Author Topic: History of Haridwar , Uttrakhnad ; हरिद्वार उत्तराखंड का इतिहास  (Read 63620 times)

Bhishma Kukreti

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         Growth in cities in Mauryan Period with context Ancient  History of Haridwar,  Bijnor,  Saharanpur

            हरिद्वार  ,  बिजनौर  , सहारनपुर   इतिहास    संदर्भ में  मौर्य काल में शहरों का विकास

              हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास     संदर्भ में मौर्य काल की सभ्यता व संस्कृति     -3
                   Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  - 106 
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  106                   


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
                                      शहरीकरण का विकास

मौर्य काल में लौह संस्कृति विकास के कारण जंगलों को कृषि योग्य बनाया गया।  कृषि विकास से निर्यात बढ़ा और निर्यात हेतु मंडियों में वृद्धि हुयी।  इससे मौर्य काल में शहरीकरण को भी बढ़ावा मिला। अशोक काल में कालसी (जौनसार देहरादून ) के शिलालेख से पता चलता कि यंहा से कई व्यापारिक कार्य सम्पन होते थे।  बिजनौर के मयूरध्वज का विकास बुद्ध के समय हो चुका था।  कालसी का मंडी बनने से बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर का भी विकास हुआ होगा और अवश्य ही इन स्थानो की कई वस्तुएं बिक्री हेतु कालसी आती होंगीं।
बौद्ध और जैन भिक्षु हरिद्वार , बिजनौर में आश्रमों में बहुतायत से रहते थे।  इसका अर्थ है कि इस क्षेत्र में नागरिकरण विकास हुआ या नगरीकरण से प्रभावित हुए होंगे।
 

** संदर्भ - ---वैदिक इंडेक्स डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२ राहुल -ऋग्वेदिक आर्य मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन
अग्रवाल , पाणिनि कालीन भारत
अग्निहोत्री , पंतजलि कालीन भारत
अष्टाध्यायी
दत्त व बाजपेइ  , उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म का विकास
महाभारत
विभिन्न बौद्ध साहित्य
जोशी , खस फेमिली लौ
भरत सिंह उपाध्याय , बुद्धकालीन भारतीय भूगोल
रेज डेविड्स , बुद्धिष्ट इंडिया

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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --
 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -      Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ;  Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Bijnor;    Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;    Ancient History of Saharanpur;   Ancient  History of Nakur , Saharanpur;    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;   Ancient Saharanpur History,     Ancient Bijnor History; कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास                      :=============  स्वच्छ भारत !  स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत =============:

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    Trade in Mauryan Period and Ancient  History of Haridwar, Bijnor,   Saharanpur


                               हरिद्वार  ,  बिजनौर  , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में मौर्य काल में  व्यापार

                   Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  - 108     

                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -108                     


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

कृषि , शिल्प व जंगलों के दोहन से व्यापार में अतिशय विकास हुआ।  हरिद्वार , बिजनौर व सहारनपुर भी व्यापार में विकसित हुए ही होंगे।  हिमालय की तलहटी हाई वे का काम करता ही रहा होगा।  गंगाद्वार , गोविषाण , अहोगंग , कालसी धार्मिक केंद्र भी थे और धार्मिक केन्द्रों  व्यापरिक मंडी बनना स्वाभाविक है।
मौर्य काल में व्यापारिक सड़कों का जाल बिछा था। (महाजन , ऐन्सियन्ट इण्डिया , पृष्ठ ३३६ )
एक सड़क थी जो चम्पा से नाव द्वारा बनारस से जुड़ती थी और फिर गंगा के द्वारा सहजाति , जम्मू तक जोड़ सड़कें थीं।  आगे सिंधु क्षेत्र को भी जोड़ने वाली सड़क थी
दूसरा  महत्वपूर्ण मार्ग था जो उत्तर को दक्षिण से जोड़ता था -श्रावस्ती - उज्जैनिका , विदिशी , कौसम्बी और गोदावरी क्षेत्र
तीसरा महामार्ग उत्तर से दक्षिण पूर्व का था - श्रावस्ती -से राजगिरि तक और मार्ग में -कपिलवस्तु , वैशाली , पाटलिपुत्र  नालंदा।
चौथा महामार्ग पंजाब से मध्य व पश्चिम एशिया को जोड़ता था।
इसी तरह सड़कों का जाल विछा था।
किन्तु व्यापार सरल न था क्योंकि उन्नति के साथ ठगी भी साथ साथ विकसित होती थी।  रास्तों पर डाकू आदि का बोलबाला। था  डा डबराल ने भाभर (बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर आदि )  डाकुओं की कार्यशैली पर भी प्रकाश डाला है। व्यापारी अपनी सेना लेकर चलते थे।
नदियों को पुल से  नही अपितु नावों द्वारा पार किया जाता था।
आंतरिक व्यापार के अतिरिक्त निर्यात में विकास हुआ और भारत का माल , चीन, दक्षिण पूर्व एशिया , पश्चिम एशिया व यूरोप की मंडियों में पंहुचता था
 भाभर से सुरमा , जंगल का  उत्पाद, और्वेदिक जड़ी बूटियां , खालें , उन आदि निर्यात  होता था।  उत्तराखंड का माल भी भाभर के रास्ते व मंडियों द्वारा निर्यात होता था।  अशोक के लिए दांतुन भी उत्तराखंड से जाता था।       


 ** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन
अग्रवाल , पाणिनि कालीन भारत
अग्निहोत्री , पंतजलि कालीन भारत
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दत्त व बाजपेइ  , उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म का विकास
महाभारत
विभिन्न बौद्ध साहित्य
जोशी , खस फेमिली लौ
भरत सिंह उपाध्याय , बुद्धकालीन भारतीय भूगोल
रेज डेविड्स , बुद्धिष्ट इंडिया

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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -
      Trade in Mauryan Period  & Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;  Trade in Mauryan Period  & Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Trade in Mauryan Period  &  Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;  Trade in Mauryan Period  & Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; Trade in Mauryan Period  &  Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;  Trade in Mauryan Period  & Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Trade in Mauryan Period  &Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ;  Trade in Mauryan Period  &Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ;  Trade in Mauryan Period  & Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;  Trade in Mauryan Period  &   Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;   Trade in Mauryan Period  &  Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Trade in Mauryan Period  &Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;    Trade in Mauryan Period  &  History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;   Trade in Mauryan Period  & Ancient History of Bijnor;   Trade in Mauryan Period  & Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;  Trade in Mauryan Period  &  Ancient History of Saharanpur;  Trade in Mauryan Period  & Ancient  History of Nakur , Saharanpur;  Trade in Mauryan Period  &  Ancient   History of Deoband, Saharanpur;   Trade in Mauryan Period  &  Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur; Trade in Mauryan Period  &  Ancient Saharanpur History,  Trade in Mauryan Period  &   Ancient Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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   Guild System in Mauryan Period and Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur
                            हरिद्वार  ,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में मौर्य काल  में  संघ , श्रेणी  याने ट्रेड गिल्ड

           Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  -   109   
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 109                 


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
 मौर्य काल की एक प्रमुख विशेषता है कि इस युग में गिल्ड /सहकारिता याने संघ /श्रेणी प्रणाली के विस्तार व विकास से आर्थिक स्थिति में विकास हुआ।
व्यापरी व शिल्पकारों ने सहकारिता के तहत संघ बनाये।  संघ अपने सदस्यों के व्यापार वृद्धि हेतु संगठित रूप से कार्य करते थे।
संघ का प्रधान श्रेणीमुखिया या जेष्ट श्रेणी कहलाया जाता था।  यह पदवी खानदानी पदवी थी। श्रेणीप्रमुख के पास न्याय व कार्यकारी अधिकार थे और वह सदस्यों को नियंत्रित करता था।
राज्य का न्याय विभाग भी व्यापारी या शिल्पकार संघ के न्याय को मान्यता देता था।
संघ का काम राज्य को कर भी चुकाना होता था। कौटिल्य ने संघ से लाभ का पूरा व्यौरा दिया है।  कौटिल्य के अनुसार समय आने पर राजा संघ के धन को लूटकर राज्य का काम चला सकता था।
कभी कभी श्रेणी इतना ताकतवर हो जाता था कि राजा व सामंत भी उसके सामने झुकते थे।
किरणकुमार थपलियाल ने व्यापारियों व शिल्पकारों के संघों का अध्यन पूर्व वैदिक , बुद्ध काल , जैन काल व मौर्य काल में  किया है। (Kiran Kumar Thapliyal, 2001, Guilds in Ancient India, In Life Thoughts and Culture in  India Delhi)
 जहां तक हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर का प्रश्न है तो यह कहा जा सकता है कि कालसी में बड़ी मंडी होने और उत्तराखंड की पहाड़ियों से निर्यात की प्रचुरता के कारण इन क्षेत्रों में स्थानीय संघ अवश्य रहे होंगे।
       


 ** संदर्भ - ---वैदिक इंडेक्स डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२ राहुल -ऋग्वेदिक आर्य मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --
 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -    Guild System in Mauryan Period   Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;  Guild System in Mauryan Period Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;  Guild System in Mauryan Period Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Guild System in Mauryan Period Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ;  Guild System in Mauryan Period Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;  Guild System in Mauryan Period Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;  Guild System in Mauryan Period Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ;  Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ;   Guild System in Mauryan Period Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;    Guild System in Mauryan Period Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;  Guild System in Mauryan Period   Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; Guild System in Mauryan Period    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;   Guild System in Mauryan Period    History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Bijnor;    Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;  Guild System in Mauryan Period   Ancient History of Saharanpur;   Guild System in Mauryan Period Ancient  History of Nakur , Saharanpur; Guild System in Mauryan Period    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;  Guild System in Mauryan Period Ancient Saharanpur History,   Guild System in Mauryan Period   Ancient Bijnor History;
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Bhishma Kukreti

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 हरिद्वार इतिहास  और अहोगंग  (हरिद्वार ) के बौद्ध स्थाविर  -(Sambhut Sanvasi )

                          Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  -110     

                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -110                     


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

  कहा जाता है कि बुद्ध अपने जीवन काल में उशीरध्वज पर्वत पंहुचे थे।  [उपाध्याय , बुद्धकालीन भारतीय भूगोल ]. इस पर्वत की पहचान जिसे बौद्ध साहित्य में 'अहोगंग ' कहा गया है कनखल की पहद्दी  की पहाड़ी से की जाती है। डा खरकववल लिखते हैं की इस क्षत्र को 'ज्ञानपाली प्रदेश ' कहा जाता था (जे एस खर्कवाल , लैंड ऐंड हैबिटाट )।.
गंगा जी से रामगंगा तक के क्षेत्र में शिवालिक की गिरिशाखा का प्राचीन नाम 'मयुरपर्वत ' या 'मोरीगिरी' था। महाभारत व बौद्ध साहित्य में गंगा जी के पूर्वी तट से लक्ष्मण झूला की पहडियां ९उद्य्पुर व तल्ला ढांगू क्षेत्र ) की उशीरध्वज , अहोगंग , अधोगंग नाम से पहचान हुयी है।
 
                                                सम्भूत साणवासी

   बुद्ध के समय ही उशीरध्वज , गंगाद्वार कनखल क्षेत्र पुनीत क्षेत्र या ज्ञानपाली प्रदेश ' क्षेत्र बन चुका था। बुद्ध निर्वाण के पश्चात गंगाद्वार का भाभर क्षेत्र बौद्ध चिंतन मनन का क्षेत्र बन चुका था।
बुद्ध के प्रथम  शिष्य का नाम आनंद था। आनंद ने बुद्ध की मृत्यु के बाद प्रथम संगति सभा महाकश्यप की अध्यक्षता में हुयी थी।
आनंद का एक शिस्य यश था व दूसरा  शिष्य जो कनखल -अहोभंग का था का नाम साणवासी सम्भूत था [महवंश -पृष्ठ १७ ]।
  साणवासी के जीवनकाल में बौद्ध धर्म के दो दल हो चुके थे।  वैशाली और पाटलिपुत्र का दल कठोर अनुशाशन में शीतलता का समर्थक था।  किन्तु कौशंबी , पाथेय व अवन्ति के संघ अनुशाशन के समर्थक थे।  बौद्ध धर्म पर संकट के बादल छ चुके थे।
    इस संकट को दूर करने हेतु यश अहोगंग में साणवासी सम्भूतके पास पंहुचा।  पावावाले साठ , अवंतीवाले अट्ठासी भिक्षु थे।  ये सभी महाक्षीणाश्रव स्थविर अहोगंग में एकत्रित हुए।  दोनों क्षेत्र के सभी आरण्यक , पांसुकूलिक , त्रिचिवरिक व सभी अर्हत अहोगंग पर्वत पर पंहुचे।  वहां इन नब्बे हजार  भिक्षुकों ने अहोभंग में साणवासी सम्भूत  से विचार विमर्श किया।
          तब यश , साणवासी सम्भूत व रेवत स्थविर के प्रयत्न से कालाशोक के राजयकाल में बुद्ध  निर्वाण के 100 वर्ष पश्चात बौद्धमति की द्वितीय संगीति का आयोजन हुआ (महावंश पृष्ठ १७ )

   
* शेष भाग अगले अध्याय में

 ** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२ [समस्त संदर्भ सूची हेतु देखें ]
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
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Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 27/4/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -
    Buddhist Sthavir (Apostles ) of Ahogang/Adhoganga (Haridwar ) &    Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; Buddhist Sthavir (Apostles ) of Ahogang/Adhoganga (Haridwar ) &   Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Buddhist Sthavir (Apostles ) of Ahogang/Adhoganga (Haridwar ) &   Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;Buddhist Sthavir (Apostles ) of Ahogang/Adhoganga (Haridwar ) &    Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ;  Buddhist Sthavir (Apostles ) of Ahogang/Adhoganga (Haridwar ) &  Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;  Buddhist Sthavir (Apostles ) of Ahogang/Adhoganga (Haridwar ) &  Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; Buddhist Sthavir (Apostles ) of Ahogang/Adhoganga (Haridwar ) &   Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ;  Buddhist Sthavir (Apostles ) of Ahobhang/Adhoganga (Haridwar ) & Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ;   Buddhist Sthavir (Apostles ) of Ahogang/Adhoganga (Haridwar ) & Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; Buddhist Sthavir (Apostles ) of Ahogang/Adhoganga (Haridwar ) &   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;   Buddhist Sthavir (Apostles ) of Ahogang/Adhoganga (Haridwar ) &  Ancient History of Bijnor;    Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;    Ancient History of Saharanpur;   Ancient  History of Nakur , Saharanpur;    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;   Ancient Saharanpur History,     Ancient Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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              Buddhists of  Mayurgiri in Context History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur

                           मौर्यकाल में भाभर , हरिद्वार , बिजनौर व सहारनपुर में बौद्धधर्मी
                 
                Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  -112     
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  112                   


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
              गंगाद्वार [हरिद्वार ] के पास की जनता बौद्ध अवलम्बी थी। उत्तराखंड के दक्षिण भाग के निवासियों ने बौद्ध धर्म अपना लिया था.  प्राचीनकाल में गंगा जी से रामगंगा तक के शिवालिक पर्वत श्रेणियों के तल वाले क्षेत्र को मयूरगिरी कहा जाता था। इसी श्रेणी पदतल पर गंगातट पर मयूरनगर बसा था कोटद्वार के पास बिजनौर में मोरध्वज स्तूप था.
साँची के स्तूपों  प्राप्त धातु पात्रों में अहोगंग निवासी स्थविर मोग्गलिपुत तिस्स , हिमवंत  आचार्य कस्सपगोत , मंझिम स्थविर , हारीतीपुत्र , तथा गोती (कौत्सी ) पुत्र की धातु (अस्थिअवशेस ) मिले हैं।  इन धातुपात्रों के ढक्क्नो पर अशोककालीन लिपि में स्थविरों के नाम अंकित हैं। इससे विदित होता है कि उत्तराखंड , हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर में बौद्ध स्थविरों को समकालीन समाज में सम्मान प्राप्त था।
  साँची के अभिलेखों से विदित होता है कि मोरगिरी के पार्श्व में बसे कुछ गाँव निवासियों ने साँची पंहुचकर स्तूपनिर्माण में सहयोग दिया व दान भी दिए थे।
 मोरगिरी के निवासी अर्हदत्त , सिंघगिरी , भिक्षु देवरक्षित ने भी अपने दान को अंकित किया था
१- मोरसिहिकट अर्हदितस दानं
महामोरगम्हासिहगिरिनो दानं
देवरखतस मोरजहकटियस भिछनो दान
( उपरोक्त संदर्भ :  भुल्लर , ऐपिग्राफिया इंडिका ,भाग २ , पृष्ठ १०५ , ११० , ३७१ , ३८५ )
 डा डबराल ने निम्न ब्यौरा दिया है -
भारहुत  अभिलेखों से ज्ञात होता है कि मोरगिरी के निवासी घाटिल की माता ने , जितमित्र ने , स्तूपदास  पुष्पा ने उस पुनीत स्थान में सुपनिर्माण हेतु दान दिया।
 भारहुत में नागरक्षित और उसकी माता चक्रमोचिका का दानलेख , मोरगिरी की नागिला भिक्षुणी का दानलेख , धनभूति की पत्नी नागरक्षिता  दानलेख , और धनभूति के दो स्तम्भ लेख मिलते हैं। साँची में आर्य के अन्तेवासी नाजिल व भदंत नाजिल के संबंधियों के दानलेख मिलते हैं। इससे मौल्म होता है कि धनभूति कोई राजा या सामंत /क्षत्रप था।
साँची के अभिलेखों में मोग्गलिपुत के शिष्य गोतिपुत , तथा वाछिपुत के शिष्य गोतिपुत , गोतिपुत भंडुक, तथा गोतिपुत राजलिपिकार का उल्लेख है ।
भारहुत व मथुरा के अभिलेखों में गोतिपुत आगरज , बाछिपुत धनभूति तथा वात्सीपुत्र वाघपाल का उल्लेख है।
       


 ** संदर्भ - ---वैदिक इंडेक्स डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२ राहुल -ऋग्वेदिक आर्य मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन
अग्रवाल , पाणिनि कालीन भारत
अग्निहोत्री , पंतजलि कालीन भारत
अष्टाध्यायी
दत्त व बाजपेइ  , उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म का विकास
महाभारत
विभिन्न बौद्ध साहित्य
जोशी , खस फेमिली लौ
भरत सिंह उपाध्याय , बुद्धकालीन भारतीय भूगोल
रेज डेविड्स , बुद्धिष्ट इंडिया

Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 29/4/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --
 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -      Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;  Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;  Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; Buddhists of  Mayurgiri in Context   Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;   Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;  Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ; Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;  Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;   Buddhists of  Mayurgiri in Context   Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;  Buddhists of  Mayurgiri in Context    Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; Buddhists of  Mayurgiri in Context    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;  Buddhists of  Mayurgiri in Context     History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;   Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient History of Bijnor;   Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;   Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient History of Saharanpur;  Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient  History of Nakur , Saharanpur;   Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Buddhists of  Mayurgiri in Context Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur; Buddhists of  Mayurgiri in Context   Ancient Saharanpur History, Buddhists of  Mayurgiri in Context     Ancient Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास                      :=============  स्वच्छ भारत !  स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत =============:

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                   Greece-Bacteria Rule in India and History of Haridwar , Bijnor and Saharanpur
                                भारत में यवन  अथवा यूनानी -बैक्ट्रिया शासन व हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का इतिहास

                               Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  -  112   
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 112                   


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती
                                            यवन अधिकार
                        राजा राष्ट्रीय जलोक

       232 BC में अशोक की मृत्यु के पश्चात कश्मीर में अशोक पुत्र राष्ट्रीय जलोक ने स्वतंत्रता घोष्ट कर दी।  जलोक अपने पिता के साम्राज्य  जीतता हुआ कान्यकुब्ज तक पंहुच गया। जलोक का अधिकार , पश्चिम पंचनद , मध्यदेश  और पंचाल पर अधिकार हो गया।
 इससे इतिहासकार [डबराल ] अनुमान लगाते हैं कि   कुलिंद जनपद व भारद्वाज जनपद के सामंत या शासक ने जलोक  के अधिकार को या तो स्वीकार कर लिया होगा या मैत्री कर ली होगी।  कुरु व पांचाल के जलोक के अधीन होने का अर्थ है कि बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर के सामंत जलोक के अधीन हो गए होंगे।
नरेंद्र सहगल के अनुसार जलोक शिव पूजक था। जलोक एक बहादुर व कुशल शासक था व उसने विदेशी आक्रान्ताओं को कश्मीर से दूर रखने में भूमिका निभाई।


 ** संदर्भ - ---वैदिक इंडेक्स डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२ राहुल -ऋग्वेदिक आर्य मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --
 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -      Greece-Bacteria Rule & Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Greece-Bacteria Rule &Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;   Greece-Bacteria Rule &Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; Greece-Bacteria Rule &  Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;  Greece-Bacteria Rule & Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Greece-Bacteria Rule &Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; Greece-Bacteria Rule &  Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ; Greece-Bacteria Rule & Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;  Greece-Bacteria Rule & Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; Greece-Bacteria Rule &  Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;   Greece-Bacteria Rule &  Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ; Greece-Bacteria Rule &    Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; Greece-Bacteria Rule &   Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; Greece-Bacteria Rule &  Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;   Greece-Bacteria Rule &   History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;    Greece-Bacteria Rule &Ancient History of Bijnor;    Greece-Bacteria Rule &Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;  Greece-Bacteria Rule &  Ancient History of Saharanpur;   Ancient  History of Nakur , Saharanpur;  Greece-Bacteria Rule &  Ancient   History of Deoband, Saharanpur; Greece-Bacteria Rule &    Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;  Greece-Bacteria Rule & Ancient Saharanpur History,  Greece-Bacteria Rule &   Ancient Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास                      :=============  स्वच्छ भारत !  स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत =============:


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        Greece -Bactria King Euthydemus I and History of Haridwar, Bijnor and Saharanpur
 
                    यवन  नरेश युथिदिम (260 -200 /195 BC ) संदर्भ में हरिद्वार , बिजनौर व सहारनपुर का इतिहास

            Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  -  113                   
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -     113               


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

         अशोक की मृत्यु होते ही पश्चमी तट  प्रदेशों के समान्तों /क्षत्रपों ने स्वतंत्रता घोषित कर दी।  225 BC के करीब वाख्तरी यवननरेश  युथिदिम ने वलख , बुखारा , कंधार , सीस्तान , दक्षिणी अफ़ग़ानिस्तान पर अधिकार जमा लिया।
राजतरंगणी के अनुसार मौर्य सामंत व शासक जलोक ने म्लेच्छ की सेना के एक आक्रमण को विफल कर दिया था।  यह आक्रमण शायद 225 -189 BC के मध्य कभी हुया था [राहुल ]।
 जलोक के बारे में अधिक सूचना नही मिलती और लगता है कि जलोक की मृत्यु पश्चात उसके वंशजों से कश्मीर व पश्चमी भाग निकल  गया था। आशककलीन लिपि की पांचाल मुद्राओं से अनुमान लगाया जा सकता है।
       


 ** संदर्भ - ---वैदिक इंडेक्स डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२ राहुल - मध्यएशिया का इतिहास
राजतरंगणी
कनिंघम , क्वेसन्स ऑफ एन्सिएंट इंडिया
*Polibius, The Histories, Book XI, Chapter 34, vol -1


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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --
 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -      Greece -Bactria King Euthydemus I & Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;  Greece -Bactria King Euthydemus I & Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Greece -Bactria King Euthydemus I &  Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;  Greece -Bactria King Euthydemus I & Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ; Greece -Bactria King Euthydemus I &  Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;  Greece -Bactria King Euthydemus I & Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; Greece -Bactria King Euthydemus I &  Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Greece -Bactria King Euthydemus I &Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;  Greece -Bactria King Euthydemus I & Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;  Greece -Bactria King Euthydemus I &    History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;  Greece -Bactria King Euthydemus I &  Ancient History of Bijnor; Greece -Bactria King Euthydemus I &   Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;   Greece -Bactria King Euthydemus I & Ancient History of Saharanpur;  Greece -Bactria King Euthydemus I & Ancient  History of Nakur , Saharanpur;  Greece -Bactria King Euthydemus I &  Ancient   History of Deoband, Saharanpur;  Greece -Bactria King Euthydemus I &   Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;  Greece -Bactria King Euthydemus I & Ancient Saharanpur History,     Greece -Bactria King Euthydemus I &Ancient Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास                      :=============  स्वच्छ भारत !  स्वच्छ भारत ! बुद्धिमान भारत =============:

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              Greece Bactria King Demetrius I in context History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur

                     हरिद्वार ,  बिजनौर   , सहारनपुर   इतिहास  संदर्भ में यवन नरेश दिमित्रस I
                  Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  -  114                   
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -    114                 


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

दिमित्रस I [200 -180 ? 160 ? BC ] युथिदिम का पराक्रमी पुत्र था। वह सिकंदर के समान भारत पर अधिकार का आकांक्षी था। अनुमान किया जाता है कि  राज्याम्भरम्भ अशोक की मृत्यु के तीस चालीस वर्ष पश्चात हुआ।
       
अपने पुत्र को बाख्तार व सॉग्द की रक्षा का भार सौंपकर दिमित्रस Iअपने भ्राता अपोलोदात व सेनापति मेनान्द्र के साथ भारत विजय अभियान पर निकल पड़ा। पश्चमी तक्षशिला और पश्चमी सिंधु क्षेत्र को जीतकर वह दक्षिण सिंधु पंहुचा और वहां अपने नाम दिमित्रस के नाम से  की स्थापना की। दिमित्रस I  की एक सेना मेनान्द्र  नेतृत्व में गांधार के पूर्व की और बढ़ी और व्यास , सतलज को पार कर मथुरा तक पंहुच गयी।
दिमित्रस I  की दूसरी सेना अपोलोदात  के नेतृत्व पातळ नगरी को जीतकर सौराष्ट्र से होती हुयी भरुकच्छ तक पंहुच गयी। भरुकच्छ को राजधानी बनाई।
पश्चमी भारत के बड़े भूभाग पर अधिकार के बाद मगध विजय की योजना बनाई।
सेना ने वर्तमान चित्तौड़ के नजदीक माध्यमिका नगरी को जीतकर पाटलिपुत्र की और प्रस्थान किया
सेना ने मथुरा को जीतकर पूर्व की ओर पांचाल , साकेत व काशी को जीतकर पाटलिपुत्र पर आक्रमण कर दिया।
यवन आक्रमणों का वर्णन पतांजलि /पंतजलि  महाभाष्य , हरिवंश , युग पुराण , मार्कण्डेय पुराण , गार्गी संहिता में भी उल्लेख है।
कुछ नरेशों ने प्रतिरोध किया कुछ नरेश प्रतिरोध ना कर सके। मगध का राजा भागकर जंगलों में छुप गया था।
यवन सेना संख्या में अधिक थी व युद्ध सामग्री व युद्ध परवहन तंत्र में विकसित थी।  भारत में जैन व बौद्ध संस्कृति के कारण युद्ध विज्ञान में विकास लगभग बंद ही था तो यवन सेना को जीतना सरल था।
इसी दौरान यवन में अन्य यवन समान्तों ने दिमित्रस के राज्य पर अधिकार कर लिया। अपने साम्राज्य को बचाने में दिमित्रस की मृत्यु हुयी (160  या 180 BC )
भारत में भी यवन अधिकारी आपस में लड़ बैठे और पांचाल[उत्तर यमुना दोआब , सहारनपुर व कुछ भाग उत्तराखंड ] व अन्य मध्य देस के भाग से यवन अधिकार समाप्त हो गया।


** संदर्भ - ---
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२ राहुल - मध्यएशिया का इतिहास
राजतरंगणी
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*Polibius, The Histories, Book XI, Chapter 34, vol -1
Pantjali, Mahabhashya

Dr J.N.Benrarji
D. C Sarkar

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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --
 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -    Greece Bactria King Demetrius I,  Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ; Greece Bactria King Demetrius I,  Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Greece Bactria King Demetrius I,  Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;  Greece Bactria King Demetrius I, Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;  Greece Bactria King Demetrius I, Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Greece Bactria King Demetrius I,Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Greece Bactria King Demetrius I,Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Greece Bactria King Demetrius I,Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;   Greece Bactria King Demetrius I,Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;  Greece Bactria King Demetrius I,   Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ; Greece Bactria King Demetrius I,   Ancient History of Bijnor;    Greece Bactria King Demetrius I,Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;  Greece Bactria King Demetrius I,  Ancient History of Saharanpur; Greece Bactria King Demetrius I,  Ancient  History of Nakur , Saharanpur;Greece Bactria King Demetrius I,    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;  Greece Bactria King Demetrius I,   Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur; Greece Bactria King Demetrius I,  Ancient Saharanpur History,   Greece Bactria King Demetrius I,  Ancient Bijnor History;
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Bhishma Kukreti

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       Menander I or Milinda : An Indo- Greek  King in context History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur
             यवन राजा मेनान्द्र /मिलिंद और हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर का इतिहास
                                      Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  -  115                   
                         
                                         हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  115                   


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

        बाख़्तरी -यूनानी राजाओं में मेनान्द्र अथवा मिलिंद का नाम भारत में बहुत प्रसिद्ध है।  बौद्ध धर्मी साहित्यकारों ने मेनान्द्र पर रोचक प्रकाश डाला है [मिलिंद पन्हा ).
             विद्वानो का मत है कि मेनान्द्र अथवा मिलिंद की राजधानी सकाल में थी (सियालकोट ) दिमित्रस Iके पश्चमी भाग पर युक्रादित ने अधिकार कर लिया था।
                            मेनान्द्र का अफगानिस्तान , पंजाब , राजस्थान , काठियावाड़ , भरुच (भरुकच्छ ) था और पूर्व में हिमाचल प्रदेश,  उत्तराखंड , रुहेलखण्ड , यमुना -गंगा दोआब , मथुरा आगरा तक फैला था।
मेनान्द्र के सिक्के शिमला जिले के सबाथु , रामपुर , मथुरा और आगरा के पास भूतेश्वर में मिले हैं।
                      स्त्रावो के अनुसार मेनान्द्र/Menander ने सिकंदर सी अधिक भारतीय भूभाग पर अधिकार किया।  उसने अपने राज्य की सीमा व्यास नदी से इसमस नदी तक विस्तार किया था । इसमस नदी की पहचान कुमाऊं से रुहेलखण्ड-कन्नौज तक भने वाली तक काली नदी (इक्षुमती या इच्छुमति ) से की जाती है।

                               मेनान्द्र/Menander का राज्यविधि समय

विद्वानों ने मेनान्द्र/Menanderकी राज्यविधि समय 175 - 90 BC के मध्य निर्धारित किया है -
बौन गुटस्मिद -175 BC
लामोत - 163 -150 BC
स्मिथ - 160 -140 BC
रैप्सन - 160 BC
नारायण -155 -130 BC
डी सी सरकार - 115 -90 BC

      अब तक पांचाल के 12 से अधिक राजाओं के सिक्के प्राप्त हो चुके हैं अतः मेनान्द्र/Menander का पांचाल पर अधिक दिनों तक अधिकार नही रहा होगा।
मेनान्द्र/Menander की मृत्यु व मृत्यु समय पर विद्वानो के अलग अलग विचार हैं।  कुछ कहते हैं कि मेनान्द्र/Menander की मृत्यु बैक्ट्रिया सामंतो से युद्ध के समय हुयी। कुछ कहते हैं कि पाटलिपुत्र पुष्यमित्र ने जब साकल पर आक्रमण किया तब मेनान्द्र/Menander की मृत्यु हुयी।  यूनानी लखकों के अनुसार मेनान्द्र/Menander की मृत्यु अपने साम्राज्य की रक्षा करते हुयी।



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Pantjali, Mahabhashya

Dr J.N.Benarji
D. C Sarkar


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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --
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Bhishma Kukreti

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          Administration of Greek Indian King Menander/Milinda in context History Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur
                           हिन्द-यवन राजा मेनान्द्र/Menander/मिलिंद का प्रशासन

                    Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  -  116                   
                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -    116                 


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

        बौद्ध साहित्य ''मिलिंद पन्हा' में यवन राजा मेनान्द्र/Menander/मिलिंदकी प्रशसा की गयी है।  'मिलिंद पन्हा' व यूनानी साहित्य में मेनान्द्र/Menander/मिलिंदको न्यायप्रिय व दार्शनिक शासक बताया गया है।  मेनान्द्र/Menander/मिलिंद नदार्शनिक प्रश्नो का उत्तर देने में कुशल था।  एक बार वह प्रश्न उत्तर नही दे स्का तो वह बौद्ध विद्वान थेर नागसेन के पास गया और थेर नागसेन ने उन प्रश्नो का निवारण किया।  मेनान्द्र/Menander/मिलिंद बौद्ध धर्म स्वीकार किया।  मिलिंद पन्हा में लिखा है की वृद्ध होने पर मेनान्द्र/Menander/मिलिंदने अपना साम्राज्य पर को सौंपकर प्रवाजी बन गया व प्रवाजी के रूप में निर्वाण प्राप्त किया।  उसे मृत्यु से पूर्व अर्हत पद प्राप्त हो गया था।
                              मेनान्द्र/Menander/मिलिंदके परवर्ती यवन शासक
मेनान्द्र/Menander/मिलिंदके उत्तराधिकारी उसके समान उदार न थे अपितु अति स्वार्थी थे व भारत के संस्कृति विरुद्ध व्यवहार करते थे।  लूटमार , व्यभिचार , स्त्रियों -बच्चों पर अत्याचार , आपस में झगड़ा के आदि  थे। सदा दूसरों की स्त्रियों को छीनने वाले , गोवध को सदा तयार रहते थे ।  इससे उनका कुछ समय पश्चात ही विनाश हो गया।
                         मेनान्द्र/Menander/मिलिंद राज्य में समकालीन हरिद्वार , बिजनौर व सहारनपुर

 87 -165 AD  विद्यमान विद्वान ताल्मी (मोतीचन्द्र के अनुसार ) ने यवन नरेशों के बारे में जो सुचना दी हैं उनमे कुलिंदराइन याने कुलिंद जनपद का उल्लेख किया है। व्यास , सतलज , यमुना , गंगा की उपत्यका में कुलिंदराइन जाती बसी थी (खस ) .
बिजनौर , हरिद्वार , सहारनपुर का कितना भाग मेनान्द्र/Menander/मिलिंदके राज्य में था अनुमान लगाना कठिन है।
कांगड़ा जिले में यवन नरेश अपोलदत्त II व कुलिंदनरेश अमोघभूति के सिक्के मिलने से अनुमान लगाया जा सकता है कि कुलिंदनरेश अमोघभूति ने कुलिंद क्षेत्र को यवन राज्य से मुक्त किया था।
         मेनान्द्र/Menander/मिलिंद  का पश्चमी भारत के बंदरगाहों उत्तर पश्चिम की व्यापारिक मंडियों पर अधिकार होने से निर्यात -आयात व्यापर बढ़ा।  अतः मेनान्द्र/Menander/मिलिंदके राजयकाल में हरिद्वार , बिजनौर व सहारनपुर में अवश्य ही व्यापार वृद्धि हुयी होगी।
सियालकोट से साकेत तक के हाइवे के मध्य स्रुघ्न , कालकूट , भाभर , गोविषाण शहर आते थे अतः व्यापारिक विकास हुआ होगा।
 राहुल व अल बरुनी जैसे इतिहासकार सहारनपुर , हरिद्वार का निकटवर क्षेत्र -जौनसार  लोगों का संबंध यवनों से जोड़ते हैं जिसका अर्थ है कि मेनान्द्र/Menander/मिलिंदके समय यवनों का बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर पर भी प्रभाव था।

** संदर्भ - ---
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२ राहुल - मध्यएशिया का इतिहास
राजतरंगणी
कनिंघम , क्वेसन्स ऑफ एन्सिएंट इंडिया
*Polibius, The Histories, Book XI, Chapter 34, vol -1
Pantjali, Mahabhashya

Dr J.N.Benarji
D. C Sarkar


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