Author Topic: Roopkund: Unsolved Mystery - रुपकुण्ड: एक अनसुलझा रहस्य  (Read 62859 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

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  रूपकुंड की यात्रा के लिए जून उत्तरार्द्ध से सितम्बर उत्तरार्द्ध का समय सर्वोत्तम होता है क्योंकि इसके बाद इस पूरे क्षेत्र में हिमपात का सिलसिला प्रारम्भ हो जाता है जिससे पर्यटकों को यात्रा के लिए अनुकूल परिस्थितियां दुर्लभ हो जाती हैं।
 
 यहां मखमली हरी घास के मैदान हैं जिन्हें कश्मीर में सोनमर्ग और गुलमर्ग जैसे नामों से जाना जाता है। समुद्रतल से २४०० मीटर की ऊंचाई पर पसरा हुआ वेदनी बाग एशिया के प्रमुख विशाल बागों में से एक है। यहां पहुंचने पर पर्यटक की थकान पल भर में उड़न छू हो जाती है और वह ताजगी से सराबोर होकर अनोखी स्फूर्ति का अनुभव करता है। उसे यहां असीम सुखद आनंद की अनुभूति होती है।
         

 कहा जाता है कि वेदों की रचना यहीं पर की गई थी। यहां मौजूद एक छोटे कुंड में किया गया तर्पण पूर्वजों के लिए कल्याणकारी माना जाता है। अगले १८ किलोमीटर की पदयात्रा के बाद पर्यटक रूपकुंड के पास पहुंच जाता है। इस दिव्य कुंड की अथाह गहराई

  कटोरेनुमा आकार तथा चारों ओर बिखरे नर कंकाल व वातावरण में फैले गहन निस्तब्धता से मन में कौतूहल व जिज्ञासा का ज्वार उत्पन्न हो जाता है। रूपकुंड के रहस्य का प्रमुख कारण ये नर कंकाल ही हैं जो न केवल इसके इर् गिर्द दिखते हैं बल्कि तालाब में इनकी परछाइयां भी दिखाई पड़ती हैं।

 इन अस्थि अवशेषों के विषय में क्षेत्रवासियों में अनेक प्रकार की किवदन्तियां प्रचलित हैं जिन्हें सुनकर पर्यटक रोमांचित हो उठता है। वर्षों से पुरातत्ववेत्ता व इतिहासकार इन नर कंकालों के रहस्य का पता लगाने में जुटे हैं लेकिन अब तक कोई ठोस और सर्वमान्य हल नहीं निकाल पाए हैं
 
 एक पौराणिक कथा के अनुसार इस रहस्मयी रूपकुंड की उत्पत्ति भगवान शिव के त्रिशूल गाड़ने से हुई थी। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार भगवान शंकर मां पार्वती के साथ कैलाश पर्वत की ओर गमन कर रहे थे तो माता पार्वती प्यास से व्याकुल हो उठीं तब शिवजी ने अपना त्रिशूल गाड़कर एक कुंड की रचना की।

पार्वती जी ने अंजुलि से कुंड का जल पी कर अपनी प्यास बुझाई। जल पीते समय रूपकुंड के जल में अपने श्रंगार का प्रतिबिम्ब देखकर वे अति हर्षित हो गईं। माता पार्वती को प्रसन्नचित और प्रफुल्लित देखकर भगवान शंकर ने इस कुंड को रूपकुंड का नाम दे दिया।

पंकज सिंह महर

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विनोद सिंह गढ़िया

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कंकाल के रूप में 600 साल से तड़प रही हैं यह आत्माएं !!

भारत वर्ष दुनियां के ऐतिहासिक राष्ट्रों में से एक है. इसका विस्तृत इतिहास बेहद रोमांचकारी और अपने अंदर कई रहस्यों को समेटे हुए है. पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक फैली भारत की सीमाओं के अंदर कई ऐसे राज हैं जो आज भी सुलझने का इंतजार कर रहे हैं. ऐसे ही कुछ राज छिपे हैं हिमालय की विशाल श्रृंखलाओं और गुफाओं में. इन गुफाओं में जितनी खोज की जाती है उतने ही राज सामने आते जाते हैं. हिमालय अपने सीने में अनेक रहस्यों को छिपाएं हुए है. जानकार इस बात की पुष्टि करते हैं कि प्राचीन काल से ही यहां जिज्ञासुओं और पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता था. हिमालय की बर्फीली पहाड़ियों के बीच बसा रूपकुंड भी ऐसे ही रहस्यों को समेटे हुए हैं, जिन्हें सुलझा पाना शायद किसी के लिए भी सरल नहीं है.



अभी तक बहुत से वैज्ञानिकों द्वारा रूपकुंड के रहस्यों को भेदने के दावे तो बहुत हुए हैं लेकिन कोई भी अभी तक वहां रखे नरकंकालों के रहस्य से पर्दा नहीं उठा पाया है. दुर्गम होने के कारण वर्षों तक अज्ञात रहे इस कुंड में 500 से अधिक नरकंकाल बिखरे पड़े हैं. लेकिन बर्फीली झील के पास इतने सारे कंकाल किसके हैं, यह कोई नहीं समझ पा रहा है.

वन विभाग के पूर्व अधिकारी मढ़वाल वर्ष 1942-43 में दुर्लभ पुष्पों की खोज करते-करते यहां पहुंच गए थे लेकिन जब उन्होंने इतनी संख्या में नर कंकालों को देखा तो उन्हें लगा कि वह किसी दूसरे ही लोक में आ गए हैं. उनके साथी तो इस दृश्य को देखकर डरकर भाग गए.

वर्ष 1957 से 1961 तक यहां कई शोध परीक्षण किए जाते रहे. लखनऊ विश्वविद्यालय से संबद्ध नृवंशशास्त्री डॉ. डी.एन. मजूमदार ने भी 1957 में यहां से कुछ कंकालों के नमूने मानव शरीर विशेषज्ञ डॉ. गिफन को अमेरिका भेजे. रेडियो कार्बन विधि से परीक्षण करने पर डॉ. गिफन को ज्ञात हुआ कि यह कंकाल लगभग 400-600 वर्ष पुराने हैं.



इन कंकालों के पीछे की हकीकत तो कोई नहीं जानता लेकिन इनसे संबंधित एक पौराणिक मान्यता जरूर लोगों को चौंका रही है. स्थानीय लोगों का कहना है कि एक बार कन्नौज के राजा यशोधवल, सेना और अन्य साथियों के साथ नंदादेवी के दर्शन के लिए गए. उन्होंने गढ़वाल क्षेत्र की पावन धार्मिक नियमों और सभी मर्यादाओं की उपेक्षा की. राजा अपनी गर्भवती रानी व दास-दासियों सहित तमाम लश्कर दल के साथ त्रिशूल पर्वत होते हुए नंदादेवी यात्रा मार्ग पर स्थित रूपकुंड में पहुंचे.


नंदादेवी के प्रकोप के कारण वहां अचानक भयंकर वर्षा के साथ ओले गिरने लगे. अन्य साथियों और सेना के साथ राजा का परिवार भी यहां फंस गया और उनकी जान चली गई. यह नरकंकाल उन्हीं के हैं.


Devbhoomi,Uttarakhand

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रूपकुंड महोत्सव के 25 वर्ष पूरे होने पर भव्य होगा आयोजन
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देवाल: 13हजार फीट की ऊंचाई पर देवाल स्थित वेदनीकुंड में नंदासप्तमी को नंदालोकजात यात्रा के दौरान वेदनी में तीन दिवसीय रूपकुंड महोत्सव इस वर्ष अपने 25 वर्ष पूरे होने पर 20 से 22 सितंबर को धूमधाम से मनायेगा। इसके लिए समिति का गठन कर सदस्यों को जिम्मेदारियां सौंप दी गयी हैं।

मेला कमेटी संस्थापक रामचंद्र उनियाल ने कहा कि मेला समिति में संरक्षक जिलाधिकारी चमोली, अध्यक्ष का जिम्मा जिला पंचायत अध्यक्ष भगवती प्रसाद, कार्यक्रम अध्यक्ष जीत सिंह दानू, संयोजक पर्यटन अधिकारी मेला अधिकारी उपजिलाधिकारी थराली डीपी सिंह, उपाध्यक्ष क्षेत्र प्रमुख देवीदत्त कुनियाल, महासचिव बख्तावर सिंह, सचिव खड़ग सिंह को बनाया गया।

 महोत्सव में विभिन्न कला मंच, युवक व महिला मंगल दल, शिक्षण संस्थाओं के सांस्कृतिक कार्यक्रम, खेल-कूद, पशु प्रदर्शनी, पर्वतारोहण, निबंध, नाटक प्रतियोगिताएं भी रखी गयी है।

क्षेत्र प्रमुख देवीदत्त कुनियाल ने कहा कि हर वर्ष नंदादेवी लोकजात यात्रा का समापन वेदनीकुंड में होता है इस बार मेले को 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं जिसे धूमधाम से मनाया जाने का निर्णय लिया गया है।



Dainik jagran

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Bones found around edges of Uttarakhand lake belonged to ninth century tribespeople killed by cricket ball-sized hailstones
 Scientists believe they have finally solved the mystery of how the skeletons of more than 200 people came to be in a frozen lake in Uttarkhand
 
 The skeletons, which were first discovered by a British forest guard in 1942, were initially thought to be the bodies of Japanese soldiers travelling through India as part of a World War II land invasion.
 
 But although the cold climate around the Lake of Roopkund, at 16,000ft above sea level, had preserved some of the hair, flesh and leather clothes of the victims, the bodies were dated to around 850AD.
 
 Scientists discovered they appeared to be from two main groups - one was closely related which seemed to be a family group and another of shorter local people.
  They concluded that the family were likely to be pilgrims heading through the valley with the help of the locals as guides.
 
 Theories ranging from a landslide to a mass suicide were put forward to explain the deaths, but it is only now that researchers believe they know what caused the cracks in their skulls.
 
  During World War II the British government feared they were the remains of Japanese soldiers, but tested showed they were much older
 
  The Lake of Roopkund is in northern India near Nepal
 
 A 2004 expedition to the site concluded the group was killed by cricket ball-sized hailstones during a sudden storm.
 
 This, they decided, was the only way to explain why the skulls and shoulder bones of the dead had all been hit by rounded objects directly from above.
 
 As there was nowhere to shelter in the valley, the group was at the mercy of the storm.
 
 Their bodies lay in the lake, which regularly freezes, for the next 1,200 years until their wartime discovery.  souce (dailymail.co.uk)

Rajen

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news from: nav bharat times : 3.6.2013


Devbhoomi,Uttarakhand

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आखिरकार उत्तराखंड के रूपकुंड में कंकाल झील के रहस्‍य से परदा उठ गया है. वैज्ञनिकों का कहना है कि जमी झील के पास मिले लगभग 200 कंकाल नौवीं सदी के उन भारतीय आदिवासियों के हैं जो ओले की आंधी में मारे गए थे.


इन कंकालों को सबसे पहले साल 1942 में ब्रिटिश फॉरेस्‍ट गार्ड ने देखा था. शुरुआत में माना जा रहा था कि यह नर कंकाल उन जापानी सैनिकों के थे जो द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान इस रास्‍ते से गुजर रहे थे. लेकिन अब वैज्ञानिकों को पता चला है कि ये कंकाल 850 ईसवी में यहां आए श्रद्धालुओं और स्‍थानीय लोगों के हैं

शोध से खुलासा हुआ है कि कंकाल मुख्‍य रूप से दो समूहों के हैं. इनमें से कुछ कंकाल एक ही परिवार के सदस्‍यों के हैं, जबकि दूसरा समूह अपेक्षाकृत कद में छोटे लोगों का है. शोधकर्ताओं का कहना है कि उन लोगों की मौत किसी हथियार की चोट से नहीं बल्कि उनके सिर के पीछे आए घातक तूफान की वजह से हुई है. खोपड़ियों के फ्रैक्चर के अध्ययन के बाद पता चला है कि मरने वाले लोगों के ऊपर क्रिकेट की गेंद जैसे बड़े ओले गिरे थे.

कंकाल झील' के नाम से मशहूर यह झील हिमालय पर लगभग 5,029 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है. हर साल जब भी बर्फ पिघलती है तो यहां कई सौ खोपड़ियां देखी जा सकती हैं. पहले कहा जाता था कहा जाता था कि यह खोपड़िया कश्‍मीर के जनरल जोरावर सिंह और उसके आदमियों की हैं, जो 1841 में तिब्‍बत के युद्ध से लौट रहे थे और खराब मौसम की जद में आ गए. ऐसा भी कहा जाता था कि ये लोग संक्रामक रोग की चपेट में आ गए होंगे या फिर तालाब के पास आत्‍महत्‍या की कोई रस्‍म निभाई गई होगी.

गौरतलब है कि रूपकुंड को रहस्‍मयी झील के रूप में जाना जाता है और इसके चारों ओर ग्‍लेशियर और बर्फ से ढके पहाड़ हैं. यह झील 2 मीटर गहरी है और हर साल कई ट्रेकर्स और श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है. रूपकुंड में 12 साल में एक बार होने वाली नंदा देवी राज जात यात्रा में भाग लेने के लिए श्रद्धालु दूर-दूर से यहां आते हैं. इस दौरान देवी नंदा की पूजा की जाती है.



 

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