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Author Topic: Nanda Raj Jat Story - नंदा राज जात की कहानी  (Read 42931 times)

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पंकज सिंह महर

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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #15 on: April 28, 2008, 11:55:20 AM »
........रुपकुण्ड से आगे ज्यूंगरालीधार के बाद होमकुण्ड में जाकर राजजात की समाप्ति होती है। होमकुण्ड में नन्दादेवी की पूजा होती है। छतोलियाँ और चौसिंगा खाडू भी पूजा के पश्चात् देवी को अर्पित किये जाते हैं। यहाँ पर विचित्र चौसिंगा खाडू विशाल जनसमूह को छोड़कर देवी का उपहार पीठ पर लदे अकेला ही दुर्गम पहाड़ों के रास्ते कैलाश की ओर चल देता है। इसे देवी का ही चमत्कार माना जाता है। कहा जाता है कि यह खाडू कैलाश तक निर्विघ्न पहुँच जाता है। इसके बारे में अनेक आश्चर्यजनक लोककथायें भी प्रचलित हैं।
और, अन्तत: होमकुण्ड में देवी की विदाई के बाद प्रसाद बांटा जाता है और नौटियाल और कुंवर लोग वापस नौटी आते हैं। नौटी में यात्रा काल के दौरान रुके लोगों द्वारा भागवत कथा तथा यज्ञ आदि किये जाते हैं। राजजात से लौटे लोगों के आने पर भोज इत्यादि का आयोजन होता है। और इस प्रकार राजजात पूर्ण होती है।
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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
मुझको तो हिम से भरे अपने पहाड़ ही प्यारे हैं.

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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #16 on: June 16, 2008, 01:07:44 PM »
राजजात की परम्परा कांसुवा के कुंवरों द्वारा निभाई जाती रही है। यह जात १९ पड़ावों से गुजर कर पूरी होती है। उनका विवरण आगे प्रस्तुत होगा।
यात्रा का प्रारम्भ-

नन्दादेवी सिद्ध पीठ नौटी में भगवती नन्दादेवी की स्वर्ण प्रतिमा पर प्राण प्रतिष्ठा देकर, रिंगाल की पवित्र राजछतोली व चार सींग के मेढे़ की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भगवती नन्दा को मायके से ससुराल भेजने के लिये आभूषण, वस्त्र, उपहार, मिठाई आदि चार सींग के मेढ़े की पीठ पर फांचे में रखकर कैलाश की ओर विदा किया जाता है। (वर्ष १९९४ में कांचीकोटि के शंकराचार्य जी के मार्गदर्शन में उत्तर भारत का पहला श्रीयंत्र मंदिर की स्थापना कैलाश मानसरोवर के स्वामी प्रणवानन्द जी ने श्री नन्दा देवी परिसर में करायी)। कहा जाता है कि नौटी गांव में प्रत्येक राजजात यात्रा के अवसर पर नरबलि द्वारा देवी की पूजा संपन्न करायी जाती थी जो ३०० साल पहले भगवती ने नरबलि को स्वीकार नहीं की, तो यह प्रथा समाप्त हो गई।
       इस आयोजन का पहलू यह भी है कि जब यह यात्रा अपने चरम के लिये हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में प्रवेश करती है, ठीक उसी समय सिद्धपीठ नौटी में कथा-वाचन-श्रवण हो, इस आराधना के साथ शुरु होती है कि यात्रा सुगम हो औए कष्टप्रद न हो तथा सभी यात्री सकुशल लौंटे।
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आंखों के आगे वनश्री के खुलते पट न्यारे-२ हैं,
छोटे-छोटे खेत और आडू सेबों के बगीचे, देवदार वन,
जो नभ तक अपना छवि जाल पसारे हैं,
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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #17 on: June 16, 2008, 01:28:18 PM »
चार सींग वाला मेढ़ा, जो नंदा राज जात यात्रा में सबकी अगुवाई करता है।

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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #18 on: June 16, 2008, 01:39:15 PM »
नन्दा को उत्तराखण्ड की बेटी माना जाता है और नन्दा राज जात भी इसी का प्रतीक है, जैसे अपनी बेटी को बुलाने और पहुंचाने की प्रक्रिया होती है, वैसे ही इस पर्व में नन्दा को बुलाने और ससुराल भेजा जाता है।
नन्दा जात में शरद ऋतु के आगमन पर गंगाड़ी साक समौण के साथ नन्दा को बुलाने जाते हैं और पतझड़ के आगमन से पूर्व ननदा को ससुराल भेजा जाता है।
     नन्दिकुंड जात से जब वापस आते हैं तो भोजपत्र की पवित्र छतोली ब्रह्मकमलों से लदी होती है। नन्दा के मायके आने की अभिव्यक्ति का प्रतीक छतोली का ढोल-दमाऊं व भोंकरों के स्वरों के साथ स्वागत किया जाता है।
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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #19 on: June 16, 2008, 01:48:44 PM »
शरद ऋतु के आगमन पर नन्दा का आगमन होत है, मैतुड़ा (मायका) के देश पर नन्दा की दृष्टि पड़ते ही धान की बालियों में पीलापन आ जाता है और धान की कटाई आरम्भ हो जाती है। इसलिये नन्दा माई की पूजा के समय पीला परिधान अर्पित किय जाता है और गीत गाये जाते हैं-

आई पहुंची नन्दा या धरम की धाती
ऋषियों की ध्याण स्या मैणा की लाडली।
देवतों की माता स्या मातुली मा ऎग्ये,
मातुली मा ऎग्ये स्या हेरंदी देखंदी।
कुमायूं की कोटमाई, गढ़ की भवानी,
धिया की लाड़ली या मैत्यू की पियारी।
आई पहुंची नन्दुला मैत्यू को मडुली,
मैत्यू की मडुली स्या हेरंदी देखंदी॥
हेर्याली देख्याली यो मैतुड़ा को देश,
मैतुड़ा को देश यो कनु प्यारु लगद॥
मैत्यू की मडुली या भेंटुली भॆंटीग्ये,
भेंटुली भॆंटीग्ये या खुद विसरेग्ये॥
पंच भै टोपल्या सी मनोला-बुझोला,
पंच मै टोपल्या सी मनोला-बुझौला।
हर्षेमान ह्वैगी नन्दूला माई,
दीजाया असीस नन्दूला माई,
तेरो असीस सिर्वाणी धरौंला,
दीजाया असीस नन्दूला माई......।
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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #20 on: June 16, 2008, 02:04:34 PM »
नन्दा जी जब ससुराल जाती हैं तो अपरिचित देश के लिये विदा होने वाली बेटी नन्दा अपने माता-पिता के पास क्या रुनेड़ा लगाती है-

यकुली यकुली बाबा जी मी लगदी डर
यकुली यकुली मी कनी कैकि जोऽलू।

बेटी के आंसू पोंछते हुये माता-पिता उसे समझाते हैं-

आगि द्यूंलो बेटी त्वे सकल जनीत,
पीछी द्यूंलो बेटी त्व हसती व घोड़ा,
आगे जाला हाथी ब्वे पिछी जाला घोड़ा,।
गोरु को गोठ्यार ब्वे बाखरयूं की नांदी,
त्वे दगड़ी जाला सीं तेरा दीदी भूला,
त्वे दगड़ी जाल सीं पौणा दासी दास।
त्वेंते मेरा धिया ब्वे एकुली ना भेजूं,
त्वेकूं द्यूलो धिया ब्वै गंगाड़ समौण।
काखड़ी मुंगरी ब्वै च्यूड़ी रे भुजजी,
त्वीकूं द्यूंलो लाड़ी मी बावन रस्याल,
गंगाडू समौण मी कैलास पोछोलू,
त्वेकूं मेरी लाड़ी मी एकूली नी भेजू,
तेरो भाई लाटू ब्वै बाटा कू अग्वालू,
ज्येठू भै वजीर ब्वै औंसी कू झड़वालू,
त्वेकूं मेरी लाड़ी मी एकूली नी भेजू,
त्वेकूं मेरी लाड़ी मी एकूली नी भेजू॥


यह अश्रुपूर्ण विदाई का दॄश्य सबके हृदय को करुणा से भर देता है और सबके आंखों में आंसू ला देता है।
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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #21 on: June 18, 2008, 12:27:25 PM »
जैसा मैंने पहले बताया था कि यह यात्रा १९ पड़ावों से होकर गुजरती है तो अब इन पड़ावों की संक्षिप्त जानकारी आपके सम्मुख प्रस्तुत है-

प्रथम पड़ाव- ईड़ाबधाणी

नौटी में यात्रा के शुभअवसर पर अपार भीड़ होती है, गाजे-बाजे व भंकोरों सहित भगवती नन्दा को हजारों लोग विदा करते हैं। भगती वचन निभाने के लिये ईड़ाबधाणी में पूजा लेने आती है। मार्ग में छंतोली, ल्यूइसा, सिलिंगी, चौड़ती, हेलुती आदि होते हुये आती है तथा नन्दा छतोली व खाड़ू का नौटी से चलकर प्रथम रात्रि विश्राम ईड़ाबधाणी में ही होता है
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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #22 on: June 18, 2008, 12:30:24 PM »
दूसरा पड़ाव-नौटी

ईड़ा बधाणी से यात्रा दूसरे दिन वापस नौटी के लिये रवाना होती है। मार्ग में रिठोली,जाख, दियारकोटी, कुकुड़े, पुड़ियाणी, कनोठ, झड़कण्डे व नैणी गांवों में पूजा लेकर रात्रि विश्राम नौटी में होता है।
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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #23 on: June 18, 2008, 12:37:42 PM »
तीसरा पड़ाव-कांसुवा

नौटी से नन्दादेवी राजजात की कैलाश के लिये विदाई के समय गांव के नर-नारी बच्चे नम आंखों से विदा करते हैं। नैणी, देवल  गढ़सारी की छ्तोलियां वैनोली गांव से पहले यात्रा में शामिल होती है। मलैड़ी व नौना की छतोलियां भी यात्रा में शामिल होकर राजजात की शोभा बढ़ाती है। यात्रा गढ़वाल के राजवंशी कुंवरों के मूल गांव कांसुवा पहुंचती है। यहां पर परम्परागत रुप से यात्रियों का भव्य स्वागत होता है। राजा के छोटे भाई (कान्सा) के गांव कांसुवा में नन्दादेवी, भराड़ी देवी व कैलापीर देवताओं के मन्दिर हैं। भराड़ी के चौक में सर्वप्रथम चार सींग वाले मेढे़ और पवित्र राज छतौली की पूजा-अर्चना होती है।
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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #24 on: June 18, 2008, 12:49:11 PM »
चौथा पड़ाव- सेम

कांसुवा से सेम रवाना होने पर कांसुवा गांव में नन्दादेवी की छतोली ड्यूंडी ब्राहमणों को सौंपी जाती है। तत्पश्चात गढ़वाल नरेशों की प्रथम राजधानी चांदपुर गढ़ी में गढ़्वाल नरेश के वंशजों द्वारा शाही पूजा करवायी जाती है। जिसे देखने गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र से यात्री बड़ी संख्या में आते हैं। यहीं पर कैलीपीर में काली जी का भव्य मंदिर व चांद्पुर गढ़ी के गढ़वाल राज्य की प्रथम राजधानी के महल व किले हैं। नन्दा की जात यहां पर तोप की पूजा पाकर सेम पहुंचती है, यहां पर गरौली व चमोला की छतोलियां भी जात में शामिल होती हैं। सेम में नन्दा देवी का प्राचीन मंदिर भी है।
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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #25 on: June 18, 2008, 12:54:41 PM »
पांचवा पड़ाव- कोटी

सेम से कोटी जाने के लिये धारकोट तक थोड़ी चढ़ाई है, धारकोट, घण्डियाल व सिमतौली गांवों में पूजा पाकर यात्रा सितोली धार पहुंचती है। यहां पर भगवती से कोटिशः प्रार्थना की जाती है, इसलिये इसका गांव का नाम कोटी पड़ा । यात्रा नन्दादेवी मंदिर कोटी व मैती पहुंचती है। यहां पर विशेष पूजा होती है। यहीं पर खण्डुरा, रतूडा़, चूलाकोट, थापली व बगोली के लाटू यात्रा में शामिल होते हैं। रात में मंदिर में जागरण होता है, यहां पर पत्थर की अतिप्राचीन मूर्तियां और मंदिर हैं।
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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #26 on: June 18, 2008, 01:09:20 PM »
छठवां पड़ाव- भगोती

कोटी से भगोती रवाना होने पर धतोड़ा के खेतों में भगवती के पहलवानों का मल्ल युद्ध होता है। इस युद्ध को देखने के लिये सम्पूर्ण क्षेत्र का विशाल मेला यहां पर लगता है। कोटी, धतोड़ा, बम्याला, कंडवाल गांव, चौरीखाल, छैकुड़ा और मनोड़ा की छतोलियां राजजात में शामिल होती हैं। भगोती पहुंचने पर नन्दाजात दल का भव्य स्वागत होता है, यह भगवती के मायके क्षेत्र का अंतिम पड़ाव होता है।
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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #27 on: June 18, 2008, 01:19:54 PM »
सातवां पड़ाव- कुलसारी

भगोती से केदारु देवता की छ्तोली भी यात्रा में शामिल होती है। भगोती गांव की सीमा पर क्यूर गधेरे पर किमोली नैणी की छ्तोलियों का मिलन होता है। यहां पर भगवती कई घंटों की अनुनय-विनय के बाद मायके से ससुराल क्यूर गधेरे को पार कर प्रवेश करती है। यहां से बुटोला थोकदारों, सयाणों का सहयोग प्राप्त होता है। रास्ते में नारायणबगड़, पन्ती, बैनोली, मींग गधेरा, हरमनी, नगरकोटी में यात्रा का भव्य स्वागत होता है। कुलसारी पहुंचने पर भगवती के ससुराल क्षेत्र के प्रथम पड़ाव में पहुंचने पर भव्य स्वागत होता है। यहां पर राजजात हमेशा अमावस्या के ही दिन पहुंचती है। अमावस्या की कालरात्रि को कालीयंत्र भूमि से निकालकर पूजा-अर्चना की जाती है, फिर अगली यात्रा तक के लिये इसे भूमिगत किया जाता है। यहां पर दक्षिणकाली, त्रिमुखी शिव, लक्ष्मीनारायण, हनुमान और सूर्य भगवान का मंदिर है तथा बाहर के क्षेत्र में लक्ष्मी जी की चरण पादुका भी है।
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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #28 on: June 18, 2008, 01:30:09 PM »
आठवां पड़ाव- चेपडंयू

कुलासारी से चलने पर थराली में विशाल मेला लगता है। थराली के पास ही देवराड़ा गांग है, जहां बधाण की राजराजेश्वरी नन्दादेवी वर्ष में ६ महीने रहती है। शेष ६ महीना कुरुड़ दशोली में रहती है। यह गांव बुटोला थोकदारोम का गांव है, यहां पर नन्दा देवी की स्थापना घर पर ही की गयी है, रात्रि विश्राम के समय सभी लोग देवी का जागरण करते हैं।
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Re: नंदा देवी - उत्तराखंड की ईष्ट देवी ( नंदा राज जात की कहानी)
« Reply #29 on: June 18, 2008, 01:41:52 PM »
नौवां पड़ाव- नन्दकेशरी

यहां पर बधाण की राजराजेश्वरी नन्दादेवी की डोली कुरुड़ से चलकर राजजात में शामिल होती है, साथ ही कुमाऊं से भारी संख्या में यात्री अल्मोड़ा, नन्दाकोट, डंगोली आदि स्थानों से छ्तोली-कटार आदि जात में शामिल होती है। किवदंती है कि नन्दकेशरी में सुराई के पेड़ पर केश अटक जाने के कारण देवी दैत्यों से बचने के लिये पेड़ में छइप गई और भैरव को याद किया और उसके बाद महादेव ने उनकी रक्षा की। जिस कारण इसका नाम नन्दकेशरी पड़ गया, यात्रा में नन्दकेशरी में ही मन्दिरों का समूह मिलता है। नन्दकेशरी सम्पूर्ण गढ़वाल और कुमाऊं के देवताओं का मिलन स्थल भी कहलाता है।
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