Author Topic: Districts Of Uttarakhand - उत्तराखंड के जिलों का विवरण एवं इतिहास  (Read 71016 times)

Devbhoomi,Uttarakhand

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उत्तराखण्ड या उत्तराखंड भारत के उत्तर में स्थित एक राज्य है। २००० और २००६ के बीच यह उत्तरांचल के रूप में जाना जाता था, ९ नवंबर २००० को उत्तराखंड भारत गणराज्य के २७ वें राज्य के रूप मे अस्तित्व मे आया। राज्य का निर्माण कई वर्ष के आन्दोलन के पश्चात हुआ। इस प्रान्त में वैदिक संस्कृति के कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थान हैं।उत्तराखंड की सीमाऐं उत्तर मे तिब्बत और पूर्व मे नेपाल से मिलती हैं
 तथा पश्चिम में हिमाचल प्रदेश और दक्षिण मे उत्तर प्रदेश(अपने गठन से पहले यानि कि सन २००० से पहले यह उत्तर प्रदेश का एक हिस्सा था) इसके पडो़सी हैं। पारंपरिक हिंदू ग्रंथों और प्राचीन साहित्य में इस क्षेत्र का उल्लेख उत्तराखंड के रूप में किया गया है।
 हिन्दी और संस्कृत मे उत्तराखंड का अर्थ उत्तरी क्षेत्र या भाग होता है।जनवरी २००७ में स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान मे रखते हुये उत्तराखंड के नाम आधिकारिक तौर पर उत्तरांचल से बदलकर उत्तराखंड कर दिया गया। देहरादून उत्तराखंड की अंतिम राजधानी होने के साथ इस क्षेत्र में सबसे बड़ा शहर है। गैरसन नामक एक छोटे से कस्बे को इसकी भौगोलिक स्थिति को देखते युये भविष्य की राजधानी के रूप में प्रस्तावित किया गया है किन्तु विवादों और संसाधनों के अभाव के चलते अभी भी देहरादून अस्थायी राजधानी बनी हुई है। राज्य का उच्च न्यायालय नैनीताल में है।
राज्य सरकार ने हाल मे हस्तशिल्प और हथकरघा को बढा़वा देने के लिये कुछ पहल की हैं साथ ही बढ़ते पर्यटन व्यापार तथा उच्च तकनीकी वाले उद्योगों को प्रोत्साहन के लिए आकर्षण कर योजनायें प्रस्तुत की हैं। राज्य मे कुछ विवादास्पद बडी़बांध परियोजनाओं भी हैं



 जिनकी पूरे देश में अक्सर आलोचना की जाती है, जैसे कि भागीरथी-भीलांगना नदियों पर बनने वाली टिहरी बांध परियोजना। यह परियोजना की कल्पना १९५३ मे की गयी थी और अब ये अपने निर्माण के अन्तिम चरण मे है। उत्तराखंड चिपको आंदोलन के जन्मस्थान के नाम से भी जाना जाता है
* अल्मोड़ा जिला              
* उत्तरकाशी जिला
* उधमसिंहनगर जिला
* चमोली जिला
 * चम्पावत जिला
* टिहरी जिला
* देहरादून जिला
* नैनीताल जिला
* पिथौरागढ जिला
* पौरी जिला
 * बागेश्वर जिला
 * रूद्रप्रयाग जिला
 * हरिद्वार जिला

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01-अल्मोड़ा

उत्तराखण्ड का महत्वपूर्ण नगर है । हल्द्वानी, काठगोदाम और नैनीताल से नियमित बसें अल्मोड़ा जाने के लिए चलती हैं। ये सभी बसे भुवाली होकर जाती हैं। भुवाली से अल्मोड़ा जाने के लिए रामगढ़, मुक्तेश्वर वाला मार्ग भी है। परन्तु अधिकांश लोग गरमपानी के मार्ग से जाना ही अदिक उत्तम समझते हैं। क्योंकि यह मार्ग काफी सुन्दर तथा नजदीकी मार्ग है।भुवाली, हल्द्वानी से ४० कि.मी. काठगोदाम से ३५ कि.मी. और नैनीताल से ११ कि.मी. की दूरी पर स्थित है। तथा भुवाली से अल्मोड़ा ५५ कि.मी. की दूरी पर बसा हुआ है।



स्कन्दपुराण के मानसखंड में कहा गया है#ै कि कौशिका (कोशी) और शाल्मली (सुयाल) नदी के बीच में एक पावन पर्वत स्थित है। यह पर्वत और कोई पर्वत न होकर अल्मोड़ा नगर का पर्वत है। यह कहा जाता है कि इस पर्वत पर विष्णु का निवास था। कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि विष्णु का कूर्मावतार इसी पर्वत पर हुआ था।एक कथा के अनुसार यह कहा जाता है कि अल्मोड़ा की कौशिका देवी ने शुंभ और निशुंभ नामक दानवों को इसी क्षेत्र में मारा था। कहानियाँ अनेक हैं, परन्तु एक बात पूर्णत: सत्य है कि प्राचनी युग से ही इस स्थान का धार्मिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक महत्व रहा है।
आज के इतिहासकारों की मान्यता है कि सन् १५६३ ई. में चंदवंश के राजा बालो कल्याणचंद ने आलमनगर के नाम से इस नगर को बसाया था। चंदवंश की पहले राजधानी चम्पावत थी।
 कल्याणचंद ने इस स्थान के महत्व को भली-भाँति समझा। तभी उन्होंने चम्पावत से बदलकर इस आलमनगर (अल्मोड़ा) को अपनी राजधानी बनाया।सन् १५६३ से लेकर १७९० ई. तक अल्मोड़ा का धार्मिक भौगोलिक और ऐतिहासिक महत्व कई दिशाओं में अग्रणीय रहा।
इसी बीच कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक एवं राजनैतिक घटनाएँ भी घटीं। साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टियों से भी अल्मोड़ा सम्स्त कुमाऊँ अंचल का प्रतिनिधित्व करता रहा।
सन् १७९० ई. से गोरखाओं का आक्रमण कुमाऊँ अंचल में होने लगा था। गोरखाओं ने कुमाऊँ तथा गढ़वाल पर आक्रमण ही नहीं किया बल्कि अपना राज्य भी स्थापित किया। सन् १८१६ ई. में अंग्रेजो की मदद से गोरखा पराजित हुए और इस क्षेत्र में अंग्रेजों का राज्य स्थापित हो गया।
अल्मोड़ा नगर के पूर्वी छोर पर 'खगमरा' नामक किला है। कत्यूरी राजाओं ने इस नवीं शताब्दी में बनवाया था। दूसरा किला अल्मोड़ा नगर के मध्य में है। इस किले का नाम 'मल्लाताल' है। इसे कल्याणचन्द ने सन् १५६३ ई. में बनवाया था। कहते हैं, उन्होंने इस नगर का नाम आलमनगर रखा था।
वहीं चम्पावत से अपनी राजधानी बदलकर यहाँ लाये थे। आजकल इस किले में अल्मोड़ा जिले के मुख्यालय के कार्यलय हैं। तीसरा किला अल्मोड़ा छावनी में है, इस लालमण्डी किला कहा जाता है।
 अंग्रेजों ने जब गोरखाओं को पराजित किया था तो इसी किले पर सन् १८१६ ई. में अपना झण्डा फहराया था। अपनी खुशी प्रकट करने हेतु उन्होंने इस किले का नाम तत्कालीन गवर्नर जनरल के नाम पर - 'फोर्ट मायरा' रखा था। परन्तु यह किला 'लालमण्डी किला' के नाम से अदिक जाना जाता है। इस किले में अल्मोड़ा के अनेक स्थलों के भव्य दर्शन होते हैं।
नन्दा देवी मन्दिर :
 गढ़वाल कुमाऊँ की एक मात्र ईष्ट देवी भगवती नन्दा पार्वती है। नन्दा अष्टमी के दिन सम्पूर्मम पर्वतीय अंचल में नन्दा की विशेष पूजा होती है। नन्दा देवी की मूर्ती केले के पत्तों और केले के तनों से बनाई जाती है। नन्दा की सवारी भी निकाली जाती है। नन्दा अष्टमी भाद्रपद अर्थात् सितम्बर के महीने में आती है।यहाँ पर इस दिन बहुत बड़ा मेला लगता है। इस दिन दर्शनार्थी आकर पूजा करते हैं।
मेले में झोड़ा, चाँचरी और छपेली आदि नृत्यों का भी सुन्दर आयोजन होता है। कुमाऊँ के कई अंचलों की लोकनृत्य की पार्टियाँ यहाँ आकर अपना-अपना कौशल दिखाती हैं, पर्यटक, पदारोही, सैलानी और साहित्य एवं कला प्रेमी इन्ही दिनों अधिकतर कुमाऊँ की संस्कृति तता वहाँ के जन-जीवन की वास्तविक जानकारी करने हेतु अल्मोड़ा पहुँचते हैं। अल्मोड़ा की नन्दा देवी के दर्शन करना अत्यन्त लाभकारी माना जाता है।
अल्मोड़ा में नन्दा देवी के अलावा त्रिपुर सुन्दरी मन्दिर, रघुनाथ मन्दिर, महावीर मन्दिर, मुरली मनोहर मन्दिर, भैरवनाथ मन्दिर, बद्रीनाथ मन्दिर, रत्नेश्वर मन्दिर और उलका देवी मन्दिर प्रसिद्ध हैं।जामा मस्जिद, मैथोडिस्ट चर्च और अंगलीकन चचें प्रसिद्ध है।
कसार देवीमंदिर :
 यह मुख्य नगर से आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस मंदिर से हिमालय की ऊँची-ऊँची पर्वत श्रेणियों के दर्शन होते हैं। कसार देवी का मंदिर भी दुर्गा का ही मंदिर है। कहते हैं कि इस मंदिर की स्थापना ईसा के दो वर्ष पहले हो चुकी थी। इस मंदिर का धार्मिक महत्व बहुत अधिक आंका जाता है।
चित्तई मंदिर :
कुमाऊँ के प्रसिद्ध लोक - देवता 'गोल्ल' का यह मंदिर नन्दा देवी की तरह प्रसिद्ध है। इस मंदिर का महत्व सबसे अधिक बताया जाता है। अल्मोड़ा से यह मंदिर ६ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हिमालय की कई दर्शनीय चोटियों के दर्शन यहाँ से होते हैं।
कालीमठ :
यह अल्मोड़ा से ५ कि.मी. की दूरी पर स्थित है। एक ओर हिमालय का रमणीय दृश्य दिखाई देता है और दूसरी ओर से अल्मोड़ा शहर की आकर्षक छवि मन को मोह लेती है। प्रकृतिप्रेमी, कला प्रेमी और पर्यटक इस स्थल पर घण्टों बैठकर प्रकृति का आनन्द लेते रहते हैं। गोरखों के समय राजपंडित ने मंत्र बल से लोहे की शलाकाओं को भ कर दिया था। लोहभ के पहाड़ी के रुप में इसे देखा जा सकता है
सिमतोला :
यह अल्मोड़ा नगर से ३ कि.मी. की दूरी पर 'सिमतोला' का 'पिकनिक स्थल' सैलानियों का स्वर्ग है। प्रकृति के अनोखे दृश्यों को देखने के लिए हजारों पर्यटक इस स्थल पर आते-जाते रहते हैं।
 मोहनजोशी पार्क :
 इस जगह पर एक ताल का निर्माण किया गया है। मानव निर्मित 'v' आकार के इस ताल की सुन्दरता इतनी आकर्षक है कि सैलानी घंटों इसी के पास बैठकर प्रकृति की अद्भुत छवि का आनन्द लेते रहते हैं। यहाँ का मोहक और शान्त वातावरण पर्यटकों के लिए काफी सुखद अनुभव रहता है।
मटेला:
मटेला का सुखद वातावरण सैलानियों के लिए विशेष आकर्षण का केन्द्र है। यहाँ के बाग अत्यन्त सुन्दर हैं। 'पिकनिक' के लिए कई पर्यटक यहाँ अपने-अपने दलों के साथ आते हैं।नगर से १० कि.मी. की दूरी पर एक प्रयोगात्मक फार्म भी है।

राजकीय संग्रहालय :
 अल्मोड़ा में राजकीय संग्रहालय और कला-भवन भी है। कला प्रेमियों तथा इतिहास एवं पुरातत्व के जिज्ञासुओं के लिए यहाँ पर्याप्त सामाग्री है।
ब्राइट एण्ड कार्नर :
यह अल्मोड़ा के बस स्टेशन से केवल २ कि.मी. कब हूरी पर एक अद्भुत स्थल है। इस स्थान से उगते हुए और डूबते हुए सूर्य का दृश्य देखने हजारों मील से प्रकृति प्रेमी आते रहते हैं।इंगलैण्ड में 'ब्राइट बीच' है। उस 'बीच' से भी डूबते और उगते सूरज का दृश्य चमत्कारी प्रभाव डालने वाला होता है। उसी 'बीच' के नाम पर अल्मोड़ा के इस 'कोने' का नाम रखा गया है।अल्मोड़ा सुन्दर आकर्षक और अद्भुत है। इसीलिए नृत्य-सम्राट उदयशंकर को यह स्थान इतना भाया था कि उन्होंने अपनी 'नृत्यशाला' यहीं बनायी थी। उनके कई विश्वविख्यात नृत्यकार शिशुओं ने अल्मोड़ा की रमणीय धरती में ही नृत्य कला की प्रथम शिक्षा ग्रहण की थी।उदयशंकर की तरह विश्वकवि रविन्द्रनाथ टैगोर को भी अल्मोड़ा पसन्द था। वे यहाँ कई दिन तक रहे।विश्व में वेदान्त का शंखनाद करने वाले स्वामी विवेकानन्द अल्मोड़ा में आकर अत्याधिक प्रसन्न हुए थे। उन्हें इस स्थान में आत्मिक शान्ति मिली थी।

अन्य दर्शनीय स्थलअल्मोड़ा स्वंय में दर्शनीय है। परन्तु, उसके आस-पास के क्षेत्रों में भी कई ऐसे स्थल हैं जिनका सौन्दर्य सैलानियों के लिए आकर्षण का विषय है।
 कटारमलकटारमल का सूर्य मन्दिर
 अपनी बनावट के लिए विख्यात है। महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने इस मन्दिर की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उनका मानना है कि यहाँ पर समस्त हिमालय के देवतागण एकत्र होकर पूजा अर्चना करते रहै हैं। उन्होंने यहाँ की मूर्तियों की कला की प्रशंसा की है।कटारमल के मन्दिर में सूर्य पद्मासन लगाकर बैठे हुए हैं।
 यह मूर्ति एक मीटर से अधिक लम्बी और पौन मीटर चौड़ी भूरे रंग के पत्थर में बनाई गई है। यह मूर्ती बारहवीं शताब्दी की बतायी जाती है। कोर्णाक के सूर्य मन्दिर के बाद कटारमल का यह सूर्य मन्दिर दर्शनीय है। कोर्णाक के सूर्य मन्दिर के बाहर जो झलक है, वह कटारमल मन्दिर में आंशिक रुप में दिखाई देती है।कटारमल के सूर्य मन्दिर तक पहुँचने के लिए अल्मोड़ा से रानीखेत मोटरमार्ग के रास्ते से जाना होता है।
 अल्मोड़ा से १४ कि.मी. जाने के बाद ३ कि.मी. पैदल चलना पड़ता है। मन्दिर १५५४ मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। अल्मोड़ा से कटारमल मंदिर १७ कि.मी. की निकलकर जाता है। रानीखेत से सीतलाखेत २६ कि.मी. दूर है। १८२९ मीटर की ऊँचाई पर बसा हुआ है। कुमाऊँ में खुले मैदान के लिए यह स्थान प्रसिद्ध है। कुमाऊँ का यह ऐसा खिला हुआ रमणीय स्थान है यहाँ देश के कोने-कोने से हजारों बालचर तथा एन.सी.सी. के कैडेट अपने-अपने शिविर लगाकर प्रशिक्षण लेते हैं। यहाँ ग्रीष्म ॠतु में रौनक रहती है। प्रशिक्षण के लिए यहाँ पर्याप्त व्यवस्था है। दूर-दूर तक कैडेट अपना कार्यक्रम करते हुए, यहाँ आन्नद मनाते हैं।
 'सीतला देवी' का यहाँ प्राचीन मंदिर है। इस देवी की इस सम्पूर्ण क्षेत्र में बहुत मान्यता है। इसीलिए 'सीतलादेवी' के नाम से ही इस स्थान का नाम 'सीतलाखेत' पड़ा है। यहाँ पर्यटकों के लिए पर्याप्त व्यवस्था है। कुमाऊँ मण्डल विकास निगम ने यहाँ पर चार शैय्याओं वाला एक आवासगृह बनाया है। प्रकृति-प्रेमियो के लिए 'सीतलाखेत' का सम्पूर्ण क्षेत्र आकर्षण से बरा हुआ है।'सीतलाखेत' का मुख्य आकर्षम यह है कि यहाँ से हिमालय के भव्य दर्शन होते हैं। छुट्टियों को शान्तिपूर्वक बिताने के लिए यह अत्युत्तम स्थान है।
 उपत :
रानीखेत-अल्मोड़ा मोटर-मार्ग के पाँचवें किलोमीटर पर उपत नामक रमणीय स्थल है। कुमाऊँ की रमणीयता इस स्थल पर और भी आकर्षक हो जाती है। उपत में नौ कोनों वाला विशाल गोल्फ का मैदान है। गोल्फ के शौकीन यहाँ गर्मियों में डेरा डाले रहते हैं। रानीखेत समीप होने की वजह से सैकड़ों प्रकृति-प्रेमी और पर्वतारोही भी इस क्षेत्र में भ्रमणार्थ आते रहते हैं। प्रकृति का स्वच्छन्द रुप उपत में छलाक हुआ दृष्टिगोचर होता है। रानीखेत से प्रतिदिन सैलानी यहाँ आते रहते हैं।
कालिका :
उपत में लगभग एक-डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर कालिक नामक स्थल भी अपनी प्राकृतिक छटा के लिए विख्यात है। कालिका में 'कालीदेवी' का मंदिर है। यहाँ काली के भक्त निरन्तर आते रहते हैं। 'कालिका' में वन विभाग की फूलों की एक नर्सरी है। इस नर्सरी के कारण अनेक वनस्पति शास्र के शोधार्थी और प्रकृति-प्रेमी यहाँ जमघट लगाए रहते हैं।
मजखाली :
 कालिक से केवल ७ कि.मी. दूर पर रानीखेत-अल्मोड़ा-मार्ग पर मजखाली का अत्यन्त सौन्दर्यशाली स्थल स्थित है। मजखाली की धरती रमणीय है। यहाँ से हिमालय का मनोहारी हिम दृश्य देखने सैकड़ों प्रकृति-प्रेमी आते रहते हैं। मजखाली से कौसानी का मार्ग सोमेश्वर होकर जाता है। रानीखेत से कौसानी जाने वाले पर्यटक मजखाली होकर ही जाना पसन्द करते हैं।

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02-उत्तरकाशी
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[color=green]उत्तरकाशी ऋषिकेश से 155 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक शहर है, जो उत्तरकाशी जिले का मुख्यालय है। यह शहर भागीरथी नदी के तट पर बसा हुआ है। उत्तरकाशी धार्मिक दृष्‍िट से भी महत्‍वपूर्ण शहर है। यहां भगवान विश्‍वनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। यह शहर प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है
। यहां एक तरफ जहां पहाड़ों के बीच बहती नदियां दिखती हैं वहीं दूसरी तरफ पहाड़ों पर घने जंगल भी दिखते हैं। यहां आप पहाड़ों पर चढ़ाई का लुफ्त भी उठा सकते हैं।
उत्तरकाशी का एक अन्‍य आकर्षण पर्वतारोहण है। यहां आप पर्वतारोहण का मजा ले सकते हैं। हर-की-दून, दोदीतल, यमुनोत्री तथा गोमुख से पर्वतारोहण किया जा सकता है।उत्तरकाशी के अधिकांश रेस्‍टोरेंटों में शाकाहारी खाना मिलता है। कुछ होटलो में विशेष अनुरोध पर गढ़वाली भोजन बनाया जाता है।



झंगुरा,मंडुआ तथा भट्ट यहां के प्रमुख भोजन है। इसके साथ-साथ रायता तथा रोटी भी यहां के लोग खाते हैं। सत्‍यम फूड यहां का सबसे बढि़या रेस्‍टोरेंट है।
उत्तरकाशी जिले का एक भाग बड़कोट गढ़वाल राज्य का एक हिस्सा था जहां ‘पाल’ नाम से विभूषित गढ़वाल वंश का शासन था, जो बाद में ‘शाह’ नाम में बदल गया। वर्ष 1803 में, नेपाल के गोरखों ने गढ़वाल पर आक्रमण किया और अमर सिंह थापा को वहां का शासक बनाया गया।



वर्ष 1814 में गोरखों का संपर्क अंग्रेजी शासन से हुआ क्योंकि उनकी सीमाएं अंग्रेजों की सीमा से सटी थी। सीमा संकट ने अंग्रेजों को गढ़वाल पर आक्रमण करने को बाध्य किया।अप्रैल, वर्ष 1815 में गोरखों को गढ़वाल से खदेड़ दिया गया और इसे अंग्रेजों के जिले में मिलाकर दो भागों में बांटा गया पूर्वी एवं पश्चिमी गढ़वाल। पूर्वी गढ़वाल को अंग्रेजों ने अपने साथ रखा और इसे ब्रिटीश गढ़वाल कहा गया।
 इनको छोड़कर अलकनंदा नदी के पश्चिम स्थित पश्चिमी गढ़वाल को पंवार वंश के उत्तराधिकारी सुदर्शन शाह को दे दिया गया। इस क्षेत्र को टिहरी गढ़वाल या टिहरी रियासत का नाम दिया गया। बड़कोट उस समय के एक प्रशासनिक क्षेत्र रवाँई पट्टी का एक भाग था और यहीं से रवाँई नाम का सूत्रपात हुआ। वर्ष 1947 में भारत को स्वाधीनता प्राप्त होने पर वर्ष 1949 में इसे उत्तर प्रदेश राज्य के साथ मिलाया गया।



 शहर की खुदाई में कई कुंडों का उदय हुआ। जिसके इर्द-गिर्द सीढ़ियों सहित पत्थर की दीवार निर्मित है) साथ ही भगवान विष्णु, गणेश तथा विष्णु के द्वारपालों जय एवं विजय की मूर्तियां भी मिली। चूंकि इन खोजों का अध्ययन एवं अधिकृति होना अब भी बाकी है इसलिये इनका समय-काल निर्धारित नहीं हो सकता। फिर भी तथ्य है कि वर्तमान गांव एवं शहर के अस्तित्व से पहले भी बड़कोट एक आवासीय स्थल रहा था।
पौराणिक समय से भिन्न जाति, भाषा और संस्कृति के लोग यहां (गढ़वाल) में भिन्न जगहों से भिन्न समय पर आकर बसे। सबसे पहले कोल, कीरात और खासा (डोम, भोटिया और खासा) जो आज के जमाने के ब्राह्मण और राजपूत हैं। इसलिये पहले यहां के समाज की तीन सतह थी। मध्य युग में भारत के मैदानी इलाकों से यहां लोग आ पहुंचे जिससे समाज की सतहें चार हो गई।”
बड़कोट के यमुनोत्री के रास्ते पर सड़क से बन जाने पर लोग गढ़वाल के अन्य ईलाकों से आकर यहां बसने लगे। व्यवसायियों ने इसमें यात्रा पर आये यात्रियों की आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु होटलों, ढ़ाबों एवं अन्य सेवाओं को शुरू करने का अपार अवसर देखा। यही वह समय था जब बड़कोट एक गांव से छोटे कसबों के रूप में विकसित हुआ जो आज है।पुरानी टिहरी के जल प्लावन के कारण भी उस शहर के वासियों ने बड़कोट में पुनर्वास स्थापित कर लिया। आज बड़कोट का नक्शा बदल रहा है।
 जिले में उत्तरकाशी के बाद दूसरा सबसे बड़ा शहर बड़कोट धीरे-धीरे महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है, खासकर वर्ष 1990 के दशक में उत्तरकाशी क्षेत्र में आये भयानक भूकंप के बाद। उसके बाद कई मुख्यालयों एवं अन्य जिला स्तरीय कार्यालयों का आना बड़कोट में जारी है।
पास पड़ोस के क्षेत्रों से लोग रोजगार की तलाश या बच्चों की पढ़ाई के लिये यहां आ जाते हैं।परंपरागत परिधानपरंपरागत रूप से ऊन का विस्तृत इस्तेमाल किया गया है। प्रत्येक ग्रामीण परिवार कुछ भेड़ों एवं बकरियों को पालता है एवं उनके ऊन का इस्तेमाल वस्त्र निर्माण में करता है। भेड़ों के ऊन से बेंडी या वस्त्र बनाया जाता है जहां ऊन के गोलों को ग्रामीण बुनकर को देकर वस्त्र बनवाया जाता है।
परंपरागत तौर पर पुरूष ऊन के बुने कुर्ते एवं पायजामे पहनते हैं, जिसके ऊपर ऊन के जैकेट या कोट धारण करते हैं। महिलाये पल्लु रहित साड़ीनुमा कपड पॉकी तथा गट्टर धारण करती हैं जो 12 फीटx* 9 फीट कपड़ा उनकी कमर के चारों ओर बंधा होता है, [/color]

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जब वे खेतों में काम करती हैं और इसके ऊपर एक ब्लाऊज या कुर्ता पहनती है। इस परिधान को पूर्ण करता है एक साफा सर ढकने के लिये।बकरी के भेड़ों की अपेक्षा मोटे एवं सख्त ऊनों से या तो बरसाती-कोट या दरियां बनायी जाती हैं।परंपरागत जेवर सोने के बने होते हैं जिनमें शामिल होते हैं बिंदाल, कानों के झुमके, बुलाक (नाक की बाली जो नाकों के दोनों छिद्रों के केंद्र में पहना जाता है और चिबुक तक झुलता है), नथ, तिमाणिया (गले का हार जिसमें तीन खोखले स्वर्णिम गोलों को मूंगे के मनके के कई तारों पर झुलाया जाता है) एवं मंगल-सूत्र (काले मूंगे पर झूलता एक केंद्रीय स्वर्ण का टुकड़ा) आदि।
 जबकि बड़कोट गांव के स्त्री-पुरूष अब भी परंपरागत वस्त्र पहनते हैं, बड़कोट शहर में वस्त्र अधिक आधुनिक होते हैं तथा महिलाएं सलवार-कमीज तथा साड़ियां पहनती हैं और पुरूष पैंट-शर्ट धारण करते हैं।जीवन की परंपरागत शैलीबड़कोट क्षेत्र में खेती योग्य भूमि की कमी है। कृषि को प्रभावित करने वाले अवरोधक तत्वों में शामिल हैं कृषि मौसम छोटा होना, निम्न तापमान, अधिक ऊंचाई, भूमि का आकार छोटा होना, खड़ी ढालों के कारण मिट्टी क्षय की निरस्तता, आदि। कृषि आय को पूरा करने के लिये ऊन एवं मांस के लिये भेड़-पालन, पौधे उगाने, कताई एवं बुनाई एवं अन्य कुटीर उद्योगों का सहारा परंपरागत रूप से लिया गया है।
परंपरागत गेहूं, चावल, मड़ुआ एवं झंगोरी की पैदावार के अलावा बड़कोट क्षेत्र में छीमी (मटर) एंव टमाटर जैसे नगदी फसल की पैदावार भी की जाती है, जिन्हें पुरोला एंव देहरादून की बाजारों में ले जाकर बेचा जाता है। बड़कोट के ऊपर की पहाड़ियों पर आलू पैदा किया जाता है तथा यहीं स्थानीय स्वामित्व के सेब के बगीचे भी स्थित हैं।
 परंपरागत भोजन में शामिल है बड़ी, मीठारहित हल्वा जो गुड़ के साथ खाया जाता है, दाल चावल एवं गेहूं से बना असका, जिसे चटनी के साथ खाया जाता है तथा तिलांता जो चावल एवं तिल की खिचड़ी है।

बोली की भाषाएंरवाल्टी,


(केवल बड़कोट एवं नौ-गांव में बोली जाने वाली गढ़वाली का एक बदला स्वरूप), हिन्दी एवं अल्पज्ञान की अंग्रेजी।नृत्य एवं गीतगीत एवं नृत्य क्योंकि खासकर रवाँई के लोग प्रत्येक अवसर का समारोह पूर्वक मनाते हैं, छोटा हो या बड़ा और वर्ष भर संगीत एवं नृत्य का सिलसिला चलता रहता है। गीतों एवं नृत्यों के साथ ढोल एवं नगाड़े भी होते हैं, जिन्हें परंपरागत बाजगी बजाते हैं।

 गीतों एवं नृत्यों की गहरी जड़े संप्रदाय के जीवन-चक्र, खेतिहर जीवन, प्रकृति तथा धर्म में व्याप्त होती हैं।रासो वह गीत एवं नृत्य होता है जो प्राचीन काल के स्थानीय नायकों एवं नायिकाओं का समारोह होता है या फिर उन लोगों का भी जिन्होंने हाल के दिनों में अच्छे एवं बहादुरी के कारनामे किये हैं। रासो में पुरूष एवं महिलाएं दोनों नाचते हैं, जिसके चक्राकार रूप में पुरूष एवं महिलाएं अपनी बाहे
एक दूसरे के कमर पर रखने से जुड़े रहते हैं। केवल पुरूषों का रास नृत्य तलवार या खुखरी के टेक से किया जाता है।जागर एवं पांडव नृत्य अधिक धार्मिक प्रकृति के होते हैं।


 कुल (परिवार), इश्ट (आवास-भूमि) एवं ग्राम देवी तथा देवताओं की प्रतिमाओं से संप्रदाय का संबंध गहरा एवं निकट का होता है। प्रत्येक अवसर पर ये स्थानीय देवी–देवता ही हैं जो लोगों को समर्थन देती हैं। जागर में थाली की धुन पर आह्वान गीत घढ़ियाला गाता है देवी देवताओं को आमंत्रित करने के लिए।
इसके बाद देवी या देवता समूह के कुछ लोगों में आती हैं। संगीत की धुन पर उन्मत्त होकर वह अचेतावस्था में पहुंच जाते हैं। वे या तो व्यक्तिगत रूप से या फिर चक्राकार होकर नाचते हैं एवं
जागर एक सामान्य बात है जो घर के परिसर में ही होता है। दूसरी ओर पांडव नृत्य अधिक औपचारिक होता है और खुली जगह पर ढोल एवं नगाड़ों की धुन पर किया जाता है।

शक्‍ित मंदिरदेवी

 मंदिरविश्‍वनाथ मंदिर के दायीं ओर शक्‍ित मंदिर है। इस मंदिर में 6 मीटर ऊंचा तथा 90 सेंटीमीटर परिधि वाला एक बड़ा त्रिशूल स्‍थापित है। इस त्रिशूल का ऊपरी भाग लो‍हे का तथा निचला भाग तांबे का है। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी दुर्गा (शक्‍ित) ने इसी त्रिशूल से दानवों को मारा था। बाद में इन्‍हीं के नाम पर यहां इस मंदिर की स्‍थापना की गई।

दायरा बुग्‍याल
 यह बुग्‍याल समुद्र तल से 10,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। यहां से हिमालय का बहुत ही सुंदर नजारा दिखता है। यहां एक छोटी सी झील भी है।

केदार ताल
यह ताल समुद्र तल से 15000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। थाल्‍यासागर चोटी का इसमें स्‍पष्‍ट प्रतिबिंब नजर आता है। केदार ताल जाने के रास्‍ते में कोई सुविधा नहीं मिलती है। इसलिए यहां पूरी तैयारी के साथ जाना चाहिए।

नचिकेता ताल
इस ताल के चारों तरफ हरियाली ही हरियाली है। ताल के तट पर एक छोटा सा मंदिर भी है। कहा जाता है कि नचिकेता जो संत उदाक के पुत्र थे उन्‍होने ही इस ताल का निर्माण किया था। इसी कारण इस ताल का नाम नचिकेता ताल पड़ा। इस ताल के पास ठहरने और खाने की कोई सुविधा नहीं है।

गोमुखगौमुख:


 गंगा का उद्गम‎गोमुख हिमनदी ही भागीरथी (गंगा) नदी के जल का स्रोत है। यह हिंदुओं के लिए बहुत ही पवित्र स्‍थान है। यहां आने वाला प्रत्‍येक यात्री को यहां जरुर स्‍नान करना चाहिए है। यह गंगोत्री से 18 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां से 14 किलोमीटर दूर भोजबासा में एक पर्यटक बंगला है जहां पर्यटकों के ठहरने और भोजन की व्‍यवस्‍था होती है।
नंदन-वन-तपोवनयह स्‍थान गंगोत्री हिमनद से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यहां से आसपास की पहाड़ी का बहुत सुंदर नजारा दिखता है।

नेहरु पर्वतारोही संस्‍थान

उत्तरकाशि की शामइस संस्‍थान की स्‍थापना 1965 ई.में हुई। इस संस्‍थान में पर्वतारोहण सिखाया जाता है। यहां एक हिमालयन संग्रहालय भी है। इस संग्रहालय में पर्वतारोहण से संबंधित पुस्‍तकें, फिल्‍म्‍ा तथा स्‍लाइडस रखे हुए हैं। यहां एक दुकान भी हैं। इसमें पर्वतारोहण से संबंधित सामान मिलता हैं। लोकेशन: टहरी झील के नजदीक राष्‍ट्रीय राजमार्ग संख्‍या 108 पर। वेबसाइट: nimindia.org समय: सुबह 10बजे से शाम 5 बजे तक। मंगलवार बंद। शुल्‍क: वयस्‍क के लिए 5 रु.तथा बच्‍चों के लिए 2 रु.।

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03-उधमसिंहनगर

उधमसिंह नगर उत्तरांचल राज्य के उधमसिंहनगर जिला का मुख्यालय है। यह शहर औद्योगिक क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। इसके अतिरिक्त यहां की प्राकृतिक सुंदरता इस जगह को और अधिक सुंदर बनाती है। उधमसिंह नगर पहले नैनीताल जिले में था। लेकिन अक्टूबर 1995 में इसे अलग जिला बना दिया गया।
 इस जिले का नाम स्वर्गीय उधम सिंह के नाम पर रखा गया है। उधम सिंह स्वतंत्रता सेनानी थे। जलियांवाला बाग हत्याकांड होने के पश्चात् इन्होंने ही जनरल डायर की हत्या की थी। इस जिले में तीन अनुमंडल रूद्रप्रयाग, काशीपुर और काटिमा को सम्मिलित किया गया है। यह जगह चारों ओर से हिमालय से घिरा हुआ है।

काशीपुर-
 इस जगह को गोविशन के नाम से भी जाना जाता है। हर्ष काल (606-647 ईसवीं) के दौरान, यून-च्वांग (631-641 ईसवीं) इस जगह घूमने के लिए आए थे। काशीपुर का नाम काशीनाथ अधिकारी के नाम पर रखा गया था। काशीनाथ अधिकारी ने ही इस स्थान की स्थापना की थी।
 प्रसिद्ध कवि गुमानी ने इसी जगह पर अनेक कविताएं लिखी है। यह जगह गिरीतल और द्रोणा सागर के साथ-साथ पंड़ावों के लिए भी जानी जाती है। काशीपुर में लगने वाला चैती मेला भी काफी प्रसिद्ध है। वर्तमान समय में काशीपुर प्रमुख औद्योगिक शहरों के लिए जाना जाता है। सर्दियों में यहां का नजारा काफी अद्भुत होता है।

पूर्णागिरी-
पूर्णागिरी मंदिर शक्तिपीठ के लिए प्रसिद्ध है। यह स्थान तंकपुर से 21 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह मंदिर पर्वत के सबसे ऊंचे हिस्से में है। हर साल काफी संख्या में श्रद्धालु पूर्णागिरी के दर्शन के लिए आते हैं। नवरात्रा के अवसर पर यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है।

अतारिया मंदिर-

 इस मंदिर में भगवान अतारिया की पूजा की जाती है। हर साल काफी संख्या में भक्तगण इस मंदिर में आते हैं। नवरात्रों के अवसर पर यहां दस दिनों के मेले का कार्यक्रम होता है। अतारिया मंदिर रूद्रप्रयाग-हल्द्वानी मार्ग से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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चैती मंदिर-

चैती मंदिर का नाम माता चैती देवी ने नाम पर रखा गया है। यह मंदिर उधमसिंह नगर के प्रमुख स्थानों में से एक है। मार्च माह के अवसर पर यहां चैती मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले का आयोजन बहुत बड़े स्तर पर किया जाता है। नवरात्रों के दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालु चैती देवी के दर्शनों के लिए यहां पर आते हैं। यह मंदिर काशीपुर-बैजपुर मार्ग पर स्थित है जो कि काशीपुर बस स्टैंड से 2.5 किलोमीटर की दूरी पर है।

 नानक माता धाम-

 यह बहुत ही बड़ा धाम है। नानक माता का निर्माण सरयू नदी पर किया गया है। नानक माता धाम केवल धाम नहीं है बल्कि यह जगह पिकनिक स्थल के रूप में जानी जाती है। यहां का शांत वातावरण और झीलों से बहता पानी इस स्थान की खूबसूरती को ओर अधिक बढ़ाता है। यहां बोटिंग का भी मजा लिया जा सकता है। यह धाम रूद्रप्रयाग से 56 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।नानक माता-सिखों के पहले गुरू, गुरू नानक देव जी इस जगह पर घूमने के लिए आए थे।
उन्हीं के नाम पर इस जगह का नाम नानक माता रखा गया। नानक माता सिखों के प्रमुख धार्मिक स्थानों में से एक है। यह बहुत ही खूबसूरत गुरूद्वारा है। इसके सामने ही नानक माता धाम है। प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या में भक्तगण इस जगह पर आते हैं। नानक माता में ही टूरिंस्ट रेस्ट हॉउस की सुविधा भी उपलब्ध है। इसके अलावा श्रद्धालुओं के लिए गुरूद्वार में रहने की सुविधा भी उपलब्ध है। नानक माता रूद्रप्रयाग-तंकपुर मार्ग पर स्थित है। यह स्थान रूद्रप्रयाग से 56 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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04-चमोली

चमोली भारतीय राज्य उत्तरांचल का एक जिला है ।बर्फ से ढके पर्वतों के बीच स्थित यह जगह काफी खूबसूरत है। चमोली अलखनंदा नदी के समीप बद्रीनाथ मार्ग पर स्थित है। यह उत्तराचंल राज्य का एक जिला है। यह प्रमुख धार्मिल स्थानों में से एक है। काफी संख्या में पर्यटक यहां आते हैं।
 चमोली की प्राकृतिक सुंदरता पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। पूरे चमोली जिले में कई ऐसे मंदिर है जो हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
चमोली में ऐसे कई बड़े और छोटे मंदिर है तथा ऐसे कई स्थान है जो रहने की सुविधा प्रदान करते हैं। इस जगह को चाती कहा जाता है। चाती एक प्रकार की झोपड़ी है जो अलखनंदा नदी के तट पर स्थित है।



मुख्य आकर्षण,

बद्रीनाथबद्रीनाथ देश के प्रमुख धार्मिक स्थानों में से एक है। यह चार धामों में से एक धाम है। श्री बद्रीनाथ मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। इसकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी। इसके बाद इसका निर्माण दो शताब्दी पूर्व गढ़वाल राजाओं ने करवाया था। बद्रीनाथ तीन भागों में विभाजित है- गर्भ गृह, दर्शन मंडप और सभा मंडप।

तपकुण्ड
अलखनंदा नदी के किनार पर ही तप कुंड स्थित कुंड है। इस कुंड का पानी काफी गर्म है। इस मंदिर में प्रवेश करने से पहले इस गर्म पानी में स्नान करना जरूरी होता है। यह मंदिर प्रत्येक वर्ष अप्रैल-मई माह में खुलता है। सर्दियों के दौरान यह नवम्बर के तीसर सप्ताह में बंद रहता है। इसके साथ ही बद्रीनाथ में चार बद्री भी है जिसे सम्मिलित रूप से पंच बद्री के नाम से जाना जाता है। यह अन्य चार बद्री- योग ध्यान बद्री, भविष्य बद्री, आदि बद्री और वृद्धा बद्री है।

हेमकुंड साहिब
 हेमकुंड को स्न्रो लेक के नाम से भी जाना जाता है। यह समुद्र तल से 4329 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां बर्फ से ढके सात पर्वत हैं, जिसे हेमकुंड पर्वत के नाम से जाना जाता है। इसके अतिरिक्त तार के आकार में बना गुरूद्वारा जो इस झील के समीप ही है सिख धर्म के प्रमुख धार्मिक स्थानों में से एक है। यहां विश्‍व के सभी स्थानों से हिन्दू और सिख भक्त काफी संख्या में घूमने के लिए आते हैं। ऐसा माना जाता है कि गुरू गोविन्द सिंह जी, जो सिखों के दसवें गुरू थे, यहां पर तपस्या की थी। यहां घूमने के लिए सबसे अच्छा समय जुलाई से अक्टूबर है।
गोपेश्‍वर शहर में तथा इसके आस-पास बहुत सारे मंदिर है। यहां के प्रमुख आकर्षण केन्दों में पुराना शिव मंदिर, वैतामी कुंड आदि है।
गोपेश्वर का इतिहास गोपीनाथमन्दिर से निकट से जुड़ा है, जिसके इर्द-गिर्द यह शहर बसा है। मन्दिर परिसर में पाये गये एक लोहे के त्रिशूल पर खुदे लेख वर्तमान 6-7वीं सदी के हैं। चार लेख संस्कृत की नागरी लिपि में हैं, जिनमें स्कंदनाग, विष्णुनाग तथा गणपतनाग जैसे शासकों का वर्णन है। वर्ष 1191 से एक अन्य लेख में नेपाल के सामान्य वंश के शासक अशोक माल्ला का वर्णन है।


प्राचीन काल में शासकों द्बारा अपनी प्रभुता की घोषणा करने का एक सामान्य तरीका होता था विजय के प्रतीक के रूप में एक त्रिशूल गाड़ देना। भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण, जो वर्ष 1970 से ही मंदिर की देखभाल कर रहा है, के अनुसार मंदिर का निर्माण कत्यूरी शासन के दौरान 9-11वीं सदीं के मध्य हुआ।मूलरूप से प्राचीन काल में यह गांव मन्दिर से 280 मीटर दूर था तथा उसे रानीहाट या कश्मीरहाट कहते थे।
जैसा कि नाम से पता चलता है, यह एक बाजार था जो निपुण मूर्तिकारों के लिये प्रसिद्ब था, वे मुलायम पत्थरों से धार्मिक मूर्तियां गढ़ते थे और केदारनाथ-बद्रीनाथ जाने वाले पैदल तीर्थयात्रियों को बेचते थे। तीर्थ यात्रा के पथ पर गोपेश्वर बद्रीनाथ एवं केदारनाथ से समान दूरी पर था
और इसीलिये तीर्थ यात्रियों का प्रिय था। शहर की मान्यता का दूसरा कारण यह था कि जो कोई भी तीर्थ यात्री बद्रीनाथ-केदारनाथ मन्दिरों तक नही पहुंच पाता था, वह यहां गोपीनाथ मन्दिर में पूजा कर अपनी तीर्थ यात्रा पूर्ण कर लेता था। यह एक ऐसा क्षेत्र था, जहां साधु-संत जगह की शांति एवं सुंदरता से अभिभूत होकर यहां पूजा एवं तप के लिये रूक जाते थे।
पंच प्रयाग में गढ़वाल हिमालय से निकलने वाली पांच प्रमुख नदियों का संगम होता है। ये पांच नदियां विष्णु प्रयाग, नंद प्रयाग, कर्म प्रयाग, रूद्र प्रयाग और देव प्रयाग है।

यहां दो प्रमुख नदियों अलखनंदा और भागीरथी आपस में मिलती है। इसके अलावा यहां कई प्रसिद्ध मंदिर और नदी घाट भी है। ऐसा माना जाता है कि देव प्रयाग में भगवान विष्णु ने राजा बाली से तीन कदम भूमि मांगी थी। यहां रामनवमी, दशहरा और बसंत पंचमी के अवसर पर मेले का आयोजन किया जाता है।
यहां अलखनंदा और धौली गंगा नदियों का संगम होता है। यह समुद्र तल से 6000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। विष्णु प्रयाग से जोशीमठ सिर्फ 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

फूलो की घाटी


प्राकृतिक प्रेमियों के लिए यह जगह स्वर्ग के समान है। इस स्थान की खोज फ्रेंक स्मिथ और आर.एल. होल्डवर्थ ने 1930 में की थी। इस घाटी में सबसे अधिक संख्या में जंगली फूलों की किस्में देखी जा सकती हैं। पौराणिक कथा के अनुसार हनुमान जी लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा के लिए यहां से संजीवनी बूटी लेने के लिए आए थे। इस घाटी में पौधों की 521 किस्में हैं। 1982 में इस जगह को राष्ट्रीय उद्यान के रूप मे घोषित कर दिया गया था। इसके अलावा यहां आपको कई जानवर जैसे, काला भालू, हिरण, भूरा भालू, तेंदुए, चीता आदि देखने को मिल जाएंगें।

औली
 बहुत ही खूबसूरत जगह है। अगर आप बर्फ से ढ़के पर्वतों और स्की का मजा लेना चाहते हैं तो औली बिल्कुल सही जगह है। जोशीमठ के रास्ते से आप औली तक पहुंच सकते हैं। जो कि लगभग 16 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सर्दियों में कई प्रतियोगियों का आयोजन किया जाता है।
यह आयोजन गढ़वाल मंडल विकास सदन द्वारा करवाया जाता है। इसके अलावा आप यहां से नंदा देवी,कामत औद और दुनागिरी पर्वतों का नजारा भी देख सकते हैं। जनवरी से माच के समय में औली पूरी तरह बर्फ की चादर से ढ़का हुआ रहता है। यहां पर बर्फ करीबन तीन फीट तक गहरी होती है। औली में होने वाले स्की कार्यक्रम यहां पर्यटकों को अपनी ओर अधिक आकर्षित करते हैं।

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05-चम्पावत
चम्पावत , उत्तरांचल का एक जिला है ।उत्तराखंड का ऐतिहासिक चंपावत जिला अपने आकर्षक मंदिरों और खूबसूरत वास्तुशिल्प के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। पहाड़ों और मैदानों के बीच से होकर बहती नदियां अद्भुत छटा बिखेरती हैं। चंपावत में पर्यटकों को वह सब कुछ मिलता है
 
 जो वह एक पर्वतीय स्थान से चाहते हैं। वन्यजीवों से लेकर हरे-भरे मैदानों तक और ट्रैकिंग की सुविधा, सभी कुछ यहां पर है।समुद्र तल से 1615 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। चंपावत कई सालों तक कुंमाऊं के शासकों की राजधानी रहा है। चांद शासकों के किले के अवशेष आज भी चंपावत में देखे जा सकते हैं।
चम्पावत की संस्कृति को आकार यहां के इतिहास से मिला है। यह एक प्राचीन शहर है जिसे 10वीं सदी में कुमाऊं के चंद वंश के राजाओं द्वारा बनवाया गया था। स्थानीय आकर्षणों में सुंदर मंदिर परिसरों के अवशेष तथा कुछ पौराणिक तौर पर जुड़े स्थल जैसे गोरिल देवता तथा नागनाथ के मंदिर शामिल हैं।
यह शहर चीड़ पेड़ के वनों तथा समतल हरे-भरे खेतों से घिरा है एवं यहां का शांतिपूर्ण वातावरण तथा यहां के मित्रवत लोग आपके हृदय में जगह बना लेंगे। शहर के आस-पास घूमने योग्य स्थानों में प्राचीन घटोत्कच्छ मंदिर तथा मायावती में स्वामी विवेकानंद से जुड़ा आश्रम शामिल हैं।
 चम्पावत,मुख्य आकर्षण
बालेश्रवर मंदिर
यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण चांद शासन ने करवाया था। इस मंदिर की वास्तुकला काफी सुंदर है। ऐसा माना जाता है कि बालेश्रवर मंदिर का निर्माण 10-12 ईसवीं शताब्दी में हुआ था

मीठा-रीठा साहिब
 यह सिक्खों के प्रमुख धार्मिक स्थानों में से एक है। यह स्थान चम्पावत से 72 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। कहा जाता है कि सिक्खों के प्रथम गुरू, गुरू नानक जी यहां पर आए थे। यह गुरूद्वारा जहां पर स्थित है वहां लोदिया और रतिया नदियों का संगम होता है। गुरूद्वार परिसर पर रीठे के कई वृक्ष लगे हुए है। ऐसा माना जाता है कि गुरू के स्पर्श से रीठा मीठा हो जाता है। गुरूद्वारा के साथ में ही धीरनाथ मंदिर भी है। बैसाख पूर्णिमा के अवसर पर यहां मेले का आयोजन किया जाता है।
पूर्णनागिरी मंदिर
यह पवित्र मंदिर पूर्णनागिरी पर्वत पर स्थित है। यह मंदिर तंकपुर से 20 किलोमीटर तथा चम्पावत से 92 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पूरे देश से काफी संख्या में भक्तगण इस मंदिर में आते हैं। इस मंदिर में सबसे अधिक भीड़ चैत्र नवरात्रों ( मार्च-अर्प्रैल) में होती है। यहां से काली नदी भी प्रवाहित होती है जिसे शारदा के नाम से जाना जाता है।
श्यामलातल
 यह जगह चम्पावत से 56 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके साथ ही यह स्थान स्वामी विवेकानन्द आश्रम के लिए भी प्रसिद्ध है जो कि खूबसूरत श्यामातल झील के तट पर स्थित है। इस झील का पानी नीले रंग का है। यह झील 1.5 वर्ग किलोमीटर तक फैली हुई है। इसके अलावा यहां लगने वाला झूला मेला भी काफी प्रसिद्ध है।
पंचेश्रवर
यह स्थान नेपाल सीमा के समीप स्थित है। इस जगह पर काली और सरयू नदियां आपस में मिलती है। पंचेश्रवर भगवान शिव के मंदिर के लिए अत्यंत प्रसिद्ध है। काफी संख्या में भक्तगण यहां लगने वाले मेलों के दौरान आते हैं। और इन नदियों में डूबकी लगाते हैं।
देवीधुरा
यह जगह चम्पावत से 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह खूबसूरत जगह वराही मंदिर के नाम से जानी जाती है। यहां बगवाल के अवसर पर दो समूह आपस में एक दूसरे पर पत्थर फेकते हैं। यह अनोखी परम्परा रक्षा बन्धन के अवसर की जाती है।
लोहाघाट
यह ऐतिहासिक शहर चम्पावत से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह स्थान लोहावती नदी के तट पर स्थित है। यह जगह अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी काफी प्रसिद्ध है। इसके अलावा यह स्थान गर्मियों के दौरान यहां लगने वाले बुरास के फूलों के लिए भी प्रसिद्ध है।


अब्बोट माउंट बहुत ही खूबसूरत जगह है। इस स्थान पर ब्रिटिश काल के कई बंगले मौजूद है। यह खूबसूरत जगह लोहाघाट से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसके अलावा यह जगह 2001 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
ग्वेल जी को न्याय का देवता भी कहा जाता है। माना जाता है कि जिस किसी के भी साथ राज दरबार में गलत न्याय हुआ हो, न्याय में भेदभाव हो गया हो तो वह इनके दरबार में अपनी करुण पुकार कहकर या लिखकर इनके समक्ष करता है, इसी विश्वास के साथ कि ग्वेल देवता अवश्य ही मेरे साथ हुये अन्याय को देखते हुये,
 त्वरित न्याय करेंगे। यहां आकर उन्हें न्याय भी मिलता है। ऎसे कई उदाहरण हिअं ग्वेल जी के न्याय के, अन्यायी को दंड देने के तथा दुःखियों का दुःख दूर करने के लिये।
 माना जाता है कि ग्वेल जी जब राजा थे, तब वह राज्य में घूम-घूम कर जन अदालत लगाकर त्वरित न्याय दिया करते थे। आज भी लोक अदालतों के माध्यम से जनता को तुरंत न्याय दिलाने का प्रयास दिया जाता है। ग्वेल जी इस आवश्यकता को समझते हुये लिक अदालतों द्वारा न्याय कार्य आरम्भ कर चुके थे।.
 घटोत्‍कच का मंदिर
 यह शहर से 2 किमी, की दूर चम्‍पावत तामली माटर मार्ग के किनारे पर बसा है यह भीम पुत्र् घटोत्‍कच का मंदिर है महाभारत की लडाई में घटोत्‍कच का सिर धड से कट कर यहां पर गिरा यह क्षेत्र् एक जलाशय के रूप में था पांडव अपने पुत्र् के सिर को न देखकर बहुत दुखी हुए तो स्‍वप्‍न में स्‍वंय घटोत्‍कच ने बताया कि मेरा सिर अमुक क्षेत्र् में है तो पांडव लोग डुढते हुए यहां आये व जलाशय को देखकर घबरा गये कि कैसे सिर को निकाला जाय उन्‍होंने मॉ भगवती अखिल तारणी से प्रार्थना की तथा भीम ने गदा प्रहार कर जलाशय को तोड डाला घटोत्‍कच का श्राद्व किया जिसके चिन्‍ह, हवन कुन्‍ड, नेदी,दीपे आदि आज भी खण्‍डहर के रूप में विद्यमान है जिस स्‍थान पर श्राद्व किया वह शिला धर्म शिला के नाम से नाम से जानी जाती है धार्मिक पर्वो पर आज भी यहां पर स्‍नान करने का महत्‍व है
व्‍यानधुरा
आस्‍था का केन्‍द्र व्‍यानधुरा विभिन्‍न प्रकार के वन्‍य जन्‍तुओं से भी भरा पूरा है यह मंदिर मनोहारी प्राक़तिक सौन्‍दर्य से भरपूर्व है तथा टनकपुर से 25 कि,मी दूर अवस्थित है इस मंदिर की बनावट अन्‍य मंदिरो से भिन्‍न है जिसमें छत और कलश नहीं है इसमें धनुश –वाण, ि‍त्रशूल इकठठे है
ऐडी को अर्जन का अवतार तथा व्‍यान को धर्मराज युधिष्टिर का अवतार मानते है मान्‍यताहै कि पांडव की तपोभूमि होने से भगवती व्‍यान, देव ,ऐडी ने तुर्क आक़मणकारी को जिसे माल का भराडा कहते है को रोका पांडवो ने व्‍यानधुरा में अज्ञातवास के समय भगवती की आराधना की ओर अस्‍त्र् शस्‍त्रों को इसी स्‍थान पर छिपाया भीम ने कीचक का वद्य भी इसी क्षेत्र् मे किया था दस क्षेत्र् में मुगल कालीन लेख भी मिला है
एडी व व्‍यान राजांशी देव के रूप में पूजयनीय है और न्‍याय केप्रतीक माने जाते है इसकी कई शाखायें है एक शाखा चम्‍पावत से 3 किमी, चम्‍पावत – ललुवापानी मोटर मार्ग से मात्र् 1.50 किमी पर है तथा एक अन्‍य शाखा गहतोडा फटक्‍ शिला के नाम से सेन धुरा में अवस्थित है इन मंदिरों में पशु बलि वर्जित है जन मानस में ऐडी व्‍यानधुरा की महीमा बहुत है

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06-टिहरी गढ़वाल




टिहरी गढ़वाल , उत्तरांचल का एक जिला है ।टिहरी गढ़वाल भारतीय राज्य उत्तराखंड का एक जिला है। इसके अतिरिक्त टिहरी उत्तराखंड का सबसे बड़ा जिला है। पर्वतों के बीच स्थित यह जगह काफी खूबसूरत है। हर वर्ष काफी संख्या में पर्यटक यहां पर घूमने के लिए आते हैं। यह स्थान धार्मिक स्थल के रूप में भी काफी प्रसिद्ध है। यहां आप चम्बा, बुदा केदार मंदिर, कैम्पटी फॉल, देवप्रयाग आदि स्थानों में घूम सकते हैं। यहां की प्राकृतिक खूबसूरती काफी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर खिंचती है।

टिहरी और गढ़वाल दो अलग नामों को मिलाकर इस जिले का नाम रखा गया है। जहाँ टिहरी बना है शब्‍द ‘त्रिहरी’ से, जिसका मतलब है एक ऐसा स्‍थान जो तीन तरह के पाप (जो जन्‍मते है मनसा, वचना, कर्मा से) धो देता है वहीं दूसरा शब्‍द बना है ‘गढ़’ से, जिसका मतलब होता है किला।
सन्‌ 888 से पूर्व सारा गढ़वाल क्षेत्र छोटे छोटे ‘गढ़ों’ में विभाजित था, जिनमें अलग-अलग राजा राज्‍य करते थे जिन्‍हें ‘राणा’, ‘राय’ या ‘ठाकुर’ के नाम से जाना जाता था।ऐसा कहा जाता है कि मालवा के राजकुमार कनकपाल एक बार बद्रीनाथ जी (जो आजकल चमोली जिले में है) के दर्शन को गये जहाँ वो पराक्रमी राजा भानु प्रताप से मिले। राजा भानु प्रताप उनसे काफी प्रभावित हुए और अपनी इकलौती बेटी का विवाह कनकपाल से करवा दिया साथ ही अपना राज्‍य भी उन्‍हें दे दिया।

टिहरी गढ़वाल , उत्तरांचल का एक जिला है ।टिहरी गढ़वाल भारतीय राज्य उत्तराखंड का एक जिला है। इसके अतिरिक्त टिहरी उत्तराखंड का सबसे बड़ा जिला है। पर्वतों के बीच स्थित यह जगह काफी खूबसूरत है। हर वर्ष काफी संख्या में पर्यटक यहां पर घूमने के लिए आते हैं। यह स्थान धार्मिक स्थल के रूप में भी काफी प्रसिद्ध है। यहां आप चम्बा, बुदा केदार मंदिर, कैम्पटी फॉल, देवप्रयाग आदि स्थानों में घूम सकते हैं। यहां की प्राकृतिक खूबसूरती काफी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर खिंचती है।
टिहरी और गढ़वाल दो अलग नामों को मिलाकर इस जिले का नाम रखा गया है। जहाँ टिहरी बना है शब्‍द ‘त्रिहरी’ से, जिसका मतलब है एक ऐसा स्‍थान जो तीन तरह के पाप (जो जन्‍मते है मनसा, वचना, कर्मा से) धो देता है वहीं दूसरा शब्‍द बना है ‘गढ़’ से, जिसका मतलब होता है किला।

सन्‌ 888 से पूर्व सारा गढ़वाल क्षेत्र छोटे छोटे ‘गढ़ों’ में विभाजित था, जिनमें अलग-अलग राजा राज्‍य करते थे जिन्‍हें ‘राणा’, ‘राय’ या ‘ठाकुर’ के नाम से जाना जाता था।ऐसा कहा जाता है कि मालवा के राजकुमार कनकपाल एक बार बद्रीनाथ जी (जो आजकल चमोली जिले में है) के दर्शन को गये जहाँ वो पराक्रमी राजा भानु प्रताप से मिले। राजा भानु प्रताप उनसे काफी प्रभावित हुए और अपनी इकलौती बेटी का विवाह कनकपाल से करवा दिया साथ ही अपना राज्‍य भी उन्‍हें दे दिया।

 धीरे-धीरे कनकपाल और उनकी आने वाली पीढ़ियाँ एक-एक कर सारे गढ़ जीत कर अपना राज्‍य बड़ाती गयीं। इस तरह से सन्‌ 1803 तक सारा (918 सालों में) गढ़वाल क्षेत्र इनके कब्‍जे में आ गया।उन्‍ही सालों में गोरखाओं के नाकाम हमले (लंगूर गढ़ी को कब्‍जे में करने की कोशिश) भी होते रहे, लेकिन सन्‌ 1803 में आखिर देहरादून की एक लड़ाई में गोरखाओं की विजय हुई जिसमें राजा प्रद्वमुन शाह मारे गये। लेकिन उनके शाहजादे (सुदर्शन शाह) जो उस वक्‍त छोटे थे वफादारों के हाथों बचा लिये गये। धीरे-धीरे गोरखाओं का प्रभुत्‍व बढ़ता गया और इन्‍होनें करीब 12 साल राज्‍य किया। इनका राज्‍य कांगड़ा तक फैला हुआ था,

फिर गोरखाओं को महाराजा रणजीत सिंह ने कांगड़ा से निकाल बाहर किया। और इधर सुदर्शन शाह ने इस्‍ट इंडिया कम्‍पनी की मदद से गोरखाओं से अपना राज्‍य पुनः छीन लिया।ईस्‍ट इंडिया कंपनी ने फिर कुमाऊँ, देहरादून और पूर्व (ईस्‍ट) गढ़वाल को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला दिया और पश्‍चिम गढ़वाल राजा सुदर्शन शाह को दे दिया जिसे तब टेहरी रियासत के नाम से जाना गया।

राजा सुदर्शन शाह ने अपनी राजधानी टिहरी या टेहरी शहर को बनाया, बाद में उनके उत्तराधिकारी प्रताप शाह, कीर्ति शाह और नरेन्‍द्र शाह ने इस राज्‍य की राजधानी क्रमशः प्रताप नगर, कीर्ति नगर और नरेन्‍द्र नगर स्‍थापित की। इन तीनों ने 1815 से सन्‌ 1949 तक राज्‍य किया। तब भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान यहाँ के लोगों ने भी काफी बढ चढ कर हिस्‍सा लिया। आजादी के बाद, लोगों के मन में भी राजाओं के शासन से मुक्‍त होने की इच्‍छा बलवती होने लगी। महाराजा के लिये भी अब राज करना मुश्‍किल होने लगा था।

और फिर अंत में 60 वें राजा मानवेन्‍द्र शाह ने भारत के साथ एक हो जाना कबूल कर लिया। इस तरह सन्‌ 1949 में टिहरी राज्‍य को उत्तर प्रदेश में मिलाकर इसी नाम का एक जिला बना दिया गया। बाद में 24 फरवी 1960 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसकी एक तहसील को अलग कर उत्तरकाशी नाम का एक ओर जिला बना दिया


पर्यटन स्थल
बुदा केदार मंदिर
इस स्थान पर बाल गंगा और धर्म गंगा नदियां आपस में मिलती है। टिहरी से इस जगह की दूरी 59 किलोमीटर है। ऐसा माना जाता है कि दुर्योधन ने इसी जगह पर तर्पण किया था। पौराणिक कथा के अनुसार, भिरगू पर्वत पर पंडावों और ऋषि बालखिली के बीच लड़ाई हुई थी।
देवप्रयागदेवप्रयाग

एक प्राचीन शहर है।यह भारत के सर्वाधिक धार्मिक शहरों में से एक है। इस स्थान पर अलखनंदा और भागीरथी नदियां आपस में मिलती है। देवप्रयाग शहर समुद्र तल से 472 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। देवप्रयाग जिस पहाड़ी पर स्थित है उसे गृद्धाचल के नाम से जाना जाता है।
यह जगह गिद्ध वंश के जटायु की तपोभूमि के रूप में भी जानी जाती है। माना जाता है कि इस स्थान पर ही भगवान राम ने किन्नर को मुक्त किया था। इसे ब्रह्माजी ने शाप दिया था जिस कारण वह मकड़ी बन गई थी।
नगतिबा

यह जगह समुद्र तल से 3040 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां से आप हिमालय की खूबसूरत वादियों के नजारों का लुफ्त उठा सकते हैं। इसके अतिरिक्‍त यहां से देहरादून की घाटियों का नजारा भी देखा जा सकता है। नगतिबा ट्रैर्क्‍स और पर्वतारोहियों के लिए बिल्कुल सही जगह है।
 इस स्थान की प्राकृतिक सुंदरता यहां पर्यटकों को अपनी ओर अधिक आकर्षित करती है। नगतिबा पंतवारी से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह स्थान अधिक ऊंचाई पर होने के कारण यहां रहने की सुविधा नहीं है। इसलिए ट्रैर्क्‍स पंतवारी में कैम्प में रहा करते हैं। इसलिए आप जब इस जगह पर जाएं तो अपने साथ टैंट व अन्य सामान जरूर ले कर जाएं।
चम्बा

मंसूरी से 60 किलोमीटर और नरेन्द्र नगर से 48 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह स्थान समुद्र तल से 1676 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां से बर्फ से ढके हिमालय पर्वत और भागीरथी घाटी का खूबसूरत नजारा देखा जा सकता है। चम्बा अपने स्वादिष्ट सेबों के लिए भी प्रसिद्ध है।
चंद्रबदनी
यह स्थान देवप्रयाग से 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। चंद्रबदनी पंहुचने के आपको कांडीखाल से 10 किलोमीटर तक पैदल यात्रा करनी होगी। ऐसा माना जाता है कि राजा दक्ष द्वारा भगवान शिव को यज्ञ में न बुलाने के कारण माता सती ने यज्ञ कुंड में अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। इसके पश्चात् भगवान शिव ने सती को हवन कुंड से निकाल कर अपने कंधों पर रख लिया। इस प्रकार वह कई वर्षो तक सती को लेकर इधर-उधर घूमते रहे।
इसके बाद भगवान विष्णु ने माता सती के शरीर को अपने सुदर्शन चक्र द्वारा 52 हिस्सों में कांट दिया। माता सती के शरीर का निम्न हिस्सा इसी स्थान पर गिरा था। इसके अतिरिक्त मंदिर के आसपास कई अन्य छोट-छोटे मंदिर भी है। प्रत्येक वर्ष अप्रैल माह में इस स्थान पर बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है।
सेम मुखेम
 यह जगह समुद्र तल से 2903 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यह मंदिर नाग राज का है। यह मंदिर पर्वत के सबसे ऊपरी भाग में स्थित है। मुखेम गांव से इस मंदिर की दूरी दो किलोमी.है। माना जाता है कि मुखेम गांव की स्थापना पंड़ावों द्वारा की गई थी।
धनौलटीg]
एक गांव है। जो कि चम्बा से 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह गांव ऑक, देवदार और सदाबहार पौधों (गुलाब जसे दिखने वाला) से घिरा हुआ है। यह गांव छुट्टिया बिताने और पिकनिक स्थल के रूप में बिल्कुल उचित जगह है। यह गांव चारों ओर से जंगलों और बर्फ से ढके पर्वतों से घिरी हुई है। यह जगह काफी शान्तिपूर्ण स्थल के रूप में भी जानी जाती है जिस कारण यहां पर्यटकों की भीड़ अधिक रहती है।
नरेन्द्र नगर
नरेन्द्र नगर मुनि-की-रीति से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह जगह समुद्र तल से 1,129 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है।
हवाई अड्डा
सबसे नजदीकी हवाई अड्डा जोलीग्रांट हवाई अड्डा है। टिहरी जोलीग्रांट से 93 किलोमीटर की दूरी पर है।
रेल मार्ग
ऋषिकेश सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन है। ऋषिकेश से टिहरी 76 किलोमीटर दूर स्थित है।
सड़क मार्ग
 नई टिहरी कई महत्वूर्ण मार्गो जैसे देहरादून, मसूरी, हरिद्वार, पौढ़ी, ऋषिकेश और उत्तरकाशी आदि जगहों से जुड़ा हुआ है। आस-पास की जगह घूमने के लिए टैक्सी द्वारा भी जाया जा सकता है।

Devbhoomi,Uttarakhand

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07-देहरादून(Dehradoon)
देहरादून शहर, दिल्ली से २३० किलोमीटर दूर दून घाटी में बसा हुआ है। 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश राज्य से अलग कर जब उत्तराखंड राज्य का गठन किया गया था, उस समय इसे उत्तरांचल की राजधानी बनाया गया। देहरादून नगर पर्यटन, शिक्षा, स्थापत्य, संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है,मान्यता है कि द्वापर युग में गुरु द्रोणाचार्य ने द्वारागांव के पास देहरादून शहर से 19 किमी पूर्व में देवदार पर्वत पर तप किया था।
 इसी से यह घाटी द्रोणाश्रम कहलाती है।[१]. केदारखंड को स्कंदपुराण का एक भाग माना जाता है। इसमें गढ़वाल की सीमाओं का वर्णन इस तरह है- गंगाद्वार-हरिद्वार से लेकर श्वेतांत पर्वत तक तथा तमसा-टौंस नदी से बौद्धांचल-बघाण में नन्दा देवी तक विस्तृत भूखंड जिसके एक ओर गंगा और दूसरी तरफ यमुना नदी बहती है। तमसा का प्रवाह भी देहरादून से होकर है।
 रामायण काल से देहरादून के बारे में विवरण आता है कि रावण के साथ युद्ध के बाद भगवान राम और उनके छोटे भाई लक्ष्मण इस क्षेत्र में आए थे। अंग्रेज लेखक जीआरसी विलियम्स ने मेमोयर्स आफ दून में ब्राह्मण जनुश्रुति का उल्लेख करते हुए लिखा है कि लंका विजय के पश्चात् ब्राह्मण रावण को मारने का प्रायश्चित करने और प्रायश्चित स्वरूप तपस्या करने के लिए गुरु वशिष्ठ की सलाह पर भगवान राम लक्ष्मण के साथ यहां आए थे।



तपस्या वाले स्थान पर भरत मंदिर बनाया गया था। कालांतर में इसी मंदिर के चारों ओर ऋषिकेश नगर का विकास हुआ। पुरातत्व की दृष्टि से भरत मंदिर की स्थापना सैकड़ों साल पुरानी है। स्कंद पुराण में तमसा नदी के तट पर आचार्य द्रोण को भगवान शिव द्वारा दर्शन देकर शस्त्र विद्या का ज्ञान कराने का उल्लेख मिलता है। यह भी कहा जाता है कि आचार्य द्रोण के पुत्र अश्वात्थामा द्वारा दुग्धपान के आग्रह पर भगवान शिव ने तमसा तट पर स्थित गुफा में प्रकट हुए शिवलिंग पर दुग्ध गिराकर बालक की इच्छा पूरी की थी। यह स्थान गढ़ी छावनी क्षेत्र में स्थित टपकेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर बताया जाता है।
महाभारत काल में देहरादून का पश्चिमी इलाका जिसमें वर्तमान कालसी सम्मिलित है का शासक राजा विराट था और उसकी राजधानी वैराटगढ़ थी। पांडव अज्ञातवास के दौरान भेष बदलकर राजा विराट के यहां रहे। इसी क्षेत्र में एक मंदिर है जिसके बारे में लोग कहते कि इसकी स्थापना पांडवों ने की थी। इसी क्षेत्र में एक पहाड़ी भी है जहां भीम ने द्रौपदी पर मोहित हुए कीचक को मारा था। जब कौरवों तथा त्रिगता के शासक ने राजा विराट पर हमला किया तो पांडवों ने उनकी सहायता की थी।