Author Topic: Give Employment Not Ebriety 1984 - "नशा नहीं, रोजगार दो" आन्दोलन 1984  (Read 11856 times)

पंकज सिंह महर

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इसके आगे समाचार पत्र ने आंदोलन का विश्लेषण किया है, जो आपके समक्ष प्रस्तुत है-


चुनाव के लिये सुरा-शराब के बड़े व्यापारियों से पैसा जुटाने वाले तमाम राजनैतिक दल इस आंदोलन में आने से कतराते हैं, क्षेत्रीय दल, उत्तराखण्ड क्रान्ति दल, जिसका एक्मात्र विधायक प्रदेश की विधानसभा में है, एक अपवाद है। उ०सं०वा० ने भी कोई विशेष तवज्जो राजनैतिक दलों को नहीं दी है, वाहिनी द्वारा चुनावी राजनैतिक दलों को निरर्थक घोषित करने के बाद ऎसी आशा धूमिल हो जाती है कि चुनावी राजनैतिक दल  झूठे मन से भी अपने सहयोग का हाथ आगे बढ़ायेंगे। बावजूद इसके  कि इस तरह के प्रचंड जनांदोलन से उनके अस्तित्व पर संकट आ पड़ा है।
      सबसे ज्यादा असमंजस सत्ताधारी दल कांग्रेस (ई) को है, सुरा-शराब के खिलाफ जन भावना की जानकारी राजनैतिक दलों की तरह कांग्रेस को भी थी। लेकिन उसकी ओर से समस्या के निराकरण की कोई कोशिश नहीं की गई, लेकिन एक बार आंदोलन शुरु हुआ तो कांग्रेस भी हरकत में आ गई। पहले उसने आरोप लगया कि वाहिनी तो सुरा वालों की एजेन्ट है, शराबबंदी कांग्रेस ने लागू करवाई है और वह इस आंदोलन को आगे बढायेगी। सुरा के खिलाफ आंदोलन बढ़ा तो उसने पैंतरा बदला और खुलेआम कहना शुरु कर दिया कि "शराब दो-वोट लो"। नैनीतल में उसने पर्यटन की आड़ ली, उधर कांग्रेस के अल्मोड़ा सांसद का कहना है कि उग्रवादियों ने आंदोलन हथिया लिया है, वे क्यों नहीं हथिया सके? इस बारे में संभवतः वह कुछ नहीं कह सके, इस बीच अनुभवी राजनेता नारायण दत्त तिवारी को मुख्यमंत्री बनाकर उ०प्र० भेज दिया गया है, वे पहाड़ में आंदोलन को निष्क्रिय बनाने का हर संभव प्रयास करेंगे, क्योंकि आगामी चुनावों को दृष्टिगत रखते हुये कोई जोखिम लेना वो पसंद नहीं करेंगे।......

पंकज सिंह महर

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...ऎसे प्रयास भी हो रहें है, अल्मोड़ा नगर में कांग्रेस के युवा तत्वों को प्रशासन द्वारा पूरी छूट दी गई है कि वो आंदोलन का हरसंभव विरोध करें। सत्ताधारी दल की रणनीति यही है कि सारे मामले को घपले में डाल दिया जाय, ताकि आंदोलन में जनता किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाये तथा सुरा-शराब लाबी पहले की तरह शक्तिशाली हो जाये। इस स्थिति में उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी और उसके सहयोगी संगठनों के लिये यह जरुरी हो जाता है कि वे आंदोलन की रणनीति बनाने में सावधानी बरतें। जनप्रतिनिधियों से बहस में उलझने के बजाय जनाधार मजबूत करें, राष्ट्रीय-अंर्तराष्ट्रीय और व्यवस्था परिवर्तन संबंधी समस्याओं को फिलहाल पीछे रखकर सुरा-शराब आंदोलन को ही आगे बढ़ाये। यदि वे सुरा-शराब को गौंण कर रातों-रात जनता की राजनैतिक चेतना विकसित करने का विचार रखते हैं तो वे गलत हैं। क्योंकि इससे देहात की हजारों-हजार जनता आंदोलन से उदासीन होती चली जायेगी और शहरों के पढ़े-लिखे बेरोजगार नौजवान ही आंदोलन में साथ रह जायेंगे। यह उन्हें मानना होगा कि जबसे उन्होंने देहात की जमीन छोड़ी है और धरने-अनशन के रुप में नगरों में ज्यादा ध्यान दिया है, उन्होंने अपनी शक्ति क्षीण ही की है। क्योंकि उनकी आधी ताकत तो निहित स्वार्थों के प्रतिरोध में ही नष्ट हो रही है। इसमें दो राय नहीं है कि यह आजादी के बाद पहाड़ में सर्वाधिक सशक्त आंदोलन है और इसकी सफलता-असफलता ही काफी हद तक पहाड़ के भविष्य के निर्माण में सहायक होगी।

इति!

पंकज सिंह महर

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संभवतः इसी आंदोलन के दौरान हीरा सिंह राणा जी ने यह गीत लिखा होगा।
सुरा- शराबैल हाय मेरी मौ , लाल कै दी हो,
छन दबलौं ठन ठन गोपाल कै दी हो,
न पियो, नै पियो, कौ सबुले , कैकी नि मानी ,
साँची लगौनी अक्ला- उम्र दघोडी नि आनी,
अफ्फी मैले अफ्फु हैणी जंजाल कै दी हो,
छन डबलौं ठन ठन
गोपाल कै दी हो

पंकज सिंह महर

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करना ही होगा एक इंतखाब।
आदमी की जिंदगी या सुरा-शराब।।



नैनीताल के मौन आन्दोलनकारी  अवस्थी मास्साब इस आन्दोलन के दौरान उक्त पंक्तियों को तख्ती में लिखकर अपनी आदतानुसार गले में लटकाकर घुमते थे।

हेम पन्त

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शराब उत्तराखण्ड के मस्तक पर एक कलंक की तरह दिखता है... गैर पहाङी लोगों ने इस बात से सम्बन्धित कई मुहावरे भी गढ लिये हैं. इसी वर्ष "नशा नहीं रोजगार दो" आन्दोलन की 25वीं सालगिरह मनाई गई. मुख्य आयोजन इस आन्दोलन की जन्म्भूमि बसभीङा में 2 फरवरी को हुआ.

इस मुख्य आन्दोलन के अलावा पहाङ के युवा व महिलायें शराब के विरोध में समय-समय पर आन्दोलन चलाते रहते हैं. लेकिन नेतृत्व की कमी, शराब माफिया के षङयन्त्र व मीडिया के असहयोग के कारण यह आन्दोलन किसी निर्णायक मन्जिल तक कम ही पहुंच पाते हैं.

शराब बन्दी की बात आने पर पिथौरागङ के अमर छात्रनेता निर्मल जोशी "पण्डित" को नही भुलाया जा सकता. 27 मार्च 1998 को पिथौरागढ में शराब के ठेके उठने थे. इन ठेकों के खिलाफ अपने पूर्व घोषित आन्दोलन के अनुसार उन्होने आत्मदाह किया. 16 मई 1998 को जिन्दगी मौत के बीच झूलते हुए अन्ततः उनकी मृत्यु हो गयी. इस समय शराब पहाङ की नयी व पुरानी पीढी को खोखला कर रही है इसलिये अब नये "पण्डित" की और "नशा नहीं रोजगार दो" जैसे जनआन्दोलन की जरूरत महसूस होती है.

पंकज सिंह महर

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1984 में शुरु किया गया नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन आज भी उतना ही प्रासंगिक है। आज भी लोग इस कुरीति के खिलाफ लड़ रहे हैं, तब की और आज की परिस्थितियां भिन्न हो चुकी हैं, हमारा अपना राज्य है, अपनी सरकार है, लेकिन इस बुराई के खिलाफ आवाज उठाने वाला राज्य आज इस कुरीति को बंद कराने के बजाय इसे व्यापार का माध्यम बनाकर राजस्व प्राप्ति का साधन मानता है।

( ये लेख बसौली को करीब से जानने वाले महेश जोशी ने नैनीताल-समाचार के ताज़ा अंक १४ से ३० अप्रैल में लिखा है। इस लेख नैनीताल समाचार के सौजन्य से यहां टंकित)

अल्मोड़ा ज़िला प्रशासन ने बसौली कस्बे से शराब दुकानें पांच किलोमीटर दूर हटाने का भरोसा दिया।
जिसके बाद शराब विरोधी संघर्ष समिति, मल्ला स्यूनरा ने आंदोलन स्थगित कर दिया। बसौली में महिलाएं २८ मार्च से शराब की दुकानों के आगे धरना दे रही थीं। महिलाओं ने शराब की दुकानों पर ताला डालकर शराब की बिक्री रोक दी। महिलाओं ने प्रशासन को चेतावनी दी, कि अगर शराब की दुकाने नहीं हटाई गयी, तो ६ अप्रैल की दोपहर से अनिश्चितकालीन चक्का जाम लगा दिया जाएगा।
        जैसा कि हमेशा होता है, प्रशासन ने महिलाओं की बात को गंभीरता से नहीं लिया। आचार संहिता का बहाना बनाकर आंदोलनकारियों को फुसलाने की कोशिश हुई। इधर शराब की बिक्री बंद होने के बावजूद शराबियों की संख्या में कोई कमी नहीं हुई। इसने महिलाओं की चिंता बढ़ा दी। जिसके बाद महिलाओं ने आसपास की गतिविधियों पर नज़र रखना शुरू किया। महिलाओं को पता चला कि शराब के सेल्समैन कुछ और दुकानदारों के साथ मिलकर बाहर ही बाहर शराब बेच रहे हैं। बस फिर क्या था महिलाओं ने इसका विरोध करना शुरू किया। लेकिन ऐसा करने पर महिलाओं को धमकियां मिलने लगी। धमकियों ने महिलाओं को डराने के बजाय एकजुट कर दिया। और सभी महिलाएं अपने अस्तित्व और आत्म-सम्मान के लिए एकजुट हो गयी।

लेकिन इसी बीच ३० मार्च को अल्मोड़ा में हुई नीलामी में बसौली की दुकानें पुराने ठेकेदार के नाम होने की ख़बर ने आंदोलनकारियों को सकते में डाल दिया। कहां तो आंदोलनकारी पूरे इलाके में शराब बंदी के लिए आंदोलन कर रहे थे, और कहां ये नीलामी की ख़बर। इस ख़बर ने आग में घी का काम किया। आंदोलन को और जन समर्थन मिलने लगा। व्यापार संगठन और ग्राम प्रधान संघ ने आंदोलन के समर्थन में प्रशासन को ज्ञापन सौंपे। महिलाओं ने अल्मोड़ा-बागेश्वर राष्ट्रीय राजमार्ग पर हर रोज़ दोपहर बाद प्रदर्शन और सांकेतिक चक्का जाम कर प्रशासन को चेताया।
      लेकिन प्रशासन को इस आंदोलन से कोई फर्क नहीं पड़ा। प्रशासन शराब की इन दुकानों को आसपास ही कहीं खिसकाने की फिराक में लगा रहा। इससे सतराली, ताकुला, डोटियालगांव, भकूना, झिझाड़, चुराड़ी, गंगलाकोटली, भैसोड़ी, हड़ौली, सुनोली आदि गांवो की महिलाएं भी बसौली के आंदोलन में आने लगी। अब महिलाओं का रात-रात भर जागरण शुरू हो गया।
       ६ अप्रैल की सुबह से ही आंदोलनकारी जुटने लगे थे। दोपहर तक सैकड़ों महिलाएं धरने पर बैठ चुकी थीं। और उनका आना लगातार जारी था। महिला संगठन की अध्यक्ष लक्ष्मी देवी के नेतृत्व में नारों और जनगीतों के साथ अनिश्चितकालीन चक्का जाम शुरू हुआ। महिलाओं के सामने एक बड़ा सवाल था। शराब उनके घर उजाड़ रही है। उनके नौजवान बेटे शराब के चंगुल में फंसकर अपना सबकुछ गवां रहे हैं। घर के मर्द शराब पीकर अपना सबकुछ बरबाद करने में लगे हैं। ज़ाहिर है घर संभालने वाली महिलाएं अपनी आंखों के सामने ये सब नहीं देख सकती। इसलिए उनके सामने ये सवाल करो या मरो बनकर खड़ा हो गया था। आंदोनकारियों ने लान कर दिया कि अगर सरकार अभी भी नहीं जागी, तो लोकसभा चुनावों का बहिष्कार किया जाएगा।
          महिलाओं के शांतिपूर्ण आंदोलन के बावजूद सोया प्रशासन अब जाग गया। आंदोलनकारियों के चक्का जाम से सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी-लंबी कतारें लग गयी। ये प्रशासन के लिए एक खराब स्थिति थी। महिलाओं के तेवर से प्रशासन में हड़कंप मच गया। अंतत: तीन घंटे बाद ज़िला प्रशासन को महिलाओं के आगे झुकना पड़ा। प्रशासन की ओर से नायब तहसीलदार जगन्नाथ जोशी ने सूचना दी कि ज़िला प्रशासन दोनों शराब की दुकानों को बसौली से पांच किलोटर दूर हटाने को सहमत हो गया है। लेकिन महिलाएं अभी भी जाम खोलने को तैयार नहीं हुई। महिलाएं चाहती थी, कि डीएम या एसडीएम स्तर का कोई अधिकारी आकर भरोसा दिलाए। करीब साढे तीन घंटे बाद चक्का जाम खोल दिया गया। लेकिन महिलाओं ने धरना जारी रखा।
         देर शाम एसडीएम और ज़िला आबकारी अधिकारी को घरना स्थल पर आना ही पड़ा। और उन्होने महिलाओं को भरोसा दिलाया कि शराब की दुकानें बसौली से पांच किलोमीटर दूर हटा दी जाएंगी। इस आश्वासन के बाद आंदोलनकारियों में खुशी की लहर दौड़ गयी। गांव की महिलाओं ने अपने दम पर प्रशासन को झुका दिया था। हालांकि अब ये दुकानें बसौली से हटाकर कहां ले जाई जाएंगी ? इस सवाल ने संभावित गांवों की महिलाओं की हलचल बढ़ा दी है। अनुमान लगाया जा रहा है कि इन शराब की दुकानों को बसौली से हटाकर भेटूली, अयारपानी या फिर कफड़खान ले जाया जा सकता है। ज़ाहिर है अब वहां की महिलाएं बैचेन हो गयी हैं। अब बारी एक और आंदोलन की है.... जिसके स्वर संभवतया लोकसभा चुनाव के बाद सुनाई पड़ें। लेकिन फिलहाल बसौली की औरतें अपनी जीत पर गर्व तो कर ही सकती हैं।

(अनुमान है कि सरकार को बसौली की दुकानों से डेढ़ करोड़ के आसपास का राजस्व मिलता है। )

पंकज सिंह महर

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Intoxication as a Social Evil: Anti-Alcohol Movement in Uttarakhand, by Shekhar Pathak

Abstract

The present anti-alcohol movement in Uttarakhand radically differs from earlier attempts to combat alcoholism. Although liquor remains the primary focus, the movement recognises the social system in which intoxication operates. While alcoholism is the means by which state commercialisation has sapped the vitality of the hill society, it is only a symptom of the deeper malaise of predatory capitalist 'development'. There has been a consistent attempt to understand alcohol as a social phenomenon. On different occasions, activists of the movement have made it clear that their opposition is not intended as an encroachment on the individual rights of citizens and they are not dreaming of a society with total and successful prohibition. However, in a region where the basic necessities of food, clothing and shelter are a growing problem for the bulk of the population, alcohol consumption cannot be viewed with equanimity. The major demand of the movement has been employment in place of alcohol. It is a bitter irony that while army recruitment marked the advent of liquor in Uttarakhand, youths are now rejected by the military on grounds of ill-health. Prohibition by itself is not adequate to eradicate alcoholism as a social evil; on the contrary, it may have certain adverse consequences. As such, the anti-alcohol movement views prohibition as the first step in a more fundamental restructuring of society.



SOURCE- http://www.jstor.org

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शराब बंदी आन्दोलन और उदयपुर
 
सविनय अवग्याँ आन्दोलन  के अर्न्तगत दछिनी गढ़वाल लैंसीदोन तहशील की शराब की अधिकान्श दुकानों पर सत्याग्रहियों ने धरना दिया आन्दोलन के दूसरे चरण मैं शराब की भट्टियों शराब बनाये जाने वाले केन्द्रों पर ने सत्याग्रहियों ने अधिकार करने के उद्देश्य से जगमोहन सिंह नेगी के साथ विचार विमर्स किया!तत्पश्चात ७ मई १९३० को जगमोहन सिंह नेगी सहित छ्वान सिंह ,नारायण दास महंत और गोपाल सिंह के साथ स्वयं सेवकों ने योजनाबद्ध ढंग से शराब की भट्टियों पर ढाबा बोलकर उन्हें नष्ट कर दिया था!
तल्ला उदयपुर छेत्र मैं डबल सिंह नेगी के नेतृत्व मैं १२ सत्य्गढ़ओ के दल ने शराब की भट्टियों पर धरना देकर नष्ट करने का प्रयत्न किया!अन्तः सत्याग्रही उदयपुर छेत्र से शराब उत्पादन केन्द्रों को बंद करने मैं सफल हुए,तत्कालीन सामाजिक जीवन की इस बिराई को बिर्टिश प्रशासन द्वारा पोषित किया जा रहा था! इसके विरूद्व कांग्रेश आन्दोलन को मिली आरम्भिक सफलता के कारण एनी छेत्रों मैं भी नशा विरोधी आन्दोलन पर्खरहोने लगा!

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कोटद्वार दुगड्डा मैं शराब बंदी आन्दोलन
 
गढ़वाल मैं सत्याग्रह के प्रथम संचालक प्रताप सिंह नेगी के नेतृत्व मैं कोटद्वार दुगड्डा मैं शराब की भट्टियों और दुकानों को नाकेबंदी का अभियान चलाया गया!संघठित ढंग से इस बुराई के उन्न्मोलन के लिए कोटद्वार मैं एक सत्याग्रह शिविर का आयोजन किया गया!इसमें बलदेव सिंह आर्य सहित अनेक सेवकों ने भाग लिया नशे की बढाती प्रविर्ती के कारण इस समूचे छेत्र का वातावरण दूषित हो रहा था,इस स्तिथि से निपटने के लिए योजनाबद्ध ढंग से शराब की भट्टियों की नाकाबंदी की गयी,इसमें नशेड़ियों कोइ,सुरा सुंदरी शराब की दुकानों तक पहुँचने नहीं दियागया!
फलस्वरूप प्रशासन को सुरा से मिलाने वाली राजस्वा मैं कमी आ गयी!तत्पश्चात जिल्ल्धिकारी एक्टन की आज्ञान से पुलिश ने शराब की दुकानों पर धरना दे रहे सत्याग्रहियों पर लाठी बरसाईइस घट्ना से  सम्पूरण छेत्र मैं उत्तेजना फ़ैल गयी!किन्तु सत्याग्रहियों के दुसरे दल धरना देते रहे,दूसरी ओर प्रशासन ने इन्हें गिरफ्तार कर पुनः रिहा न करने की निति से शराब बंदी आन्दोलन उग्र रूप धारण नहीं कर सका!
क्प्त्द्वर दुगड्डा ओर उदयपुर मैं शराब की भट्टियों की सफल नाकेबंदी की सूचना से उत्साहित होकर चन्द्र सिंह रावत,नारादानंद,गोरीलाल,हरिशंकर धस्माना नारायण सिंह सहित कांग्रेश कार्यकर्त्ता दुगादा मैं एकत्रित हुए,प्रताप सिंह नेगी के आदेश पर इन्होने स्थानीय जनता के साथ शराब की भट्टियों की पिकेटिंग शुरू की पुलिश द्वारा धरना दे रहे सत्याग्रहियों पर लाठी चालन किया गया!इस पर भी सत्य्गार्ही अपने स्थानों पर डटे रहे,तत्पश्चात प्रशासन ने इन्हें बंदी बनाकर कारवाश मैं डाल दिया!

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गढ़वाल मैं बिर्टिश प्रशासन द्वारा शराब की दुकानों पर पिकेटिंग कर विभाग की स्थापना से पर्यटकों ओर पर्वतारोहियों की संख्या मैं विरधी हुई!इसके साथ ही पर्यटन की आड़ मैं नशे की संसकिरती का यहाँ प्रचार-प्रसार
किया गया था!अल्मोडा,नैनताल,देहरादून,लैन्सिदौन,रानीखेत,चकराता आदि प्रव्तीय नगरों मैं शराब की दुकाने स्थापित की गयी!बिर्तिश्कालीन दस्तावेजों से जयंत होता है किपहले शराब तराई भावर मैं प्रचलित थी!किन्तु इसके बदते प्रचलनओर राज्स्वमैं विरधी कारण पर्वतीय नगरों मैं लैंसीडाउन  प्रणाली के आधार पर शराब कि दुकाने कोली गयी,सन १९३९-४० मैं सरकारी सत्र मैं देहरादून से शराब से मिलने वाली राजस्व कि आय ६७९४ रूपये थी!दूसरी ओर कुमाऊं -गढ़वाल से इसी अवधि मैं सरकार को कुल १७१७ रूपये का राजस्व मिला तह,पर्वतीय छेत्र मैं नशे कि प्रविर्ती को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से जगह-जगह  सड़कों के किनारे शराब कि दुकाने ओर शराब के ढेके खुलवाये गए,फलस्वरूप २० वीं सताब्दी के आरंभिक दो दशकों तक प्रशासन को शराब से मिलने वाली राजस्व कि आय बढ़कर १३१४४६ रूपये तक पंहुच गयी थी! १०३० के दशक के पश्चात् भी मानव शक्ति को छीन करने के षड़यंत्र ओर राजस्व प्राप्ति आकांछा के कारण पहाडों मैं नशे कि प्रविर्ती को बढावा दिया गया,फलस्वरूप १९४६ मैं उत्तराखादं से आबकारी राजस्व बड़कर २६९९४६५ रूपये शासन को मिलने लगा था!
स्वाधीनता प्राप्ति के उपरांत भी शासन द्वारा आंग्ल शासन कि आबकारी निति का अछ्रस पालन किया गया! पर्नाम्तः २० वीं सताब्दी के अंतिम चरण के मध्य निषेध आन्दोलन कि अनदेखी कर राजस्व प्राप्ति कि लालसा के कारण शराब कि दुकानों के लिए लाइसेंस दिए गए!

 

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