Author Topic: Maiti Movement, 1994 - मैती आन्दोलन, १९९४  (Read 27586 times)

पंकज सिंह महर

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साथियो,
      आप लोग मैती आन्दोलन से परिचित होंगे ही, आइये आज इसी सामाजिक आन्दोलन पर चर्चा करते हैं।

पंकज सिंह महर

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उत्तराखण्ड में मैत का अर्थ होता है मायका, और मैती का अर्थ होता है, मायके वाले। इस आन्दोलन में पहाड़ की नारी का उसके जल, जंगल और जमीन से जुड़ाव को दर्शाया गया। क्योंकि एक अविवाहित लड़की के लिये उसके गांव के पेड़ भी मैती ही होते हैं, इसलिये जिस भी लड़की की शादी हो रही हो, वह फेरे लेने के बाद वैदिक मंत्रोच्चार के बीच एक पेड़ लगाकर उसे भी अपना मैती बनाती है।
       इस भावनात्मक पर्यावरणीय आन्दोलन की शुरुआत 1994  में राजकीय इण्टर कालेज, ग्वालदम, जिला-चमोली के जीव विग्यान के प्रवक्ता श्री कल्याण सिंह रावत जी द्वारा की गई। जो अभी भी निरन्तर चल रहा है, आज इस कार्यक्रम ने अपना फैलाव पूरे उत्तराखण्ड सहित देश के कई अन्य राज्यों तक कर लिया है।


अगली पोस्टों में कुछ समाचार दिये जा रहे हैं, जिससे आप मैती की व्यापकता को और करीब से जान पायेंगे।

पंकज सिंह महर

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मैती : रस्म नहीं, आंदोलन भी


आज के दौर में 'ग्लोबल वार्मिंग' एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है और इस गंभीर समस्या के भावी खतरों से पूरा विश्व खौफजदा हो चला है। ऐसे में उत्ताराखण्ड के चमोली जनपद में चल रहा आंदोलन एक बड़ी मिसाल कायम करता है। मैती जैसे पर्यावरणीय आंदोलन कुछ लोगों के लिए सिर्फ रस्मभर हैं जबकि इस आंदोलन की पृष्ठभूमि में जाएं तो पता चलता है कि यह एक ऐसा भावनात्मक पर्यावरणीय आंदोलन है जिसे व्यापक प्रचार मिले तो पर्यावरण प्रदूषित ही ना हो। मैती यानि शादी के अवसर पर वैदिक मंत्रेच्चार के बीच दूल्हा-दुल्हन द्वारा फलदार पौधों का रोपण। पर्यावरण के रक्षार्थ इस तरह के भावनात्मक आंदोलन की शुरुआत हुई आज से करीब एक दशक पूर्व। चमोली जनपद के राजकीय इंटर कालेज ग्वालदम के जीव विज्ञान के प्राधयापक कल्याण सिंह रावत द्वारा मैती आंदोलन की शुरुआत हुई जो धीरे-धीरे परम्परा का रूप धारण करती जा रही है। यह आंदोलन आज गढ़वाल में जन-जन तक पहुंच चुका है। मैती का अर्थ होता है 'मायका' यानि जहां लड़की जन्म से लेकर शादी होने तक अपने माता-पिता के साथ रहती है। और जब उसकी शादी होती है तो वह ससुराल जाती है लेकिन अपनी यादों के पीछे वह गांव में बिताए गए पलों के साथ ही शादी के मौके पर रोपित वृक्ष से जुड़ी यादों को भी साथ लेकर जाती है। इसी भावनात्मक आंदोलन के साथ शुरू हुआ पर्यावरण संरक्षण का यह अभियान दिनों-दिन आगे बढ़ता जा रहा है। मैती आंदोलन के साथ लोगों को जोड़ने का जो काम कल्याण सिंह रावत ने किया अब वह परम्परा का रूप ले चुका है। अब जब भी गढ़वाल के किसी गांव में किसी लड़की की शादी होती है कम से कम चमोली जनपद में तो विदाई के समय मैती बहनों द्वारा दूल्हा-दुल्हन को गांव के एक निश्चित स्थान पर ले जाकर फलदार पौधा दिया जाता है। वैदिक मंत्रें द्वारा दूल्हा इस पौधो को रोपित करता है तथा दुल्हन इसे पानी से सींचती है, फिर ब्राह्मण द्वारा इस नव दम्पत्ति को आशीर्वाद दिया जाता है। दूल्हा अपनी इच्छा अनुसार मैती बहनों को पैसे भी देता है। आज जनपद के कई गांवों में मैती संगठन मौजूद हैं। यह गांव की बहनों का संगठन है। गांव की सबसे मुखर व जागरूक लड़की मैती संगठन की अधयक्ष बनती है। जिसे 'दीदी' के नाम से जाना जाता है। मैती संगठन के बाकी सदस्यों को मैती बहन के नाम से फकारा जाता है। शादी की रस्म के बाद दूल्हा-दुल्हन द्वारा रोपे गए पौधों की रक्षा यही मैती बहनें करती हैं। इस पौधों  को वह खाद, पानी देती हैं, जानवरों से बचाती हैं। मैती बहनों को जो पैसा दूल्हों के द्वारा इच्छानुसार मिलता है, उसे रखने के लिए मैती बहनों द्वारा संयुक्त रूप से खाता खुलवाया जाता है। उसमें यह राशि जमा होती है। खाते में अधिाक धानराशि जमा होने पर इसे गरीब बच्चों की पढ़ाई पर भी खर्च किया जाता है। मैती के पीछे श्री रावत जी की यह सोच थी कि सालभर में कई शादियां गांवों में होती हैं। प्रत्येक शादी में अगर एक पेड़ लगे तो एक बड़ा जंगल बन जाएगा, जंगल से फल व ईंधान प्राप्त होगा, घास पैदा होगी, जो गांव के लोगों के बीच नि:शुल्क बांटी जाएगी। साथ ही शुध्द वायु भी लोगों को मिलेगी। पर्यावरण सुंदर होगा। अगर यहां के संदर्भ में देखें तो यहां की अर्थव्यवस्था जल, जंगल, जमीन से जुड़ी हुई है। लेकिन आज प्राकृतिक संपदा खतरे में है। ऐसे में मैती आन्दोलन वैश्विक होते हुए पर्यावरणीय समस्या का एक कारगर उपाय हो सकता है। बशर्ते इसके लाभों को व्यापक रूप से देखा जाए। आज सरकार पर्यावरण संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपया खर्च कर रही है, लेकिन समस्या दूर होने के बजाए बढ़ती जा रही है। ऐसे में पर्यावरण को बचाने के लिए मैती को एक सफल कोशिश कहा जा सकता है।

साभार- http://www.bhartiyapaksha.com/mag-issues/2008/January08/Maite%20Rasm%20nahi.html

पंकज सिंह महर

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मैती आन्दोलन की धूम कनाडा तक भी

“पैसे दे दो, जूते ले लो ” लोक में इस गीत के बोल चाहे जिस तरह के भी हों, विवाह के अवसर पर जूते चुराकर नेग लेने की परंपरा बहुत पुरानी है. लेकिन उत्तराखंड की लड़कियों ने शादी के लिए आए दूल्हों के जूते चुरा कर उनसे नेग लेने के रिवाज को तिलांजलि दे दी है. वे अब दूल्हों के जूते नहीं चुराती बल्कि उनसे अपने मैत यानी मायके में पौधे लगवाती हैं. इस नई रस्म ने वन संरक्षण के साथ साथ सामाजिक समरसता और एकता की एक ऐसी परंपरा को गति दे दी है, जिसकी चर्चा देश भर में हो रही है.
       अब यह आंदोलन उत्तराखंड सहित देश के आठ राज्यों में भी अपने जड़ें जमा चुका है. चार राज्यों में तो वहां की पाठ्य पुस्तकों में भी इस आंदोलन की गाथा को स्थान दिया गया है. कनाडा में मैती आंदोलन की खबर पढ़ कर वहां की पूर्व प्रधानमंत्री फ्लोरा डोनाल्ड आंदोलन के प्रवर्तक कल्याण सिंह रावत से मिलने गोचर आ गईं.
 
       वे मैती परंपरा से इतना प्रभावित हुई कि उन्होंने इसका कनाडा में प्रचार-प्रसार शुरु कर दिया. अब वहां भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं. मैती परंपरा से प्रभावित होकर कनाडा सहित अमेरिका, ऑस्ट्रिया, नार्वे, चीन, थाईलैंड और नेपाल में भी विवाह के मौके पर पेड़ लगाए जाने लगे हैं.

      मैती आंदोलन की भावनाओं से अभिभूत होकर अब लोग जहां पेड़ लगा रहे हैं वहीं उनके व्यवहार भी बदल रहे हैं. पर्यावरण के प्रति उनके सोच में भी परिवर्तन आ रहा है. यही वजह है कि अब लोग अपने आसपास के जंगलों को बचाने और इनके संवर्धन में भी सहयोग करने लगे हैं. इस आंदोलन के चलते पहाड़ों पर काफी हरियाली दिखने लगी है और सरकारी स्तर पर होने वाले वृक्षारोपण की भी असलियत उजागर हुई है. गांव-गांव में मीत जंगलों की श्रृंखलाएं सजने लगी हैं.

      पर्यावरण संरक्षण के लगातार बढ़ते इस अभियान को अपनी परिकल्पना और संकल्प से जन्म देने वाले कल्याण सिंह रावत ने कभी सोचा भी नहीं था कि उनके प्रेरणा से उत्तराखंड के एक गांव से शुरु हुआ यह अभियान एक विराट और स्वयं स्फूर्त आंदोलन में बदल जाएगा.

मैती की धुन

       अब तो इसकी व्यापकता इतनी बढ़ गई है कि इसके लिए किसी पर्चे-पोस्टर और बैठक-सभा करने की जरूरत नहीं होती है. मायके में रहने वाली मैती बहनें शादियों के दौरान दूल्हों से पौधे लगवाने की रस्म को खुद-ब-खुद अंजाम देती हैं.
 
विवाह के समय ही पेड़ लगाने की इस रस्म के स्वयं स्फूर्त तरीके से फैलने की एक बारात में आए लोग भी होते हैं जो अपने गांव लौटकर इस आंदोलन की चर्चा करने और अपने यहां इसे लागू करने से नहीं चूकते. शादी कराने वाले पंडित भी इस आंदोलन का मुफ्त में प्रचार करते रहते हैं. अब तो शादी के समय छपने वाले निमंत्रण पत्रों में भी मैती कार्यक्रम का जिक्र किया जाता है. आज की तारीख में आठ हजार गावों में यह आंदोलन फैल गया है और इसके तहत लगाए गए पेड़ों की संख्या करोड़ से भी उपर पहुँच गई है. करीब डेढ़ दशक पहले चामोली के ग्वालदम से फैला यह आंदोलन कुमाऊं में घर-घर होते हुए अब गढ़वाल के हर घर में भी दस्तक देने लगा है. शुरुआती दौर में पर्यावरण संरक्षण के वास्ते चलाए गए इस अभियान में महिलाओं और बेटियों ने इसमें सर्वाधिक भागीदारी निभाई.

मैती का अर्थ होता है लड़की का मायका. गांव की हर अविवाहित लड़की इस संगठन से जुड़ती हैं. इसमें स्कूल जाने वाली लड़कियों के साथ, घर में रहने वाली लड़कियां भी शामिल होती हैं. इस संगठन को लड़कियों के घर परिवार के साथ गांव की महिला मंगल दल का भी समर्थन-सहयोग प्राप्त होती है. बड़ी-बूढ़ी महिलाएं भी मैती की गतिविधियों में शामिल होने से नहीं चूकती.

मैती वाली दीदी

मैती संगठन की कार्यविधि बिल्कुल साफ औऱ कदम सरल है. संगठन को मजबूत और रचनात्मक बनाने के लिए सभी लड़कियां अपने बीच की सबसे बड़ी और योग्य लड़की को अपना अध्यक्ष चुनती है, अध्यक्ष पद को बड़ी दीदी का नाम दिया गया है. बड़ी दीदी का सम्मान उनके गांव में उतना ही होता है जितना एक बड़े परिवार में सबसे बड़ी बेटी का होता है.

गांव के मैती संगठन की देखरेख और इसको आगे बढ़ाने का नेतृत्व चुनी गई बड़ी दीदी ही करती है. बाकी सभी लड़कियां इस संगठन की सदस्य होती है. जब बड़ी दीदी की शादी हो जाती है तो किसी दूसरी योग्य लड़की को बहुत सहजता के साथ संगठन की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है और यह क्रम लगातार चलता रहता है.

गांव की हरेक लड़की मायके में अपने घर के आसपास किसी सुरक्षित जगह पर अपने प्रयास से किसी वृक्ष की एक पौध तैयार करती है. यह पौध जलवायु के अनुकूल किसी भी प्रजाति की हो सकती है. कुछ लड़कियां जमीन पर पॉलिथीन की थैली पर केवल एक पौधा तैयार करती है. गांव में जितनी लड़कियां होती हैं, उतने ही पौधे तैयार किये जाते हैं.
 
हरेक लड़की अपने पौध को देवता मान कर या अपने जीवन साथी को शादी के समय़ देने वाला एक उपहार मान कर बड़ी सहजता, तत्परता और सुरक्षा से पालती-पोसती रहती है. इस तरह अगर गांव में सौ लड़कियां है तो सौ पौध तैयार हो रहे होते हैं. किसी भी गांव की लड़की की शादी तय हो जाने पर बड़ी दीदी के मां-बाप से बातचीत करके उनके घर के ही आंगन में या खेत आदि में शादी के समय अपने दूल्हे के साथ पौधारोपण कर देती हैं. शादी के दिन अन्य औपचारिकताएं पूरी हो जाने पर बड़ी दीदी के नेतृत्व में गांव की सभी लड़कियां मिल कर दूल्हा-दुल्हन को पौधारोपण वाले स्थान पर ले जाती हैं. दुल्हन द्वारा तैयार पौधे को मैती बहनें दुल्हे को यह कह कर सौंपती हैं कि यह पौधा वह निशानी है या सौगात है जिसे दुल्हन ने बड़े प्रेम से तैयार किया है.

मैती कोष भी

दूल्हा मैती बहनों के नेतृत्व में पौधा रोपता है और दुल्हन उसमें पानी देती है. मंत्रोच्चार के बीच रोपित पौधा दूल्हा दुल्हन के विवाह की मधुर स्मृति के साथ एक धरोहर में तब्दील हो जाता है. पौधा रोपने के बाद बड़ी दीदी दूल्हे से कुछ पुरस्कार मांगती है. दूल्हा अपनी हैसियत के अनुसार कुछ पैसे देता है, जो मैती संगठन के कोष में जाता है. मैती बहनों दूल्हों से प्राप्त पैसों को बैंक य़ा पोस्ट ऑफिस में या गांव की ही किसी बहू के पास जमा करती रहती हैं.

इन पैसों का सदुपयोग गांव की गरीब बहनों की मदद के लिए किया जाता है. गरीब बहनों के विवाह के अलावा इन पैसों से उन बहनों के लिए चप्पल खरीदी जाती है, जो नंगे पांव जंगल में आती-जाती हैं या इन पैसों से गरीब बच्चियों के लिए किताब या बैग आदि खरीदे जाते हैं. हरेक गांव में मैती बहनों को साल भर में होने वाली दस पंद्रह शादियों से करीब तीन चार हजार से अधिक पैसे जमा हो जाते हैं. ये पैसे मैती बहनें अपने गांव में पर्यावरण संवर्धन के कार्यक्रमों पर भी खर्च करती है.

प्रसून लतांत
उत्तराखंड के इलाकों से


साभार- http://raviwar.com/news/58_maiti-uttarakhand-prasunlatant.shtml

पंकज सिंह महर

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प्रेम का पेड़

मैती आंदोलन अब केवल विवाह के मौके पर दूल्हा-दुल्हन से वृक्ष लगाने तक सीमित नहीं रह गया है. इस आंदोलन के प्रणेता कल्याण सिंह रावत ने इस भावनात्मक आंदोलन को बहुमुखी बनाने में भी कामयाबी पाई है. अपने अनेक अभिनव प्रयोगों और गरीबों, विकलांगो, महिलाओं और छात्रों के बीच सामाजिक कार्यों के कारण मैती संगठन की पहचान सभी वर्गों के बीच बन गई है. इस संगठन ने वैलेंटाइन डे जैसे आयातित मैके को भी गुलाब फूल लेने-देने के प्रचलन से बाहर निकाल कर `एक युगल एक पेड़’ के कार्यक्रम से जोड़ दिया है. अब उत्तराखंड़ के गांव-गांव में वेलेंटाइन डे पर भी प्रेमी जोड़े अपने प्रेम की याद में पेड़ लगाते हैं. 
      मैती बहनों ने एक और भावनात्मक कार्यक्रम को अंजाम दिया. जब टॉस वन प्रभाग उत्तरकाशी में स्थित एशिया का सबसे बड़ा देवदार वृक्ष गिर गया तो उसकी याद में मैती बहनों ने इस पेड़ के महाप्रयाण पर एक भव्य औऱ शिक्षाप्रद क्रार्यक्रम का आयोजन किया. इस मौके पर जहां हजारों लोगों की मौजूदगी में महाप्रयाण किए देवदार वृक्ष को भावभीनी विदाई दी गई, वहीं उसकी जगह इसी जाति का एक नया पेड़ भी लगाया गया.
मैती बहनों ने पर्यावरण संरक्षण और वन्यप्राणियों की रक्षा के लिए कई नए मेलों का भी शुभारंभ किया जो आज भी हर वर्ष अपने समय पर आयोजित होते आ रहे हैं.

       मैती बहनों ने पूरे उत्तराखंड में पर्यावरण संरक्षण के लिए वृक्षारोपण के अलावा वन्यजीवों की रक्षा के साथ अंधविश्वास के खिलाफ न सिर्फ चेतना जगाई बल्कि लंबा संघर्ष भी किया. चौरींखाल पौड़ी गढ़वाल में बूंखाल मेरे के दौरान पशुवध के खिलाफ संघर्ष किया. संघर्ष का परिणाम यह हुआ है कि जहां हर वर्ष इस मेले में चार सौ भैंसों की बलि दी जाती थी, वहीं उनकी संख्या अब चालीस से भी कम हो गई है. इसी तरह विनसर और सरनौल क्षेत्रों में भी वन्य प्राणियों की रक्षा के अभियान चलाए गए. सरनौल में सौ से अधिक वन्यप्राणियों की रक्षा की गई. मैती संगठन ने पूरे उत्तराखंड में वन्य़प्राणियों के प्रति प्रेम पैदा करने के लिए आठ सौ किलोमीटर की महायात्रा का आयोजन किया और वन्य प्राणियों की रक्षा के लिए लोगों को जागरुक किया.

मैती बहनों ने रूद्रनाथ बुग्याल में जड़ी-बूटी दोहन के खिलाफ भी संघर्ष किया. चामोली गांवल में पाटला गांव को गोद लेकर उसे पूरी साक्षर बनाने में कामयाबी पाई. बांधों के कारण डूब गए टिहरी शहर की स्मृति को सुरक्षित रखने के लिए डूबते समय तैंतीस ऐतिहासिक स्थलों की मिट्टी को लाकर स्वामी रामतीर्थ कॉलेज के हाल में उसे अलग-अलग गढ़ों में स्थापित किया गया और उस पर वृक्ष लगाए गए.

इसी तरह मैती बहनों ने राज्य सरकार की मदद से पंद्रह दिसंबर 2006 में सौ साल पूरा करने वाले एफआरआई देहरादून का शताब्दी समारोह मनाया. इस समारोह में राज्य भर के बारह लाख बच्चों के हस्ताक्षर युक्त दो किलोमीटर लंबे कपड़े से एफआरआई भवन को लपेटा गया. तत्कालीन राज्यपाल सुदर्शन अग्रवाल ने मुख्य अतिथि के रूप में कपड़े की गांठ बांधी और दो ऐतिहासिक वृक्षों का जलाभिषेक किया.

मैती बहनों ने पर्यावरण संरक्षण और वन्यप्राणियों की रक्षा के लिए कई नए मेलों का भी शुभारंभ किया जो आज भी हर वर्ष अपने समय पर आयोजित होते आ रहे हैं. ग्रामीणों के बीच स्वास्थ्य चेतना अभियान युवाओं के लिए खेलकूद और बेसहारों को सहारा देने के लिए भी अनेक कर्यक्रम संचालित होते रहे हैं.

प्रसून लतांत
उत्तराखंड के इलाकों से

साभार- http://www.raviwar.com/news/57_premkaped-maiti-prasunlatant.shtml

पंकज सिंह महर

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मैती आंदोलन के प्रवर्तक कल्याण सिंह रावत से बातचीत  


मैती आंदोलन के इस तरह व्यापक होने की उम्मीद पहले से थी ?

इस आंदोलन की जो अवधारणा थी और जो ताना-बाना बुना गया था, उससे ही यह उम्मीद की गई थी कि लोग जरूर इस आंदोलन को अपनाएंगे और इसमें अपनी भावनात्मक दिल्चस्पी दिखाएंगे. उत्तराखंड के कुमाऊं औऱ गढ़वाल में, जहां भी लोगों ने इसके बारे में सुना, वहां यह आंदोलन अपने आप फैलता चला गया.

आंदोलन को बहुआयामी बनाने के लिए और क्या-क्या प्रयोग किए गए ?

लोग भावनात्मक रूप से वृक्षारोपण से जुडेंगे तो पेड़ लगाने के बाद उसके चारों ओर दीवार या बाड़ लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. लोग खुद ही उसकी सुरक्षा करेंगे.
 
इस आंदोलन को केवल वृक्षारोपण तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि हमारी राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय घटनाएं हैं, इनमें कुछ अहम तिथियां हैं, उनसे जोड़कर इस आंदोलन को भावनात्मक रूप देने का प्रयास किया गया ताकि उन चीजों के प्रति भी लोगों की भावनाएं जाग सकें. जैसे कि कोई राष्ट्रीय धरोहर है, राष्ट्रीय पर्व है. इसके अलावा कुछ वैसी चीजों जो हमारे यहां दूसरे देशों से आई हैं, उनको भी अपनी राष्ट्रीयता के ताने बाने में बुनकर पेश करने की कोशिश की गई. वैलेंटाइन डे मनाने का प्रचलन दूसरे देशों से अपने यहां आया, जिसका काफी विरोध हुआ, पर इसके बावजूद युवा पीढी उसकी ओर काफी आकर्षित हुई. यहां तक कि इसकी हवा हिमालय के गावों तक पहुँच गई. मैती आंदोलन ने इसका विरोध नहीं किया बल्कि इसे एक नया रूप देने की कोशिश की गई. हम लोगों ने युवाओं से आग्रह किया कि इस मौके पर फूल नहीं देकर एक पेड़ लगाइए. पेड़ को ही कहीं जाकर प्रेम से झुक कर लगाइए. फिर देखिए अगले पांच सालों में वह पेड़ इतना ऊंचा हो जाएगा कि आपको उसे सिर उठा कर देखने के लिए विवश होना पड़ेगा.


मैती संगठन को एक एनजीओ का रूप क्यों नहीं दिया गया ?

पहले मैं भी इस मुद्दे पर पूरी तरह स्पष्ट नहीं था. अगर मैती आंदोलन को एनजीओ का रूप देगें तो हो सकता है कि इसका आज के जैसा आकर्षण खत्म हो जाएगा. देश में कई एनजीओ हैं अपवाद के रूप में, जो केवल कागजों पर चल रहे हैं. काम नहीं करते हैं और सभी सरकारी, गैर सरकारी फंड लूट कर ले जाते हैं. इस कारण लोगों की नजर में एनजीओ का सकारात्मक रूप नहीं रह गया है.

इसलिए हमने कहा कि मैती को एक स्वयंस्फूर्त आंदोलन ही रहने दिया जाए ताकि लोग इससे भावनात्मक रूप से जुड़ सकें. इस आंदोलन में जहां पैसे को जोड़ेंगे, वहीं इसकी आत्मा मर जाएगी. इसलिए हर गांव में मैती की बहनें शादी के समय दूल्हों और बारातियों से जो पैसे मिलते हैं, उसे आपस में ही अपने पास में जमा करते हैं और इसी से संगठन का काम चलाती हैं. छोटी-छोटी इकाई और छोटे-छोटे संसाधन. मैती की बहनों को बड़े पैमाने पर संसाधन जुटाने की जरूरत ही नहीं होती.


मैती आंदोलन का जन्म कैसे हुआ और इसकी प्रेरणा आपको कैसे मिली ?

इस आंदोलन के जन्म की कहानी तो वास्तव में प्रकृति प्रेरणा से शुरु हुई है. मैं खुद प्रकृति प्रेमी हूं. मेरे पिता भी वन विभाग में रहे. दादा भी उसमें ही रहे. मेरा बचपन भी जंगलों के बीच बीता. जब मैं गोपेश्वर में पढ़ने गया तो वहां जंगल को बचाने के लिए चिपको आंदोलन शुरु हुआ. उसमें मैंने छात्र होते हुए भी सक्रिय भागीदारी निभाई.

गांधावादी संगठनों के संपर्क में रहा और मैं छात्र भी वनस्पति विज्ञान का रहा. प्रकृति के करीब रहने में मेरी दिलचस्पी रही. पूरे हिमालय का दौरा किया गढ़वाल-कुमाऊं का चप्पा चप्पा घूम गया हूं. इन यात्राओं के दौरान गावों में वहां के जन-जीवन को महिलाओं की परिस्थितियों को समझने का मौका मिला.

मैंने देखा कि सरकारी वृक्षारोपण अभियान विफल हो रहे थे. एक ही जगह पर पांच पांच बार पेड़ लगाए जाते पर उसका नतीजा शून्य होता. इतनी बार पेड़ लगाने के बावजूद पेड़ दिखाई नहीं पड़ रहे थे. इन हालात को देखते हुए मन में यह बात आई कि जब तक हम लोगों को भावनात्मक रूप से सक्रिय नहीं करेंगे, तब तक वृक्षारोपण जैसे कार्यक्रम सफल नहीं हो सकते.

लोग भावनात्मक रूप से वृक्षारोपण से जुडेंगे तो पेड़ लगाने के बाद उसके चारों ओर दीवार या बाड़ लगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी. लोग खुद ही उसकी सुरक्षा करेंगे. शुरु में अंधविश्वासों के कारण मुझे कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ा पर हमारी सही नीयत ने कमाल कर दिखाया. मैती बहनें तो सक्रिय हैं ही, गांव के आम लोग भी मैती से जुड़ते चले गए हैं.


प्रसून लतांत
उत्तराखंड के इलाकों से


साभार- http://www.raviwar.com/news/56_kalyansinghravat-maiti-prasunlatant.shtml

पंकज सिंह महर

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Green vows and wedding vows 



The unique Maiti ritual in the Kumaon hills has made a startling difference to the forest cover in the state of Uttaranchal.

A wedding ceremony is in progress in a village in the Kumaon hills. The priest is chanting shlokas and mantras while the groom plants a sapling and his bride waters it. The plant will be taken care of by the parents and friends of the bride once she leaves for her groom's house. It will always be a reminder of her.

This is the 'Maiti ritual' which is an integral part of wedding ceremonies in the Kumaon. Maiti in Uttaranchal literally means 'mother's home'. The ritual was first conceived by Kalyan Singh Rawat, a zoology teacher at a government school. Women in the region had been affected the most by deforestation: they had to walk for miles in search of grass, wood and drinking water. Rawat realised that forests could best be conserved if women participated actively: after all, they would be the ones to benefit from regenerated forests. He formed the Maiti Organisation in 1996 and the Maiti ritual was first introduced in a small town called Gwaldam. In each village or town there is a Maiti group comprising unmarried girls. The eldest among them is called Maiti didi. The Maiti group nurtures a nursery from which one sapling is given to the groom to plant during the wedding ceremony. The money that the groom customarily gives to all the unmarried girls is collected and used to fund the education of poor girls or to help in the marriage expenses of an underprivileged girl.

The success of this women-centric movement has been spectacular. Within four years it has spread to 500 villages. The state government of Uttaranchal has passed an order to formulate all-women forest panchayats to involve an increasing number of women in the management and protection of forests. After the Kargil war, women in Ochati village developed a Maiti forest dedicated to soldiers. Recently, 300 trees have been planted in villages in Bageshwar district. Students from Garhwal University have planted saplings in Nainital, Srinagar and Garhwal to promote the Maiti movement. The result of this in terms of improved forest cover in the state is startling. The new state has 67.07 per cent forest area in contrast to UP which has a mere 17.54 per cent. This is a quantum leap as in 1950 Uttaranchal had 58 per cent forest cover which had dwindled to 36 per cent in 1980.

All this has been achieved with relatively little financial investment. The government has been spending lakhs of rupees every year on afforestation programmes involving plantation of eucalyptus and pine. These trees grow fast and locals make a quick profit by selling them to industries. However, the success of the government afforestation programmes is low as these exotic plants drain groundwater and make the soil infertile. In contrast the trees planted in the Maiti ritual are indigenous. They supply firewood and fodder to the locals. And though the locals do not make a quick profit from these trees, it is more sustainable in the long term. The indigenous species improve soil fertility and are eco-friendly.

Contact: Chhaya Kunwar
Co-ordinator, Women's Wing
Himalayan Action Research Centre
744, Indira Nagar, P.O. New Forest
Dehradun- 248006
Uttarakhand, India

email- harcddn@nde.vsnl.net.in

पंकज सिंह महर

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कुछ चित्र

पंकज सिंह महर

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Planting a sapling while you tie a knot, sounds interesting doesn’t it? Well, this is what many newly-weds in Uttaranchal have been doing! Maiti Van is a campaign launched by WWF-India in the state of Uttaranchal under the Terai Arc Landscape (TAL) Programme. Started in February 2006, this innovative programme encourages marrying couples to plant saplings during their marriage ceremony.

Maiti van is a forest village that belongs to the bride’s parental home. Whenever there is a marriage in any of the TAL’s target villages, two saplings, one of fruit and the other of fodder species, are given by WWF-India, as a gift to the bride’s family. The bride and bridegroom plant the saplings on their wedding day.

This activity has helped encourage plantation on private land in target villages. At present the programme is implemented in only four villages such as Chukum, Choti Haldwani, Kunkhet and Mohan but is gaining popularity now and will be extended to other villages soon. As a part of the campaign around 50 saplings have been planted

In India, religion and conservation are closely associated. WWF-India has always acknowledged this close bond between religion and conservation. This approach has proved effective in strengthening the plantation programme of multi-purpose tree species among target communities in Uttaranchal. This is also an excellent medium for generating awareness among villagers regarding environmental issues.

A local villager says,"We believe that if the plant is healthy and growing well then the newlywed daughter is also happy at her husband’s home”. This belief motivates people to take proper care of the growing trees.

The local community has readily accepted this new tradition and suggested that WWF-India also provide them with saplings on other occasions such as the wedding of a son, namkaran samaroh (celebrations of giving name to a new born child), grahpravesh (celebrating entry into a new house) and many other auspicious occasions. Each sapling is a reminder of these important events.

Besides Maiti van, plantations have also been encouraged by conducting sensitization programmes on other occasions like World Environment Day, Wildlife Week, Jim Corbett’s birthday celebrations and the visit of Government Ministers to the villages. In addition, the Youth club “Evergreen Youth for a Living Planet” formed under the TAL Programme is empowered to generate awareness among the masses about climate change and motivate villagers to plant trees as their own initiatives. Altogether 1500 saplings have been planted through the WWF-India programme in the last few months.

Earlier planting tree species on the edges of fields was thought to have a negative impact on crop but now the approach is changing. The innovative idea of Maiti van is having a positive impact on local communities and should bear fruit for the future generations.

WWF-India has always emphasized on the importance of conserving and planting trees. Besides our initiatives in TAL, WWF-India launched the nation wide “Adopt a Plant” campaign where free saplings are being distributed to people who pledge to nurture them into trees.


साभार-http://www.wwfindia.org/news_facts/fieldnotes/

पंकज सिंह महर

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सूबे की सीमा को लांघ हिमाचल पहुंचेगा मैती

बीज बचाओ आंदोलन के बाद अब मैती आंदोलन भी उत्तराखंड की सीमा पार कर हिमाचल प्रदेश में दस्तक दे चुका है। वृक्षारोपण के जरिए पर्यावरण संरक्षण का मैती आंदोलन हिमाचल में भी शुरू होगा। हिमाचल प्रदेश से लौटे मैती आंदोलन के प्रणेता व उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) के वैज्ञानिक कल्याण सिंह रावत ने बताया कि हिमाचल के सोलन, किन्नौर और कांगड़ा जिलों में पर्यावरण संरक्षण की चेतना जागृत करने के लिए मैती आंदोलन शुरू किया जाएगा। जुलाई से किन्नौर से आंदोलन की शुरुआत होगी। इसके तहत सतलुज नदी की घाटियों के क्षेत्रों को हरा-भरा किया जाएगा। उन्होंने बताया कि हिमाचल विवि के इंस्टीट्यूट ऑफ इंटीग्रेटेड हिमालयन स्टडीज की निदेशक डॉ. विद्या शारदा और प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. पीएस नेगी उत्तराखंड के वन आंदोलनों व मैती से बहुत प्रभावित हैं। मालूम हो कि मैती के तहत विवाह के दौरान नव दंपती वधू के मायके में एक वृक्ष लगाते हैं। इसकी देखभाल उसके माता-पिता को करनी होती है। कल्याण सिंह रावत का कहना है कि उत्तराखंड व हिमाचल दोनो पर्वतीय राज्य हैं और दोनों की एक जैसी समस्याएं हैं। उत्तराखंड देश में चिपको, नदी बचाओ, रक्षा सूत्र और नशा नहीं रोजगार दो जैसे आंदोलनों की जन्मभूमि है। हिमाचल में चल रहा बीज बचाओ आंदोलन भी उत्तराखंड में कुंवर प्रसून व विजय जड़धारी के बीज बचाओ आंदोलन की प्रेरणा से ही जन्मा है।

 

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