गैरसैण राजधानी होनी चाहिए या नहीं, इस पर काफी चर्चा देखने को मिल रही रही है. कोइ इसका समर्थन कर रहा है तो, कोई इसका विरोध. मैं भी गैरसैण का समर्थन करता हूँ.
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Subhash kandpal <sck_kandpal@yahoo.co.in
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गैरसैण राजधानी होनी चाहिए या नहीं, इस पर काफी चर्चा देखने को मिल रही रही है. कोइ इसका समर्थन कर रहा है तो, कोई इसका विरोध. मैं भी गैरसैण का समर्थन करता हूँ. जो लोग गैरसैण को राजधानी बनाने का विरोध कर रहे है मैं ब्याक्तिगत रूप से उन लोगों से पोछना चाहता हूँ कि आखिर क्या बारी है इसमे. जो मेरे भाई बन्धु कह रहे है कि इसके अलावा भी हमारे पास बहुत सारे महत्वपुर्ण मुद्दे है चर्चा के लिए, जैसे शिक्षा, गरीबी, बिजली पानी, सड़क, चिकित्सा. निश्चित रोप से ये बहुत ही गंभीर विषय है उत्तराखंड के विकास के लिए लेकिन मैं आप सभी लोगों से पूछना चाहता हूँ कि यदि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से गैरसैण स्थानांतरित की जाती है तो क्या ये सभी विकास रुक जायेगे?, देहरादून को राजधानी के रूप में 10 साल का समय हो गया है. आप उत्तराखंड का विकास किस रोप में देखते है? क्या केवल शहरी इलाकों का विकास ही उत्तराखंड का विकास माना जायेगा? देहरादून आज विकसित हो रहा तो, इसका मतलब ये है कि पूरा उत्तराखंड विकास कर रहा है. उत्तराखंड निर्माण से १० वर्ष पहले के देहरादून और आज वर्तमान के देहरादून में तुलना कीजिये. राजधानी बनने से पहले उसका रोप क्या था और आज क्या है.
जो लोग ये कह रहे है कि ये मूर्खता वाला विषय है, सोच है, तो मैं सर्वप्रथम उन लोगों से कहना चाहता हूँ कि उत्तराखंड राज्य निर्माण करने का आन्दोलन जिस मुद्दे पर लड़ा गया था उसमे गैरसैण का मुद्दा सबसे ऊपर था, तो आप लोगों के अनुसार उन आन्दोलनकारियों कि सोच गलत थी, या उनका सोचना गलत था, या उनकी मानसिकता गलत थी? जिन्होंने अपने जीवन का बलिदान दिया हमने उनकी सोच को ही गलत नकार दिया. मैं आप लोगों से पूछना चाहता हूँ कि हम में से कितने लोगों ने उत्तराखंड राज्य आन्दोलन में भाग लिया? कितने लोगों ने मुजफरनगर- खटीमा में कांड में पुलिस की गोलिया खाई ? कितने लोगों ने पुलिस के डंडे खाए? कितने लोग भूख हरताल पर बैठे? मुझे नहीं लगता है कि हम से कोई भी लोग इस आन्दोलन का हिस्सा बना हो और जो इसका भुक्तभोगी होगा शायद वो कभी भी मन नहीं करेगा.
गैरसैण को राजधानी बनाने का उधेध्य विकास से ही है. सर्वप्रथम तो गैरसैण उत्तराखंड के केंद्र में बसा हुआ है. राजधानी शब्द का मूल ही केद्र है. गैरसैण की सीमा उत्तराखंड के दोनों क्षेत्रों को टच करती है गढ़वाल क्षेत्र को भी और कुमाओं. कहने का मतलब ये है कि दोनों क्षेत्र के लिए ये सबसे नजदीकी बिंदु है.
दूसरा सबसे बड़ा मुद्दा है विकास का. आज अगर देहरादून का कुछ विकास हुआ है तो उसमे राजधानी का भी अपना एक अमूल्य योगदान है. राजधानी बनने के बाद देहरादून का चहुमुखी विकास हुआ है. ये आप सभी लोग जानते है. अगर राजधानी को गैरसैण बनाया जाता है तो उत्तराखंड के शहरी क्षेत्रों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों के विकास कि भी सम्भावना भी बढ़ सकती है. जिस गति से राजधानी बनने के बाद देहरादून और उसके आस पास के इलाकों का विकास हुआ, शायद उसी गति से उत्तराखंड के अन्य पहाडी क्षेत्रों का विकास हो सकता है.
मैं ज्यादा विस्तार में ना जाकर ये कहना चाहता हूँ कि यदि राजधानी के नाम पर देहरादून का विकास हो सकता है तो राजधानी के नाम पर गैरसैण का विकास भी हो सकता है और अगर गैरसैण का विकास होता है तो इसका मतलब ग्रामीण क्षेत्रों का भी विकास हो सकता है. आज बहुत सारे लोगों ने अपने खेत खलिहान बेचकर देहरादून या उसके आस पास के क्षेत्रों में जमीन जायदाद लेकर बस गए है, क्यों?, क्यों पहाड़ के गाँव खली हो रहे है और पहाड़ के शहरी क्षेत्रों में भीड़ बढ़ रही है? इसका उत्तर शायद आप लोग मुझसे ज्यादा अछि तरह बता सकते है.
जो भाई बहिन ये कह रहे है कि राजधानी को बदलने से विकास रुक जायेगा, मेरी दृष्टि में बिलकुल ऐसा नहीं है, फर्क है केवल सोच की. सच तो ये है कि आज ग्रामीण क्षेत्रों की ओर कोई नहीं जाना चाहता है. लोग कह रहे है कि उत्तराखंड से पलायन हो रहा है, मैं तो ये कहता हूँ कि उत्तराखंड का उत्तराखंड से उत्तराखंड में पलायन हो रहा है, कही और नहीं, फर्क सिर्फ इतना है कि उत्तराखंड का ग्रामीण क्षेत्रों से उत्तराखंड के शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन हो रहा है और इस बात को कोई नहीं समझ रहा है और या समझने की कोशिश ही नहीं कर रहे है.
ये मेरी अपनी सोच है.
आपका अपना बन्धु
सुभाष काण्डपाल