Author Topic: Justice for Muzzaffarnagar Case, State Struggle-न्याय की मांग- मुज्ज़फ्फर नगर  (Read 17135 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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02 अक्टूबर जहाँ राष्ट्रपिता एव पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री के जनम दिन के रूप में मनाया जाता है वही उत्तराखंड वासियों के लिए यह दिन 'काला दिवस' के रूप में भी मनाया जाता है। 02 अक्तूबर 1994 को जब प्रथक राज्य उत्तराखंड की मांग के लोग दिल्ली की जा रहे थे, पुलिस की वर्दी में मुलायम सरकार के गुंडों ने निहत्ते और शान्ति पूर्वक प्रदर्शन के लिए जा रहे नागरिको पर रात में गोली चला कर कई लोगो को मार दिया और महिलाओ के साथ बलात्कार जैसे घटनाओं को अंजाम दिया। आज लगभग 20 होने वाले है घटना को लेकिन हत्यारे अभी भी खुल आम घूम रहे है और तत्कालीन सरकार के मुखिया  मुलायम सिंह अब तो उत्तराखंड में अपनी पार्टी को मजबूत करने में लगे है। शर्म शर्म शर्म।। उत्तराखंड में मुलायम जैसे लोगो का वहिष्कार होना चाहिए।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मुजफ्फरनगर (रामपुर तिराहा) गोलीकाण्ड
 : रामपुर तिराहा गोली काण्ड
 
 २ अक्टूबर, १९९४ की रात्रि को दिल्ली रैली में जा रहे आन्दोलनकारियों का रामपुर तिराहा, मुजफ्फरनगर में पुलिस-प्रशासन ने जैसा दमन किया, उसका उदारहण किसी भी लोकतान्त्रिक देश तो क्या किसी तानाशाह ने भी आज तक दुनिया में नहीं दिया कि निहत्थे आन्दोलनकारियों को रात के अन्धेरे में चारों ओर से घेरकर गोलियां बरसाई गई और पहाड़ की सीधी-सादी महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार तक किया गया। इस गोलीकाण्ड में राज्य के ७ आन्दोलनकारी शहीद हो गये थे। इस गोली काण्ड के दोषी आठ पुलिसवालों पर्, जिनमे तीन इंस्पै़क्टर भी हैं, पर मामला चलाया जा रहा है।
 
 शहीदों के नाम:
 
 अमर शहीद स्व० सूर्यप्रकाश थपलियाल (२०), पुत्र श्री चिंतामणि थपलियाल, चौदहबीघा, मुनि की रेती, ऋषिकेश।
 अमर शहीद स्व० राजेश लखेड़ा (२४), पुत्र श्री दर्शन सिंह लखेड़ा, अजबपुर कलां, देहरादून।
 अमर शहीद स्व० रविन्द्र सिंह रावत (२२), पुत्र श्री कुंदन सिंह रावत, बी-२०, नेहरु कालोनी, देहरादून।
 अमर शहीद स्व० राजेश नेगी (२०), पुत्र श्री महावीर सिंह नेगी, भानिया वाला, देहरादून।
 अमर शहीद स्व० सतेन्द्र चौहान (१६), पुत्र श्री जोध सिंह चौहान, ग्राम हरिपुर, सेलाकुईं, देहरादून।
 अमर शहीद स्व० गिरीश भद्री (२१), पुत्र श्री वाचस्पति भद्री, अजबपुर खुर्द, देहरादून।
 अमर शहीद स्व० अशोक कुमारे कैशिव, पुत्र श्री शिव प्रसाद, मंदिर मार्ग, ऊखीमठ, रुद्रप्रयाग।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Bijendar Rawat
3 hrs ·
 

-----------बलिदान को नमन------------

उतराखंड के लिए
प्राणों की आहुति देने वाले
वीर अमर शहीदो
तुम्हारे इस बलिदान को
याद रखेंगे पहाड़ के जन
वास्तव में तुमने ही
जन्म भूमि का क़र्ज़ उतारा हैं
इसलिए "दग़डया"कर रहा हैं
तुम सब को नमन
व्यर्थ नहीं गया
तुम्हारा ये अमर बलिदान
मिल गया हैं उतराखंड राज्य हमें
तुम्ही शहीदों के कारण ही
आज हो रही हमारी पहचान ।

@द ग़ ड या


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
6 hrs · Edited ·

कख जाणा भैजी उत्तराखंड आंदोलन मा

मथी पहाड़ भति निस गांगडु भति
स्कुल दफ्तर गौं बजार भति

मथी पहाड़ भति निस गांगडु
स्कुल दफ्तर गौं बजार भति

मनख्यूं दार धार धार भति
हिटण हिटण लग्यां छं
हिटण हिटण लग्यां
हिटण लग्यां छं
भैठाना कु लगा नि
बाटा भरयां छं सड़कियुं मा जगा नि
दीदा कख जाणा
भैजी कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा
दीदी कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा
भुला कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा

बेरोजगार ज्वानि सड़कियुं मा
दुकी लाचार बुढ्पा सड़कियुं मा

बेरोजगार ज्वानि सड़कियुं मा
दुकी लाचार बुढ्पा सड़कियुं मा

भविष्य नौन्याल लुक सड़कियुं मा
माँ भैनों कु दुक सड़कियुं मा

हिटण हिटण लग्यां छं
हिटण हिटण लग्यां
हिटण लग्यां छं
भैठाना कु लगा नि
बाटा भरयां छं सड़कियुं मा जगा नि

बोला कख
बोला कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा
कख क कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा
सबी कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा

भूक ना तिस ना दर ना फ़िक्र छ
मुठी बोटी छं कसी कमर छ

भूक ना तिस ना दर ना फ़िक्र छ
मुठी बोटी छं कसी कमर छ

हाथ मा मुछ्ला आँखों मा आंगार
खुथ धरती मा आकास नजर छ

हिटण हिटण लग्यां छं
हिटण हिटण लग्यां
हिटण लग्यां छं
भैठाना कु लगा नि
बाटा भरयां छं सड़कियुं मा जगा नि

दीदा कख जाणा
भैजी कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा
दीदी कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा
भुलू कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा

बाबा बी दादा बी नाती सड़क मा
एक वें सबी जाती सड़क मा

बाबा बी दादा बी नाती सड़क मा
एक वें सबी जाती सड़क मा

माँ बेटी सासु ब्वारी सड़क मा
आच बनी सबी चिंगारी सड़क मा

हिटण हिटण लग्यां छं
हिटण हिटण लग्यां
हिटण लग्यां छं
भैठाना कु लगा नि
बाटा भरयां छं सड़कियुं मा जगा नि

बोला कख
बोला कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा
कख क कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा
सबी कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा

मथी पहाड़ भति निस गांगडु भति
स्कुल दफ्तर गौं बजार भति

मथी पहाड़ भति निस गांगडु
स्कुल दफ्तर गौं बजार भति

मनख्यूं दार धार धार भति

हिटण हिटण लग्यां छं
हिटण हिटण लग्यां
हिटण लग्यां छं
भैठाना कु लगा नि
बाटा भरयां छं सड़कियुं मा जगा नि

बोला कख
बोला कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा
कख क कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा
सबी कख जाणा छं तुम लोक
उत्तराखंड आंदोलन मा

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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टुटदी तिबरी,उजड्यू खंड
क्या इलै ही मांग उत्तराखंड?
लोग परदेशों मा बस्या,
रयु क्या वे उत्तराखंड?
खाणी-सीणी परदेशों मा,
पिकनिक खुणि उत्तराखंड?
धुरपालि की पाल टुटी,
देली मा कंडली जमी
फेसबुक मा स्टेट्स द्यखणु,
की आई लव उत्तराखंड।
पलायन पहाड़ कु हुयु
क्या इलै ही मांग उत्तराखंड?
नेता मस्तमौला हुया,
डेरा डल्यु दून मा,
शहीद आंदोलनकारी ह्वेगी,
उत्तराखंड की लड़ै मा,
स्वच्दा होला वु भी आज,
की किलै मांग यु उत्तराखंड?
कुछ त सोचो भाइयो तुम भी,
की किलै मांग यु उत्तराखंड,
आओ फिर से बसोंला पहाड़ मा,
सपनों कु बुण्यु उत्तराखंड,
‪#‎Vikas‬ Dhyani

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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नहीं भूलेगा २ अक्टूबर
===============
हमारे देश के इतिहास में २ अक्टूबर एक महत्वपूर्ण दिन है.
हम सब जानते हैं कि इस दिन दो महान विभूतियों का जन्म
हुआ था. महात्मा गाँधी जी और लालबहादुर शास्त्री जी. एक का
नारा अमन एक का जय जवान जय किसान. दोनों ही हमारे
देश के लिए इतना कुछ कर गए जो भुलाये नहीं भूलेगा.

२ अक्टूबर उत्तराखंड के जख्मों को भी हरा करता है. इस दिन
१९९४ में राष्ट्र-प्रहरियों की जननी उत्तराखंड की नारी का अक्षमनीय
अपमान हुआ. वर्दीधारी भेड़ियों ने नारी शक्ति का अपमान कर घोर
अपराध किया. आज तक उन भेड़ियों को सजा नहीं दी गयी.
उत्तराखंड के जनमानस की यह मांग अभी तक अपूर्ण है.
मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहे पर आज भी आवाज गूँज रही है--

दो अक्टूबर चौरानबे की हो रही थी भोर
रामपुर तिराहे पर मचा भेड़ियों का शोर
रायी-बगोवाली की चौपाल जग गयी थी
भेड़ियों के तांडव से जंग छिड़ गयी थी.

कायरों ने राह में छिप कर घात लगाई
नारी के अपमान की योजना बनाई
निर्दोष निहत्थों पर लाठी बन्दूक चलायी
सैनिकों की जननी पर क्रूरता बरसाई .

मैं दुर्योधन दुशासनों के बीच घिर गयी थी
वर्दी में नरपिशाचों के नीयत फिर गयी थी
कई कृष्ण आये तब बचाने मेरी लाज
उनकी मानवता का आज भी ह्रदय पर राज.

दिल की तमन्ना तब अधूरी रह गयी थी
कमर में दराती की कमी खल गयी थी
काश ! उस दिन मेरे हाथ में दराती होती
हैवानों के चिथड़ों की खबर छपी होती.

पूरन चन्द्र कांडपाल- सदस्य www.MeraPahadForum.com

विनोद सिंह गढ़िया

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[justify]“जो घाव लगे और जाने गयीं वे प्रतिरोध की राजनीति की कीमत थी”1996 में इलाहबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रवि एस.धवन ने अपने फैसले में लिखा.जिस सन्दर्भ में वे इस बात को लिख रहे थे,उस बात को आज 2 अक्टूबर 2014 को बीस साल हो गए हैं.आज से बीस वर्ष पहले 2 अक्तूबर 1994 को केंद्र में बैठी “मौनी बाबा” नरसिम्हा राव की सरकार से अलग राज्य की मांग करने दिल्ली जा रहे उत्तराखंड आन्दोलनकारियों को उत्तर प्रदेश की तत्कालीन मुलायम सिंह यादव सरकार के पुलिस प्रशासन ने मुजफ्फरनगर में तलाशी के बहाने रोका और फिर हत्या, लूटपाट,महिलाओं से अभद्रता और बलात्कार यानि जो कुछ भी गुंडे-बदमाश या कुंठित-विकृत मानसिकता के अपराधी कर सकते थे,वो सब देश की सर्वोच्च प्रशासनिक व पुलिस सेवा-आई.ए.एस. और आई.पी.एस. के अफसरों की अगवाई में किया गया.
आज बीस बरस बाद भी उत्तराखंड को इन्तजार है कि इन हत्यारे,बलात्कारी अफसरों और अन्य कर्मियों को सजा मिले.चूँकि उत्तराखंड को आज भी मुजफ्फरनगर काण्ड के मामले में अभी भी न्याय की दरकार है,इसलिए उस जघन्य काण्ड को मैं न्यायपालिका के कुछ फैसलों के नजरिये से याद करने की कोशिश करता हूँ.मुजफ्फरनगर काण्ड के खिलाफ यदि कोई सबसे सशक्त फैसला था तो वो 6 फ़रवरी 1996 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ती रवि एस.धवन और ए.बी.श्रीवास्तव की खंडपीठ ने दिया.273 पेजों के इस फैसले में इन दोनों न्यायाधीशों ने इस प्रशासनिक अपराध के प्रति बेहद कठोर रुख अपनाया और पीड़ित उत्तराखंडी स्त्री-पुरुषों के प्रति इनका रवैया बेहद संवेदनशील था.दोनों न्यायाधीशों ने अलग-अलग फैसला भी लिखा और उनकी खंडपीठ ने संयुक्त निर्देश भी जारी किये.
जस्टिस रवि एस. धवन ने मुजफ्फरनगर काण्ड को राज्य का आतंकवाद करार दिया.जस्टिस ए.बी.श्रीवास्तव ने लिखा कि “महिलाओं का शीलभंग करना,बलात्कार करना,महिलाओं के गहने और अन्य सामान लूटना,वहशीपन की निशानी है जो कि आदिम पुरुषों में भी नहीं पायी जाती थी और यह देश के चेहरे पर एक स्थायी धब्बे की तरह रहेगा.”यह धब्बा आज भी धुला नहीं और पीड़ितों को न्याय की दरकार है,न्याय का इन्तजार है पर न्याय की उम्मीद नजर नहीं आती है.इलाहाबाद उच्च नयायालय ने ही इस काण्ड की सी.बी.आई.जांच का आदेश भी दिया.उक्त फैसले में सी.बी.आई. की कार्यप्रणाली की तीखी आलोचना की गयी है कि वह जानबूझ कर मामले को लटका रही है.अदालत ने लिखा कि सी.बी.आई. ने इस मामले में जिस तरह कार्यवाही की,उससे “समय और सबूत दोनों नष्ट” हो गए.आज बीस साल बाद सी.बी.आई. की अदालतों में लंबित मुकदमों और एक-एक कर छूटते अभियुक्तों,तरक्की पाते और शान से रिटायरमेंट के बाद का जीवन गुजारते मुजफ्फरनगर काण्ड के दोषी अफसरों को देख कर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की बात सच होती प्रतीत हो रही है कि सी.बी.आई. की रूचि दोषी अफसरों को सजा दिलाने में नहीं है.इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उक्त फैसले में पुलिस की गोलीबारी में मरने वालों और बलात्कार की शिकार महिलाओं को 10 लाख रूपया मुआवजा देने का आदेश किया किया गया.साथ ही घायलों को 25 हज़ार,गंभीर रूप से घायलों को 2.5 लाख और अवैध रूप से बंदी बनाये जाने वालों को 50 हज़ार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया गया था.उत्तराखंड की तब की 60 लाख जनसँख्या के लिए अदालत ने आदेश किया था कि पांच साल तक एक रुपाया,प्रति व्यक्ति,प्रति माह केंद्र और राज्य मिलकर जमा करें और इस राशि को उत्तराखंड के लोगों विशेषतौर पर महिलाओं के विकास के लिए खर्च किया जाए.अदालत ने इसे उत्तराखंडियों के घावों पर मरहम लगाने के छोटी विनम्र कोशिश कहा था.
1999 में 273 पन्नों के उक्त फैसले को मुजफ्फरनगर काण्ड के समय वहां के डी.एम.रहे अनंत कुमार सिंह की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने कुछ किन्तु-परन्तु लगा कर खारिज कर दिया.अनंत कुमार सिंह ने ही आन्दोलनकारियों पर गोली चलाने का आदेश दिया था और बाद में यह शर्मनाक बयान भी उन्ही का था कि “कोई महिला यदि रात के समय गन्ने के खेत में अकेली जायेगी तो उसके साथ ऐसा ही होगा”.ये अनंत कुमार सिंह ना केवल सपा,बसपा बल्कि कांग्रेस,भाजपा को भी अत्यधिक प्रिय रहे हैं.मुख्यमंत्री रहते हुए वर्तमान गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने अनंत कुमार सिंह के खिलाफ मुकदमा चलाने की इजाजत देने से इन्कार कर दिया और इन्हें प्रमोशन देकर अपना प्रमुख सचिव बनाया.केंद्र की पिछले कांग्रेस सरकार के दौरान अनंत कुमार सिंह केंद्र सरकार में सचिव पद पर आरूढ़ हो चुके थे.
अदालती फैसलों की श्रंखला में 2003 में अजब-गजब तो नैनीताल उच्च न्यायलय में हुआ. न्याय की मूर्ती एम.एम.घिल्डियाल और पी.सी.वर्मा ने मुजफ्फरनगर काण्ड के आरोपियों अनंत कुमार सिंह आदि को बरी कर दिया.इसके खिलाफ प्रदेश भर में तूफ़ान खड़ा हो गया.आन्दोलनकारियों ने हाई कोर्ट के घेराव का ऐलान कर दिया.1 सितम्बर 2003 को होने वाले इस घेराव के एक दिन पहले उक्त दोनों न्याय की मूर्तियों ने अपना फैसला यह कहते वापस ले लिया कि अदालत के संज्ञान में यह बात नहीं थी कि 1994 में एम.एम.घिल्डियाल उत्तराखंड संयुक्त संघर्ष समिति के वकील रहे थे और अब वे उसी मामले में फैसला सुना रहे हैं.यह विचित्र था क्यूंकि किसको मालूम नहीं था,यह तथ्य-स्वयं एम.एम.घिल्डियाल को?बहरहाल जनता के घेराव के दबाव में अदालत द्वारा अपना फैसला वापस लेने की यह अनूठी मिसाल है.
लेकिन इतने कानूनी दांवपेंच के बावजूद भी उत्तराखंड के सीने पर मुजफ्फरनगर काण्ड के घाव हरे हैं.उत्तराखंड में कांग्रेस-भाजपा के नेता सत्तासीन होने के लिए अपनी पार्टियों के भीतर सिर-फुट्टवल मचाये हुए हैं.लेकिन जिनकी शहादतों और कुर्बानियों के चलते वे सत्ता सुख भोगने के काबिल हुए,उनको न्याय दिलाना सत्ता के लिए मर मिटने वालों के एजेंडे में नहीं है.इलाहबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में लिखा था कि “भारत के संविधान की यह अपेक्षा है कि हम एक लोकतान्त्रिक लोकतंत्र चलायें,एक जनवादी जनतंत्र चलायें ना कि पिलपिला लोकतंत्र(banana republic) या तानाशाही हुकूमत.”लेकिन उत्तराखंड ही क्यूँ देश के कई हिस्सों में न्याय,लोकतंत्र और संविधान का यह तकाजा पूरा होना बाकी है.
मुजफ्फरनगर काण्ड के दोषियों को बीस वर्ष बाद भी सजा ना मिलना अंग्रेजी नाटककार जॉन गाल्सवर्दी के इस प्रसिद्द कथन को ही सच सिद्ध करता है कि “न्याय देने में विलम्ब करना,न्याय देने से इनकार करना है(justice delayed is justice denied)”. खटीमा,मसूरी,मुजफ्फरनगर काण्ड आदि दमन कांडों के दोषियों को बीस बरस बाद भी सजा ना मिल पाना,हमको न्याय देने से इनकार ही तो है.

लेख : इन्द्रेश मैखुरी

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Sunil Negi

The most shameful, grusome ,barbaric n horrendous mujaffarnagar episode though happened in 1994, is still fresh in the mind of every diehard uttrakhandi because 20 years ago from now number of committed and dedicated separate uttarakhand activists including several women were not only shamefully assaulted and grievously injured by the human beasts but were also pre strategically murdered on the orders of the then up dg police n officers bua singh etc. Etc under the anti uttarakhandi mulayam singh yadav'government. More than 15 people laid down their lives in the firing.These agitationists were peacefully going to particate in the historic ram lila maidan rally to demand separate utttarakhand state from the then central government. Since the last 25 years not a single officer directly responsible for this most heinous and barbaaric crime has been jailed or penalized , rather promoted by mulayam singh yadav n other governments. After the formation of separate uttrakhand state 8 governments and several chief ministers have tasted the political power by being at the helm but unfortunately no one has ever aspired or seriously endeavored to get the guilty punished or form a commission to try the guilty officers n politicians for the unprovoked firing n criminal assault on our women n youth including the old ones. Several commisions has been formed since then n haryana government is likely to constitute a commision to probe the fishy land deals of robert vadra but our chief ministers of succesive governments have or had no time to punish the guilty. Shame on them. I sometime feel ashamed to be pronounced as an uttrakhandi.
Sunil negi,president,ujf

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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इंसाफ के लिए उत्तराखंड के लोगों ने दिया धरना पृथक उत्तराखंड राज्य के लिए संघर्ष कर रहे आंदोलनकारियों की हत्या और महिलाओं से दुष्कर्म करने के आरोपियों को सजा दिलाने के लिए उत्तराखंड के लोगों ने शुक्रवार को जंतर-मंतर पर धरना दिया और राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन भेजा। मारे गए आंदोलनकारियों की आत्मा की शांति के लिए हवन भी किया गया।

धरने में भाजपा नेता व एकीकृत दिल्ली नगर निगम के पूर्व चेयरमैन जगदीश ममगांई, क्रांति दल के उपाध्यक्ष प्रताप सिंह शाही, लोकमंच के अध्यक्ष बृजमोहन उप्रेती, जनमोर्चा के हर्षवर्धन खंडूरी सहित उत्तराखंड से जुड़े कई नेता शामिल हुए।

ममगांई ने कहा कि सीबीआई, राष्ट्रीय महिला आयोग, संसदीय दल व विभिन्न सामाजिक संस्थाओं की जांच में सारे आरोप प्रमाणित होने के बावजूद नारी अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने एवं निर्दोष लोगों की हत्या करने वाले पुलिसकर्मियों को 21 साल बाद भी सजा नहीं मिली है।

उन्होंने कहा कि अलग उत्तराखंड राज्य के समर्थन में 2 अक्टूबर, 1994 को आयोजित लालकिला रैली में भाग लेने दिल्ली आ रहे आंदोलनकारियों को मुजफ्फरनगर स्थित रामपुर तिराहे पर रोककर अमानवीय जुल्म, हत्या व महिलाओं के साथ दुष्कर्म किए गए थे। यह घटना भारतीय लोकतंत्र पर कलंक है, लेकिन आरोपी पुलिसवालों को सजा देने के बजाय उन्हें पदोन्नति देकर सम्मानित किया गया।
- See more at: http://naidunia.jagran.com/national-people-of-uttarakhand...

 

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