Author Topic: Strugle Story Of Making Uttarakhand State - उत्तराखंड राज्य बनने की संघर्ष कहानी  (Read 22984 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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 दोस्तो,

आज हम चर्चा करेंगे उत्तराखंड राज्य बनने की ! उत्तराखंड राज्य बनने के लिए हमे बहुत सारी कठिनायों का सामना करना पड़ा और हमारी लोगो ने राज्य बनने के लिए कई बलिदान दिए !


We would also like to inform you that Mr Charu Tiwari Ji, Editor of famous Newspapwer has joined us. He had actively participated in Uttarakhand state formation and even arrested several times. He wil give us some details on this.


एम् एस मेहता

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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उत्तराखंड राज्य आसानी से नहीं मिला है इसके लिये कई बार बंद और चक्काजाम की मार यहां की जनता को झेलनी पड़ी. इस आन्दोलन में लगभग 50 आन्दोलनकारी शहीद हुए.

उत्तराखंड के संघर्ष से राज्य के गठन तक जिन महत्वपूर्ण तिथियों ने भूमिका निभायी वे इस प्रकार हैं- आधिकारिक सूत्रों के अनुसार मई 1938 में तत्कालीन ब्रिटिश शासन मे गढ़वाल के श्रीनगर में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इस पर्वतीय क्षेत्र के निवासियों को अपनी परिस्थितियों के अनुसार स्वयं निर्णय लेने तथा अपनी संस्कृति को समृद्ध करकने के आंदोलन का समर्थन किया. सन् 1940 में हल्द्वानी सम्मेलन में बद्रीदत्त पाण्डेय ने पर्वतीय क्षेत्र को विशेष दर्जा तथा अनुसूया प्रसाद बहुगुणा ने कुमांऊ गढ़वाल को पृथक इकाई के रूप में गठन की मांग रखी.

1954 में विधान परिषद के सदस्य इन्द्रसिंह नयाल ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पंत से पर्वतीय क्षेत्र के लिये पृथक विकास योजना बनाने का आग्रह किया तथा 1955 में फजल अली आयोग ने पर्वतीय क्षेत्र को अलग राज्य के रूप में गठित करने की संस्तुति की. वर्ष 1957 में योजना आयोग के उपाध्यक्ष टीटी कृष्णमाचारी ने पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं के निदान के लिये विशेष ध्यान देने का सुझाव दिया. 

12 मई 1970 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा पर्वतीय क्षेत्र की समस्याओं का निदान राज्य तथा केन्द्र सरकार का दायित्व होने की घोषणा की और 24 जुलाई 1979 में पृथक राज्य के गठन के लिये मसूरी में उत्तराखंड क्रांति दल की स्थापना की गयी. जून 1987 में कर्ण प्रयाग के सर्वदलीय सम्मेलन में उत्तराखंड के गठन के लिये संघर्ष का आह्वान किया तथा नवंबर 1987 में पृथक उत्तराखंड राज्य के गठन के लिये नयी दिल्ली में प्रदर्शन और राष्ट्रपति को ज्ञापन एवं हरिद्वार को भी प्रस्तावित राज्य में शामिल करने की मांग की गयी.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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1994 उत्तराखंड राज्य एवं आरक्षण को लेकर छात्रों नेसामूहिक रूप से आन्दोलन किया 1 मुलायम सिंह यादव के उत्तराखंड विरोधी वक्तब्य से क्षेत्र में आन्दोलन तेज हो गया 1 उत्तराखंड क्रांतिदल के नेताओं ने अनशन किया 1 उत्तराखंड में सरकारी कर्मचारी पृथक राज्य की मांग के समर्थन में लगातार तीन महीने तक हड़ताल पर रहे तथा उत्तराखंड में चक्काजाम और पुलिस फायरिंग की घटनाएं हुइ 1 उत्तराखंड आन्दोलनकारियों पर मसूरी और खटीमा में पुलिस द्वारा गोलियां चलायीं गयीं 1 संयुक्त मोर्चा के तत्वाधान में दो अक्टूबर 1994 को दिल्ली में भारी प्रदर्शन किया गया 1 इस संघर्ष में भाग लेने के लिये उत्तराखंड से हजारों लोगों की भागेदारी हुयी 1 प्रदर्शन में भाग लेने जा रहे आन्दोलनकारियों को मुजफ्फर नगर में काफी पेरशान किया गया और उन पर पुलिस ने फायिरिंग की और लाठिया बरसायीं तथा महिलाओं के साथ अश्लील व्यहार और अभद्रता की गयी 1इसमें अनेक लोग हताहत और घायल हुये1इस घटना ने उत्तराखंड आन्दोलन की आग में घी का काम किया 1अगले दिन तीन अक्टूबर को इस घटना के विरोध में उत्तराखंड बंद का आह्वान किया गया जिसमें तोड़फोड़ गोलाबारी तथा अनेक मौतें हुयीं 1 सात अक्टूबर 1994 को देहरादून में एक महिला आन्दोलनकारी की मृत्यु हो गयी इसके विरोध में आन्दोलनकारियों ने पुलिस चौकी पर उपद्रव किया 1 पन्द्रह अक्टूबर को देहरादून में कफ्र्यू लग गया उसी दिन एक आन्दोलनकारी शहीद हो गया 1 27अक्टूबर 1994 को देश के तत्कालीन गृहमंत्री राजेश पायलट की आन्दोलनकारियों की वार्ता हुयी 1इसी बीच श्रीनगर में श्रीयंत्र टापू में अनशनकारियों पर पुलिस ने बर्बरतापूर्वक प्रहार किया जिसमें अनेक आन्दोलनकारी शहीद हो गये 1 पन्द्रह अगस्त 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा ने उत्तराखंड राज्य की घोषणा लालकिले से की 1सन् 1998 में केन्द्र की भाजपा गठबंधन सरकार ने पहली बार राष्ट्रपति के माध्यम से उ.प्र. विधानसभा को उत्तरांचल विधेयक भेजा 1 उ.प्र. सरकार ने 26 संशोधनों के साथ उत्तरांचल राज्य विधेयक विधान सभा में पारित करवाकर केन्द्र सरकार को भेजा 1 केन्द्र सरकार ने 27 जुलाई 200 0को उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक 200 0 को लोकसभा मेंे प्रस्तुत किया जो 01 अगस्त 2000 को लोक सभा में तथा 10 अगस्त को राज्यसभा में पारित हो गया 1 भारत के राष्ट्रपति ने उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक को 28 अगस्त को अपनी स्वीकृति दे दी

इसके बाद यह विधेयक अधिनियम में बदल गया और इसके साथ ही 09 नवंबर 2000 को उत्तरांचल राज्य अस्तित्व मे आया जो अब उत्तराखंड नाम से अस्तित्व में है

पंकज सिंह महर

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उत्तराखण्ड आन्दोलन चित्रों के माध्यम से
http://uttarakhand.prayaga.org/andolan/index.html

पंकज सिंह महर

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उत्तराखण्ड आन्दोलन के समय विभिन्न पोस्टर बनाये गये थे, हमारे मित्र श्री राजीव रावत ने उनका संकलन किया है, आप भी देखिये.....

http://uttarakhand.prayaga.org/justice.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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24 जुलाई 1979 में कुमायूं विश्व विद्यालय के पूव कुलपति डॉ. डी.डी. दत्त की अध्यक्षता में उत्तराखंड राज्य की लड़ाई लड़ने के लिये उत्तराखंड क्रान्तिदल .उक्रांद. के नाम से एक राजनीतिक दल का गठन किया गया और इस दल द्वारा हरिद्वार जिले को प्रस्तावित उत्तराखंड राज्य में सम्मिलित करने की मांग सहित एक ज्ञापन राष्ट्रपति को दिया 1 दो तथा तीन अप्रैल 1980 को उत्तराखंड क्रांति दल का दो दिवसीय महासम्मेलन हल्द्वानी में किया गया 1 सन् 1980 में उक्रांद की आेर से डॉ.डी.डी. पंत ने अल्मोड़ा पिथौरागढ़ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा 1 सन् 1989 में उ.प्र. विधानसभा के लिये उक्रांद के जसवन्त सिंह बिष्ट तथा काशीसिंह ऐरी चुनाव जीते

जसवंत सिंह इससे पूर्व भी उक्रांद के विधायक चुने गये थे 1 उत्तराखंड के विधायकों ने राज्य विधानसभा में उत्तराखंड राज्य के लिये प्रस्ताव रखा 1 पूर्व में राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां उत्तराखंड राज्य का विरोध करती रहीं 1 उत्तराखंड में उत्तराखंड क्रांति दल.उक्रांद. के बढ़ते प्रभाव तथा उत्तराखंड राज्य आन्दोलन को मिल रहे समर्थन को देखते हुए सन् 1988 में भारतीय जनता पार्टी ने भी उत्तराखंड राज्य की मांग का समर्थन करना प्रारम्भ कर दिया और उत्तराखंड राज्य के बजाये उत्तरांचल राज्य का नारा दिया 1 1991 के लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड की चारों लोकसभा सीटों पर भाजपा विजयी हुयी

बाद में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने विधानसभा में प्रस्ताव पेश कर उत्तराखंड के स्थान पर उत्तरांचल नाम को वैधानिक मान्यता प्रदान कर दी 1 कांग्रेस के नेता यद्यपि पूर्व में छिटपुट रूप में ही उत्तराखंड राज्य की मांग करते रहे किन्तु बाद में उसने भी उत्तराखंड राज्य का समर्थन करना प्रारंभ कर दिया 1 सर्वप्रथम 1991 में उ.प्र. की तत्कालीन भाजपा सरकार ने उत्तरांचल राज्य गठन का प्रस्ताव विधान सभा में पारित किया 1 सन् 1994 में मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने उत्तराखंड राज्य गठन के लिए कौशिक समिति का गठन किया 1 इस समिति ने राज्य का समर्थन करते हुए 05 मई 1994 को अपनी रिपोर्ट सरकार को दी 1 इस समिति ने पर्वतीय क्षेत्र में स्थान स्थान पर जाकर लोगों के सुाव लिये 1 कुमायूं और गढ़वाल के मध्य स्थित गैरसैंण नामक स्थान पर राजधानी बनाने की संस्तुति दी 1 कौशिक समिति की सिफारिश पर 24 अगस्त 1994 को उ.प्र. विधान सभा ने उत्तराखंड राज्य बनने का प्रस्ताव पारित कर दिया 1 रामगुलाम . पांडेय प्रेम

हलिया

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पंकज जी और मेहता जी, जानकारी हेतु धन्यबाद।

पंकज सिंह महर

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उत्तराखण्ड आन्दोलन की संघर्ष यात्रा को आप इस ब्लाग पर देख सकते हैं-

http://jayuttarakhand.blogspot.com/2007/12/blog-post_310.html

उत्तराखण्ड आन्दोलन से संबंधित कुछ और जानकारियां भी यहां पर हैं

http://jayuttarakhand.blogspot.com/

पंकज सिंह महर

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उत्तराखण्ड आन्दोलन के दौरान घायल लोग


पंकज सिंह महर

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एक सामाजिक कार्यकर्त्ता तथा महिला कल्याण समिति की अध्यक्षा श्रीमती शशि बहुगुणा, आंदोलन के प्रारंभ को उसी तरह याद करती है मानो यह कल की ही बात हो। “अगस्त 8, 1994 में शिवरात्री थी। इन्द्रमणि बडो़नी तथा दिवाकर भट्ट जैसे कुछ लोग आरक्षण के लिये मंडल आयोग की सिफारिशों के खिलाफ सात-आठ दिनों से जिला कार्यालय (कलेक्टोरेट) के बाहर भूख हडताल पर थे।” वह याद करती हैं, “अकस्मात् पुलिस ने उन्हें घसीट कर रातों–रात मेरठ जेल में ले जाकर बंद कर दिया। उसमें कुछ वृद्ध लोग भी शामिल थे।” इसी बीच यह आदेश जारी हुआ कि सड़कों पर चार लोगों से अधिक लोगों का मिलना वर्जित है। जब पौड़ी के लोगों ने यह सुना, वे विभ्रांत एवं भयभीत हो गये।

शशि ने कुछ करना तय किया। उन्होंने महिला कल्याण संघर्ष समिति के कुछ अनुभवी सदस्याओं को बुलाया जिसमें श्रीमती नंदा नेगी, श्रीमती मोहिनी नैथानी एवं डॉ. बहुगुणा शामिल हुए एवं इन महिलाओं ने बद्रीनाथ-केदारनाथ धर्मशाला में मिलने का निश्चय किया। “हमलोग ने अपने घरों से अकेले या दो के झुण्ड में निकले, पर फिर भी हमें पुलिस द्वारा रोका गया। हमने उन्हें बताया कि हम मंदिर जा रहे हैं। कुल मिलाकर 11 महिलाओं ने धर्मशाला से निकलकर पताका लहराते हुए नारे लगाये। जैसे ही लोगों ने हमें देखा, वे सब घरों से बाहर निकल पड़े। ऐसा लगा मानों वे किसी और के आगे आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। युवा, वृद्ध, गृहिणियां एवं बच्चे सभी सड़कों पर उतर पड़े और हमने कलेक्टेरेट की ओर बढ़ना शुरू किया।”

इस बीच पुलिस ने इस उपद्रव से निपटने के लिये उत्तर प्रदेश से और पुलिस दल को बुला लिया। कुछ जगह जनता के क्रोध के प्रदर्शन के कारण यह विरोध हिंसक हो उठा। पुलिस अधीक्षक की गाड़ी जला दी गयी, एक सरकारी गाड़ी का चालक मर गया, लोगों ने पत्थर फेंक-फेंक कर कलेक्टेरेट के फर्नीचर तोड़ डाले। “मैं प्रतिनिधि मंडल की एक सदस्य थी जो अंदर जिलाध्यक्ष से मिलने गयी थी। मैं महिलाओं से बातें करने बाहर आयी कि लोगों ने मुझे घेर लिया। इस धक्का-मुक्की में मेरी कुछ हड्डियां टूट गयीं। क्रोध इतना अधिक था कि लोगों को रोक पाना कठिन था। जब जिलाधिकारी तथा पुलिस अधीक्षक ने मुझे बाहर निकाला और हड्डी टूटने पर मेरी सहायता करनी चाही तो भीड़ ने डंडों से उन्हें पीटा। पुलिस ने 108 चक्र गोलियां चलायीं, फिर भी स्थिति नियंत्रित नहीं हो पायी।”

इन सभी ऊहापोहों में ही कभी एक अलग राज्य की मांग उठ गयी। लोगों ने हमेशा ही महसूस किया कि उत्तर प्रदेश सरकार की नीतियां एवं कार्यक्रम पहाड़ियों के लिये यथेष्ट नहीं रहे हैं और इसलिये उन्होंने एक अलग राज्य की मांग की, ताकि वे अपने विकास के लिये स्वयं कार्यक्रम बना सकें। बाकी, जैसा वे कहते हैं अब इतिहास बन चुका है। यह विचार सभी को भा गया और पूरे राज्य में बड़े प्रदर्शनों की दौड़ शुरू हो गयी। इसका अंत वर्ष 2000 में उत्तराखंड (तब उत्तरांचल) बनने पर ही हुआ।
 

 

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