Author Topic: Uttarakhand News - उत्तराखंड समाचार  (Read 182053 times)

नवीन जोशी

  • Moderator
  • Sr. Member
  • *****
  • Posts: 479
  • Karma: +22/-0
Re: Uttarakhand News - उत्तराखंड समाचार
« Reply #50 on: February 18, 2012, 11:35:53 PM »
कश्मीर में लहलहाएगा उत्तराखंड का पॉपुलर
लालकुआं (एसएनबी)। उत्तराखण्ड के पॉपुलर को कश्मीर में लहलहाने के लिए वन विभाग ने जम्मू कश्मीर सरकार से डील की है। परीक्षण के तहत जम्मू एवं कश्मीर के वन विभाग सोयल कंजरवेशन की टीम तीन हजार पौधों की पहली खेप साथ ले गयी है। जम्मू एवं कश्मीर का वन महकमा उच्च हिमालयी क्षेत्र में इसका रोपण कर अनुसंधान करना चाहता है। जम्मू एवं कश्मीर भूमि संरक्षण विभाग के वन क्षेत्राधिकारी चरनदास ने बताया कि तराई भाबर सहित शुष्क क्षेत्र में उगने वाले पॉपुलर पर वन अनुसंधान संस्थान ने लम्बे समय तक शोध किया था। उन्होंने बताया कि लालकुआं में तैयार शंकर नस्ल का एल क्लोन इजाद किया है। पॉपुलर पौधा अभी तक स्थानीय एवं अन्य राज्यों को आपूर्ति किया जाता था। वन अनुसंधान केंद्र के प्रभारी वन क्षेत्राधिकारी आरएस बिष्ट के अनुसार पूर्व में विदेशों से पॉपुलर के क्लोन लिये गये थे। उसके बाद यहां शंकर नस्ल के पौधे तैयार किये गये। नये क्लोन विदेशी क्लोनों की अपेक्षा अत्यधिक वृद्धिकारी साबित हुए हैं। उन्होंने बताया कि इनकी मांग पूरे भारत में तेजी से बढ़ रही है। पॉपुलर का रोपण जनवरी मध्य से फरवरी तक किया जाता है। आठ वर्षो में पेड़ तैयार हो जाता है। पहली बार जम्मू एवं कश्मीर को इसकी आपूर्ति की जा रही है। श्री दास ने बताया कि अनुसंधान के तौर पर लालकुआं एवं ज्योलीकोट वन अनुसंधान केंद्र से तीन हजार पॉपुलर की पौध कश्मीर ले जायी जा रही है। इसे ऊधमपुर, श्रीनगर एवं जम्मू में प्रयोग के तौर पर लगाया जाएगा।

सौजन्य: http://rashtriyasahara.samaylive.com/epapermain.aspx?queryed=14]राष्ट्रीय सहारा.[url]http://rashtriyasahara.samaylive.com/epapermain.aspx?queryed=14 [/url]

नवीन जोशी

  • Moderator
  • Sr. Member
  • *****
  • Posts: 479
  • Karma: +22/-0
Re: Uttarakhand News - उत्तराखंड समाचार
« Reply #51 on: February 21, 2012, 12:30:21 AM »
अब ऑनलाइन होगी कुमाऊं की बैठकी होली
अल्मोड़ा, जागरण कार्यालय : अपनी विविध शैली और परम्परागत रीति-रिवाज के लिए पूरे विश्व में विख्यात कुमाऊं की होली अब जल्द ही एक क्लिक पर उपलब्ध होगी। दिल्ली की लोकरंग संस्था ने इसकी पहल की है। इन दिनों यह संस्था कुमाऊं के विभिन्न इलाकों में घूमकर कुमाऊंनी होली की विशेषताओं का अध्ययन कर रही है। सम्पूर्ण कुमाऊं में पूस के पहले रविवार से ही होली की शुरुआत हो जाती है। वर्षो से अनवरत चली आ रही इस परम्परा ने यहां की होली को एक अलग स्थान दिलाया है। कुमाऊंनी होली की इन्हीं खूबियों से प्रेरित होकर दिल्ली की लोकरंग संस्था ने अब इसे ऑनलाइन करने का बीड़ा उठाया है। संस्था के चेयरमैन मनीष मेहता ने बताया कि कुमाऊं की होली के ऑनलाइन होने के बाद पूरे विश्र्व के लोग यहां की संस्कृति व सामाजिक सरोकारों से रूबरू हो सकेंगे। संस्था के कलाकारों ने अल्मोड़ा के श्री लक्ष्मी भंडार क्लब में लोकरंग और हुक्का क्लब के तत्वाधान में बैठकी होली संध्या कार्यक्रम का आयोजन कर यहां की होली का विस्तार से अध्ययन किया। संस्था के सदस्यों ने नगर का भ्रमण कर वयोवृद्ध होल्यारों से भी मुलाकात की। हुक्का क्लब के प्रभात साह गंगोला, राजेन्द्र तिवारी, चन्द्र शेखर पांडे ने संस्था के इस प्रयास को सराहनीय बताते हुए उन्हें कुमाऊंनी होली से जुड़ी अनेक जानकारियां दीं।

नवीन जोशी

  • Moderator
  • Sr. Member
  • *****
  • Posts: 479
  • Karma: +22/-0
Re: Uttarakhand News - उत्तराखंड समाचार
« Reply #52 on: February 21, 2012, 11:28:59 PM »
पहाड़ में घटती जनसंख्या से बिगड़े राजनीतिक समीकरण
पर्वतीय जनपदों में आबादी कम हुई तो विधानसभा सीटों पर पड़ा असर
कम हुई सात विस सीटें बना और बिगाड़ सकती हैं दलों की सियासी गणित
इसी रफ्तार से जनसंख्या घटी तो आंतरिक सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा

देहरादून (एसएनबी)। प्रदेश के पर्तीय जनपदों में घटती जनसंख्या से न केवल विकास बाधित हुआ है बल्कि राजनीतिक समीकरण भी बिगड़ गए हैं। चमोली, पिथौरागढ़ , बागेर , पौड़ी व अल्मोड़ा पांच जनपदों में 2001 की तुलना में 2011 की जनगणना में आबादी कम हुई तो सीधा असर विधानसभा सीटों पर पड़ा। नए परिसीमन के बाद इन जिलों से कम हुई सात विस सीटें राजनीतिक दलों की ‘ गणित ’ बिगाड़ भी सकती हैं और बना भी सकती हैं। इसी रफ्तार से यदि आबादी घटी और पलायन बढ़ा तो यह भविष्य में आंतरिक सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है। प्रदेश जिला पंचायत सदस्य संगठन व प्रांतीय ब्लाक प्रमुख संगठन ने पर्वतीय क्षेत्र के विकास व आंतरिक सुरक्षा के लिए राजनीतिक संतुलन कायम करने को केंद्र सरकार व निर्वाचन आयोग से परिसीमन पर नए सिरे से विचार करने का अनुरोध किया है। राज्य निर्माण की मांग से उपजे आंदोलन से उत्तर प्रदेश को विभाजन के बाद उत्तराखंड नए राज्य के रूप में अस्तित्व में आया। राज्य निर्माण की मांग के पीछे मूल भावना पर्वतीय जिलों का पिछड़ापन था। इसी पिछड़ेपन को दूर करने के लिए गैरसैंण को स्थाई राजधानी के रूप में प्रस्तावित किया गया। भले ही गैरसैंण की मांग राजनीतिक दल की मांग रही है , लेकिन इसके मूल में पर्वतीय क्षेत्रों के विकास की भावना छिपी हुई है। राज्य निर्माण के लगभग ग्यारह वर्ष पूरे हो चुके हैं । पर्वतीय क्षेत्रों का विकास तो दूर पलायन तक नहीं रोका जा सका है। रोजगार के कम अवसर व अवस्थापना सुविधाओं का अभाव , मुख्य रूप से दो ऐसे कारण हैं जिससे बढ़ते पलायन पर अंकुश नहीं लगाया जा सका। इसका दुष्प्रभाव विकास पर भी पड़ा और घटती जनसंख्या के असर से राजनीतिक समीकरण भी बदल गए। वर्ष 2001 व 2011 की जनसंख्या के आंकड़ों का समानुपातिक अध्ययन किया जाए तो पांच जिलों में आबादी घटते ही विधानसभा सीटें भी कम हो गई। आंकड़ों के अनुसार पांच पर्वतीय जिलों से छह विस सीटें कम हो गईं और देहरादून, हरिद्वार व ऊधमसिंह नगर में बढ़ गई। जिला पंचायत प्रमुख संगठन के प्रदेश अध्यक्ष व प्रांतीय ब्लाक प्रमुख संगठन के संरक्षक जोत सिंह बिष्ट ने एक अनौपचारिक बातचीत में कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में तीन कारणों से जनसंख्या में कमी आई। पहला पलायन , दूसरा केरल की तर्ज पर जनसंख्या नियंतण्रव तीसरा उत्तरकाशी, चमोली व पिथौरागढ़ में सैकड़ों किमी लंबी चीन व तिब्बत सीमा से जुड़े गैर आबाद सीमांत गांव । इन तीनों कारणों से विकास की गतिविधियां शिथिल हुईं। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में चीन हवाई पट्टी का निर्माण व रेल लाइन बिछा ुचुका है। चीन की बढ़ती गतिविधियां और गैर आबाद क्षेत्रफल का बढ़ना निकट भविष्य में देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। विधानसभा क्षेत्रों के नए परिसमीन के बाद एक तरफ पर्वतीय क्षेों की सीटें कम हुई , वहीं दूसरी ओर पर्वतीय क्षेत्रों से राजनीति की ‘ एबीसी’

सीखने वाले जनप्रतिनिधि मैदानों की ओर पलायन कर रहे हैं। विधानसभा सीटों के परिसीमन के वक्त भाजपा-कांग्रेस अथवा किसी दूसरे राजनीतिक दल ने पर्वतीय क्षेत्रों से विस सीटों के कम किए जाने का विरोध नहीं किया। आज मुख्यमंत्री अथवा उप मुख्यमंत्री की कुर्सी का दावा करने वाले भाजपा व कांग्रेस के लोग हरिद्वार व तराई क्षेत्र (ऊधमसिंह नगर) को उत्तराखंड में मिलाने का विरोध कर रहे थे। बिष्ट ने भाजपा व कांग्रेस पर आरोप लगाया कि दोनों दल सुविधाभोगी राजनीति के आदी हो गए हैं। उन्हें यह सोचने की फुर्सत नहीं कि पर्वतीय जिलों से यदि इसी रफ्तार से पलायन होता रहा और जनसंख्या घटती रही तो वर्ष 2051 में होने वाले परिसीमन के बाद राज्य के नौ पर्वतीय जिलों में मात्र 16 विधानसभा सीटें रह जाएंगी, शेष 54 सीटें देहरादनू , हरिद्वार , ऊधमसिंह नगर व नैनीताल जिले में रह जाएंगी। बिष्ट ने कहा पर्वतीय क्षेत्रों में किए गए परिसीमन पर पुनर्विचार करने के लिए केंद्र सरकार व चुनाव आयोग से अनुरोध किया जाएगा। वर्तमान में परिसीमन का मामला कोर्ट में लंबित है।

सौजन्य: राष्ट्रीय सहारा. http://rashtriyasahara.samaylive.com/epapermain.aspx?queryed=14[/size]

नवीन जोशी

  • Moderator
  • Sr. Member
  • *****
  • Posts: 479
  • Karma: +22/-0
Re: Uttarakhand News - उत्तराखंड समाचार
« Reply #53 on: February 21, 2012, 11:31:40 PM »
[color=green]जहां बिना घोसले के निवास करती हैं सैकड़ों गौरैया
भीमताल : आमतौर पर पक्षियों में कोयल को ही आवासहीन माना गया है। बाकी सब पक्षियों के घोंसले होने का वर्णन मिलता है। परंतु भीमताल में एक रिसोर्ट में चार वृक्षों में कई वषरें से सैकड़ों गौरैया निवास कर रहे हैं। आश्चर्य यह है कि इन वृक्षों में एक भी घोंसला नहीं है। भीमताल के नजदीक कंट्री इन रिसोर्ट परिसर के भीतर ही छह वृक्षों में कई वर्षो से गौरैया चिडि़या आ रही हैं। इन चिडि़यों के आने का समय भी तय है। गर्मियों में शाम के समय सात बजे के करीब होटल परिसर में प्रवेश करती हैं तथा सवेरे पांच बजे एक साथ होटल से चली जाती हैं। जाड़ों में आने जाने का समय थोड़ा विलंब होता है। जहां एक ओर गर्मियों में होटल में पर्यटकों की आवाजाही अधिक रहती है वहीं इन चिडि़यों की आवाजें समा को और रंगीन बनाती है। कई पर्यटक तो कई घंटों तक इस दृश्य को देखते रहते हैं। होटल प्रबंधक रवि कुमार जोशी बताते हैं कि इन चिडि़यों को प्रारंभ में आकर्षित करने के लिये संगीत तथा कृत्रिम घोंसलों का प्रयोग किया गया था। छह वर्ष लगातार व्यवस्था जारी रखी गई बाद में धीरे धीरे यह व्यवस्था हटा ली गई और चिडि़यों का आना जाना जारी है। होटल प्रबंधन के अनुसार 1999 से हर दिन यह चिडि़या परिसर के अंदर स्थित छह वृक्षों में आती है। हर वर्ष यह चिडि़यां बीस दिनों के लिये कहीं जाने के बाद दुबारा इन वृक्षों में आना प्रारंभ कर देती हैं।
सौजन्य: दैनिक जागरण. http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=14&edition=2012-02-22&pageno=4#id=111733877271071760_14_2012-02-22[/color]

नवीन जोशी

  • Moderator
  • Sr. Member
  • *****
  • Posts: 479
  • Karma: +22/-0
Re: Uttarakhand News - उत्तराखंड समाचार
« Reply #54 on: February 24, 2012, 12:31:20 AM »
कोल्ड स्टोरेज से बदली सेब किसानों की तकदीर
देहरादून (एसएनबी)। पहाड़ी के किसानों को अगर कोल्ड स्टोरेज की सुविधाएं उपलब्ध हो जाएं तो उनकी किस्मत किस तरह से बदल सकती है और बिचौलियों से उन्हें किस तरह निजात मिल सकती है इसकी एक मिसाल सामने आई है। उत्तरकाशी के नौगांव में एक डच गैर सरकारी संस्थान ने सेब उत्पादक किसानों के लिए कोल्ड स्टोरेज सुविधा क्या शुरू की त्यूणी-हषिर्ल -नौगांव सेब पट्टी की तकदीर ही बदलने लगी। इस सुविधा के स्थापित होने से पहली बार इस क्षेत्र के सेब 85 रुपये की दर से बेचे जा सके। जबकि पहले सेब 60 रुपये के हिसाब से बेचने पड़ते थे। सीधा सा अर्थ है कि इससे सुविधा पर खर्च होने वाला बिजली के बिल आदि को काट भी दिया जाए तो किसानों को सीधा-सीधा 10 से 15 रुपये प्रति किलोग्राम तक का लाभ हुआ है। यानी एक तरह से किसानों को 20 से 25 फीसद अधिक कीमत मिली है और सभी को कुल मिलाकर लगभग 40 लाख रुपये का लाभ हुआ है । इतना ही नहीं सेब उत्पादन से जुड़े लोगों का कहना है कोल्ड स्टोरेज की स्थापना से उन्हें बिचौलियों से मुक्ति मिल गई है क्योंकि पहले सेब की फसल सड़ जाने के डर से औने-पौने दाम पर बिचौलियों को ही बेचनी पड़ती थी लेकिन कोल्ड स्टोरेज सुविधा में अब सेबों को 9 महीने तक सुरक्षित रखा जा सकता है यानी सेब उत्पादक अपनी फसल का 9 महीने तक स्वामी बना रह सकता है और बाजार के दामों पर नजर रखते हुए अपनी लाभ-हानि के हिसाब से सेब बेच सकता है। यह सुविधा उत्तरकाशी के नौगांव में पिछले साल सितंबर से शुरू कर दी गई है। दअसल एक डच गैर सरकारी स्वयंसेवी संस्था ‘ स्टिटिंग हेट ग्रोएने वुड्ट’ (एसएचजीजब्लू) की मदद से क्षेत्र की गैर सरकारी संस्थाओं ने मिल कर नौगांव में करीब 15 करोड़ 50 लाख रुपये लागत की फ्रेश फूड तकनीक सुविधा स्थापित की है। यह कोल्ड स्टोरेज सुविधा हॉलैंड की एक अन्य कंपनी की सेब सुरक्षित रखने की नई तकनीक ‘ वैन एमेरौंजेन तकनीक’ पर आधारित है। इस तकनीक को कंट्रोल एटमोस्फेयर स्टोरेज भी कहा जाता है। इस तकनीक में सेबों को वातावरण के एक से दो डिग्री तापमान पर सुरक्षित रखा जाता है। इस कोल्ड स्टोरेज सुविधा में करीब 1200 मीट्रिक टन सेब नौ महीने तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं। मौजूदा वक्त में करीब 400 मीट्रिक टन सेब सुरक्षित रखे गए हैं। डच संस्था के साथ काम कर रही स्थानीय गैर सरकारी संस्था श्री जगदंबा समिति के प्रमुख लक्ष्मी प्रसाद सेमवाल का कहना है कि डच संस्थाओं की मदद से शुरू यह कोल्ड स्टोरेज उत्तरकाशी के नौगांव में कोल्ड स्टोरेज की सुविधा शुरू 1200 मीट्रिक टन सेब रखे जा सकते हैं सुरक्षित सुविधा सेब पट्टी में सेबों को सुरक्षित रखने के लिए स्थापित पूरे गढ़वाल में पहली सुविधा है। उनका कहना है कि परियोजना का उद्देश्य किसानों को बिचौलियों के चंगुल से आजादी दिलाना हैं क्योंकि जब तक वे सेब के व्यापार से बाहर नहीं हो जाते किसानों को उसकी सेब की फसल की असली कीमत नहीं मिल पाएगी। उनका कहना है सेबों को सुरक्षित रखने की डच तकनीक ने किसानों को काफी लाभ देना शुरू कर दिया है। परियोजना की बेहतर बात यह है कि मशीन की लागत निकलने के बाद यह सुविधा स्थानीय स्थानीय किसानों को हस्तांतरित कर दी जाएगी।

नवीन जोशी

  • Moderator
  • Sr. Member
  • *****
  • Posts: 479
  • Karma: +22/-0
Re: Uttarakhand News - उत्तराखंड समाचार
« Reply #55 on: February 28, 2012, 11:25:32 PM »
सच लिखे, कहानियाँ न बनाए पुलिस: डीजीपी
कहा, पुलिस सिर्फ व्यवस्था का हिस्सा, सजा दिलाना उसका काम नहीं
कालाढूंगी प्रकरण में सरकार द्वारा मुकदमे वापस लेने पर कोई अफसोस नहीं : पांडे

नैनीताल (एसएनबी)। प्रदेश के पुलिस महानिदेशक ज्योति स्वरूप पांडे ने कहा कि पुलिस केवल न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा है। उसका काम मामले को अंजाम तक पहुंचाकर किसी को सजा दिलाना नहीं है, वरन न्यायिक व्यवस्था में उसकी भूमिका गेटकीपर की है जिसका कार्य केवल यह देखना है कि कोई मामला न्यायालय तक जाना है या नहीं। उन्होंने पुलिसकर्मियों को ताकीद की है कि वह मामले को मजबूत बनाने के फेर में कहानियां न बनाए, वरन जो सच्चाई हो उसे लिखें। डीजीपी मंगलवार को मुख्यालय स्थित पुलिस लाइन में पत्रकारों से वार्ता के दौरान कालाढूंगी कांड में सरकार द्वारा मुकदमे वापस लिये जाने के सवाल पर प्रतिक्रिया कर रहे थे। उन्होंने कहा कि न्यायिक व्यवस्था का हिस्सा होने के नाते वह मानते हैं कि कई बार दोषी को सजा देना मानवीय एवं कई दृष्टिकोणों से जरूरी नहीं होता। उन्होंने कहा कि पुलिस को किसी घटना की जैसी प्राथमिक सूचना मिले, ठीक वैसी ही जीडी व सीडी में दर्ज करनी चाहिए, न कि कहानी बनानी चाहिए। पुलिस को उन्होंने सभी मामलों को दर्ज करने को कहा, साथ ही जोड़ा कि किस मामले को एफआईआर माना जाए या नहीं, यह कोर्ट का विवेकाधिकार है। उन्होंने ताकीद की झूठी प्राथमिकी दर्ज होने की दशा में निदरेषों का उत्पीड़न न होने पाये। उन्होंने कहा कि हालिया दौर में उन्होंने अधीनस्थ अधिकारियों से अपराध अधिक क्यों हो रहे हैं, व तत्काल अपराधों का खुलासा करने के आदेश देने बंद कर दिये हैं। बस यह पूछा जा रहा है कि आपराधिक मामलों में क्या कदम उठाये जा रहे हैं। माना कि आंकड़ेबाजी के फेर में अपराध दर्ज करने से बचना नहीं चाहिए।
सीसीटीएनएस व डीएनए डाटा बैंक बनाएगी पुलिस
नैनीताल। डीजीपी जेएस पांडे ने बताया कि आधुनिकीकरण की राह पर तेजी से आगे बढ़ रही उत्तराखंड पुलिस कम्प्यूटर नेटवर्किग के सीसीटीएनएस सिस्टम को जल्द लागू करने और प्रदेश में अपराधियों के डीएनए का डाटा बैंक बनाने की दिशा में चल पड़ी है। सीसीटीएनएस सिस्टम का साफ्टवेयर केंद्र सरकार के स्तर पर तैयार हो रहा है, वहीं अपराधियों के डीएनए का डाटा बेस तैयार करना अभी प्रारंभिक चरण में है। ऐसा होने से अपराधों के खुलासे में खासी आसानी होगी। डीजीपी ने पुलिस को सबसे बड़ा मानव संसाधन आधारित विभाग बताया। उन्होंने कहा कि उनकी सबसे बड़ी कोशिश पुलिस कर्मियों को बेहतर आवास, आवागमन व संचार सुविधा दिलाना है। विभाग में उपनिरीक्षकों की पदोन्नति प्रक्रिया चल रही है, वहीं इंटरमीडिएट पास कांस्टेबलों को ग्रेड-पे देने और उपनिरीक्षकों के पदों पर अधिकाधिक पदोन्नति के अवसर देने की कोशिश है। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्वक चुनाव निपटाने के बाद राज्य पुलिस मतगणना एवं इसके ठीक बाद आ रहे होली के त्योहार को शांतिपूर्वक निपटाने की तैयारियों में जुटी है। विभाग के पेट्रोल एवं टीए-डीए से संबंधित बिल काफी समय से लंबित हैं। नई सरकार से उम्मीद होगी कि जल्द इन बिलों का भुगतान हो सकेगा।
पुलिसकर्मी लेंगे विधिक जानकारियां
राज्य विधिक प्राधिकरण एवं पुलिस महकमे में बनी सहमति
नैनीताल (एसएनबी)। उत्तराखंड पुलिस के जवानों को अब विधिक जानकारियां भी दी जाएंगी, ताकि कानून-व्यवस्था बनाये रखने के दौरान वह आवश्यक जानकारियों से अपडेट रहें। इस मामले में राज्य पुलिस एवं उत्तराखंड राज्य विधिक प्राधिकरण के बीच सहमति बनी है। राज्य के करीब 26 हजार पुलिसकर्मियों को प्राधिकरण द्वारा आम जनता को विधिक ज्ञान देने के लिए तैयार की गई 34 लघु पुस्तिकाएं (पंफलेट) दी जाएंगी। राज्य के पुलिस महानिदेशक ज्योति स्वरूप पांडे ने बताया कि उत्तराखंड राज्य विधिक प्राधिकरण द्वारा तैयार की गई इन पुस्तिकाओं से वह बेहद प्रभावित हुए। मंगलवार को उन्होंने इस बारे में उत्तराखंड उच्च न्यायालय में प्राधिकरण के अध्यक्ष उत्तराखंड उच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति तरुण अग्रवाल तथा प्राधिकरण के सचिव प्रशांत जोशी से भेंट की जिसके साथ इन पुस्तिकाओं को औपचारिक रूप से राज्य पुलिस को सौंपा गया। डीजीपी ने कहा कि प्रदेश पुलिस के जवान डिक्शनरी की भांति इन पुस्तिकाओं को अपने पास रखेंगे और जरूरत पड़ने पर इनका प्रयोग कर सकेंगे।

नवीन जोशी

  • Moderator
  • Sr. Member
  • *****
  • Posts: 479
  • Karma: +22/-0
Re: Uttarakhand News - उत्तराखंड समाचार
« Reply #56 on: March 04, 2012, 12:00:32 AM »
राष्ट्रपति करेंगी ज्योलीकोट की प्रधान को पुरस्कृत
नैनीताल (एसएनबी)। जनपद की ज्योलीकोट ग्राम पंचायत का नाम प्रदेश के उन आठ निर्मल ग्रामों में शुमार होने जा रहा है जिन्हें देश की राष्ट्रपति अपने हाथों से निर्मल ग्राम पुरस्कार प्रदान करेंगी। उत्तराखंड की कुल 63 ग्राम पंचायतें इस पुरस्कार हेतु चयनित हुई हैं जिनमें से शेष 55 ग्राम पंचायतों को राज्य में पुरस्कार देकर सम्मानित किया जाएगा। ज्योलीकोट की ग्राम प्रधान भावना रावत यह पुरस्कार लेंगी। जनपद के भीमताल स्थित स्वजल कार्यालय में प्राप्त सूचना के अनुसार ज्योलीकोट ग्राम पंचायत को प्रदेश की उन आठ ग्राम पंचायतों में शुमार किया गया है जिनकी प्रधान को राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कार प्रदान किया जाएगा। सूची में ज्योलीकोट भीमताल विकास खंड की एकमात्र ग्राम पंचायत है जिसे पक्के शौचालय, पेयजल, शिक्षा, सीवरेज व स्वच्छता आदि सुविधाएं प्रदान करने के लिये निर्मल ग्राम पुरस्कार से चयनित किया गया है। जनपद की कुल आठ ग्राम पंचायतों को निर्मल ग्राम पुरस्कार हेतु चयनित किया गया है, इनमें से शेष सात प्रदेश की अन्य 55 ग्राम पंचायतों के साथ पुरस्कार ग्रहण करेंगी। ग्राम प्रधान भावना रावत ने कहा कि ग्राम पंयायत के लोगों के सहयोग से उन्हें यह पुरस्कार मिल रहा है। उनके पति सांसद प्रतिनिधि भाजपा नेता हरगोविंद रावत, भाजपा विधायक प्रत्याशी हेम आर्य, स्वजल परियोजना प्रबंधक भीमताल बीसी तिवाड़ी, बीडीओ तारा ह्यांकी, जिपं सदस्य नीमा आर्या, गीता बिष्ट, ललित जोशी ने बधाई दी है।

CA. Saroj A. Joshi

  • Newbie
  • *
  • Posts: 40
  • Karma: +3/-0
Re: Uttarakhand News - उत्तराखंड समाचार
« Reply #57 on: March 04, 2012, 01:09:28 AM »
sushree bhawna rawat ji ko bahut bahut badhai !

नवीन जोशी

  • Moderator
  • Sr. Member
  • *****
  • Posts: 479
  • Karma: +22/-0
Re: Uttarakhand News - उत्तराखंड समाचार
« Reply #58 on: March 05, 2012, 12:17:45 AM »
आपरेशन जौरासी छठे दिन भी जारी
मंगलवार से सुचारु हो जाएगा राजमार्ग

अल्मोड़ा(एसएनबी)। अल्मोड़ा खैरना राष्ट्रीय राजमार्ग में जौरासी के पास एनएच विभाग द्वारा खतरनाक हो चुकी अर्धचन्द्राकार पहाड़ी को तोड़ने का कार्य छठे दिन भी जारी रहा। विभाग सोमवार की रात तक इस सड़क को हर हाल में यातायात के लिए खोलने के लायक बनाने की जद्दोजहद में जुटा रहा। अधिकारियों के मुताबिक सोमवार की देर रात तक पूरा कार्य कर लिया जायेगा और मंगलवार से हर हाल में सड़क को खोला जायेगा। काफी हद तक लक्ष्य के नजदीक पहुंच चुके विभाग को एक बार फिर विशाल बोल्डरों के राह में आ जाने के कारण काफी पसीना बहाना पड़ा। यह खतरनाक पहाड़ी छह दिनों के अभियान में टाप लेबल से तो तोड़ी जा चुकी है। लेकिन बीच में कई स्थानों पर लटके बड़े बड़े बोल्डर अभी भी गिराये नहीं जा सके हैं। सड़क से ये बोल्डर काफी खतरनाक भी दिखाई दे रहे है। रविवार को विभाग के अधिकारियों ने मौके का एक बार फिर गहनता से मुआयना किया और आपस में विचार-विमर्श कर कार्य प्रगति की समीक्षा की। विभाग के अनेक अधिकारी बीच में दबे इन भयंकर बोल्डरों को पूर्व की स्थिति से कम खतरनाक भी मान रहे है। इन लोगों का मानना है कि ये बोल्डर पहले से भी यहां मौजूद थे।

नवीन जोशी

  • Moderator
  • Sr. Member
  • *****
  • Posts: 479
  • Karma: +22/-0
Re: Uttarakhand News - उत्तराखंड समाचार
« Reply #59 on: March 13, 2012, 11:37:48 PM »
सूरतेहाल : 70 गढूं का नरेश ठाठ मा, जनता का बबाल सी जख्या-तखी
पहाड़ में हर पत्थर के नीचे एक सीएम, अगर यही हाल रहा तो कैसे होगा प्रदेश का विकास

भूपेंद्र कंडारी/एसएनबी, देहरादून। लोकमान्यता है कि देवभूमि उत्तराखंड में 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास है। यहां के हर पत्थर में कोई न कोई देवता रचा-बसा है। देवभूमि ने देश के राजनीतिक क्षेत्र में ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र को बड़े-बड़े रथी-महारथी दिये। विडम्बना यह रही कि जो एक बार इन पहाड़ों को छोड़कर शहरों को गया, वह फिर लौट कर नहीं आया। आजादी के बाद से लगातार उपेक्षा का दंश झेल रहे इस पहाड़ी राज्य में समय के साथ समस्याएं भी पहाड़ जैसी होनी लगीं। खेत-खलिहान बारिश का, गांव पलायन करने वालों का, स्कूल मास्टरों का, अस्पताल डाक्टरों का और युवा वर्ग रोजगार का इंतजार करते थक गया, लेकिन कोई नहीं आया। पीर जब पर्वत सी हो गई तब पृथक राज्य आंदोलन की गंगा निकली और सुनहरे भविष्य के सपने आंखों में लेकर कई लोगों ने अपनी शहादत दे दी। शहादत देने वालों को यह मालूम होता कि इस प्रदेश के नेता उनकी शहादत को यों ही जाया कर देंगे और उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश की कार्बन कापी बना देंगे तो शायद वे ऐसा कतई नहीं करते। प्रदेश के नेताओं ने शहीद होने वालों के सपने राज्य बनने के पहले दिन ही उजाड़ दिये। राज्य की बुनियाद पड़ने के साथ ही यहां का हर नेता मुख्यमंत्री बनने के सपने देखने लगा और आज 12 साल बाद यह स्थिति है कि पहाड़ के हर पत्थर के नीचे एक मुख्यमंत्री छिपा हुआ है। आगाज करते हैं उत्तराखंड के पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी से। शहीदों के परिजनों ने अपने आंसू ठीक से पोंछे भी नहीं थे कि मुख्यमंत्री बनने के लिए भाजपाइयों में घमासान शुरू हो गया। नवम्बर 2000 में मुख्यमंत्री के लिए हुआ घमासान शायद ही कोई भूल पाया हो। नित्यानंद स्वामी का नाम मुख्यमंत्री पद के लिए तय होने के साथ ही पूरी भाजपा बिखर कर तार-तार हो गई। पहाड़-मैदान के नाम पर जनता को गुमराह करने की कोशिशें भी खूब हुई। भाजपा के वरिष्ठ नेता जो कि उस समय खुद को मुख्यमंत्री का प्रबल दावेदार बता रहे थे, वह नौ नवम्बर 2000 को परेड मैदान में होने वाले शपथ ग्रहण समारोह में अंतिम समय तक नहीं गए और मुख्यमंत्री का विरोध ही करते रहे। आखिर में बगावत करने वालों को किसी तरह मनाया तो गया लेकिन वह शांत नहीं बैठे और अंत में 30 अक्टूबर 2001 को तब चैन की सांस ली, जब भगत सिंह कोश्यारी राज्य के दूसरे मुख्यमंत्री बने। नित्यानंद स्वामी को कुर्सी से हटाने का नतीजा यह हुआ कि भाजपा आपस में ही लड़ती-भिड़ती रह गई और मार्च 2002 में विधानसभा चुनाव हार गई। कांग्रेस तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष हरीश रावत के नेतृत्व में चुनाव जीती, लेकिन मुख्यमंत्री के पद के लिए सभी वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं में घमासान हो गया। सभी नेता अपने साथ आठ-दस विधायक लेकर दावेदारी करने लगे और अंत में हुआ यह कि दो मार्च 2002 को नारायण दत्त तिवारी ने उत्तराखंड के तीसरे मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली। तिवारी को पैराशूट मुख्यमंत्री बताते हुए विद्रोही उनके खिलाफ पूरे पांच साल तक खम ठोकते रहे, लेकिन राजनीति के उस्ताद तिवारी ने सरकार को आंच नहीं आने दी। कांग्रेस ने वर्ष 2002 में अपने घोषणा पत्र में हर साल दो लाख लोगों को रोजगार देने का वादा किया था, लेकिन रोजगार तो दूर की बात पहाड़ में तेजी के साथ गांव के गांव खाली होने लगे। समूचे प्रदेश में जमीन माफिया की पौ बारह रही। फिर वर्ष 2007 में भाजपा ने पहाड़वासियों के आंसू पोछने का वादा किया। पहाड़ के भोले-भाले लोग फिर भाजपा के झांसे में आ गए। भगत सिंह कोश्यारी के नेतृत्व में लड़े गए विधानसभा चुनाव का नतीजा यह हुआ कि मुख्यमंत्री का सेहरा भाजपा ने भी कांग्रेस की तर्ज पर भुवन चंद्र खंडूड़ी के सिर बांध दिया। इसे अन्याय बताते हुए विद्रोही भाजपा कार्यकर्ता आखिर तक लड़ते रहे और अंत में भाजपा हाईकमान ने थक-हार कर खंडूड़ी की पसंद से ही 24 जून 2009 को रमेश पोखरियाल के सिर मुख्यमंत्री का ताज बांध दिया। इसके बाद जो लोग रमेश पोखरियाल से असंतुष्ट थे, उन्होंने मोर्चा खोल दिया और वह तब तक लड़ते रहे जब तक रमेश पोखरियाल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान रहे। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने एक बार फिर पलटी खाई और 11 सितम्बर 2011 भुवनचंद्र खंडूड़ी को दूसरी बार मुख्यमंत्री का कांटों भरा ताज सौंप दिया। पहले भाजपाई फिर तिवारी शासनकाल में कांग्रेस कार्यकर्ता और उसके बाद भाजपा कार्यकर्ता राज्य में पूरे पांच साल तक मुख्यमंत्री पद को लेकर आपस में लड़ते रहे। इस बार के विधानसभा चुनाव में किसी तरह भाजपा से संख्या में एक विधायक ज्यादा कांग्रेस का निर्वाचित क्या हुआ कि कांग्रेस का हर नेता मुख्यमंत्री बनने के सपने संजोने लगा। चुनाव परिणाम से लेकर आज तक कांग्रेसियों के बीच क्या घमासान हुआ, किसी से छिपा नहीं है। कांग्रेस के दिग्गज ही कह रहे हैं कि विजय बहुगुणा की सरकार एक साल से ज्यादा नहीं चलेगी। यानी जनता फिर से एक और घमासान देखने के लिए तैयार रहे। राजनीतिज्ञों की इस खींचतान और आपसी कलह का खमियाजा इस पहाड़ी प्रदेश की गरीब जनता को भुगतना पड़ रहा है। आज भी पहाड़ में गांव के गांव खाली हो रहे हैं। प्राथमिक विद्यालयों में आज भी पांच कक्षाएं तीन कमरों में चल रही हैं। 80 के दशक में बनी सड़कों का डामरीकरण तक नहीं हो पाया है। गांव बिजली, पानी के लिए आज भी तरस रहे हैं। क्या कोई नेता बता सकता है कि पिछले दस सालों में ऋषिकेश और हल्द्वानी से ऊपर पहाड़ पर कितना विकास हुआ। कितने उद्योग-धंधे फलीभूत हुए? विकास की कितनी योजनाओं पर काम हुआ? सिवाय इसके कि पहाड़ के पत्थरों में बसे 33 करोड़ देवताओं की जगह अब मुख्यमंत्रियों ने ले ली है।[/size]
[/color]

 

Sitemap 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22