Author Topic: Famous Temples Of Bhagwati Mata - उत्तराखंड मे देवी भगवती के प्रसिद्ध मन्दिर  (Read 74067 times)

मोहन जोशी

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तैसी के हमार इलाक मैं महाकाली मंदिर गंगोलीहाट छु, वा विशाल माँ चंडिका  मंदिर छु,

वीक दगरी दगरी हमर ग्वाक तरफ खिर्मांडे मैं विशाल माँ जवाला उलका मंदिर ले छु जा विसाल मेला नन्दास्थ्मी ही लागू 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Chamunda Devi Temple

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Chamunda Devi Temple is situated in Rudraprayag. The temple is dedicated to the Goddess Durga. It offers an enchanting view of the snow-clad peaks all around. Alaknanda and Mandakini rivers flow close by. Nearby attractions are Rudranath Temple, Shri Koteshwar Mahadev Temple, Gaurikund, Gupt Kashi and Son Prayag.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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चंडी माता मंदिर (चंडाग )
« Reply #62 on: May 12, 2009, 11:26:53 AM »

चंडी माता मंदिर (चंडाग )

उत्तराखंड में पिथोरागढ़ जिले में चंडाग नामक एक बहुत ऊँची चोटी है जहाँ भगवती माता (यानी चंडी माता का मंदिर) है ! कहा जाता है की इसी जगह पर माता ने चुंड मुंड राक्षसों का वध किया था !

Ref : KUmoan ka Itihas..

हेम पन्त

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ध्वज मन्दिर : पिथौरागढ
« Reply #63 on: May 12, 2009, 03:09:53 PM »
लगभग 14 किमी लम्बी व 5 किमी चौङी पिथौरागढ घाटी (सोर घाटी) तीन तरफ से पहाङों से घिरी है, जिसमें सबसे ऊंची चोटी है, ध्वज पहाङ की. समुद्र तल से 2134 मीटर की ऊंचाई पर इस चोटी के शीर्ष में जयन्ती माता का प्रसिद्ध मन्दिर है जो ध्वज मन्दिर के नाम से जाना जाता है. पिथौरागढ से 15 किमी दूर बसे टोटानौला(प्लेटा) अथवा सतगढ़ गांव से लगभग 3 घंटे तक खङी चढाई में पैदल यात्रा करने पर मां जयंती के इस सिद्ध मन्दिर में पहुंचा जा सकता है. इतनी अधिक ऊंचाई पर स्थित होने के कारण इस मन्दिर से सैकङों किमी दूरी तक स्थित पर्वत श्रंखलाएं दृष्टिगोचर होती हैं. 
 

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Bal Sundari Mandir, KASHIPUR, UTTARAKHAND
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Bal Sundari Mandir also known as Chaiti Mandir, is the most famous temple in Kashipur. During Navratras in March a grand fair is held here every year. The fair draws lakhs of pilgrims and devotees from far-flung areas. Devotees throng the temple to offer their prayers to the revered Goddess.

The temple has a simple structure with a central dome housing the idol of the Devi Bal Sundari. The structure of the temple resembles a mosque which may be due to its construction during Mughal period. There is a legend which relates to the construction of this temple to Mughal themselves, hence the influence of Muslim architecture.



There are many trees in the temple premises like Vat, Pipal and Sahtoot, including a partially burnt Kadamb tree. According to the temple priests, ancestral legend deems that this Kadamb tree was once set on fire by a tantrik with occult powers. The tantrik then challenged the priest to revive the tree. The priest got into meditation and worshipped the Goddess. It is believed that his prayers brought the tree back to life. The devotees believe that since then this tree has remained in the same condition.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गढ़वाल के विभिन्न स्थानों पर स्थापित दुर्गा एवं उसके विभिन्न स्वरुपों के महत्वपूर्ण मन्दिर निम्न हैं।
मन्दाकिनी घाटी में कालीमठ नामक स्थल पर स्थित महाकाली, महासरस्वती, महालक्ष्मी एवं हरगौरी मन्दिर
धनौल्टी (मसूरी) के निकट स्थित सरकन्डा देवी मन्दिर
हिन्डोलाखाल-टिहरी मार्ग पर स्थित चन्द्रवदनी देवी मन्दिर
कालीफट में फांगू का दुर्गा मन्दिर
बिचाला नागौर में स्थित दुर्गा मन्दिर
तल्ला उदयपुर में स्थित भवानी मन्दिर
कल्बंगवारा दुर्गा मन्दिर जहाँ देवी ने रक्तबीज का वध किया था
बिरौन, बिचला नागपुर एवं उदयपुर पट्टी (खेरा) में स्थित चामुन्डा देवी मन्दिर
श्रीनगर में स्थित ज्वालपा देवी मन्दिर
तपोवन में स्थित गौरी मन्दिर
जोशीमठ में स्थापित नवदुर्गा मन्दिर
श्रीनगर एवं अजबपुर (देहरादून) में स्थित शीतला देवी मन्दिर
बसन्त ऋतु में एवं दशहरे से ठीक पहले शरद ऋतु में नौ दिनो तक देवी दुर्गा की पूजा पूर्ण श्रृद्धा के साथ की जाती है। इन नौ दिनो को नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है एवं इन दिनो को विवाह एवं अन्य मांगलिक कार्यों के लिए अत्याधिक शुभ माना जाता है।

पंकज सिंह महर

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इग्यार देवी-पिथौरागढ़

पिथौरागढ़ और गुरना के बीच में मां भगवती के ही एक रुप इग्यार देवी का मंदिर पड़ता है, स्थानीय लोगों में इनके प्रति बहुत आस्था है। कहा जाता है कि आस-पास के ११ गांवों की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इसका नाम इग्यार देवी पड़ा। ऐसी भी किवदंती है कि ९ वीं सदी में चन्द राजाओं ने इस मंदिर की स्थापना की थी, तब मंदिर का स्वरुप छोटा था, लेकिन आज स्थानीय लोगों के सहयोग से इस मंदिर ने भव्य रुप ले लिया है।
      इस मंदिर के प्रांगण में एक पीपल का पेड़ है, इस पेड के प्रति भी लोगों की बहुत आस्था है। माना जाता है कि सच्चे मन से इस पेड़ की परिक्रमा कर मांगने से कामना पूर्ण हो जाती है। इग्यार देवी मंदिर के बारे में किवदंती है कि इस मंदिर में नवरात्रियों में मां का वाहन शेर आता था, कहा जाता है कि जब तक यहां सड़क मार्ग का निर्माण नहीं हुआ था, तब तक चैत्र और कार्तिक नवरात्र की अष्टमी को सायंकाल आरती के बाद एक शेर मंदिर में आता था और मां की मूर्ति की परिक्रमा कर प्रसाद खाकर वापस लौट जाता था।

पंकज सिंह महर

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भगवती अपर्णा-पर्णखण्डा देवी मंदिर, बद्रीनाथ

वृद्ध बदरी भगवान जिस पहाड़ों पर है उससे ऊपर पैना गांव है। पैना गांव से ऊपर पर्वत की चोटी में भगवती अपर्णा-पर्णखण्डा देवी का दिव्य मन्दिर है। भगवती पार्वती ने इसी स्थल पर भगवान शिव की प्राप्ति हेतु तप किया था। तपस्या में निरत पार्वती कभी देह रक्षा हेतु सूखे पत्ते भोजन स्वरूप प्राप्त करती रहीं परन्तु यहां तपोरत अपर्णा रहीं। यानि पत्ते चबाना भी त्याग दिए थे, इसीलिए अपर्णा नाम पडा पर्णखण्डा देवी के ही नाम से इस परगने को कालान्तर में पैनखण्डा के नाम से जाना गया, जिसका मुख्यालय जोशीमठ है।

Risky Pathak

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Way From Pankhu(Nearest Road Connectivity) To Kotgadi Devi Mandir



एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मानिला देवी मंदिर भारत के उत्तराखण्ड राज्य के अल्मोड़ा ज़िले के शल्ट में स्थित है| यह स्थान रामनगर, उत्तराखंड से लगभग ७० किमी की दुरी पर स्थित है| यहाँ तक बस या निजी वाहन द्वारा पहुंचा जा सकता है| यह इस क्षेत्र का एक प्रसिद्द मंदिर है और हर वर्ष यहाँ दूर-दूर से लोग देवी के दर्शनों के लिए आते हैं|



मंदिर दो भागों में बँटा हुआ है जिसे स्थानीय भाषा में मल मानिला और तल मानिला कहते है| प्राचीन मंदिर तो तल मनीला में ही स्थित है लेकिन मल मानिला मंदिर के पीछे की कहानी जो स्थानीय लोगो के बीच बहुत प्रचलित है वो ये है की "एक बार कुछ चोर मानिला देवी की मूर्ति को चुराना चाहते थे| लेकिन जब वो मूर्ति उठा रहे थे तो उठा न सके और तब वे मूर्ति का एक हाथ ही उखाड़ कर ले गए, लेकिन उस हाथ को भी वे अधिक दूर ना लेजा सके|" और तबसे वही पर माता का एक और मंदिर स्थापित कर दिया गया जिसे आज मल मानिला के नाम से लोग जानते है

 

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