Author Topic: Gairsain: Uttarakhand Capital - गैरसैण मुद्दा : अब यह चुप्पी तोड़नी ही होगी  (Read 175483 times)

पंकज सिंह महर

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आगामी वर्ष २०१० को उत्तराखण्ड के सभी संगठनों, प्रेमियों द्वारा "गैरसैंण राजधानी बनाओ, वर्ष" के रुप में मनाना चाहिए और अपने-अपने संगठनों के जरिये इस आन्दोलन को गति देने का प्रयास करनाअ चाहिये।

Devbhoomi,Uttarakhand

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महर जी मैं आपकी बात से बिलकुल सहमत हूँ और हमें नये वर्ष का आगाज इसी आन्दोलन से करना चाहिए की गैरसैण को राजधानी बनाया जय यही हमारा २०१० का तोहफा होना चाहिए उत्तराखंड के लिए, लेकिन करें भी तो क्या करें उत्तराखंड मैं संघठन इतने हो गए हैं की जिनकी कोई गिनती ह नहीं है ओरो ना ही ये संघठन कुछ काम के हैं इनमें तो बहुत सारे फेक संघठन हैं जो पब्लिक से उत्तराखंड के नाम पर पैसा   भी   हसूल करते हैं! चाहे कुछ भी हो लेकिन सब संघठनों का काम एक होना चाहिए उत्तराखंड के विकास के मुद्दों को सरकार के सामने लाना !




जय उत्तराखंड

Devbhoomi,Uttarakhand

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१९९४ उत्तराखंड के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय,वर्ष आते रहेंगें जाते रहेंगें लेकिन १९९४ की घटनाएं हमारी लोक स्मिरती मैं रहेंगी,हमेशा-हमेशा के लिए,सैंतालिस वर्ष तक हमारे गाँव आजादी की उस रौशनी का इन्तजार करते रहे जिस रौशनी को हमने १९४७ में अंग्रेजो से हासिल किया था !

और आजादी के सैंतालिस वर्ष के बाद आया १९९४, एक ऐसा साल जब उत्तराखंड ने एक होकर अपना लोकतांत्रिक अधिकार माँगा,भारत का मुकुट कहे जाने वाला हिमालय के हिरदय  में निवास करने वाले लाखों लाख लोगों ने एक होकर उद्घोषित किया कि-आज दो,अभी दो,उत्तराखंड राज्य दो!

हाँ वो १९९४ ही था जब एक तरफ लाखों सत्याग्रही थे और दूसरी तरफ मुलायम सिंह था और उसका चाहिता प्रशासन था! पुलिस थी पी ऐ सी थी,जब गंगा-यमुना के इस माइके में लोकतंत्र कि हत्या कर दी गई और भारत कि सरकार मौन रही जब सत्याग्रहियों को सारे आम गोली से उड़ाया गया,जब हमारी माँ बहिनों का अपमान किया गया,जब झूठे मुकदमों में फसा कर भोली जनता को दूर जेलों में बांध कर दिया गया !

जब नौजवान हों ही अपराध हो गया,जब अहिंसा के पुजारी राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी कि १२५ वीं जयंती उत्तराखंड के खून से मनाई गयी !

जब हमारी देशभक्ति पर उंगली उठाई गयी हम जो कि इन्हीं सैंतालिस वर्षों में इस देश की सीमाओं को अपन खून से सींचते रहे और सींचते रहेंगे ! कैसे भूल जायेंगे हिसाब लेंगें,हर आह,हर जख्म का ,लखनऊ के हमले और दिली के में का,हम याद रखेंगे की एक वर्ष बाद भी हत्यारे इन्हीं की सेवा करते रहे ! हम उन गीतों को भी याद रखेंग जो की संगर्ष के दौर में जनता के लवों पर थे !

इतनी सारी कुर्बानी देने के बाद भी हम अभी तक गैरसैण को उत्तराखंड की राजधानी नहीं बना सके, जिस उत्तराखंड के लिए हमारे पूर्वजों ने,और हमारी माँ बहिनों ने इतने अत्याचारों को हंसी-हंसीं में सहन कर लिया और आज तक हम उत्तराखंड की राजधानी के लिए लड़ रहे हैं,और लड़ते रहेंगें !


जय उत्तराखंड
M S JAKHI

धनेश कोठारी

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        अगर आप ये सोच रहे हैं कि गैरसैंण में कुछ सरकारी कार्यालयों के खुलने से. कुछ नई सड़कें बनने से, कुछ अधिकारियों को मार जबरदस्ती गैरसैंण भेजने से, राजधानी के पक्षधर लोग चुप्पी साध लेंगे। शायद नहीं....। आज भावातिरेक में यह भी मान लेना कि उत्तराखण्ड में जनमत गैरसैंण के पक्ष में है। तो शायद यह भी अतिश्योक्ति से ज्यादा कुछ नहीं है। भाजपा ने जब राज्य की सीमायें हरिद्वार-उधमसिंहनगर तक बढ़ाई थीं तो अलग पहाड़ी राज्य का सपना तब ही बिखर गया था। और फिर परिसीमन ने तो मानो खूंन ही निचोड़ दिया। ऐसे में जानते हो कि हम (पहाड़ी) शक्तिहीन हो चुके हैं! तब भी गैरसैंण की मांग जारी है। क्यों है न आश्‍चर्य....।
   सच यह भी है कि राज्य का एक बड़ा वर्ग जो शिक्षित है और, बेहद चालाक भी.........। मगर वह समझ-बुझकर भी अनजान है कि अलग राज्य क्यों मांगा गया? वह अनजान ही बने रहना चाहता है। क्योंकि आज यदि वह नौकरीपेशा है तो उसे आरामदायी नौकरी के आसान तरीके मालूम हैं। व्यवसायी है तो, वह अपनी पार्टी को कराधान जैसे मसलों पर ‘चंदे’ का लॉलीपाप दिखाने का हुनर रखता है। राजनीतिज्ञ है तो, जानता है कि कितनी बोतलों में उसकी जीत सुनिश्चित होगी।
   कांग्रेस-भाजपा के लिए गैरसैंण में रेल, हवाई जहाज नहीं जाते। उन्हें वहां भूकम्प के कारण अपना ‘अमर’ रहने का वरदान निश्फल हो जाने का डर है। राज्य निर्माण के बाद यहां की ‘मलाई’ की पहली स्वघोषित हकदार यूकेडी आज खुरचन को भी नहीं छोड़ना चाहती है। ऐसे में एक सवाल लाजिमी उभरता है कि गैरसैंण राजधानी फिर किसको चाहिए?
   आज मुझे याद आ रहा है आन्दोलन का वह दिन जब मैं और मेरे साथी ५ दिसम्बर १९९४ को जेल भरो के तहत मुनि की रेती से नरेन्द्रनगर के लिए रवाना हुए थे। उस दिन सड़क के दोनों छोर से आम आदमी हम पर फूलों की वर्षा करते हुए ‘जेल की रोटी खायेंगे, उत्तराखण्ड बनायेंगे’ का नारा हमारे साथ बुलन्द कर रहे थे। नरेन्द्रनगर में रस्म अदायगी के बाद अधिकांश वापस लौटना चाहते थे, सिवाय हम ११ लोगों के। नरेन्द्रनगर में कई आम व दिग्गज लोगों ने जेल न जाने देने का खासा प्रयास किया। यहां तक कि, कुछ ने तो शासन-प्रशासन के उत्पीड़न का खौफ दिखाकर रोकना चाहा। सब नाकाम रहे।
   यह मैं इसलिए याद कर रहा हूं, क्योंकि आज भी बहुत से लोग हमें राज्य की आर्थिक स्थिति का डर दिखा रहे हैं। अब भी गुमराह कर रहे हैं कि, विकास की बात कीजिए। राजधानी से क्या हासिल होगा? यह कोई नहीं बता रहा कि वे किसके विकास का दम भर रहे हैं। क्या उसमें घेस-बधाण, नीती-मलारी, त्यूनी-चकरौता, धारचुला, अल्मोड़ा, बागेश्वर, रवाईं- जौनपुर आदि का आखिरी आदमी शामिल है? बिलकुल भी नहीं। लेकिन उत्तराखण्ड तो इन्होंने ही मांगा था। उत्तराखण्ड की मांग हरिद्वार, उधमसिंहनगर, रुड़की, मंगलौर या अब शामिल होने की चाहत रखने वाले बिजनौर, सहारनपुर ने तो नहीं मांगा था।
        तमाम बहस-मुबाहिसों को दरकिनार कर एक लाइन में समझा जाना चाहिए कि, उत्तराखण्ड को ‘पहाड़ों’ ने मांगा था। पहाड़ ने खूंन बहाकर मांगा था। अपने युवाओं को बलिदान कर मांगा था। इसलिए गैरसैंण भी उन्हें ही चाहिए।
आखिर टालोगे कब तक.....? धधकने से पहले मानो तो मान जाओ............।

धनेश कोठारी
kotharidhanesh@gmail.com

Lalit Mohan Pandey

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दून में ही बनेगा विधान भवन!शंकर सिंह भाटिया, देहरादून: राज्य सरकार ने पहले राजधानी निर्माण के लिए दो सौ करोड़ और अब विधान भवन के लिए केंद्र सरकार से रकम झटक ली है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि दीक्षित आयोग की रिपोर्ट पर अभी भले ही चर्चा तक नहीं हुई है पर सत्तासीन रही सरकारों ने अघोषित रूप से देहरादून को ही सूबे की राजधानी मान लिया है। सूबे की स्थायी राजधानी का मसला राजनीतिक दलों के लिए गले की हड़्डी बना हुआ है। कोई भी बड़ा दल इस मुद्दे पर खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। दूसरी तरफ सत्ता पर काबिज रही सरकारों का रुख इशारा कर रहा है कि देहरादून को ही राजधानी मानकर काम किया जा रहा है। पहले कांग्रेस शासन में राज्य की ओर से राजधानी निर्माण के लिए केंद्र से पैसा मांगा गया। इस पर 12वें वित्त आयोग ने दो सौ करोड़ की रकम इस मद में दी। स्थायी राजधानी पर कोई निर्णय आज तक नहीं हो सका पर केंद्र से मिली इस रकम से देहरादून में राजभवन और मुख्यमंत्री आवास के साथ ही विधायक निवास व अफसरों की कालोनियां आदि निर्माण कराया गया। इसके बाद राज्य सरकार की ओर से विधान भवन के लिए पैसा मांगा। अब 13वें वित्त आयोग ने सहायता अनुदान मद में उत्तराखंड विधान भवन के लिए 88 करोड़ मंजूर किए हैं। अब सवाल उठ रहा है कि क्या स्थायी राजधानी तय किए बिना ही सरकार देहरादून में ही विधानभवन का निर्माण करेगी। वैसे भी विधानसभा अध्यक्ष हरबंस कपूर एक तर्कसम्मत सवाल कई बार उठाते रहे हैं। उनका साफ कहना है कि अस्थायी राजधानी में राजभवन, मुख्यमंत्री निवास तथा सचिवालय समेत अन्य भवनों का निर्माण किया जा सकता है तो विधानभवन का क्यों नहीं। अब तो वित्त आयोग ने नए विधान भवन के लिए 88 करोड़ रुपये की मंजूरी दे दी है। आयोग की सिफारिश में कहा गया है कि उत्तराखंड नया राज्य है। इसका अपना विधान भवन नहीं है। राज्य में विधायी संबंधी गतिविधियां एक कार्यालय भवन में चल रही हैं। राज्य सरकार ने नए असेम्बली भवन निर्माण के लिए 88 करोड़ रुपये अनुदान का आग्रह किया है। आयोग मांगे गए अनुदान की अनुशंसा करता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार इस रकम का क्या करती है। वैसे इसे खर्च करने के लिए सरकार के पास पांच साल का वक्त है। कांग्रेस शासन में पैसे का उपयोग लैप्स होने की स्थिति बनने पर किया गया था।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Oh .. This is the picture.

This is straight foward a case of cheating with the people of Uttarakhand. The case is fully politically motivated.

We are also somewhere responsible for this. Why do we give mandate to these BJP and Congress there. Let us once give mandate to UKD, the only regional party there and which played a major role in formation of Uttarakhand State.

This party has also been struggling since long for shifting of capital.

I think now this is the only solution. We have seen BJP and Congress in two terms. They have not done anything about the shifting of capital.

We will not let the sacrification of Mohan Uttarakhandi go in vain.




दून में ही बनेगा विधान भवन!शंकर सिंह भाटिया, देहरादून: राज्य सरकार ने पहले राजधानी निर्माण के लिए दो सौ करोड़ और अब विधान भवन के लिए केंद्र सरकार से रकम झटक ली है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि दीक्षित आयोग की रिपोर्ट पर अभी भले ही चर्चा तक नहीं हुई है पर सत्तासीन रही सरकारों ने अघोषित रूप से देहरादून को ही सूबे की राजधानी मान लिया है। सूबे की स्थायी राजधानी का मसला राजनीतिक दलों के लिए गले की हड़्डी बना हुआ है। कोई भी बड़ा दल इस मुद्दे पर खुलकर बोलने को तैयार नहीं है। दूसरी तरफ सत्ता पर काबिज रही सरकारों का रुख इशारा कर रहा है कि देहरादून को ही राजधानी मानकर काम किया जा रहा है। पहले कांग्रेस शासन में राज्य की ओर से राजधानी निर्माण के लिए केंद्र से पैसा मांगा गया। इस पर 12वें वित्त आयोग ने दो सौ करोड़ की रकम इस मद में दी। स्थायी राजधानी पर कोई निर्णय आज तक नहीं हो सका पर केंद्र से मिली इस रकम से देहरादून में राजभवन और मुख्यमंत्री आवास के साथ ही विधायक निवास व अफसरों की कालोनियां आदि निर्माण कराया गया। इसके बाद राज्य सरकार की ओर से विधान भवन के लिए पैसा मांगा। अब 13वें वित्त आयोग ने सहायता अनुदान मद में उत्तराखंड विधान भवन के लिए 88 करोड़ मंजूर किए हैं। अब सवाल उठ रहा है कि क्या स्थायी राजधानी तय किए बिना ही सरकार देहरादून में ही विधानभवन का निर्माण करेगी। वैसे भी विधानसभा अध्यक्ष हरबंस कपूर एक तर्कसम्मत सवाल कई बार उठाते रहे हैं। उनका साफ कहना है कि अस्थायी राजधानी में राजभवन, मुख्यमंत्री निवास तथा सचिवालय समेत अन्य भवनों का निर्माण किया जा सकता है तो विधानभवन का क्यों नहीं। अब तो वित्त आयोग ने नए विधान भवन के लिए 88 करोड़ रुपये की मंजूरी दे दी है। आयोग की सिफारिश में कहा गया है कि उत्तराखंड नया राज्य है। इसका अपना विधान भवन नहीं है। राज्य में विधायी संबंधी गतिविधियां एक कार्यालय भवन में चल रही हैं। राज्य सरकार ने नए असेम्बली भवन निर्माण के लिए 88 करोड़ रुपये अनुदान का आग्रह किया है। आयोग मांगे गए अनुदान की अनुशंसा करता है। अब देखने वाली बात यह होगी कि सरकार इस रकम का क्या करती है। वैसे इसे खर्च करने के लिए सरकार के पास पांच साल का वक्त है। कांग्रेस शासन में पैसे का उपयोग लैप्स होने की स्थिति बनने पर किया गया था।

Devbhoomi,Uttarakhand

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दोस्तों आप लोग क्या समझाते हैं की बी जे पी और कांग्रेश कुछ करेगी उत्तराखंड की राजधानी गैरसैण बनाने की ,नहीं अरे जो नेता अपने ही सहीदों और क्रांतिकारियों को भूलकर दुसरे राज्य के लोगों की मूर्ती इस देवभूमि में बना रही है तो क्या हम इनसे आशा कर सकते हैं कि ये गैरसैण को उत्तराखंड की राजधानी बनायेंगें , ये रानजीति वाले तो अपनों को ही भूल गए हैं अपनी कुर्सी बचाने के लिए !

गैरसैण राजधानी के मुद्दे पर हमको सरकार पर भरोसा नहीं करना चाहिए, सरकार चाहे  किसी भी पार्टी की हो इस मुद्दे पर वह जनता की कसोटी पर खरी नहीं उतरेगी|   इसलिये  हम  सब को मिलकर  तीव्र जन  आन्दोलन  चलाना चाहिए जो कि एक दशक पहले के उत्तराखंड आन्दोलन की याद दिला दे|

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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I fully endorse the views of Jakhi JI and Koshiyari ji.

Now the public has to decide. Give the mandate to third party..

गैरसैण राजधानी के मुद्दे पर हमको सरकार पर भरोसा नहीं करना चाहिए, सरकार चाहे  किसी भी पार्टी की हो इस मुद्दे पर वह जनता की कसोटी पर खरी नहीं उतरेगी|   इसलिये  हम  सब को मिलकर  तीव्र जन  आन्दोलन  चलाना चाहिए जो कि एक दशक पहले के उत्तराखंड आन्दोलन की याद दिला दे|


धनेश कोठारी

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निश्चित ही गैरसैंण पर आन्दोलन की जरूरत है। सरकारों या किसी पहली, दूसरी, तीसरी पार्टी के भरोसे भी राजधानी पहाड़ों पर नहीं पहुंच सकती। उत्तराखण्ड को मिलने में भी ६० साल से ज्यादा समय लगा। राजधानी भी जल्दी नहीं मिलने वाली, तय मानिए। गैरसैंण किसी मजहब या ठाकरे का फतवा नहीं कि आन्दोलन खड़ा हो जाये। आज यदि जनमत जुटाने का उपक्रम किया तो आप हार जायेंगे। परिसीमन हो चुका है। आप हाशिए पर धकेले जा चुके हैं। आन्दोलन की जमीन बेहद कमजोर है। अपनों ने ही कमजोर की है यह। राज्य के एक बड़े वर्ग को गढ़वाल में देहरादून और कुमाऊं में हल्द्वानी नजदीक और आसान हो गया है। यहां की जमीनों की कीमतें बता रही हैं कि पहाड़ कहां बसना चाहता है। लिहाजा समाधान क्या है? भंवर बना दिया गया है, और इसी भंवर से निकालना होगा समाधान।
मैं मानता हूं कि आन्दोलन के लिए विचारों की जरूरत है, मजबूत विचारों की। जो जानते हों कि गैरसैंण क्यों चाहिए और किसे!! आप यदि पक्षधर हैं तो अपने ईर्दगिर्द समझाइये कि गैरसैंण क्यों? इस मंथन में निश्चित ही विष भी सामने आयेगा, अमृत भी। लड़ाई जारी रखिए...........................।

 

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