Author Topic: Kedarnath Dham Uttarakhand- कर लो दर्शन केदारनाथ धाम के  (Read 32179 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dosto,

भारत वर्ष यह मुकुट हिमालय राज्य जो देव भूमि के नाम से भी विख्यात है! जहाँ पर पग-२ पर देवी देवताओ के मंदिर है! आज हम यहाँ पर जानकारी दे रहे है उत्तराखंड के चार धामों में एक केदारनाथ धाम का !

इस टोपिक में हम केदारनाथ से जुडी धार्मिक कथा और केदारनाथ धाम के कुछ तस्वीरे प्रस्तुत करंगे! जो सदस्य केदारनाथ धाम में पहले जा चुके है वो अपना अनुभव और यात्रा के बारे में जानकारी और फोटो भी इस टोपिक में शेयर कर सकते है !

जय केदारनाथ जी की!



एम् एस मेहता


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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भगवान् शिव के १२ बारह ज्योतिर्लिंग जो की निम्न प्रकार से देश के अलग-२ हिस्सों में है, उनमे से केदारनाथ एक है! केदार नाथ हमारे उत्तराखंड राज्य है गढ़वाल मंडल में, रुद्रप्रयाग जिले में स्थित है!  केदारनाथ ३५८१ मीटर की ऊँचाई पर मंदकिनी नदी के तट पर स्थित है !

इससे पहले हम केदारनाथ के बारे में विस्तृत में बताये, भगवन शंकर के १२ ज्योतिर्लिंग के बारे में जाने !
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   1. श्रीरामेश्वर तीर्थ तमिलनाडु प्रांत के रामनाड जिले में है। यहाँ लंका विजय के पश्चात भगवान श्रीराम ने अपने अराध्यदेव शंकर की पूजा की थी। ज्योतिर्लिंग को श्रीरामेश्वर या श्रीरामलिंगेश्वर के नाम से जाना जाता है।
   2. आन्ध्र प्रदेश प्रांत के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तटपर श्रीशैल पर्वत पर श्रीमल्लिकार्जुन विराजमान हैं। इसे दक्षिण का कैलाश कहते हैं।
   3. श्री भीमशङ्कर का स्थान मुंबई से पूर्व और पूना से उत्तर भीमा नदी के किनारे सह्याद्रि पर्वत पर है। यह स्थान नासिक से लगभग 120 मील दूर है। सह्याद्रि पर्वत के एक शिखर का नाम डाकिनी है। शिवपुराण की एक कथा के आधार पर भीमशङ्कर ज्योतिर्लिङ्ग को असम के कामरूप जिले में गुवाहाटी के पास ब्रह्मपुर पहाड़ी पर स्थित बतलाया जाता है। कुछ लोग मानते हैं कि नैनीताल जिले के काशीपुर नामक स्थान में स्थित विशाल शिवमंदिर भीमशंकर का स्थान है।
   4. श्रीघुश्मेश्वर (गिरीश्नेश्वर) ज्योतिर्लिंग को घुसृणेश्वर या घृष्णेश्वर भी कहते हैं। इनका स्थान महाराष्ट्र प्रांत में दौलताबाद स्टेशन से बारह मील दूर बेरूल गांव के पास है।
   5. श्री त्र्यम्बकेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग महाराष्ट्र प्रांत के नासिक जिले में पंचवटी से 18 मील की दूरी पर ब्रह्मगिरि के निकट गोदावरी के किनारे है। इस स्थान पर पवित्र गोदावरी नदी का उद्गम भी है।
   6. श्री सोमनाथ सौराष्ट्र, (गुजरात) के प्रभास क्षेत्र में विराजमान है। इस प्रसिद्ध मंदिर को अतीत में छह बार ध्वस्त एवं निर्मित किया गया है। १०२२ ई में इसकी समृद्धि को महमूद गजनवी के हमले से सार्वाधिक नुकसान पहुँचा था।
   7. श्रीनागेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग बड़ौदा क्षेत्रांतर्गत गोमती द्वारका से ईशानकोण में बारह-तेरह मील की दूरी पर है। निजाम हैदराबाद राज्य के अन्तर्गत औढ़ा ग्राम में स्थित शिवलिङ्ग को ही कोई-कोई नागेश्वर ज्योतिर्लिङ्ग मानते हैं। कुछ लोगों के मत से अल्मोड़ा से 17 मील उत्तर-पूर्व में यागेश (जागेश्वर) शिवलिङ्ग ही नागेश ज्योतिर्लिङ्ग है।
   8. मालवा क्षेत्र में श्रीॐकारेश्वर स्थान नर्मदा नदी के बीच स्थित द्वीप पर है। उज्जैन से खण्डवा जाने वाली रेलवे लाइन पर मोरटक्का नामक स्टेशन है, वहां से यह स्थान 10 मील दूर है। यहां ॐकारेश्वर और मामलेश्वर दो पृथक-पृथक लिङ्ग हैं, परन्तु ये एक ही लिङ्ग के दो स्वरूप हैं। श्रीॐकारेश्वर लिंग को स्वयंभू समझा जाता है।
   9. श्री महाकालेश्वर (मध्यप्रदेश) के मालवा क्षेत्र में क्षिप्रा नदी के तटपर पवित्र उज्जैन नगर में विराजमान है। उज्जैन को प्राचीनकाल में अवंतिकापुरी कहते थे।
  10. शिवपुराण में 'वैद्यनाथं चिताभूमौ' ऐसा पाठ है, इसके अनुसार (झारखंड) राज्य के संथाल परगना क्षेत्र में जसीडीह स्टेशन के पास देवघर (वैद्यनाथधाम) नामक स्थान पर श्रीवैद्यनाथ ज्योतिर्लिङ्ग सिद्ध होता है, क्योंकि यही चिताभूमि है। महाराष्ट्र में पासे परभनी नामक जंक्शन है, वहां से परली तक एक ब्रांच लाइन गयी है, इस परली स्टेशन से थोड़ी दूर पर परली ग्राम के निकट श्रीवैद्यनाथ को भी ज्योतिर्लिङ्ग माना जाता है। परंपरा और पौराणिक कथाओं से देवघर स्थित श्रीवैद्यनाथ ज्योतिर्लिङ्ग को ही प्रमाणिक मान्यता है।
  11. वाराणसी (उत्तर प्रदेश) स्थित काशी के श्रीविश्वनाथजी सबसे प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में एक हैं। गंगा तट स्थित काशी विश्वनाथ शिवलिंग दर्शन हिंदुओं के लिए सबसे पवित्र है।


  14. श्री केदारनाथ हिमालय के केदार नामक श्रृङ्गपर स्थित हैं। शिखर के पूर्व की ओर अलकनन्दा के तट पर श्री बदरीनाथ अवस्थित हैं और पश्चिम में मन्दाकिनी के किनारे श्री केदारनाथ हैं। यह स्थान हरिद्वार से 150 मील और ऋषिकेश से 132 मील दूर उत्तरांचल राज्य में है।
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Bhagwan Shiv Ke 12 Lingo Ke Baare me Yah Shalok
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    सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
    उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥1॥
    परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
    सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥2॥
    वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
    हिमालये तु केदारं घृष्णेशं च शिवालये॥3॥
    एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रात: पठेन्नर:।
    सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति॥4॥

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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केदारनाथ से जुडी धार्मिक कथा
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1.* इस ज्योतिर्लिंग की स्थापना का इतिहास संक्षेप में यह है कि हिमालय के केदार श्रृंग पर भगवान विष्णु के अवतार महातपस्वी नर और नारायण ऋषि तपस्या करते थे। उनकी आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उनके प्रार्थनानुसार ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करने का वर प्रदान किया। यह स्थल केदारनाथ पर्वतराज हिमालय के केदार नामक श्रृंग पर अवस्थित हैं।

2  पंचकेदार की कथा ऐसी मानी जाती है कि महाभारत के युद्ध में विजयी होने पर पांडव भ्रातृहत्या के पाप से मुक्ति पाना चाहते थे। इसके लिए वे भगवान शंकर का आशीर्वाद पाना चाहते थे, लेकिन वे उन लोगों से रुष्ट थे। भगवान शंकर के दर्शन के लिए पांडव काशी गए, पर वे उन्हें वहां नहीं मिले। वे लोग उन्हें खोजते हुए हिमालय तक आ पहुंचे। भगवान शंकर पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे, इसलिए वे वहां से अंतध्र्यान हो कर केदार में जा बसे। दूसरी ओर, पांडव भी लगन के पक्के थे, वे उनका पीछा करते-करते केदार पहुंच ही गए। भगवान शंकर ने तब तक बैल का रूप धारण कर लिया और वे अन्य पशुओं में जा मिले। पांडवों को संदेह हो गया था। अत: भीम ने अपना विशाल रूप धारण कर दो पहाडों पर पैर फैला दिया। अन्य सब गाय-बैल तो निकल गए, पर शंकर जी रूपी बैल पैर के नीचे से जाने को तैयार नहीं हुए। भीम बलपूर्वक इस बैल पर झपटे, लेकिन बैल भूमि में अंतध्र्यान होने लगा। तब भीम ने बैल की त्रिकोणात्मक पीठ का भाग पकड़ लिया। भगवान शंकर पांडवों की भक्ति, दृढ संकल्प देख कर प्रसन्न हो गए। उन्होंने तत्काल दर्शन देकर पांडवों को पाप मुक्त कर दिया। उसी समय से भगवान शंकर बैल की पीठ की आकृति-पिंड के रूप में श्री केदारनाथ में पूजे जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जब भगवान शंकर बैल के रूप में अंतध्र्यान हुए, तो उनके धड से ऊपर का भाग काठमाण्डू में प्रकट हुआ। अब वहां पशुपतिनाथ का मंदिर है। शिव की भुजाएं तुंगनाथ में, मुख रुद्रनाथ में, नाभि मदमदेश्वर में और जटा कल्पेश्वर में प्रकट हुए। इसलिए इन चार स्थानों सहित श्री केदारनाथ को पंचकेदारकहा जाता है। यहां शिवजी के भव्य मंदिर बने हुए हैं।

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आदि गुरु शंकराचार्य  की समाधि मंदिर के पीछे है! कहा जाता है कि चार धामों कि स्थापना के बाद शंकरा चार्य ३२ वर्ष कि आयु में यहाँ पर समाधिलींन  होगए !

महिमा व इतिहास
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केदारनाथ की बड़ी महिमा है। उत्ताराखंड में बद्रीनाथ और केदारनाथ-ये दो प्रधान तीर्थ हैं, दोनो के दर्शनों का बड़ा ही माहात्म्य है। केदारनाथ के संबंध में लिखा है कि जो व्यक्ति केदारनाथ के दर्शन किये बिना बद्रीनाथ की यात्रा करता है, उसकी यात्रा निष्फल जाती है और केदारनापथ सहित नर-नारायण-मूर्ति के दर्शन का फल समस्त पापों के नाश पूर्वक जीवन मुक्ति की प्राप्ति बतलाया गया है।

इस मंदिर की आयु के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है, पर एक हजार वर्षों से केदारनाथ एक महत्वपूर्ण तीर्थयात्रा रहा है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसा ये १२-१३वीं शताब्दी का है। ग्वालियर से मिली एक राजा भोज स्तुति के अनुसार उनका बनवाय हुआ है जो १०७६-९९ काल के थे। [२]एक मान्यतानुसार वर्तमान मंदिर ८वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा बनवाया गया जो पांडवों द्वारा द्वापर काल में बनाये गये पहले के मंदिर की बगल में है। मंदिर के बड़े धूसर रंग की सीढ़ियों पर पाली या ब्राह्मी लिपि में कुछ खुदा है, जिसे स्पष्ट जानना मुश्किल है। फिर भी इतिहासकार डॉ शिव प्रसाद डबराल मानते है कि शैव लोग आदि शंकराचार्य से पहले से ही केदारनाथ जाते रहे हैं। १८८२ के इतिहास के अनुसार साफ अग्रभाग के साथ मंदिर एक भव्य भवन था जिसके दोनों ओर पूजन मुद्रा में मूर्तियां हैं। “पीछे भूरे पत्थर से निर्मित एक टॉवर है इसके गर्भगृह की अटारी पर सोने का मुलम्मा चढ़ा है। मंदिर के सामने तीर्थयात्रियों के आवास के लिए पंडों के पक्के मकान है। जबकि पूजारी या पुरोहित भवन के दक्षिणी ओर रहते हैं। श्री ट्रेल के अनुसार वर्तमान ढांचा हाल ही निर्मित है जबकि मूल भवन गिरकर नष्ट हो गये

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स्थिति
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चौरीबारी हिमनद के कुंड से निकलती मंदाकिनी नदी के समीप, केदारनाथ पर्वत शिखर के पाद में, कत्यूरी शैली द्वारा निर्मित, विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर (३,५६२ मीटर) की ऊँचाई पर अवस्थित है। इसे १००० वर्ष से भी पूर्व का निर्मित माना जाता है। जनश्रुति है कि इसका निर्माण पांडवों या उनके वंशज जन्मेजय द्वारा करवाया गया था। साथ ही यह भी प्रचलित है कि मंदिर का जीर्णोद्धार जगद्गुरु आदि शंकराचार्य[५] ने करवाया था। मंदिर के पृष्ठभाग में शंकराचार्य जी की समाधि है। राहुल सांकृत्यायन द्वारा इस मंदिर का निर्माणकाल १०वीं व १२वीं शताब्दी के मध्य बताया गया है। यह मंदिर वास्तुकला का अद्भुत व आकर्षक नमूना है। मंदिर के गर्भ गृह में नुकीली चट्टान भगवान शिव के सदाशिव रूप में पूजी जाती है। केदारनाथ मंदिर के कपाट मेष संक्रांति से पंद्रह दिन पूर्व खुलते हैं और अगहन संक्रांति के निकट बलराज की रात्रि चारों पहर की पूजा और भइया दूज के दिन, प्रातः चार बजे, श्री केदार को घृत कमल व वस्त्रादि की समाधि के साथ ही, कपाट बंद हो जाते हैं। केदारनाथ के निकट ही गाँधी सरोवर व वासुकीताल हैं। केदारनाथ पहुँचने के लिए, रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी होकर, २० किमी. आगे गौरीकुंड तक, मोटरमार्ग से और १४ किमी. की यात्रा, मध्यम व तीव्र ढाल से होकर गुज़रनेवाले, पैदल मार्ग द्वारा करनी पड़ती है।

मंदिर मंदाकिनी के घाट पर बना हुआ हैं भीतर घारे अन्धकार रहता है और दीपक के सहारे ही शंकर जी के दर्शन होते हैं। शिवलिंग स्वयंभू है। सम्मुख की ओर यात्री जल-पुष्पादि चढ़ाते हैं और दूसरी ओर भगवान को घृत अर्पित कर बाँह भरकर मिलते हैं, मूर्ति चार हाथ लम्बी और डेढ़ हाथ मोटी है। मंदिर के जगमोहन में द्रौपदी सहित पाँच पाण्डवों की विशाल मूर्तियाँ हैं। मंदिर के पीछे कई कुण्ड हैं, जिनमें आचमन तथा तर्पण किया जा सकता है।[६]

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केदारनाथ,मंदिर वास्तुशिल्प
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यह मंदिर एक छह फीट ऊंचे चौकोर चबूतरे पर बना हुआ है। मंदिर में मुख्य भाग मंडप और गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। बाहर प्रांगण में नंदी बैल वाहन के रूप में विराजमान हैं। मंदिर का निर्माण किसने कराया, इसका कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है, लेकिन हां ऐसा भी कहा जाता है कि इसकी स्थापना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी।

मंदिर की पूजा श्री केदारनाथ द्वादश ज्योतिर्लिगों में से एक माना जाता है। प्रात:काल में शिव-पिंड को प्राकृतिक रूप से स्नान कराकर उस पर घी-लेपन किया जाता है। तत्पश्चात धूप-दीप जलाकर आरती उतारी जाती है।

 इस समय यात्री-गण मंदिर में प्रवेश कर पूजन कर सकते हैं, लेकिन संध्या के समय भगवान का श्रृंगार किया जाता है। उन्हें विविध प्रकार के चित्ताकर्षक ढंग से सजाया जाता है। भक्तगण दूर से केवल इसका दर्शन ही कर सकते हैं। केदारनाथ के पुजारी मैसूर के जंगम ब्राह्मण ही होते हैं।

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                                       हिमालय की असीम वादियों में केदारनाथ धाम
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प्राकृतिक सौंदर्य को अपने गर्भ में छिपाए, गढ़वाल हिमालय की पर्वत शृंखलाओं के मध्य, सनातन संस्कृति का शाश्वत संदेश देनेवाले, अडिग विश्वास के प्रतीक केदारनाथ और अन्य चार पीठों सहित, इसे पंचकेदार के नाम से जाना जाता है। श्रद्धालु तीर्थयात्री, सदियों से इन पावन स्थलों के दर्शन कर, कृतकृत्य और सफल मनोरथ होते रहे हैं।

 जनश्रुति है कि पांडवों ने कुरुक्षेत्र युद्ध से विजयश्री प्राप्त करने के पश्चात अपने ही संबंधियों की हत्या करने की आत्मग्लानि से पीड़ित होकर, शिव आशीर्वाद की कामना की, किंतु शिव इस हेतु इच्छुक न थे। शिव ने पांडवों से पीछा छुड़ाने हेतु केदारनाथ में शरण ली, जहाँ कि पांडवों के पहुँचने का आभास होते ही, उन्होंने बैल रूप में प्राण त्याग दिए।

 उस स्थान से पीठ के अतिरिक्त शेष भाग लुप्त हो गया। अन्य चार स्थलों पर शेष भाग दिखाई दिए, जो कि शिव के उन रूपों के आराधना स्थल बने। मुख - रुद्रनाथ, जटा-सिर - कल्पेश्वर, पेट का भाग - मध्यमेश्वर और हाथ - तुंगनाथ में पूजे जाते हैं। केदारनाथ सहित ये चार स्थल ही पंचकेदार के नाम से जाने जाते हैं।

मध्यमहेश्वर अन्य चार केदारों के मध्य स्थित है। मध्यमहेश्वर व तुंगनाथ दक्षिण में और कल्पेश्वर पूर्व में स्थित है। ये तीनों केदार एक समद्विबाहु त्रिभुज के शीर्षों पर स्थित हैं।

 केदारनाथ और कल्पेश्वर नदी घाटी में स्थित हैं, जबकि रुद्रनाथ, मंदाकिनी-अलकनंदा जल-विभाजक पर स्थित है। मंदाकिनी घाटी से चार केदारों को संबंध होने के कारण इसे केदारघाटी के नाम से जाना जाता है।



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                                                 कत्यूरी शैली द्वारा निर्मित केदारनाथ
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हिमनद के तुंड से निकलती मंदाकिनी नदी के समीप, केदारनाथ पर्वत शिखर के पाद में, कत्यूरी शैली द्वारा निर्मित, विश्व प्रसिद्ध केदारनाथ मंदिर (3562 मीटर) अवस्थित है। इसे 1000 वर्ष से भी पूर्व का निर्मित माना जाता है। जनश्रुति है कि इसका निर्माण पांडवों या उनके वंशज जन्मेजय द्वारा करवाया गया था। साथ ही यह भी प्रचलित है कि मंदिर का जीर्णोद्धार जगद्गुरु शंकराचार्य ने करवाया था।

 मंदिर के पृष्ठभाग में शंकराचार्य जी की समाधि है। राहुल सांकृत्यायन द्वारा इस मंदिर का निर्माणकाल 10वीं व 12वीं शताब्दी के मध्य बताया गया है। यह मंदिर वास्तुकला का अद्भुत व आकर्षक नमूना है। मंदिर के गर्भ गृह में नुकीली चट्टान भगवान शिव के सदाशिव रूप में पूजी जाती है।

 केदारनाथ मंदिर के कपाट मेष संक्रांति से पंद्रह दिन पूर्व खुलते हैं और अगहन संक्रांति के निकट बलराज की रात्रि चारों पहर की पूजा और भइया दूज के दिन, प्रातः चार बजे, श्री केदार को घृत कमल व वस्त्रादि की समाधि के साथ ही, कपाट बंद हो जाते हैं।

केदारनाथ के निकट ही गाँधी सरोवर व वासुकीताल है। केदारनाथ पहुँचने के लिए, रुद्रप्रयाग से गुप्तकाशी होकर, 20 किमी. आगे गौरीकुंड तक, मोटरमार्ग से और 14 किमी. की यात्रा, मध्यम व तीव्र ढाल से होकर गुज़रनेवाले, पैदल मार्ग द्वारा करनी पड़ती है।



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                        पांडवों द्वारा किया गया था पुराने केदारनाथ धाम का निर्माण
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उत्तराखण्ड के पावन चार धामों में से एक प्रसिद्ध तीर्थ केदारनाथ के पौराणिक मंदिर का निर्माण पांडवों ने किया था। आठवीं शताब्दी में आदि जगद्गुरू शंकराचार्य ने केदारनाथ का वर्तमान मंदिर बनवाया। पांडवों द्वारा निर्मित तथा शंकराचार्य जी द्वारा निर्मित मंदिर आमने-सामने हैं।

 श्री केदारनाथ भगवान शिव के बाहर ज्योतिर्लिंगों में से एक है। पौराणिक मतानुसार केदारनाथ में शिवलिंग, तुुंगनाथ में बाहु, रुद्रनाथ में मुखऽ, मदमहेश्वर में नाभि तथा कल्पेश्वर में जटा के रूप्प में भगवान शिव की पूजा अर्चना की जाती है।

पौराणिक ग्रंथों में कहा गया है कि केदारनाथ अर्थात केदारांचल में प्राण त्याग करने वाले मनुष्य को शिवलोक की प्राप्ति होती है। गरूड़ पुराण के अनुसार केदार तीर्थ में स्नान करने से सभी पापों का शमन हो जाता है। वामन पुराण के अनुसार केदार क्षेत्रा में निवास करने से तथा रुद्र का पूजन करने से मुनष्य स्वर्ग को प्राप्त करता है। पद्म पुराण के अनुसार केदारनाथ के दर्शन करने से मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होता है।
ब्रह्म वैवृत पुराण के अनुसार सतयुग में सप्तद्वीप का केदार नाम का राजा था।

 अपनी वृद्धावस्था समीप देऽकर उसने अपना सम्पूर्ण राज्य अपने पुत्रा को सौंपा तथा हिमालय की वादियों में जाकर जप, तप करने लगा। जहां इस राजा ने तपस्या की वह स्थान कालान्तर में केदारखण्ड नाम से प्रसिद्ध हुआ। शिव पुराण में कहा गया है कि केदारनाथ में केदारेश्वर लिंग के दर्शन करने से महापापी भी पापों से छूट जाता है।

 स्कन्द पुराण के अनुसार महाभारत युद्ध की विभीषिका से उकताकर जब युधिष्ठिर आदि पांडवों ने गेात्र हत्या तथा गुरु हत्या के पाप से छूटने के उपाय जानने हेतु वेद व्यास जी से पूछा तो व्यास जी ने कहा कि शास्त्रों में पापों के प्रायश्चित नहीं है। बिना केदार के जाए यह पाप नहीं छूट सकते हैं। तुम लोग केदारनाथ जाओ, वहां निवास करने से सब प्रकार के पाप नष् हो जाते हैं। केदारनाथ में मृत्यु होने से मनुष्य शिव रूप हो जाता है यही महापथ है। तब पांडवों ने अपने हिमालय के लिए प्रस्थान किया।

 कहते हैं कि जब पांडव केदारनाथ जाने लगे तो भगवान शिव वहां से भैंसे का रूप धारण करके भाग गये। जब भीम को पता चला कि भगवान शिव ने भैंसे का रूप ध्र लिया है तो भीम रास्ता घेरकर खड़े हो गये। शिव की माया से सैकड़ों भैंस केदारनाथ से नीचे उतरने लगीं उनमें भगवान शिव भी भैंस रूप में थे।

 भीम ने अपने विशाल शरीर से मार्ग को घेर लिया तथा एक पांव मार्ग के इस ओर व दूसरा दूसरी ओर करके खड़े हो गये। अन्य भैंसे तो भीम के पांवों के नीचे से गुजरने लगीं लेकिन जब भैंस रूपी भगवान शिव का नम्बर आता तो वे मार्ग से उलटा चल देते। भीम समझ गये कि यही भगवान शिव हैं जैसे ही पांडवों ने उन्हें पकड़ना चाहा भगवान शिव ने भैंस रूपी शरीर से धरती पर वार करना शुरू कर दिया।

कहते हैं वहां से सिर रूप में भगवान शिव नेपाल में निकले तथा धड़ यहीं रह गया। नेपाल में प्पशुपतिनाथ का विश्व प्रसिद्ध शिव मंदिर इसी स्थान पर है। बाद में भगवान शिव ने तब पांडवों को दर्शन दिये।



 

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