Author Topic: Historical information of Uttarakhand,उत्तराखंड की ऐतिहासिक जानकारी  (Read 34900 times)

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उत्तराखंड में नागा साम्राज्य

नागाओं को महाभारत की नागा जनजाति का वंशज माना जाता है। शुरूआती नागा किसी भी मायने में नाग उपासक नहीं थे। यह भारत की नागा नामक प्राचीन जाति थी जो एक बार हिमालय तक पहुंच गए। प्रौफेशर विलसन कहते हैं कि नागाओं की उत्पत्ति कश्यप मुनि की पत्नि काद्रू से हुई तथा ऐसा कहा जाता है कि उनमें से कुछ औरतों (नाग कन्याओं) ने मानव जाति के वीरो से विवाह किया।

 इस तरह उलुवी अर्जुन की पत्नि बनी तथा राजपूतों की एक जनजाति, जो आज भी मौजूद है, अपने आपको को नागाओं का वंशज कहती है। इससे पता चलता है कि नागा वंसिओं की उत्पत्ति राजपूत वंश से हुई है तथा उनकी शारीरिक बनावट एवं रंग-रूप भी आर्यों से उनकी उत्पत्ति का संकेत देते हैं।

गढ़वाल के नागाओं का नाम महान पैतृक परंपरा के आधार पर पड़ा। नागाओं से जुड़ी उनके पौराणिक कथाएं हैं। इनमें सबसे विलक्ष्ण गाथा भगवान कृष्ण से इनका संबंध होने की है क्योंकि कृष्ण की पूजा नागराज के रूप में की जाती है। कृष्ण के मोर पंख का ताज पहनने तथा कालिया दमन की कहानी से इस बात का संकेत मिलता है कि कृष्ण का नागाओं पर आधिपत्य था।

 डा. ओल्डहेम अपनी पुस्तक 'सन एवं सर्पेंटस' में लिखते हैं कि कृष्ण वसुदेव के पुत्र और आर्यक के पोते थे। आर्यक नाग वंश के राजा थे। सिंधुघाटी के पुरातात्विक तथा नागाओं के ई. पूर्व 300 पुराने इतिहास का संकेत देते हैं। ऋगवेद में ब्रह्मंड या पर्यावरण के देवता के रूप में उनका उल्लेख मिलता है।

गढ़वाल में नाग पूजा बहुत आम बात है तथा गढ़वाल के विभिन्न भागों में नागों की पूजा की जाती है। रोचक तथ्य यह है कि कृष्ण की पूजा नागराज के रूप में की जाती है। नगराजाओं की बहादुरी के अनेक लोकजीत मिलते है।

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गोरखा,गोरखयानी

गोरखयानी गोरखा के गढ़वाल पर बर्बर शासन (1803-1815) के लिए गढ़वाली शब्द है। इस शासन काल में अत्यधिक बर्बरता और नरसंहार का बोलबाला था जिसने पंवार वंश की शासन प्रणाली, समृद्धि, अर्थव्यवस्था, मानव संसाधन तथा गढ़वाल की शांति को छिन्न-भिन्न कर दिया।

गोरखा आक्रमण के बाद, राजा प्रधुम्न शाह अपने परिवार के साथ श्रीनगर छोड़कर बाराहर के रास्ते देहरादून भाग गए तथा गोरखाओं ने वहां तक उनका पीछा किया। आखिरी लड़ाई देहरादून में हुई।

श्री फेजर का कहना है कि इस अवसर पर लगभग 12,000 योद्धाओं वाली गढ़वाली सेना कुछ समय तक संघर्ष करने के बाद बिखर गई। राजा प्रद्युम्न शाह युद्द में वीरगति को प्राप्त हुए तथा गोरखाओं ने भारी संख्या में लोगों का कत्लेआम किया। राजा के सबसे छोटे भाई प्रीतम शाह को बंदी बनाकर वे नेपाल ले गए जबकि दूसरा भाई पारकाराम शाह बचकर इंदौर भाग गया।

 जनवरी 1804 में लंबे समय से चले आ रहे पंवार वंश के गढ़वाली राज को गोरखाओं ने एकाएक उखाड़ फेंका और तभी से श्रीनगर भी गोरखाओं की राजधानी नहीं रही। कहा जाता है कि गढ़वाली राजाओं के पारिवारिक इतिहास से संबंधित सभी बहुमूल्य दस्तावेजों और अन्य रिकार्डों, जो बीमार राजा द्वारा श्रीनगर में छोड़ दिए गए थे, को गोरखाओं ने नष्ट कर दिया गया तथा बहुमूल्य सामानों को नेपाल ले गए।

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गोरखा शासन के दौरान प्रजा की दशा के बारे में कवि मोलाराम ने इस प्रकार लिखा हैः
किसान ना बीज बयल पास नाहित कौड़ी
भजे सभी मधेश को रय्यत भई कनौरी
रैय्यत के घर ना पैसा, कंगाल सब भए
तांबा रहा कांसा माटी के चढ़ गए
टुकड़े का पारा सांसा मधेश बर गए
कपड़ा रहा ना तन में भांगेले भी सर गए


उस समय किसान के पास न तो बीज था, और न ही पैसा था। गरीबी और दरिद्रता के कारण वे मैदानी इलाकों में भागने के लिए मजबूर हो गए। उनके पास एक भी पैसा नहीं था, वे कंगाल हो गए थे। तांबे और कांसे के बर्तनों के स्थान पर उनका मिट्टी के बर्तनों से काम चलाना पड़ा।

 भूखमरी के कारण वे मैदानी इलाकों की तरफ भाग खड़े हुए। गरीबी ने न केवल उनके बढ़िया कपड़ों को छीन लिया अपितु, टाट के कपड़े भी उनके तन पर नहीं रहे गए।

नेपाल के अपने इतिहास में डैनियल लिखते है, ''गढ़वालियों के मन में पहली अप्रीतिकर भावना यह उत्पन्न हुई कि नाबालिक राजकुमार और बीमार राजा प्रद्युम्न शाह के आलाधिकारी सुदर्शन शाह तथा गढ़वाल के राजसी परिवार के अन्य उत्तरजीवियों की सुरक्षा का कोई प्रबंध नहीं किया गया।" कर्नल हयूज पीयर्स के शब्दों में, गोरखाओं ने सुदर्शन को “उनके पूर्वजों की भूमि के पालने" से बाहर खदेड़ दिया।

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श्री फ्रेजर अपने जीवनवृत्त में लिखते हैं, ''गढ़वाल में उनके राज के शुरूआत में, गणमान्य और महत्वपूर्ण व्यक्ति देश से ओक्षल हो गए या उनकी हत्या कर दी गई उनके गांव जला दिए गए और इस प्रकार पुराने परिवार नष्ट हो गए।

उनके अधिकारी राठौर थे, विजेता के रूप में उनके ढ़ंग रूखे थे इसीलिए शासन के केन्द्र से कुछ दूरी पर अपमान और लूटपाट की घटनाएं निरंतर होती रहीं। योद्धाओं ने बलात कई-कई औरतों से शादी की।

वह आगे लिखते हैं, ''पूरे 12 साल तक गढ़वाल गोरखाओं की बर्बरता का शिकार रहा। उनके रठोर शासन में पूरा देश निरंतर भयग्रस्त रहा।

चूंकि उनका निर्दयता पूर्वक दमन हुआ था अत: उनकी आजादी की भावना बूरी तरह क्षत-विसत हो गई और इन भावनाओं की खुले आम स्वीकारोक्ति के कारण प्रतिशोध की इच्छा पर अंकुश लगा। इस दुर्दशा से मुक्ति की प्रबल इच्छा, निराशा से ही सही, बलवती हो गई थी।"

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एटकिंसन अपने हिमालयन डिस्ट्रिक गजेटियर, खंड III, पृष्ठ 253 में गोरखाओं के संक्षेप शासन का सारांश इस प्रकार प्रस्तुत किया हैः ''लगभग 12 वर्ष तक गोरखायियों ने गढ़वाल में शासन किया है, पहले भयावह युद्ध चलता रहा जिसकी वजह से देश में पुरूषों और धन दौलत का अकाल पड़ गया।

 इस अभागे प्रांत के उनके परवर्ती नेतृत्व में, उनके मन में इससे उत्पन्न परेशानी का बोलबाला नजर आता है तथा उन्होंने इस तरह से कार्य किया मानों वे इसका बदला लेने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हों।

 इसके पुराने परिवार नष्ट हो गए, सभी गणमान्य और महत्वपूर्ण व्यक्तियों की हत्या कर दी गई या वे ओझल हो गए, इसके गांव जला कर और उजाड़ दिए गए तथा भारी संख्या में वाशिंदों को गुलामों के रूप में बेच दिया गया (कहा जाता है कि दो लाख गढ़वालियों को गुलामों के रूप में बेचा गया है)।

शेष भागों पर भारी कर लगाकर दमन किया गया और असहय अत्याचार से बचने के लिए कई लोग स्वेच्छा से वहां दूर से चले गए।

इस प्रकार गढ़वाल के बड़े हिस्से में शैलानियों को गांवों के खण्डहर तथा इस बात के संकेत मिलते हैं कि पहले वहां खेती होती थी, जो वाशिंदे बचे गए हैं वे संभवतः सबसे निचले स्तर के और सबसे अज्ञानी हैं और ऐसा माना जा सकता है कि दमन चक्र से पीड़ित होने से वे शारीरिक व मानसिक पतन के गर्त में उतरते चले गए।"

अंग्रेजी की सहायता से राजा सुदर्शन शाह ने गोरखाओं को पराजित किया परंतु उन्हें आधे राज्य से हाथ धोना पड़ा।

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   मध्यकाल में  उत्तराखंड

कत्युरी  राजा वीर देव के पश्चात कत्युरियों के साम्राज्य का पूर्ण विभाजन हो गया तथा यह न केवल अपनी जाति के अपितु कुछ बाहरी कबीलों के भी अधीन बट गया। गढ़वाल का एक काफी बड़ा भाग कत्युरियों के हाथों से निकल गया तथा शेष कुमाऊं क्षेत्र छह कबीलों में बट गया।

 तत्पश्चात कतुरिस साम्राज्य को नेपाली राजाओं अहोकछला (1191 AD) तथा कराछला देव (1223 AD) ने अपने राज्य में मिला लिया। यह दोनों आक्रमण विभिन्न कबीलों में परस्पर शत्रुता के कारण निर्णायक सावित हुए। तत्पश्चात तम्पूर्ण साम्राज्य 64 अथवा कुछ मतों के अनुसार  52 गढ़ों में विभाजित हो गया।

 इन सभी गढ़ों के सरदार अक्सर आपस में झगड़ते रहते थे। सोलहतवी शताब्दी के प्रारंभ में कनक पाल के वंशज  अजय पाल ने जो की चांदपुर गढ़ी कबीलों का सरदार था, सम्पूर्ण गढ़वाल को एक कर दिया।

पांडुकेश्वर  की तांबे  की प्लेटें  दर्शाती  हैं कि  इस बेराज  की राजधानी  कार्तिकेयपुरा  नीति-माना  घाटी में  और आगे  चलकर कात्यूर  घाटी में  स्थित  थी। एटकिंशन  ने काबुल  की घाटी  से इस  वंशज की  उत्पत्ति  का पता  लगाया  तथा उनकों  काटोरों  से जोड़ा। 

गैरौला  और नौटियाल  के अनुसार, कात्यूरी  छोटी खासा  जनजाति  थी जो  मूलतः  गढ़वाल  के उत्तर  में जोशीमठ  में रहती  थी तथा  बाद में  कुमाऊं  की कात्यूर  घाटी में  चली गई।  कात्यूरियों  ने पौरवों  और तिब्बती  हमलावरों  के पतन  के बाद  अपनी ताकत  बढ़ाई  तथा 7 वीं  शताब्दी  के अन्त  और 8 वीं  शताब्दी  के शुरू  में वे  आजाद हो  गए।


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डोइवाला उत्तराखंड


गढ़वाल राजाओं के शासन काल में डोईवाला एक गांव था। लेकिन रेल लाइन के आगमान के बाद डोईवाला एक बाजार के रूप में रूपांतरित हो गया। गोरखा और गढ़वाल राजाओं के समय डोईवाला देहरादून क्षेत्र में स्थित एक छोटा सा गांव था। जब डोईवाला पर अंग्रजों का अधिकार हुआ, तब इस क्षेत्र के आसपास की भूमि पर कृषि कार्य प्रारंभ हुआ और इनका विकास ग्रांट के रूप हुआ।

यही कारण है कि डोईवाला क्षेत्र में स्थित लच्छीवाला, रानीपोखरी, भोगपुर और घमंडपुर गांवों के आसपास कई ग्रांट हैं। इनमें मार्खम ग्रांट, माजरी ग्रांट और जॉली ग्रांट प्रमुख हैं। 1 मार्च 1900 को हरिद्वार- देहरादून रेल मार्ग पर रेल गाड़ियां चलनी प्रारंभ हुईं। इसी दिन डोईवाला स्टेशन अस्तित्व में आया। धीरे-धीरे ग्रांट के आसपास के क्षेत्र विकसित होने लगे और डोईवाला एक छोटा सा बाजार बन गया।

1901 में डोईवाला में पहला विद्यालय खुला। इसी साल यहां के पहले अस्पताल की भी स्थापना हुई। 1933 में यहां जानकी चीनी मिल ( रेलवे स्टेशन के नजदीक ) स्थापित हुआ। इसकी स्थापना जब्बाल इस्टेट के शासकों और स्थानीय हवेलिया परिवार ने मिलकर किया था। स्व. दुर्गा मल और कर्नल प्रीतम सिंह संधू जैसे वीर स्वतंत्रता सेनानियों की जन्म भूमि भी डोईवाला ही है।

गौरतलब है कि ये दोनों नेताजी सुभाष चन्द्र बोस द्वारा गठित आजाद हिंद फौज की ओर से देश के उत्तर-पूर्वी सीमा पर अंग्रेजों के खिलाफ लड़े थे। बीते दशक में डोईवाला की बड़ी उपलब्धि रही है- जॉली ग्रांट हवाई अड्डे के पास “हिमालयन इंस्टीट्यूट अस्पताल” की स्थापना। इसकी स्थापना 1994 में स्वामीराम ने करवाया था।

750 बिस्तरों वाले इस अस्पताल में प्राथमिक उपचार से लेकर गंभीर बीमारियों तक की आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं मौजूद हैं। इस अस्पताल से गढ़वाल क्षेत्र के लोग तो लाभान्वित हुए ही है, साथ ही यह उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के सीमावर्ती भागों के लोगों की स्वास्थ्य समस्याओं के निदान में भी काफी सहायक सिद्ध हुआ है।

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मुनि की रेती का इतिहास

उत्तराखंड के इतिहास में मुनि की रेती की एक खास भूमिका है। यही वह स्थान है जहां से परम्परागत रुप से चार धाम यात्रा शुरु होती थी। यह सदियों से गढ़वाल हिमालय की ऊंची चढ़ाईयों तथा चार धामों का प्रवेश द्वार था।

 जब तीर्थ यात्रियों का दल मुनि की रेती से चलकर अगले ठहराव गरुड़ चट्टी (परम्परागत रुप से तीर्थ यात्रियों के ठहरने के स्थान को चट्टी कहा जाता था) पर पहुंचाते थे तभी यात्रा से वापस आने वाले लोगों को मुनि की रेती वापस आने की अनुमति दी जाती थी। बाद में सड़कों एवं पूलों के निर्माण के कारण मुनि की रेती से ध्यान हट गया।

प्राचीन शत्रुघ्न मंदिर, मुनि की रेती का एक पवित्र स्थान था जहां से यात्रा वास्तव में शुरु होती थी। सम्पूर्ण भारत से आये भक्तगण इस मंदिर में सुरक्षित यात्रा के लिए प्रार्थना करते थे, गंगा में स्नान करने के बाद आध्यात्मिक शांति के लिए पैदल यात्रा शुरु करते थे।

 श्री विनोद द्रिवेदी द्विवेदी, एक स्कूल शिक्षक जो इस शहर के इतिहास को जानने में अधिक रुचि रखते हैं, के अनुसार इस मंदिर की स्थापना नौंवी शताब्दी में आदि शंकराचार्य के द्वारा की गई।

मुनि की रेती टिहरी रियासत का एक हिस्सा था तथा शत्रुघ्न मंदिर की देखभाल टिहरी के राजा करते थे। वास्तव में, वहां जहां आज लोक निर्माण विभाग का आवासीय क्वार्टर है पहले रानी का घाट था यहां पहले टिहरी की रानी तथा उनकी दासिया स्नान करने आती थीं।

 इससे थोड़ी दूर राजधराने के मृतकों के दाह-संस्कार का स्थान तथा फुलवाडी थे। दुर्भाग्य से उस स्थान पर अब कुछ भी पुराना मौजूद नहीं है।

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इस शहर के एक बुजुर्ग निवासी, श्री एच एल बदोला कहते हैं कि “टिहरी के राजा लालची नहीं थे, उन्होंने बहुत सारी जमीन जैसे देहरादून तथा मसुरी अंग्रेजों को दे दी। उन्होंने ऋषिकेश में रेलवे निर्माण के लिए जमीन दी तथा ऋषिकेश के रावत ने ऋषिकेश तक रेल स्टेशन बनाने का खर्च दिया। राजा ने अगर थोड़ा और भी सोचा होता तो आसानी से रेल मार्ग मुनि की रेती तक पहूंच जाता।”

उन दिनों रेलवे स्टेशन से मुनि की रेती तक बैलगाड़ी से पहूंचा जाता था और जब तक कि चन्द्रभाग पुल का निर्माण रियासत सरकार द्वारा न कराया गया तब तक हाथी के पीठ पर बैठकर नदी पार किया जाता था। श्री बदोला कहते हैं कि खास इसी मकसद के लिए राजा मुनि की रेती में एक हाथी रखते थे।

कैलाश आश्रम की स्थापना वर्ष 1880 में हुई और इस आश्रम के आस-पास धीरे-धीरे शहर का विकास हुआ जहां चाय की कुछ दूकानें थी, जो आध्यात्मिक ज्ञान सीखने आये लोगों के लिए बनी थी।

वर्ष 1932 में शिवानन्द आश्रम की स्थापना हुई जिनका इस शहर को योग एवं वेदान्त केन्द्र के रुप में विकास के लिए एक बड़ा योगदान है। इसका श्रेय इसके संस्थापक स्वामी शिवानन्द को जाता है जिन्होंने योग एवं वेदान्त को आसानी से समझने लायक बनाकर पश्चिम के देशों में प्रसिद्ध किया।

वर्ष 1986 में महर्षि महेश योगी ट्रांसेन्डेन्टल आश्रम (जो अभी मरम्मत के अभाव में गिर चुका है, तथा नोएडा में स्थानांतरित हो चुका है) में बीटल्स के आगमन ने भी मुनि की रेती को अन्तर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि दिलाई।

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बद्रीकाश्रम

वामन शिव  और स्कंद  पुराण  जैसे अनेक  पुराणों  में सरस्वती  नदी के  किनारे  स्थित  नदीकाश्रम  का उल्लेख  मिलता  है। आधुनिक  इतिहासकारों  की राय  है कि  बैदिर  पौराणिक  तथा उच्चकोटि  के अन्य  अध्यनों  के केंद्र  बद्रीकाश्रम  के निवासी  कृष्ण  द्वैपायन, जिन्हें  वेदव्यास  के नाम  से भी  जाना जाता  है,

 ई.यू. दूसरी  शताब्दी  में ब्रहमसूना  के नाम  से विख्यात  बादरायण  सूत्र  की रचना  की। ऐसी  धारणा  है कि  आदि शंकराचार्य  ने भी  बद्रीकाश्रम  में निवास  किया था।

 

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