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Author Topic: Kuli Begar Movement 1921 - कुली बेगार आन्दोलन १९२१  (Read 8010 times)

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पंकज सिंह महर

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Kuli Begar Movement 1921 - कुली बेगार आन्दोलन १९२१
« on: May 07, 2009, 11:46:06 AM »
उत्तराखण्ड आन्दोलनों की धरती रही है, अनेकों समय पर कई आन्दोलन यहां होते रहे हैं। कुली बेगार आन्दोलन संभवतः उत्तराखण्ड का पहला व्यापक जनांदोलन था। यह आन्दोलन बागेश्वर के उत्तरायणी मेले के दौरान 14 जनवरी, 1921 में कुमाऊं केसरी बद्री दत्त पाण्डे की अगुवाई में हुआ था। इसका प्रभाव सम्पूर्ण उत्तराखण्ड में था, कुमाऊं मण्डल में इस कुप्रथा की कमान बद्री दत्त पाण्डे जी के हाथ में थी, वहीं गढ़वाल मण्डल में इसकी कमान अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के हाथों में थी। इस आन्दोलन के सफल होने और कुली बेगार कानून को सरकार के वापस लिये जाने के बाद बद्री दत्त पाण्डे जी को कुमाऊं केसरी और अनुसूया प्रसाद बहुगुणा जी को गढ़ केसरी का खिताब जनता द्वारा दिया गया था।
     इस टोपिक के अन्तर्गत हम इस आन्दोलन के बारे में जानकारियों का आदान-प्रदान करेंगे।
« Last Edit: August 15, 2009, 11:44:59 AM by हिमांशु पाठक »
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पंकज सिंह महर

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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #1 on: May 07, 2009, 12:16:34 PM »
सबसे पहले जानते हैं कि कुली बेगार प्रथा क्या थी?
 
आम आदमी से कुली का काम बिना पारिश्रमिक दिये कराने को कुली बेगार कहा जाता था, विभिन्न ग्रामों के पधानों का यह दायित्व होता था कि वह एक निश्चित अवधि के लिये, निश्चित संख्या में कुली शासक वर्ग को उपलब्ध करायेगा। इस कार्य हेतु पधान के पास बाकायदा एक रजिस्टर भी होता था, जिसमें सभी ग्राम वासियों के नाम अंकित होते थे और सभी को बारी-बारी यह काम करने के लिये बाध्य किया जाता था।
      यह तो घोषित बेगार था और इसके अतिरिक्त शासक वर्ग के भ्रमण के दौरान उनके खान-पान से लेकर हर ऎशो-आराम की सुविधायें भी आम आदमी को ही जुटानी पड़ती थी।

       असल में कुली बेगार जैसी कुप्रथा उत्तराखण्ड में राजवंशों के समय से ही किसी न किसी रुप में थी। इस बात का पहला विवरण एटकिंसन के गजेटियर में मिलता है, जो 1884-86 के बीच लिखा गया था, उसमें बताया गया है कि "यह यातायात के लिये हमेशा ही दुष्कर रहा है" यदि हम इतिहास में देखें तो सबसे पहले चन्द शासकों (1250-1790) ने राज्य में घोड़ो से संबंधित कानून बनाया था, संभवतः कुली बेगार का यह आरंभिक स्वरुप था। आगे चलकर इस प्रथा ने ही कुली बेगार प्रथा का व्यापक रुप ले लिया। अंग्रेजों ने इसे पुनः शुरु किया और इस प्रथा को भारत में अनिवार्य कर दिया था तथा इसे दमन के रुप में भी इस्तेमाल करने लगे।..............जारी
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हेम पन्त

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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #2 on: May 07, 2009, 12:43:15 PM »
कुली बेगार ब्रिटिश शासन काल की एक ऐसी सरकारी व्यवस्था थी जिसके अन्तर्गत गांवों के लोग सरकार की सेवा में मजदूरी करने को बाध्य थे - बिना मजदूरी के. 

किसी अंग्रेज अधिकारी के अपने इलाके में दौरे पर आने के समय गांव के प्रधान और पटवारी की जिम्मेदारी होती थी कि वह उस इलाके के गांवों से अवैतनिक मजदूरों की व्यवस्था करें. इस कार्य में जाति-पाति या धर्म के आधार पर कोई छूट नहीं थी. सम्मानित लोगों को भी अपना नम्बर आने पर अंग्रेजों के लिये बिना पैसे के काम करना पङता था. कभी-कभी तो लोगों को अत्यन्त घृणित काम करने के लिये भी मजबूर किया जाता था. जैसे कि अग्रेज की Toilet Seat (कमोङ) या गन्दे कपङे आदि ढोना.

इस प्रथा के प्रति धीरे-२ जनता के बीच असन्तोष बढता गया क्योंकि गांव के प्रधान व पटवारी अपने व्यक्तिगत हितों को साधने या बैर भाव निकालने के लिये इस कुरीति को बढावा देने लगे. पूरे उत्तराखण्ड (खासकर कुमांऊं क्षेत्र) के लोगों ने इस कुरीति के निवारण के लिये संगठित होना शुरु किया. और 14 जनवरी 1921 को बागेश्वर के सरयू-गोमती के संगम (बगङ) पर कुली बेगार के हजारों रजिस्टर प्रवाहित करके इस कुप्रथा को समूल नष्ट कर दिया. यह तत्कालीन ब्रिटिश सरका के मुंह पर एक करारा तमाचा था. इस आन्दोलन से महात्मा गांधी जी बहुत प्रभावित हुए उन्होंने कुछ साल बाद खुद बागेश्वर भ्रमण किया और इसे एक बहुत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक आन्दोलन बताया.
     

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पंकज सिंह महर

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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #3 on: May 07, 2009, 01:17:25 PM »
1873 के एक सरकारी दस्तावेज के अनुसार यह कानून वास्तव में उन मालगुजारों पर आरोपित किया ग्या था, जो भूस्वामी या जमींदार कर उघारते थे। लेकिन प्रथा उन काश्तकारों पर ही प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप से प्रभावित करती थी, जो जमीनों पर मालिकाना हक रखते थे, धरातल पर सच यह था कि यह भू स्वामी अपने हिस्से का कुली बेगार, भूमि विहीन कृषकों, मजदूरों और समाज के कमजोर तबकों से ले लेते थे। उन्होंने भी सशर्त पारिश्रमिक के रुप में इसे स्वीकार कर लिया। इस प्रकार से यह प्रथा चलती रही, 1857 के विद्रोह की चिंगरी कुमाऊं (तत्कालीन सम्पूर्ण उत्तराखण्ड, टिहरी रियासत (टिहरी, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी जनपद) को छोड़कर) में भी फैली। हल्द्वानी में सबसे पहले इस प्रथा के खिलाफ विद्रोह के स्वर उठे, लेकिन अंग्रेजों ने पहले ही दौर में उसको दबा दिया। 1913 में कुली बेगार यहां के निवासियों के लिये अनिवार्य कर दिया गया। इसका हर जगह पर विरोध किया गया, बद्री दत्त पाण्डे जी ने इस आंदोलन की अगुवाई की। अल्मोड़ा अखबार के माध्यम से उन्होंने इस कुरीति के खिलाफ जनजागरण के साथ-साथ विरोध भी प्रारम्भ कर दिया। 1920 में नागपुर में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन हुआ, जिसमें पं० गोविन्द बल्लभ पंत, बद्रीदत्त पाण्डे, हर गोबिन्द पन्त, विक्टर मोहन जोशी, श्याम लाल शाह आदि लोग सम्मिलित हुये और बद्री दत्त पाण्डे जी ने कुली बेगार आन्दोलन के लिये महात्मा गांधी से आशीर्वाद लिया और वापस आकर इस कुरीति के खिलाफ जनजागरण करने लगे।
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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #4 on: May 07, 2009, 01:37:21 PM »
14 जनवरी, 1921 को उत्तरायणी पर्व के अवसर पर कुली बेगार आन्दोलन की शुरुआत हुई, इस आन्दोलन में आम आदमी की सहभागिता रही, अलग-अलग गांवों से आये लोगों के हुजूम ने इसे एक विशाल प्रदर्शन में बदल दिया। सरयू और गोमती के संगम के पास के सरयू बगड़ के मैदान से इस आन्दोलन का उदघोष हुआ।  जिलाधिकारी ने जन नेताओं पर प्रतिबंध लगा दिया, पं० हरगोबिन्द पंत, लाला चिरंजीलाल और बद्री दत्त पाण्डे को नोटिस थमा दिया लेकिन इसका कोई असर उनपर नहीं हुआ, उपस्थित जनसमूह ने सबसे पहले बागनाथ जी के मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना की और फिर 40 हजार लोगों का जुलूस सरयू बगड़ की ओर चल पड़ा, जुलूस में सबसे आगे एक झंडा था, जिसमें लिखा था "कुली बेगार बन्द करो", इसके बाद सरयू मैदान में एक सभा हुई, इस सभा को सम्बोधित करते हुये बद्रीदत्त पाण्डे जी ने कहा "पवित्र सरयू का जल लेकर बागनाथ मंदिर को साक्षी मानकर प्रतिग्या करो कि आज से कुली उतार, कुली बेगार, बरदायिस नहीं देंगे।" सभी लोगों ने यह शपथ ली और गांवों के पधान अपने साथ कुली रजिस्टर लेकर आये थे, शंख ध्वनि और भारत माता की जय के नारों के बीच इन कुली रजिस्टरों को फाड़कर संगम में प्रवाहित कर दिया।
      अल्मोडा का तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर डायबल भीड़ में मौजूद था, उसने बद्री दत्त पाण्डे जी को बुलाकर कहा कि "तुमने दफा १४४ का उल्लंघन किया है, तुम यहां से तुरंत चले जाओ, नहीं तो तुम्हें हिरासत में ले लूंगा।" लेकिन बद्रीदत्त पाण्डे जी ने दृढ़ता से कहा कि "अब मेरी लाश ही यहां से जायेगी", यह सुनकर वह गुस्से में लाल हो गया, उसने भीड़ पर गोली चलानी चाही, लेकिन पुलिस बल कम होने के कारण वह इसे मूर्त रुप नहीं दे पाया।
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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #5 on: May 07, 2009, 01:57:14 PM »
इस सफल आंदोलन के बाद जनता ने बद्री दत्त पाण्डे जी को कुमाऊं केसरी की उपाधि दी, इस आन्दोलन का लोगों ने समर्थन ही नहीं किया बल्कि कड़ाई से पालन भी किया और इस प्रथा के विरोध में लोगों का प्रदर्शन जारी रहा। इसकी परिणिति यह हुई कि सरकार ने सदन में एक विधेयक लाकर इस प्रथा को समाप्त कर दिया।
       इस आंदोलन से महात्मा गांधी बहुत प्रभावित हुये और स्वयं बागेश्वर आये और चनौंदा में गांधी आश्रम की स्थापना की। इसके बाद गांधी जी ने यंग इंडिया में इस आन्दोलन के बारे में लिखा कि "इसका प्रभाव संपूर्ण था, यह एक रक्तहीन क्रान्ति थी।"
       सन 1921 में इस प्रथा की समाप्ति के बाद किसी पर मुकदमा नहीं चला, किन्तु देशभक्तों को अन्य अपराधों में फंसाकर, यथा- जंगलों में आग लगाना, लोगों को भड़काना आदि, के लिये सजा दी गयी। जिसमें केदार दत्त पन्त, हरिकृष्ण पाण्डे, मोतीराम तिवारी, मोतीराम वैष्णव, बद्रीदत्त वैष्णव, गंगा दत्त जोशी, बिशन दत्त जोशी, नाथ लाल शाह, प्रयाग पन्त, मोहन सिंन मेहता, लक्ष्मी दत्त शास्त्री आदि प्रमुख थे। कुली कलंक धुल जाने से पर्वतीय अंचल के लोगों में एक नई जागृति भी आई और लोग नई ऊर्जा से सराबोर होकर आजादी के आन्दोलन में कूद पड़े।
       इस आन्दोलन ने जहां एक ओर लोगों को आजादी के आन्दोलन से जोड़ा वहीं सरयू बगड़ को भी हमेशा के लिये एक आन्दोलनकारियों के बद्रीनाथ के रुप में स्थापित भी कर दिया। बाद के अनेक आन्दोलनों का भी सूत्रपात इसी जगह से होता रहा, 1974 का वन बचाओ आन्दोलन, 1984 का नशा नहीं रोजगार दो आन्दोलन और 1979 से शुरु हुये उत्तराखण्ड आन्दोलन का 1994 का निर्णायक आन्दोलनों में सरयू-गोमती के संगम से गंगाजल उठाकर ही सूत्रपात किया गया।
« Last Edit: May 08, 2009, 11:33:39 AM by पंकज सिंह महर »
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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #6 on: May 07, 2009, 02:05:14 PM »
कुमाऊं के कुली बेगार आन्दोलन पर  एक फिल्म बनी है "मधुलि" कुली बेगार न देने का आह्वान करता ये गीत, बहुत ही मर्मस्पर्शी बोल हैं इस गीत के, यह गीत लिखा है सुप्रसिद्ध कवि गौरी दत्त पाण्डे "गौर्दा" ने-

मुलुक कुमाऊं का सुणी लियो यारो, झन दिया -झन दिया कुली बेगार।
घर कुड़ी बांजी करी छोडी सब काज, हांकी ली जांछ सबै माल गुजार....।


http://www.youtube.com/watch?v=IFyDax1mE3Y

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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #7 on: May 07, 2009, 02:21:28 PM »
वर्ष 1921 उत्तरायणी के दिन हुई कुली बेगार उन्मूलन की इस ऐतिहासिक घटना के बाद आज भी बागेश्वर का सरयू बगङ जनचेतना का एक महत्वपूर्ण स्थान है. लगभग एक हफ़्ते तक चलने वाले मेले में बागेश्वर के सरयू बगङ पर मकर संक्रान्ति के दिन सामाजिक संगठन व राजनैतिक दल जनसभायें व जुलूस का आयोजन करके जनजागरण की अलख जगाते हैं. इस मायने में यह मेला एक अनूठा आयोजन है.
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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #8 on: May 07, 2009, 02:28:23 PM »
बागेश्वर का एतिहासिक बगङ जहां 1921 में एक जनाआन्दोलन के बाद कुली बेगार प्रथा का उन्मूलन हुआ.. यह फोटो 2009 के उत्तरायणी मेले के समय लिया गया है.

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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #9 on: May 07, 2009, 02:45:48 PM »
कुली बेगार प्रथा उन्मूलन की सालगिरह पर उत्तरायणी के दिन विभिन्न राजनैतिक दलों की सरयू बगङ, बागेश्वर में जनसभायें..



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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #10 on: May 07, 2009, 03:13:56 PM »
सुप्रसिद्ध कवि गौरी दत्त पाण्डे "गौर्दा" उत्तराखण्ड के उन जनकवियों में हैं, जिन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से आजादी की लड़ाई को स्वर दिये। 1921 में कुली बेगार आन्दोलन के दौरान उन्होंने अपनी सशक्त लेखनी से उकेरा, कुछ बानगियां-

प्रस्तुत कविता में कुली बेगार आन्दोलन के बाद उल्लास के साथ होली मनाने का वर्णन है।



कुल्ली भूत जलाय होली

आई आज बहार, होली खेलत हैं, कुल्ली भूत जलाय होली खेलत हैं।
सरयू तट संक्रान्ति के दिन बागेश्वर में आय, होरी खेलत हैं।
भीष्म प्रतिग्या करी बदरी ने, हर चिरंजी संग लाय होरी।
नेताऊ संग लागी परजा, दीनी कलंक मिटाय होरी।
इस बंधन काटन के हित ही, भई जनता इक राय होरी।
कियो कठिन प्रण गंगाजल ले, सहसों हाथ उठाय होरी।
नौकरशाही को मन दहलो, नेता लिये बुलाय होरी।
शांति भंग मिस हट जाने को, आग्या दी धमकाय होरी।
नहिं परवा नेता जन कीनी, जै गांधी कहलाय, होरी।
संभव अब नहिं कुली बनेंगे, चाहे सरबस जाय, होरी।
अबके होरी खेलेंगे हम, शंख स्वराज बजाय, होरी।
मगन मन गावै नाचै पांडे, हो गये कृष्ण सहाय, होरी॥
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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #11 on: May 07, 2009, 03:17:45 PM »
कुली बेगार उन्मूलन आन्दोलन के अग्रणी नेता बद्री दत्त पाण्डे जी को समर्पित है पिथौरागढ का जिला अस्पताल

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पंकज सिंह महर

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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #12 on: May 07, 2009, 03:24:32 PM »
प्रस्तुत कविता में भी कुली बेगार आन्दोलन के बाद बागनाथ भवान की स्तुति सहित धन्यवाद देने का वर्णन है।

जै जै बागनाथ

जै जै बागनाथ, तेरी जै जै गंग माई,
तेरा दरबार, गयो खोरा भार,
कुली को उतार, दियो कलंक बगाई,
नेता तीन आया, संग में रिआया।
देस गीत गाया, फिरी गांधी दुहाई,
सभा एक करी, सांकि गंगा धरी,
चाहे जुला मरी, कयो कुल्लि नि द्यूं भाई,
ढंग देखी न्यार, सैप भया खार,
नसि जावौ भ्यार, कयो नेतान बुलाई,
सभा में यो ठानी, जाण में छ हानी,
हुकुम नी मानी, सैप अमला खिस्याई,
एक मत धरी, लियो काम करी,
लागि नै के कारी, नि मिली कुली बारी,
बैठी रैला मारी, सैप अमला खिस्याई,
एक मत्त धरी, लियो काम करी,
दुःख होला बरी, तुम स्वराज्य कैं पाईं,
गांधी छ औतार, बोलो जै जैकार,
करी यो बिचार, बण गांधी को सिपाई,
उतरैणी फाम शेर बद्री नाम,
भूलूंगा क्या काम, सन एकैसकी भाई॥
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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #13 on: May 07, 2009, 03:38:31 PM »
वो अंग्रेजों की दासता का वक्त था। पूरे देश पर अंग्रेजों का राज था। देश के उत्तर में जहां हिमालय दूर-दूर तक फैला है, अंग्रेज अपनी मनमानी कर रहे थे। तत्कालीन यूनाइटेड प्रोविंस का सबसे उत्तरी छोर, जो अब उत्तराखंड कहलाता है, कुली बेगार से तड़फ रहा था।   अंग्रेज अधिकारी अपने निजी काम कराने के लिए स्थानीय लोगों का उपयोग करते थे। माल को इधर-उधर पहुंचाने के लिए जानवरों की जगह इंसानों का प्रयोग। कुली की तरह इंसानों का उपयोग। अंग्रेज अधिकारी जिस किसी से चाहे कुली बेगार करवा सकता था। और जो मना करता, उसे भारी जुर्माने के साथ-साथ जेल की सजा हो जाती।

इस दमनकारी नीति के खिलाफ १९१९ में पूरे उत्तराखंड क्षेत्र में जन-आंदोलन चला। तत्कालीन ब्रिटिश गढ़वाल (अब पौढ़ी, चमोली, रुद्रप्रयाग) में इस आंदोलन की बागडोर गढ़केसरी अनुसूया प्रसाद बहुगुणा के हाथ में थी। १९१९-२० में जब कुली बेगार प्रथा के खिलाफ पूरे उत्तराखंड में आंदोलन चला तो ब्रिटिश गढ़वाल में इसकी बागडोर अनुसूया प्रसाद ने संभाल ली। गांव-गांव घूमकर लोगों को कुली बेगार के खिलाफ खड़ा किया।

अनुसूया प्रसाद की कोशिशों का नतीजा निकला, १९२१ में। अंग्रेज़ कमिश्नर रैमजे जब चमोली के दशजूला पट्टी पहुंचा, तो उसका खाना बनाने, सामान उठाने और दूसरे कामों के लिए कोई भी बेगार करने को तैयार नहीं हुआ। हार कर रैमजे ने अनुसूया प्रसाद को बातचीत के लिए बुलाया। लेकिन अनुसूया प्रसाद कुली बेगार खत्म किए बगैर बातचीत के लिए तैयार नहीं हुए। अनुसूया प्रसाद के इस साहसिक कदम के बाद जनता ने उन्हें गढकेसरी कहना शुरू कर दिया।
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Re: कुली बेगार आन्दोलन-१९२१:Kuli begar movement 1921
« Reply #14 on: May 07, 2009, 03:59:30 PM »
अँग्रेजों ने कुली उतार एवं कुली बेगार जैसी अमानवीय प्रथायें पहड़वासियों पर लादी थी । एक समय था जब पहाड़ में अँग्रेजों को अपना सामान लादने के लिए कुली मिलना कठिन था । इस प्रथा के अन्तर्गत प्रत्येक गाँव में बोझा ढोने के लिए कुलियों के रजिस्टर बनाये गये थे । अँग्रेज साहब के आने पर ग्राम प्रधान या पटवारी 'घात' आवाज लगाता । जिसके नाम की आवाज़ पड़ती उसे अपना सारा काम छोड़कर जाना अनिवार्यता थी । बच्चे, बूढ़े, बीमार होने का भी प्रश्न न था । सन् १८५७ में कमिश्नर हैनरी रैमजे ने ४० कैदियों से क्षमादान की शर्त पर कुलियों का काम लिया था । लेकिन ज्यों-ज्यों अँग्रेज बढ़ते गये समस्या विकट होती गयी । तब ज़ोर ज़बरदस्ती से मैनुअल आॅफ़ गवर्नमेंट आडर्स में कुली प्रथा को निर्धारित किया गया । लेकिन भूमिहीन और कर्मचारियों को कुली नहीं माना गया । कुली का कार्य वह करता था जिसके पास जमीन होती । इस तरह कुमाऊँ का प्रत्येक भूमिपति अँग्रेजों की न में कुली था । यही नहीं कुली का काम करने वाले व्यक्ति को साहब के शिविरों में खाद्य पदार्थ इत्यादि भी ले जाने पड़ते । यह भार 'बर्दायश' कहलाता ।

सन् १९२९ में कुमाऊँ केसरी बद्रीदत्त पाण्डे के नेतृत्व में इसी सरयू बगड़ में कुली बेगार के रजिस्टरों को डुबोया गया । तब से लेकर आज तक राजनैतिक दल इस पर्व का उपयोग अपनी आवाज बुलन्द करने में करते हैं ।


साभार-http://tdil.mit.gov.in
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