Author Topic: History of Haridwar , Uttrakhnad ; हरिद्वार उत्तराखंड का इतिहास  (Read 64428 times)

Bhishma Kukreti

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 Transportation System and Measurement System in Mahabharata Kulind context History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur


              हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में महाभारतीय कुलिंद राज्य में नाप तौल व परिहवन तंत्र

                   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  -- 84

                                 
                     हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -   84                 


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


                     नाप तौल
महाभारत में नापतौल के विषय में एक ही संदर्भ मिलता है
            जातरूपं द्रोणमेहार्षु : पुनज्शो नृपा: (सभापर्व ५२/४ )
द्रोण याने दूण (३२ सेर ). यह प्रथा आज भी इक्सवीं सदी में पहाड़ी इलाकों में चल रही है।
शालिवाह के माप को बीस द्रोण का कहा गया है  (आदिपर्व १५९ /६ ) . आज भी बीस दूण की एक खारी मानी जाती है।
              परिहवन
महाभारित्य कुलिंद राज्य में परिहवन कठिन था। हरिद्वार, भाभर , बिजनौर में रथ हांके जाते थे। साधारण व्यक्ति पैदल ही चलते थे।  भीम ने अपने बांधवों को या घटोतकच्छ ने पांडवों को कंधे पर उठाने का अर्थ है कि पीड़ितों , असक्षम , धनी लोगों को पपीठ या कंधे पर बिठाकर भी यात्रा की जाती थी।
 नदी पर रस्सियों के पल प्रयोग होते थे।  घोड़े , भैंस आदि पर चढ़कर भी परिहवन किया जाता था।
यात्रा में सत्तू मुख्य भोजन था व जंगल आदि से कंद मूल फल प्राप्त कर यात्री क्षुधा शान्ति करते थे।
पथिक चटाईयां , खेल व कंबल भी लेकर चलते  थे।
यात्रा से पहले गुरु , बड़ो का आशीर्वाद लिया जाता था।

 ** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन

Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 22 /3/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --85

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -
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कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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Bhishma Kukreti

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          Marriage System in Mahabharata Kulind Kingdom &  History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur

                     हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में कुलिंद राज्य में विवाह प्रथाएं

                 History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  -- 85

                                 
                     हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -    85                 


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


                          ऋणों की कल्पनायें
 महाभारत में निम्न ऋणों की कल्पना की गयी है -
१-  पितृ ऋण
२ - देव ऋण
३ -ऋषि ऋण
४   -मनुष्य ऋण
                         विवाह
पुत्र प्राप्ति स्वर्ग जाने के लिए आवश्यक माना गया था अतः विवाह एक आवश्यक कृत माना गया है।  ऋषि भी विवाह करते थे।  फिर भी अविवाहित जीवन वितया जाता था।

                            विवाह के विभिन्न प्रकार
 १-ब्राह्म  विवाह - अधिकतर ब्राह्मणो व विशिष्ठ जातियों द्वारा
२- गन्धर्व या प्रेम विवाह - आम बात थी
३- लूटकर विवाह करना - आम बात थी
४- बहुपत्नी संस्कृति - यह रिवाज अति सामन्य रिवाज था
५- बहुपति संस्कृति - द्रौपदी के पांच पति थे।  इससे साफ़ जाहिर है कि बहुपति संस्कृति सामन्य संस्कृति थी। देहरादून के चकरौता क्षेत्र में कुछ सालों पहले बहुपति संस्कृति थी।
 ६-दूसरों से पुत्र प्राप्ति -कर्ण सहित कुंती के चार पुत्र व माद्री के दो पुत्र थे।  पांडवों में से कोई भी पाण्डु के पुत्र नही था ।  धृतराष्ट्र , पाण्डु और विदुर वास्तव में कुरु वंश के थे ही नही।  वे सत्यवती के नाजायज (?) पुत्र व्यास के पुत्र थे।  उस समय जायज या नाजायज संतान के मध्य कोई अधिक अंतर नही माना जाता रहा होगा।
                 विधवा विवाह
विधवा विवाह मान्य था।  हरिद्वार  नागपुत्री पुत्री उलिपि विधवा थी।  अर्जुन के साथ गन्धर्व विवाह के बाद उसने आदर्श पत्नी रूप में वैवाहिक  जीवन विताया था।

 ** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन

Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India  /3/2015
 


   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -
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            Social Norms in Mhabharata Kulind Kingdom in context History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur

                         
               
                       हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में विभिन्न सामाजिक मान्यताएं

                             History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  -- 85

                                 
                     हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -      85               


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


                             संतान प्राप्ति
महाभारत में संतान प्राप्ति को मनुष्य का प्रमुख कर्तव्य मन गया।
पुत्र प्राप्ति को महत्व दिया गया है।
निसंतान अथवा निपुत्र होने पर अपनी बहिन या पुत्री के पुत्र को गोद  लेना अथवा ने के पुत्र को गॉड लेने की प्रथा थी। दूसरे महापुरुष (ब्राह्मण ) से अपनी पत्नी से संसर्ग करवाकर भी संतान प्राप्ति की जाती थी। कुंती , आदि ने नियोग द्वारा दूसरे पुरुष से संतान प्राप्ति की  थी और नाम पति का हो जाता था।
संतानप्राप्ति के लिए तप किया जाता था।
                 संस्कार पूजन

विभिन्न जातिकर्म संस्कारों का वर्णन महाभारत में मिलता है।  मनुस्मृति अथवा ऋषि भार्गव स्मृति (शुक्रनीति ) के उल्लेख से साबित होता है की ४४ नही तो १६ जाति कर्म संस्कार महत्वपूर्ण थे।  अर्जुन के जंदिवस मनाने का वणर्न भी यही संदेश देता है। 
                  परिवार
महाभारत में उत्तराखंड से संबंध में एकचक्र  ब्राह्मण परिवार का जिक्र है जिसमे पती , पत्नी , पुत्र , पुत्री का वर्णन है।
हिडंबा अपने भाई  रहते भी स्वछंद गामिनी थी।
                      दाह संस्कार
पाण्डु , धृतराष्ट्र , गांधारी , विदुर आदि के प्रेत संस्कार का वर्णन है और दाह संस्कार हेतु गंगा का महत्व साबित होता है।
सती प्रथा का जन्म हो चुका था

                परिवार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता
गंगाद्वार की नागपुत्री उलिपि भी स्वछंद थी।  अतः कहा जा सकता है कि परिवार का महत्व था किन्तु व्यक्तिगत स्वतंत्रता का महत्व कम नही हुआ था।
शकुंतला , उलिपि , हिडंबा की कथाएँ दिशा देती हैं कि स्त्रियां अपने मायके में अपना अलग परिवार भी बसाती थीं।

              गृहणी

 गृहणी का समाज में अधिक उत्तरदायित्व था। यज्ञ हेतु पत्नी आवश्यक होती थी। पत्नी को अर्धांगनी का दर्जा हासिल था। नारीजीवन को सदाव्रत से जोड़ा जाता था व नारी को उत्कृष्ट समाज निर्माता माना जाता था। पुत्र व पुत्री को तकरीबन एक ही अधिकार प्राप्त थे।

                  शिष्टाचार

शिष्टाचार का अत्यंत महत्व था। गुरुजन , बड़े , बूढ़ों , ज्ञानियों को आदर देना आवश्यक था। ज्ञानियों , बुजर्गों की सेवा अत्यावश्यक था।
                        स्वाध्याय

द्विजों /ब्राह्मणो के लिए स्वाध्याय जरूरी कर्म था।

                 शरणागत रक्षा

शरणागत की रक्षा एक सामाजिक कर्तव्य  माना जाता था।
              अतिथि सत्कार
अतिथि को देव तुल्य अधिकार माना जाता था।

              समाज उत्सव
समाज उत्सव  आम बात थी और लगातार होते रहते थे।  समाज उत्सवमें नाच गान , मनोरंजन , खान -पान , जुआ , खेल आदि साधारण बात थी।

                 शिकार
शिकार प्रथा आवश्यक थी।

                     दास प्रथा
दास क्रय -विक्रय सामाजिक नेति के भाग थे।

                 चार वर्ण

श्रम  आबंटन व्यवस्था आगे बढ़ कर चार वर्णो में प्रवेश कर चुका था।  मुख्य वर्ण - ब्राह्मण , राजपूत , वैस्य व शूद्र थे किन्तु ने वर्णो जैसे म्लेच्छों , यवनों का भी वर्णन महाभारत  में है।

               विद्याध्यन

विद्याधयंन हेतु आश्रम व व्यक्तिगत अध्यापकों (आज के ट्युसन जैसे ) प्रबंध थे।  विद्यानुसार ब्राह्मणो का उप वर्ग विभाजन होता था। विद्यापीठों में छात्र जीवन अनुशासन व सात्विक होता था।
             जीवन आश्रम
जीवन को चार भागों में बांटा गया था
ब्रह्मचर्य आश्रम
गृहस्थाश्रम
वानप्रस्थ आश्रम
ताप सवृति (वैराग्य )
सन्यास
योगी जीवन आदि
                      अन्य सामजिक संस्थाएं व विश्वास आदि
धर्म निष्ठा
सत्य निष्ठां
पाप से भय
पितरों को श्राद्ध
पुरहिति पर विश्वास
ज्योतिष पर विश्वास
 शकुन व अपशकुन पर विश्वास
शुद्ध वातवरण पर विश्वास
दान महिमा पर विश्वास
भिक्षकों , कमजोर वर्ग, शिक्सार्थियों , विद्यालयों  हेतु समाज में व्यवस्था
                    मनोविज्ञान
गीत अध्याय से मालूम होता है कि मनोविज्ञान अपनी युवावस्था से उच्चावस्था की और अग्रसर था।  औटो -सजेसन (Autosuggestion ) अपनी चरमवस्था  में था।
         
                   प्रसाशन


कुलिंद जनपद का पांडवों से अच्छे संबंध थे।
         
             सैन्यशक्ति

सुबाहु की सैन्यशक्ति प्रबल थी।
हठी , घोड़े आदि का प्रयोग युद्ध में होता था।  रथ बिजनौर , हरिद्वार में चलते थे।
सैनिकों का बल मल्ल्युद्ध , धनुर्युद्ध आदि में जाता था।
सेना दलों (बटालियन ) में बांटी जाती थी।
साम , दाम , दंड , भेद, व उपेक्षा राजकारणी का मुख्य अंग था।

 ** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
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Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 24 /3/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --86

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -86


       Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;  Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context  History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;  Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context   History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;  Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ;  Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context   History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;  Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;  Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in contextHistory of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;  Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;  Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context   History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;    Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ; Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context  History of Bijnor;  Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context   History of Nazibabad Bijnor ;    History of Saharanpur;   History of Nakur , Saharanpur;  Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context   History of Deoband, Saharanpur;  Social Norms in Mahabharata Kulind Kingdom in context History of Badhsharbaugh , Saharanpur;
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                  Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty ) in Context History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur

                                   हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास  संदर्भ में परीक्षित व जन्मजेय (कुरु वंश )           


                    History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  -- 86

                                 
                               हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -       86             


                                                इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

                                       सम्राट परीक्षित
                      यादव वंश नाश होने व श्री कृष्ण मृत्यु से  युधिष्ठिर ग्लानि से भर उठा।  वह व पांडव भी देह त्याग का विचार करने लगे।  अभिमन्यु -उत्तर पुत्र परीक्षित को कुरु राज्य सौंपकर पांडव , द्रौपदी सहित कुरुक्षेत्र से देव -वन (देवबंद , सहारनपुर ) , कनखल , (मायापुर हरिद्वार ) होते हुए बद्रीधाम  पंहुचे।

              महाभारत विश्लेषण से लगता है कि   परीक्षित को पैतृक राज्य -कुरुक्षेत्र, कुरुदेश , कुरुजांगल      मिले थे। इस राज्य में पुर्बी पंजाब व गंगा -यमुना के उत्तरी दोआब आते थे।   अतः हरिद्वार, बिजनौर व सहारनपुर परीक्षित राज्य के अंतर्गत थे।  पृष्ट की सीमायें उत्तर में कुलिंद राज्य , दक्षिण में शूरशेन (मथुरा ) व बैराट;  पश्चिम में रोहतक और पूरब में रुहेलखण्ड इलाके थे ,
              परीक्षित को न्यायप्रिय , धार्मिक , दानी , अर्थनीति ग्यानी माना गया है।  पृष्ट कुशल शिकारी भी था।
परीक्षित की हत्या - नागवंशियों के प्रतिनिथि तक्षक नाग ने पुराना बदला लेने हेतु परीक्षित की विष से हत्या की।
परीक्षित  ने २५ साल तक राज्य किया।
                              जनमजेय
अपने पिता की मृत्यु समय जनमजेय बालक था  उसे बालक होते भी राजगद्दी पर बिठाया गया। जन्मजेय ने तक्षक से बदला लेने हेतु तक्षशिला जीता।  व यज्ञ  समस्त नाग भष्म हो जांय।  किन्तु ब्राह्मण पिता और नागमाता  आस्तीक  के कारण   तक्षक व ने नागों की रक्षा हुयी।
      जन्मजेय ने  पश्चिम की ओर गंगा से सिंधु तक राज्य विस्तार किया।  जन्मजेय के दिग्विजय की पुष्टि  शतपथ ब्राह्मण व ऐतरीय ब्राह्मण ने भी किन हैं। शायद जन्मजेय का उत्तराखंड पर भी अधिकार था।
जन्मजेय व ऋषियों के मध्य झगड़ा होने से जन्मजेय से ब्राह्मण हत्या भ्रूण हत्या हुयी और कहते हैं इसी कारण कुरु वंश का नाश हुआ। ब्राह्मण रुष्ट होकर पूर्व की ओर काशी , कौसल , विदेह आदि जनपदों में बस गए।
       जन्मजेय के पश्चात कुरुवंशिनियों ने ६० -७० साल तक राज्य किया विशेषतः पंजाब  क्षेत्र में।
              निचक्षु के काल में गंगा जी में भयंकर बाढ़ आई और हस्तिनापुर बह गया तो राजधानी कौशंबी स्थापित  करनी पड़ी।  ऐसा माना जाता है कि गंगा जी में बाढ़ 800 BC  या 750 विक्रम संबत के करीब आई थी। 
       


 ** संदर्भ - ---
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राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
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Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 25 /3/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --87

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -
      Parikshit and Janamjey (Kuru Vansh) & History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;Parikshit and Janamjey (Kuru Vansh) &    History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ; Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) & History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ; Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) &    History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ;  Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) &   History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;  Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) &   History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) & History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ; Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) &    History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ;   Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) & History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;  Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) &   History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;  Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) & History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;   History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) & History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;    History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;   Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) & History of Bijnor;    Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) & History of Nazibabad Bijnor ;   Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) &   History of Saharanpur;  Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) &   History of Nakur , Saharanpur;    Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) & History of Deoband, Saharanpur;  Parikshit and Janamjey (Kuru Dynasty , Vansh) & History of Badhsharbaugh , Saharanpur; कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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Bhishma Kukreti

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                 Shruti Sngrah, Puran Sngrah, etc in context History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur

                  हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में श्रुति संकलन व संग्रह


                            History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  -- 87

                                 
                     हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  87                   


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


         यद्यपि महाभारत आदि में कहा  गया है कि श्रुतियों का संग्रह व्यास ने किया और इसे एक ही पुरुष बताया।  गया मेरी दृष्टि में व्यास एक पदवी थी और जो महभारत जैसे काव्य  कर सके उसे व्यास कहा जाता रहा होगा। व्यास का अर्थ विस्तार भी है।
                                                             व्यास आश्रम
                 महाभारत युद्ध के विनाश उपरान्त व्यास अपने वास्तविक कुल (वास्तव में पांडव और कौरव व्यास संताने थीं ) नाश के बाद अपने शिष्यों के साथ गढ़वाल में मेरु /गंधमाधन पर्वत पर गंगा तट पर तपस्या करने चले गए।  वहां उन्होंने महभारत संकलन  गणेश की सहायता से लिख.
  माणा गाँव के ऊपर व्यास गुफा या व्यास पुस्तक को महाभारत का रचनास्थान माना जाता है।
                                                         व्यास चट्टी
 बणेलस्यूं , पौड़ी गढ़वाल में न्यार -गंगा के संगम पर व्यास चट्टी है और कहा जाता है कि व्यास ऋषि ने यहां तपस्या की थी।
                                                    वेद सम्पादन
  व्यास  सम्पादन किया और उन्हें चार भागों में विभाजित किया।
                                                    महाभारत संग्रह

 व्यास ने महाभारत सुनाया था और गणेश ने लिपिबद्ध किया था। इस ग्रन्थ को लिपिबद्ध करने में तीन साल लगे। समय समय पर इसमें श्लोक व कथाएँ जोड़ी गयीं।

                                            पुराणो का संग्रह

महाभारत काल में पुराणो का संग्रह भी शुरू हुआ।

                                     दर्शन शास्त्रों का प्रारम्भ
इसी काल में दर्शन  जैसे सांख्य व नीति , धर्मशास्त्र , भूगोलविज्ञान , साहित्य , कर्मकांड , स्थापत्य जैसे साहित्य लिखने की परम्परा भी शुरू हुयी।  तर्क शास्त्र या न्याय शास्त्र का प्रारम्भ भी हो गया था। महाभारत से जैन व बुद्ध धर्म का दर्शन याने भौतिक वाद भी शुरू हो चुका। था

 ** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन

Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 26 /3/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --88

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -
      Shruti Sngrah, Puran Sngrah, & History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Shruti Sngrah, Puran Sngrah, & History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;  Shruti Sngrah, Puran Sngrah, & History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;  Shruti Sngrah, Puran Sngrah, &   History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ; Shruti Sngrah, Puran Sngrah, &    History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;  Shruti Sngrah, Puran Sngrah, &   History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;  Shruti Sngrah, Puran Sngrah, &   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ;  Shruti Sngrah, Puran Sngrah, &   History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ;   History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;  History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;   History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;   Shruti Sngrah, Puran Sngrah, &   History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Shruti Sngrah, Puran Sngrah, & History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;    History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;   History of Bijnor;   Shruti Sngrah, Puran Sngrah, &   History of Nazibabad Bijnor ;    Shruti Sngrah, Puran Sngrah, & History of Saharanpur;  Shruti Sngrah, Puran Sngrah, &   History of Nakur , Saharanpur;    History of Deoband, Saharanpur;  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;
कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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                             हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में कुलिंद जनपद के गाँव , घर. घरेलू उपकरण आदि


                                      Ancient  History of Haridwar, Ancient  History Bijnor, Ancient  History Saharanpur  Part  --90

                                 
                                           हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 90                   


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

                                    गाँव
  भरत सिंह उपाध्याय अनुसार भाभर प्रदेश विशेषकर गंगाद्वार (बिजनौर सहित ) में कई वस्तियाँ थीं।  बुद्ध कोलिय जनपद के सापुंग निगम से हरिद्वार के समीप उशीरध्वज पर्वत (आज का चण्डीघाट पर्वत )  पंहुचे थे।
         उशीरध्वज से ऋषिकेश तक कई वस्तियां थीं। पाणिनि के समय नामों का बाहुल्य था जीने बसे स्थानों के नामन्त 'अर्म' लगा होता था। पत्पश्चात साहित्य में उजड़े स्थानो के नामन्त 'अर्म' लगने लगा।  ऋषिकेश में एक स्थान का नाम अब भी 'कुब्जामर्क' है।
                  पाणिनि साहित्य में भारद्वाज क्षेत्र के दो गाओं का नाम मिलता है -कृकर्ण व पर्ण।  पंतजलि ने इसी जनपद के दो नाम उल्लेख किया हैं - ऐणिक व सौँसुक।  ईशा के पांचवीं -चौथी सदी पूर्व ये गाँव अवश्य ही महत्वपूर्ण रहे होंगे।
         गाँवों से बाहर भिक्षुओं , विद्यार्थियों , ऋषियों, संघकारियों  आदि की कुटियाएं होती थीं।
 व्यक्तिगत खेतों के अतिरिक्त गाँव की सार्वजनिक (सँजैति ) जमीन भी होती थी।
                                  घर
गाँव में परिवारों के मकान पास पास होते थे।  घर मिटटी -पत्थर -लकड़ी से बनाये जाते थे।  मकान बनाने हेतु शायद दालों के आटे को मिट्टी के साथ मिलाने की विधि भी परिस्कृत हो चुकी होगी। धरातल लाल मिट्टी से पोती जाती थी व ऊपरी भाग सफेद रंग से रंगा जाता था।
                                घरेलू उपकरण
निम्न उपकरणों का उल्लेख अष्टाध्यायी में है -
  घास या पुआल का आसान या गद्दा
मांदरे - बांस , पुआल आदि से बना आसान गद्दा आदि
मूँज की चारपाई
पीढ़ा /चौकी
जानवरों के चरम पट्टियां
बांस /लकड़ी से अन्न रखने के पात्र
मिट्टी , लकड़ी व पत्थर के पात्र
थैले - खालों से बनते थे या पौधों की खालों से।
पानी पीने के लिए तुमड़ी का बहुप्रयोग होता था
                   श्रृंगार आदि
लंगोटी , कच्चा के ऊपर चादर लपेटी जाती थी
अनेक प्रकार के रंगों, चूर्णों  से मुखाकृति सजाई जाती थी।
दर्पण का उपयोग भी होता था।
अंजन का प्रयोग आम बात थी यमुना घाटी अंजन उत्पादन के लिए प्रसिद्ध थी।
आभूषण पहनने का रिवाज था। भिक्षु , भिक्षुणियाएं भी आभूषण पहनते थे।
                  भोजन
दूध,  दही , घी , मांश अवहसीक अंग थे।
तीखा , काली मिर्च , अदरक पीपल , नमक , गुड से स्वादिष्ट भोजन बनाया जाता था।
कंद मूल को ताजा या सुखाकर  प्रयोग होता था।
पतली खिचड़ी , सत्तू आदि का प्रयोग रोज होता था।
मांडी , प्लेउ आदि द्रव रूपी भोजन भी आम भोजन था।
रसों में फलों का रस प्रयोग होता था।
जड़ी बूटियों से बना धूम्र पान (धुंवां ) का प्रचलन बहुत था।
                 रोग

अतिसार , अर्श , बहुमूत्र , प्रमेह , संग्रहणी , कुष्ट , पामन , खांसी , ज्वर , मलेरिया , चर्मरोग , गण्डमाला , हृदय रोग , पक्षाघात , भगंदर रोग मुख्य थे।
जड़ी बबूटियों का प्रयोग रोग निदान हेतु किया जाता था।
                        मंत्र व तंत्र
रोग निवारण हेतु तंत्र मंत्र का प्रयोग होता था।
वशीकरण वचार प्रचलित था।
              कृषि
मंडुवा , कौणी -झंगोरा , मूंग , उड़द , अरहर , धान , तिल , जौ , गेंहू , गन्ना , कपास की खेती होती थी।
जंगली पशुओं को पकड़ने की कई विधियां उपयोग में लायी जाती थीं।
पशुपालन कृषि का मुख्यांग था।
                शस्त्रोपजीविका
  उन दिनों पर्वतीय प्रदेशो याने बिजनौर , हरिद्वार और सहारनपुर क्षेत्र में भी साहसी युवक शस्त्रों से आजीविका कमाते थे।  पाणिनि ने अत्ष्टध्यायी में पश्चिमी व मध्य हिमालय ढालों पर रहने वाले शस्त्रोजीवियों याने आयुधजीवियों का वर्णन किया है। सत्यकेतु विद्यालंकार ने महजनपद युग में योधाय जनपद की पहचान सहारनपुर से की है।
 भाभर ही नही अन्यत्र भी उत्सेधजीवियों (चोर डाकू  ) से बचने के लिये सभ्रांत व व्यापारी आयुधजीवियों की सहायता लेते थे।
                             भाभर की मंडियों से व्यापार
भाभर व तराई (गढ़वाल , बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर का भाग ) में व्यापारिक मंडियां थीं और इन मंडियों में पहाड़ों से पर्वतीय उत्पाद निर्यात हेतु आता था और यहीं से मैदानी वस्तुएं पहाड़ी खरीद कर ले जाते थे।
                                         मार्ग


       बुद्ध जीवन काल में भाभर में ही उत्तम मार्ग थे।  बुद्धकालीन शाक्य , बुलिय , कालाम , मल्ल , लिच्छवी को जोड़ने हेतु व्यापारिक मार्ग अहिछत्रा , गोविषाण , अहोगंग , कालकूट , स्रुघ्न होकर साकल पंहुचता था।  इन मार्गों पर जल , घास ईंधन व पड़ाव योग्य स्थान थे व नदी पार करने की सुविधा भी थी। इन मार्गों पर  ढोने के पशु परिहवन हेतु पशु हर ऋतू में चल सकते थे।
                                         भाषा
  शिष्ट समाज की भाषा संस्कृत थी।  जनता की भाषा स्थानीय भाषा थी जिस पर धीरे धीरे संस्कृत का प्रभाव पड़ने लगा था और साथ ही साथ संस्कृत में स्थानीय शब्द आने लगे थे।
                       नामकरण
नामकरण में मनुस्मृति या  स्मृतियों का पूरा प्रभाव था।
परिवार या कुल वास्तव में गाँव के नाम से जाना जाता था।
                              शिक्षा
 गुरुकुल  पद्धति से शिक्षा का प्रबंध होता था। लड़कियों को  भी शिक्षा दी जाती थी। विद्या धिकार ब्रह्मणो को था किन्तु हरिजन  गुरु की इच्छा से विद्या ग्रहण कर सकते थे। बुद्ध के समय व उपरान्त हरिजनों को शास्त्र शिक्षा के लये रास्ते खुल गए थे।
                            विवाह
महाभारत कालीन विवाह संस्था में अधिक अंतर नही आया था। बहिन के पुत्र -पुत्रियों से अपने पुत्र -पुत्रिओं की शादी करना शुभ माना जाता था। विवाह के अवसर पर मांश परोशना श्रेयकर माना जाता था।
                                        अंतिम संस्कार
अंतिम संस्कार में मृतक को जलाया भी जाता था व शवों को गाड़ा भी जाता था।  दाह संस्कार के बाद मृतक की हड्डियों को किसी स्थान में गाड़कर उस स्थान में स्तूप खड़े करने की परम्परा भी शुरू हो गयी थी।

                            शासन
गण , एकाधिकारी राज्य या  संघ संस्कृति अनुसार शासन व्यवस्था चलती थी।
राजा मंत्रिपरिषद की रचना करता था व उनसे सलाह लेता था।
कर भी लगाये जाते थे।
खेतों को रस्सियों से नापा जाता था।

** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन
अग्रवाल , पाणिनि कालीन भारत
अग्निहोत्री , पंतजलि कालीन भारत
अष्टाध्यायी
दत्त व बाजपेइ  , उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म का विकास
महाभारत
विभिन्न बौद्ध साहित्य
जोशी , खस फेमिली लौ
भरत सिंह उपाध्याय , बुद्धकालीन भारतीय भूगोल
रेज डेविड्स , बुद्धिष्ट इंडिया




               हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में कुलिंद जनपद (400 -300 BC )
           
                      Ancient History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  --89

                                 
                     हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -89                     


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती


                     कुलिंद जनपद [४५० -३५० विक्रमी संबत पूर्व ]
                            जनपद युग
              मगध साम्राज्य उदय से पहले भारत छोटे बड़े जनपदों में बनता था। जनपदों की सीमायें निम्न प्राकृतिक तत्व निर्धारित करते थे  [अग्रवाल , पाणिनि कालीन भारत ]-

नदियां
पहाड़
जंगल
मरुभूमि या दलदल भूमि
 जनपदों में शाशन निम्न भांति होता था
गण या संघ
एकराज
सम्राट या बड़ा राजा गणों या छोटे राज्यों को जीतकर केवल उपायन (वार्षिक या एकमुश्त भेंट या कर ) लेते थे और संघीय प्रशासन को ध्वस्त नही करते थे जिससे किसी हद तक क्षेत्र की सांस्कृतिक /सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन कम ही होता था।
    विक्रम संबत (ईशा काल के लिए  56 साल घटा दें ) से पांच या चार सदी पूर्व पाणिनि  साहित्य से पता चलता है कि उत्तर भारत में निम्न जनपद थे -
मद्र जनपद - तक्षशिला के दक्षिण -पूर्व जिसकी राजधानी साकल [स्यालकोट ] थी।
शिवि -उशीनगर - मद्र से दक्षिण में
त्रिगर्त जनपद - सतलज -व्यास -रावी नदियों का पहाड़ी क्षेत्र याने कांगड़ा से चम्बा का भूभाग।
भरत जनपद - वर्तमान थानेसर , कैथल , करनाल , पानीपत।
कुरु जनपद -दिल्ली -मेरठ का क्षेत्र।  शायद सहारनपुर का कुछ भाग कुरुजनपद में  होगा।
प्रत्यग्रथ जनपद -गंगा और रामगंगा का मैदानी उपत्यका को प्रत्यग्रथ या पांचाल कहा गया है।
कोसल , काशी व मगध - पांचाल से पूर्व में कौसल , कौसल से पूर्व काशी व उसके पूर्व में मगध जनपद थे।
                        पाणिनि का कुलिंद जनपद
 त्रिगर्ता से पूर्व सतलज , यमुना , गंगा , कालीगंगा के मध्य पहाड़ी भूभाग को कुलिंद जनपद माना गया है। पाणिनि ने इसका नाम कुलुन  भी कहा है।
महाभारत में कुलिंद व कुणिंद नाम दिए हैं।  ताल्मी ने इसे कुलिन्द्राइन कहा है। डा डबराल ने टिप्पणी दी है कि विद्वान कुलिंद , कुणिंद , कुलुन एक ही क्षेत्र हैं।
                         कुलिंद उशीनगर

  विक्रम संबत  पूर्व पांचवीं -चौथी सदी में इस क्षेत्र का नाम उशीनगर भी था। यहां बुद्ध का प्रभाव नही था और बुद्ध ने विनय धर व अन्य गणों से उपसम्पदा करने की अनुज्ञा दी थी।
                     कुलिंद जनपद के प्रदेश

डा डबराल ने विश्लेषण  है कि यह जनपद  छ प्रदेशों में बनता था -
तामस - सतलज टोंस नदी का पर्वतीय भाग था।  उशी राजा ने यमुना की सहायक नदी जला व उपजला (रूपी -सुपी ?) नदियों के तट पर तपस्या कर इंद्र से भी बड़ा पद प्राप्त किया था।
कालकूट या कालसी -यमुना के दक्षिण में कालसी , देहरादून , स्रुघ्न प्रदेश  प्रदेश की भूभाग थे।  स्रुघ्न नगर कहीं न कहीं सहारनपुर से संबंध  है।
भारद्वाज - भारद्वाज की पहचान  वर्तमान गढ़वाल क्षेत्र  जाती है। पाणिनि ने भारद्वाज क्षेत्र का दो बार उल्लेख किया है। गंगाद्वार -हरिद्वार के पास भारद्वाज ऋषि के बसने से इस भूभाग का नाम भारद्वाज पदा. याने बिजनौर, हरिद्वार का कुछ हिस्सा या पूरा व सहारनपुर का कुछ हिस्सा  भारद्वाज क्षेत्र में आता था।
तंगण -उत्तरकाशी व रुद्रप्रयाग , चमोली का भोटांतिक प्रदेश
रंकु -पिंडर नदी से पिथौरागढ़ तक का क्षेत्र
गोविषाण   - अल्मोड़ा , चम्पावत ,नैनीताल उधमसिंघ नगर से गोविषाण की पहचान की जाती है।  अतः बिजनौर का कुछ हिस्सा गोविषाण में होने की संभावना भी हो सकती है।
                     कुलिंद जनपद के प्रमुख नगर

     कत्रि नगर - अष्टाध्यायी में कत्रि व कालकूट नगर का उल्लेख है।  डा अग्रवाल ने कत्रि नगर की पहचान कत्यूरी नरेशों की राजधानी कार्तिकेयपुर से की है ।
       कालकूट नगर -इस नगर की  वर्तमान कालसी से पहचान की जाती है।    मौर्यकाल में अशोक सम्राट ने यहां  अभिलेख शीला स्थापित की  थी।
   

 ** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन
अग्रवाल , पाणिनि कालीन भारत
अग्निहोत्री , पंतजलि कालीन भारत
अष्टाध्यायी
दत्त व बाजपेइ  , उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म का विकास
महाभारत
विभिन्न बौद्ध साहित्य
जोशी , खस फेमिली लौ

                            हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर  में अशोक काल  से पहले बुद्ध धर्म

                                        History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  Part  -- 88

                                 
                     हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  88               


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

                जातक संग्रहों में हरिद्वार, बिजनौर , सहारनपुर वर्णन

       
         जातक कथाएँ बुद्ध अनुशीलन के प्राचीनतम साहित्य हैं।
               उत्तराखंड वर्णन
जातक कथाओं में उत्तराखंड , बिजनौर व सहारनपुर का अधिक नही किन्तु कुछ अंसांस वर्णन मिलता है।
ओहोगंग या अधोगंग , उशीरध्वज , यामुन , गंधमाधन , विपुल पर्वत उत्तराखंड में थे।  उशीनगर को सहारनपुर का कुछ भाग माना जाता है।  आंजनपर्वत या यामुन पर्वत में अंजन बनाया जाता था जो अशोक कल में भी प्रसिद्ध था शायद कालसी व सहारनपुर के आस पास का क्षेत्र  भी हो सकता है।

             जातक कथाओं में भाभर का वर्णन

जातक कथाओं में पहड़ी इलाकों से अधिक भाभर  क्षेत्र का वर्णन है । भाभर के वनों का वर्णन अलंकृत भाषा में हुआ है।
वृक्षों में - धव , अश्वकर्ण , खदिर , शाल , फंदन मालुव , आम, कुटज , सलल , नीप , कोसंब , आदि का वर्णन मिलता है ।
        वन्य पशुओं में -गोधा ,शरभमृग , गीदड़ , वनैल , श्वान ,हाथी , चितकबरे मृग , रोहित तुलिय बंदर , चलनी , भालू , वनवृषभ , गैंडा , सूअर , खरगोश , भेड़िया आदि पशु थे।
 पक्षी -मोर , हंस , वकुत्थ , चकोर , कुक्कुट , बगुला , सारस , बाज , नज्जुहा , दिंदिया , बाज , लोहित , प्रिष्टजीव , जीवक , तीतर , कपिंजर , कोयल , उल्लू तोता आदि।
मगरमच्छ , सर्प कछप आदि भी थे।
                   भाभर में आखेट सुविधा
 कोसल , वाराणसी से राजा भाभर (बजनौर, हरिद्वार , सहारनपुर आदि क्षेत्र ) में शिकार खेलने आते थे।  इन राजाओं को नरमाँश खाने का शौक था जो भाभर के किन्नरों को मार कर प्राप्त किया जाता था। 
दास दासियों की मंडी - भाभर से अन्य क्षेत्र के लोग किन्नर आदियों को खरीद कर ले जाते थे।
व्यापार - बैलोगाड़ी  , घोड़ा गाडी , हाथीगाड़ी से सामन को इधर उधर लिया -लाया जाता था।
आश्रम - विद्याध्यन हेतु आश्रम थे।
तपस्वी - तपस्वी भी गैर उत्तराखंडी भाभर , उत्तराखंड में रहते थे।


                बुद्धधर्म का प्रसार
 परवर्ती बौद्ध साहित्य अनुसार महात्मा बुद्ध हरद्वार में कनखल के पास पंहुचे थे। और वहां उशीरगिरी (सहारनपुर क्षेत्र ?) तक गए थे।  बुद्ध  उत्तराखंड के श्रुघ्ननगर में पंहुचे थे और वहां एक ब्राह्मण  अभिमान को दूर किया था (दत्त  व वाजपई , उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म का विकास ).
 बुद्ध निर्वाण के पश्चात गढ़वाल भाभर, हरिद्वार , बिजनौर में बौद्ध धमावलम्बियों का बर्चस्व कई शताब्दियों तक रहा।   गंगाद्वार में बुद्ध काल से सनातनी आश्रमों में बौद्ध धर्मी चिंतन शुरू हो गया था। बुध के प्रमुख शिस्य साणवासी गंगाद्वार के कनखल में रहते थे और संघ में दो विभाजन के समय साणवासी ने मगध में द्यितीय संगति का आयोजन किया था।
 गंगद्वार और, सहारनपुर  बिजनौर में अशोक काल से पहले ही बुद्ध धर्म का प्रचलन हो चुका था।  यही कारण है कि कुलिंद नरेशों के सिक्कों में चैत्य व बोधिवृक्ष अंकित हैं। ऋषिकेश से हरिद्वार व बिजनौर आदि क्षेत्र में बौद्ध आश्रम खुल चुके थे।

Bhishma Kukreti

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             Churning Discussion on Religious Hypocrisy/ Chaos  in Context Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur
                                         

                           हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में पाखडं प्लावन व चर्चा

                               Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  --91

                                 
                                      हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  -91                     


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

                               पाखंडो के तीन प्रकार

        महाभारत के बाद भौतिकवाद ने जोर पकड़ा और तर्क व चार्वक सिद्धांत ने भी जोर पकड़ा। पांचवीं सदी पूर्व भारत में मत मतांतरों की बाढ़ आ गयी थी। उन दिनों मत मतांतरों को पाषंड या पाखंड नाम दिया गया था।
तीन प्रकार के मत , मतांतर अथवा पाखंड समाज में थे -
१-आस्तिक याने परलोक पर विश्वास करने वाले
२-नास्तिक याने परलोक पर विश्वास ना करने वाले
३- केवल भाग्य पर विश्वास करने वाले।
              उपरोक्त लक्ष्य प्राप्ति हेतु दो मुख्य मार्ग थे
अ-लौकिक कर्मो द्वारा मोक्ष प्राप्ति
ब -लौकिक कर्मों का त्याग कर मोक्ष प्राप्ति
                         यज्ञ क्रिया

भारत में बुद्ध और जैन धर्म प्रचार में वैदिक कर्मकांड या सनातनी कर्मकांड के विरोध के बाद भी वैदिक यज्ञों की प्रचुरता रही थी।  कुणिंद /कुलिंद , कुरु,पांचाल, पंचनद , गांधार में यज्ञों की मान्यताओं में विशेष फरक नही पड़ा। अष्टाध्यायी में कई प्रकार के यज्ञों का वर्णन है और वैदिक देवताओं की संतुष्टि हेतु कर्मकांड का वर्णन है।

                    भक्तिपूजा परम्परा
वैदिक देवी  देवताओं के अतिरिक्त वृक्ष , यक्षों , नागों , जलाशयों , छवि Images , मातृदेवियों को भी पूजा जाता था।
               ग्रह व गण पूजा
ग्रह व गणो की पूजा देवताओं के साथ की जाती थी।
              पितर व अन्य देवता
पितरों व अन्य स्थानीय आवश्यकतानुसार स्थानीय देवताओं (ग्राम देवता आदि ) की भी पूजा मान्य थी।
                        शैव्य पूजा
शिवजी को ईश्वर उपाधि प्राप्त  हो गयी थी
       विष्णु पूजा
महाभारत के बाद विष्णु व  अवतारों की पूजा शुरू हो गयी थी।

            तपस्वी

उत्तराखंड तो तपस्वियों के लिए प्रसिद्ध था।  कण्वाश्रम आज का गढ़वाल भाभर व बिजनौर का एक मुख्य आश्रम था। जैन साहित्य जैसे आवश्यकचूर्णि में हरिद्वार में कनखल (कनकखल ) में पांच सौ जैन तपस्वियों के रहने का उल्लेख है।  बौद्ध धर्म के कई साहित्य में बिजनौर व हरिद्वार क्षेत्र का  ( विश्लेषण से अनुमानित ) वर्णन है।
 बौद्ध व जैन मत का प्रभाव समाज पर पड़ने लगा था।  किन्तु सभी मतों के एक साथ आने से समाज में गहमागहमी भी थी।

 ** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन
अग्रवाल , पाणिनि कालीन भारत
अग्निहोत्री , पंतजलि कालीन भारत
अष्टाध्यायी
दत्त व बाजपेइ  , उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म का विकास
महाभारत
विभिन्न बौद्ध साहित्य
जोशी , खस फेमिली लौ
भरत सिंह उपाध्याय , बुद्धकालीन भारतीय भूगोल
रेज डेविड्स , बुद्धिष्ट इंडिया
विभिन जैन साहित्य (डा डबराल की पुस्तक अनुसार )

Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 1/4/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -
      Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;  Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;  Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ;  Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;  Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ;  Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   AncientHistory of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;  Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;  Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;    History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bijnor;  Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;    Ancient History of Saharanpur;  Ancient  History of Nakur , Saharanpur;  Ancient   History of Deoband, Saharanpur; Ancient  Ancient History of Badhsharbaugh , Saharanpur;Ancient Saharanpur History, Ancient Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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Bhishma Kukreti

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                       Nand Empire in context History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur

                            हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में नन्द साम्राज्य

                                Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  -92     

                         
                            हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल -भाग -92                     


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

उत्तरी भारत के प्राचीन इतिहास में मघद साम्राज्य का उल्लेख करना ही पड़ता है।
नन्द साम्राज्य का उदय चौथी सदी पूर्व से लेकर तकरीबन 321 BC तक चला।
                   उग्रसेन -महापद्म
  पुराणो के अनुसार नन्द वंश का संस्थापक महापद्म था जिसने काकवर्णी से मगध का शासन छीना था।  महाबोधिवंश अनुसार उसका नाम उग्रसेन था। यूनानी लेखकों ने औग्रमस उल्लेख किया है जिसका अर्थ है - उग्रसेन का पुत्र . माहपद्म उग्रसेन के बारे में कई विवाद हैं।       
जैन ग्रंथों में नंदराज वैश्यपुत्र था।  यूनानी लेखक कर्टियस ने एक कथा सुनी थी और  का उल्लेख करते लिखा है कि उग्रसेन  आकर्षक युवा था जिसने रानी को आकर्षित कर पहले राजा का विश्वास जीता और ततपश्चात राजा की हत्त्या कर दी।  फिर कुछ दिनों तक राजकुमारों के संरक्षक बनने के पश्चात स्वयं राजा बन बैठा।
          पुराणों में नन्द राजा को शुद्रवंशी कहा गया है।
अनेक ग्रंथों के विश्लेषण से डा डबराल लिखते हैं -
१-उग्रसेन मल्ल भूमि  याने प्रत्यंत का था जो मलय से भिन्न था
२- परम्परागत वह दस्यु वृति याने आयुद्धवृति का था।
३- वह शूद्र अथवा शिल्पकार परिवार से संबंध रखता था।
४-उसने एक एक करके राज्य जीते और फिर मगध को जीता।
                  प्रत्यंत देस कौन सा था ?
प्रत्यंत  सीमान्त होता है।  समुद्रगुप्त की प्याज प्रशस्ति में सीमन्त परदेस में समतट , डवाक , कामरूप , नेपाल और कर्तृपुर को प्रत्यंत परदेस कहा गया है। उग्रसेन की सीमा महकोसल तक थी याने की उत्तरपांचल और उत्तराखंड प्रत्यंत प्रदेश थे।

                        परम्परागत दस्यु प्रवृति

          उग्रसेन की परम्परागत वृति व उत्तर भारत के एक एक प्रदेश जीतने से स्पष्ट है कि वह दस्युओं याने आयुध सैनिकों का नेता या छत्रपति था और उनकी सहायता से उसने प्रदेश जीते। इन्हे पाणिनि ने पर्वतीय आयुधजीवी नाम दिया था व कौटिल्य ने शस्त्रोपजीवी नाम दिया है।
                               
                                   शूद्र
  कुमाऊं , गढ़वाल , हरिद्वार , बिजनौर के भाभर प्रदेश में उस समय कुणिंद -कनैत अथवा खस आयुधजीवी थे जिन्हे अंग्रेज शासन काल में भी शूद्रकहा  गया था।

                                कुणिंद /कुलिंद से नन्द वंशी

     महाभारत से लेकर 300 AD उत्तराखंड , हिमाचल, हरिद्वार, सहारनपुर (कुछ भाग या संपूर्ण भाग ) पर कुलिंद /कुणिंद , कुनिंद का राज था।
रेप्सन के अनुसार नन्द वसंह का उत्तराखंड के भाभर से संबंध था।
   उग्रसेन महापद्म के पश्चात उसके आठ पुत्रों ने राज किया -
पंडुक
पण्डुगति
भूतपाल
राष्ट्रपाल
गोविषाणक
दशसिद्धक
कैवर्त
धनन्द
कुणिंद से 'कु' हटाकर नन्द वंश होने पर भी कुछ इतिहासकार हामी भरते हैं।
 कुमाऊं काशीपुर का भाभर का भूभाग गोविषाण कहलाया जाता था। इससे इतिहासकार अर्थ लगते हैं कि उग्रसेन महापद्म का संबंध अवश्य ही गोविषाण से था।  या तो महपदम की जन्मभूमि गोविषाण था या भाभर /गोविषाण विजय के वक्त  पुत्र का जन्म हुआ होगा और उसका नाम गोविषाण रखा गया होगा।
        बौद्ध साहित्य अनुसार मगध को जीतकर महापद्म ने मगध राज्य प्राप्त किया था।  इतिहासकार रैप्सन [कैब्रिज हिस्ट्री ऑफ इंडिया ] भी जैन साहित्य पर विश्वास नही करता है।
                                               राज्य   क्षेत्र
 राय चौधरी आदि के अनुसार नन्द राज्य संस्थापक ने निम्न राज्य जीते थे -
इक्ष्वाकु
पांचाल
काशी
हैहय
अश्मक
कुरु
मैथिल
शूरसेन
वीतिहोत्र

                     एकछत्र राज्य

माहपद्म ने भारत के मुख्य राज्य जीतकर प्रथम विशाल साम्राज्य स्थापित किया था और ब्राह्मणवादी संस्था को ध्वस्त किया था इसलिए ब्राह्मण लिखित , क्षत्रिय समर्थित पुराण आदि साहित्य में महापद्म को शूद्र कहा गया है।
                             शासन व्यवस्था

सर्वप्रथम बड़े साम्राज्य स्थापितिकरण के अलावा महापद्म नन्द को वृहद शासन तंत्र स्थापित करने का भी श्रेय जाता है।  अवश्य ही केन्र्दीयकरण व विकेन्द्रीयकरण का सामजस्य उग्रसेन ने किया होगा।  मार्गों की सुरक्षा , कृषि को समर्थन , जनहितकारी कार्यों की शुरुवात का श्रेय उग्रसेन या महापद्म नन्द को जाता है।
 उग्रसेन ने कृषि व जनहित को प्रोत्साहन दिया। कलिंग में जनप्रणाली की शुरवात की थी और यह भारत में किसी नरेश द्वारा जनहित प्रणाली का प्रथम उदाहरण है। (जायसवाल )
                           दानप्रियता
नन्द वंशियों की दानप्रियता प्रसिद्ध थी। [मुद्राराक्षस ]

                नाप तोल में सुधार

नन्द काल में नाप तोल का स्स्टंडर्डाइजेसन /मानकीकरण की शुरुवात हुयी और उसे नंदमान कहा जाता है।
             
                           विद्वानों का सत्कार
नन्द वंशी विद्वानों का सत्कार करते थे। बौद्ध , सनातनी , जैन ग्रंथों में नन्द वंशी राजाओं के यहां विद्वानो को सत्कार का समुचित उल्लेख हुआ है [डबराल ]

                    सैन्यबल
 यदि उस समय नन्द ने इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा किया तो अवश्य ही बड़ा सैन्यबल रहा होगा।
रायचौधरी के अनुसार नन्द सैन्यबल में दो लाख सैनिक , बीस हजार घुड़सवार ,  दो हजार रथ , और तीन हजार सैनिक हस्तिदल थे।
                                 कर

मौर्य शासन की शुरवात में कौटिल्य का हाथ है और कौटिल्य  करों व कर प्रबंधन का वर्णन बखूबी किया है।  कौटिल्य ने यदि अर्थ शास्त्र  लिखा है तो अवश्य ही भूतकाल  अनुभवों से ही यह हो सकता था।  कर प्रबंधन की वैज्ञानिक शुरुवात भी नन्द वंश में ही हुयी होगी अन्यथा कौटिल्य पैदा ही नही होता।
                                        नन्द वंश का हरिद्वार , बिजनौर व सहारनपुर पर अधिकार

                              इतिहासकारों का मानना है कि जब नन्द वंश का साम्राज्य व्यासं नदी तक था तो अवश्य ही नन्द वंश का अधिकार हरिद्वार , बिजनौर व सहारनपुर पर भी था [रैप्सन , डबराल द्वारा विश्लेषण ]

 ** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन
अग्रवाल , पाणिनि कालीन भारत
अग्निहोत्री , पंतजलि कालीन भारत
अष्टाध्यायी
दत्त व बाजपेइ  , उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म का विकास
महाभारत
विभिन्न बौद्ध साहित्य
जोशी , खस फेमिली लौ
भरत सिंह उपाध्याय , बुद्धकालीन भारतीय भूगोल
रेज डेविड्स , बुद्धिष्ट इंडिया
मजूमदार , पुसलकर , एज ऑफ इम्पीरियल यूनिटी
राय चौधरी , पॉलिटिकल हिस्ट्री ऑफ ऐन्सियन्ट इण्डिया

Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 2/4/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -
      Nand Empire & Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Nand Empire & Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;  Nand Empire & Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;  Nand Empire & Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand ;  Nand Empire & Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ; Nand Empire & Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; Nand Empire & Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand ;  Nand Empire & Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand ; Nand Empire &   Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;  Nand Empire & Ancient History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;Nand Empire &   Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;Nand Empire &   Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; Nand Empire &    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ; Nand Empire &   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;   Nand Empire & History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;  Nand Empire & Ancient History of Bijnor;  Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;Nand Empire &     Ancient History of Saharanpur;  Nand Empire & Ancient  History of Nakur , Saharanpur; Nand Empire & Ancient   History of Deoband, Saharanpur;Nand Empire & Ancient  Ancient History of Badhsharbaugh , Nand Empire & Saharanpur;Ancient Saharanpur History, Nand Empire & Ancient Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार का इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार का इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार का इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार का इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार का इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार का इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार का इतिहास ;लक्सर हरिद्वार का इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार का इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार का इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार का इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार का इतिहास ;बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास
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             Maurya Empire  in Context Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur

                       हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में मौर्य साम्राज्य

                         Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  - 93     

                         
                            हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 93                   


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

                          चाणक्य और चन्द्रगुप्त

      पुराण , बौद्ध साहित्य , जैन साहित्य सभी स्वीकार करते हैं कि चन्द्रगुप्त व उसके गुरु चाणक्य /कौटिल्य ने    नन्द वंश का नाशकर मौर्य राज्य स्थापित किया था।
          चाणक्य (कौटिल्य ) व चन्द्रगुप्त के बालकाल के बारे में  रिकार्ड उपलब्ध नही हैं।  कहा जाता है कि चाणक्य पश्चमी भारत का था व तक्षशिला विश्वविद्यालय से उपाधि प्राप्त कर घननंद के दरबार पाटलिपुत्र में पुरुष्कार पाने की इच्छा से आया था।  दुर्भाग्यवश नंदनरेश ने चाणक्य का अपमान कर डाला।
         खीजा चाणक्य वापिस जा रहा था की रास्ते में उसे एक मिला।  चाणक्य में चन्द्रगुप्त में संभवनाएं दिखीं और उसने उसे राजनीति , युद्धनीति, शिल्प शिक्षा में निष्णांत बनाने के लिए शिक्षा का प्रबंध किया ।  छन्द्र्गुप्त के बारे में कहा जाता है कि वह के साधारण क्षत्रिय मोरिय परिवार का था।
             जिन दिनों चन्द्रगुप्त तक्षशिला में अध्ययनरत था उन्ही दिनों यूनान नरेश सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया। सिकंदर को तक्षशिला नरेश ने भारत प्रवेश का मार्ग प्रदान किया।
        चाणक्य और चन्द्रगुप्त ने सिकंदर की रणनीति , युद्धनीति व अन्य कौशल को भली भांति परखा और समझा भी।  कहा जाता है कि चन्द्रगुप्त ने सिकंदर की सैन्यवयव्स्था भी देखी थी।
         
[समस्त संदर्भ सूची हेतु डा डबराल की पुस्तक पढ़ें ]

 ** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन
अग्रवाल , पाणिनि कालीन भारत
अग्निहोत्री , पंतजलि कालीन भारत
अष्टाध्यायी
दत्त व बाजपेइ  , उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म का विकास
महाभारत
विभिन्न बौद्ध साहित्य
जोशी , खस फेमिली लौ
भरत सिंह उपाध्याय , बुद्धकालीन भारतीय भूगोल
रेज डेविड्स , बुद्धिष्ट इंडिया
मुखर्जी , चन्द्रगुप्त ऐंड हिज टाइम्स

Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 3/4/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -
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             Alexander Attack on India & Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur

                                        भारतवासियों द्वारा इतिहास के साथ माजक

         हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास संदर्भ में सिकंदर का भारत पर आक्रमण
              Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur  Part  -   94 

                         
                     हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -94                     


                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

         330 BC में यूनानी आक्रांता सिकंदर ने परसिया को जीतकर उसकी राजधानी परसेपोलिस को नष्ट कर दिया।  और  भागों को जीतकर 327 BC की गर्मियों में भारत की और प्रयाण किया [मुकर्जी ] ।
उन दिनों उत्तरभारत भारत में तीन मुख्य राज्य थे और बाकी छोटे छोटे राज्य थे।  पश्चिम में छोटे छोटे राज्य थे किन्तु काबुल नदी घाटी का कोफेयस , सिंधु का उत्तरी राज्य शशिगुप्त  क का राज्य , ऊपरी कश्मीर का अभिसार राज्य, स्वात घाटी के छोटे छोटे गण  आदि राज्यों ने संगठित होकर सिकंदर को नही रोका  और अन्य क्षेत्रों का भी यही हाल था ।
१- तक्षशिला - झेलम का पश्चिम भाग।
२-पुरुवंशी या पोरस - झेलम व रावी दोआब
३-नन्द साम्राज्य - रॉबी से पूर्व गंगा महान क्षेत्र।  हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनौर नन्द वंश के अधीन था किन्तु  क्षत्रप या राजा के बारे में इतिहास रिकॉर्ड के हिसाब से मौन है।

                              क्षत्रपों की कायरता
   शशिपाल ने सिकंदर की अधीनता स्वीकार कर ली। पुरुवंश से द्वेष के कारण तक्षशिला राज्य के राजकुमार आम्भी ने सिकंदर को भारत जाने का रास्ता दिया। 
 326 BC में सिकंदर ने झेलम पार कर पोरस नरेश को हराया।

                भारतवासियों द्वारा इतिहास के साथ माजक
यह ठीक है कि युद्ध से पहले पोरस ने सिकंदर से बीरतापूर्वक डटकर युद्ध लड़ा और एक वाक्य 'कि सिकंदर !मेरे साथ वही वर्ताव करो जो राजा को राजा के साथ करना चाहिए ' से पोरस की सिकंदर से संधि हो गयी।  किन्तु उसके बाद पोरस ने भी सिकंदर को उत्तर भारत जीतने में योजना , सैनिक , छद्म कर्म [जासूसी ], रणनीति में तन -धन - मन से पूरा साथ दिया। (एज ऑफ इम्पीरियल यूनिटी - पृष्ठ 44 -50 ]
पोरस और सिकंदर की सेना को चिनाव नदी  पूर्व के अन्य राज्य जीतने में कठिनाई नही हुयी।  एक और पुरुवंशी राजा बिना युद्ध के ही गन्दिरिदे राज्य ( नन्द साम्राज्य ) की और भाग गया और उसके राज्य को पोरस राज्य में मिला लिया गया।
 आश्चर्य है कि भारतवासी ऐसे कपटी , देशद्रोही राजा की  भूरि भूरि प्रशंसा करते हैं और उसकी वीरता पर फिल्म भी बनाई जाती है।
भारतीयों द्वारा ऐतिहासिक सच के साथ इतना मजाक किया जाना हमारी मानसिकता का परिचायक है।
 
* सिकंदर का आक्रमण शेष भाग में

 ** संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज
घोषाल , स्टडीज इन इंडियन हिस्ट्री ऐंड कल्चर
आर के पुर्थि , द एपिक सिवलीजिसन
अग्रवाल , पाणिनि कालीन भारत
अग्निहोत्री , पंतजलि कालीन भारत
अष्टाध्यायी
दत्त व बाजपेइ  , उत्तर प्रदेश में बौद्ध धर्म का विकास
महाभारत
विभिन्न बौद्ध साहित्य
जोशी , खस फेमिली लौ
भरत सिंह उपाध्याय , बुद्धकालीन भारतीय भूगोल
रेज डेविड्स , बुद्धिष्ट इंडिया

Copyright@ Bhishma Kukreti  Mumbai, India 4/4/2015

   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -
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