Author Topic: Uttarakhand Save River Programme 2008 - उत्तराखंड नदी बचाओ वर्ष 2008 अभियान  (Read 18615 times)

हेम पन्त

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कोसी को लेकर चिंता

रामनगर। वैज्ञानिक मानते है कि कौसानी के पास पिनाथ पर्वत से निकलने वाली कोसी नदी का जल प्रवाह अल्मोड़ा के पास 1995 में 995 लीटर प्रति सेकेंड था जो 2003 में घटकर मात्र 85 लीटर प्रति सेकेंड रह गया। 2003 के बाद भी जल बहाव लगातार घट रहा है। वैज्ञानिक मानते है कि कोसी के रीचार्ज का स्तर औसतन बारह फीसदी है जबकि इसे 31 फीसदी होना चाहिए। 40 साल पहले कोसी में मिलने वाली नदियों की लंबाई 225.6 किमी थी जो अब 40 किमी रह गया है।


हेम पन्त

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रामगर। 31 दिसंबर को कौसानी और राज्य के अन्य हिस्सों से शुरू हुई नदी बचाओ यात्राओं का उद्देश्य पदयात्रा के बाद हुए विमर्श से उभरे बिंदुओं को सरकार को समक्ष प्रस्तुत करना भी है। सरकार का सामने राज्य की जल नीति घोषित करने, जल संसाधनों पर स्थानीय समुदायों का स्वामित्व स्वीकार करने, पानी बचाने की नीतियां ग्रामीणों के साथ मिलकर बनाने, नदियों के उद्गग स्थलों पर किसी भी तरह की छेड़छाड़ न होने देने जैसे दर्जनभर मुद्दे यात्रा के बाद रखे जाने है।

सामाजिक कार्यकर्ता राधा बहन का कहना है कि सूख रही वर्षा पोषित नदियों के पुनर्जीवन के लिए प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के कार्यक्रम घोषित होने चाहिए। उनका कहना था कि सरकारे जनता को विश्वास में लेकर जल संवर्धन नीतियां बनाएं और जनता भी एकमत होकर नदियां बचाने को सामने आएं। नदी बचाओ यात्रा का यह मकसद है। 16,17 को नदियां बचाओ यात्रा के विभिन्न दल यहां पहुंचेंगे।


हेम पन्त

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कब कहां गई कोसी बचाओ यात्रा

रामगर। 31 दिसंबर को कौसानी अनासक्ति आश्रम, एक जनवरी कौसानी, ल्वेशाल, चनौदा, अधूरिया, 2 जनवरी सोमेश्वर, टाना, पोखरी, बजे, कोटूली, 3 जनवरी मनान ग्वालाकोट, दाड़िमखोला, 4 जनवरी भगतोला, पातलीबगड़, महतगांव, 5 जनवरी कोसी, अनाड़, तलाड़, अल्मोड़ा, 6 जनवरी चौसली, 7 जनवरी क्वारब, चोपड़ा, सुयालबाड़ी, 8 जनवरी मनरसा, जौरासी, 9 जनवरी लोहाली, खैरना, 10 जनवरी खैरना से बर्धो, 11 जनवरी आमबाड़ी, बेतालघाट, 12 जनवरी मल्ली सेठी, 13 तल्ली सेरी, ओखलढूंगा, 14 जनवरी गर्जिया, 15 रामनगर, 16-17 जनवरी रामनगर में उत्तराखंड नदी बचाओ सम्मेलन।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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I there is need of saving the river otherwise water crisises will raise in coming future.

पंकज सिंह महर

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कोसी के साथ-साथ चल समझी उसकी परेशानी

 कोसी नदी क्या परेशानी भोग रही है, उसे आखिर तकलीफ क्या है? उसकी कोख सूखती क्यों जा रही है, उससे जीवन लेकर हम उसे दे क्या रहे है? उद्गम से लेकर रामगंगा में मिलने तक उसके बहाव, इर्द-गिर्द बसी सभ्यता को देखकर ही इस बात को महसूस किया जा सकता है। नदी किनारे बसे गांव अगर इसके पानी से जीवित है, तो जब यह पानी नहीं रहेगा फिर? यही सवाल न केवल कोसी बल्कि उत्तराखंड की गैर-हिमालयी और हिमालयी नदियों के साथ जुड़े है। इन सवालों का जवाब ढूंढा जाना जरूरी है, ताकि समय रहते इन नदियों के रूप में इसके आसपास बसी सभ्यता को बचाया जा सके। इसी बात को समझते हुए जन्म हुआ उत्तराखंड नदी बचाओ वर्ष 2008 अभियान का। यात्रा के तहत जमुना, भागीरथी, अलकनंदा, कोसी, पनार, गगास समेत राज्यभर की 15 नदियों की यात्रा के बाद मंगलवार को उसका रामनगर में समागम हुआ। कोसी की धार के साथ बात करते हुए पद्मश्री प्रो. शेखर पाठक, सामाजिक कार्यकर्ता राधा बहन, पामिला चटर्जी की अगुवाई में कोसी बचाओ यात्रा दल रामनगर में चाल खाल बनाएंगे, नदियों को बचाएंगे., ऊंचाई पर पेड़ रहेगे, नाले धारे टिके रहेगे., कोसी बचाओ जीवन बचाओ. जैसे नारों के साथ कोसी के समागम की तरफ बढ़ रहा था। यह यात्रा दल 15 दिन की पैदल यात्रा पूरी कर यहां पहुंचा था। लोगों के कान में कोसी, जीवन, चाल-खाल जैसी आवाजों पड़ उत्सुकता जग रही थी। उन्हे समझ नहीं आ रहा था कि जनगीत गाते चले जा रहे ये लोग आखिर है कौन। कोसी नदी में जब यात्रा दल पहुंचा तो लोगों को समझ आ रहा था कि यहां किसी राजनीतिक दल का जुलूस या कोई पुतला फूंकने जैसी कहानी नहीं बल्कि बात नदी के रूप में एक जीवन रेखा बचाने की हो रही है।

सामाजिक कार्यकर्ता राधा बहन ने जब यहां माइक थामा तो कोसी किनारे खनन कर रहे और गाड़ियां धो रहे लोगों को पता लगा कि 15 दिनों से यह यात्रा दल इन्हीं सब बातों मुखालफत करते हुए यहां पहुंचा है।

यात्रा दल ने कोसी किनारे बसे गांव के लोगों से बात की है। उनके साथ वक्त गुजारकर उनकी परेशानी भी सुनी है। जब तक हम नदी के मिजाज को नहीं समझेंगे हम भला किसी नतीजे पर कैसे पहुंच सकते है? यात्रा दल में शामिल पद्मश्री प्रो. पाठक का यह कहना था। वह बोले नदियों के साथ अनियंत्रित दोहन, बाढ़, कटान जैसी परेशानियां भरे शब्द जुड़े हुए है। इनके बारे में हम नहीं तो और कौन सोचेगा.समय रहते।

31 दिसंबर को कौसानी और राज्य के अन्य हिस्सों से शुरू हुई नदी बचाओ यात्राओं का उद्देश्य

पदयात्रा के बाद हुए विमर्श से उभरे बिंदुओं को सरकार को समक्ष प्रस्तुत करना भी है। सरकार का सामने राज्य की जल नीति घोषित करने, जल संसाधनों पर स्थानीय समुदायों का स्वामित्व स्वीकार करने, पानी बचाने की नीतियां ग्रामीणों के साथ मिलकर बनाने, नदियों के उद्गग स्थलों पर किसी भी तरह की छेड़छाड़ न होने देने जैसे दर्जनभर मुद्दे यात्रा के बाद रखे जाने है।

सामाजिक कार्यकर्ता राधा बहन का कहना है कि सूख रही वर्षा पोषित नदियों के पुनर्जीवन के लिए प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के कार्यक्रम घोषित होने चाहिए। उनका कहना था कि सरकारे जनता को विश्वास में लेकर जल संवर्धन नीतियां बनाएं और जनता भी एकमत होकर नदियां बचाने को सामने आएं। नदी बचाओ यात्रा का यह मकसद है। 16,17 को नदियां बचाओ यात्रा के विभिन्न दल यहां पहुंचेंगे।

पंकज सिंह महर

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इस अभियान में हमारे जनकवि गिर्दा भी सम्मिलित हैं और अपनी मर्मस्पर्शी कविताओं से लोगों को नदी के महत्व की जानकारी दे रहे हैं

आज हिमाल तुमन के धत्यूंछौ, जागौ-जागौ हो म्यरा लाल,
नी करण दियौ हमरी निलामी, नी करण दियौ हमरो हलाल।
ढुंग बेच्यो-माट बेच्यो, बेचि खै बज्याणी, लिस खोपि-खोपि मेरी उधेड़ी दी खाल,
न्यौलि, चांचरी, झवाड़, छपेली बेच्या मेरा, बेचि दी अरणो घाणी, ठण्डो पाणि, ठण्डी बयाल।

एक कविता वे इस बारे में कहते हैं, सही से याद नही है फिर भी
अभी तो बेच लो तुम पानी, नदियां सूखा दो,
जब पानी नही होगा जग में, तब क्या करेगा व्यापारी?

पंकज सिंह महर

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Seminar on Save the Rivers Campaign begins in Ramnagar

People demand rights over Jal-Jungle-Zameen


Ramnagar, 16 Jan: A two day seminar on ‘Save the Rivers’ campaign began here today. Yatris of all the river yatras have arrived here.

The seminar began with a welcome speech by Ganesh Rawat and the theme was taken up by Professor Shekhar Pathak.

The two day seminar has been held to compile the experiences of the ‘Save the Rivers’ campaign. The campaign began on 1 January and proceeded along 14 rivers - the Bhagirathi, Yamuna, Kosi, Alaknanda, Saryu, Gomti, Mandakini, Bhilangna, Jalkur, Panar, Gagas, Binsar-gaad, Gaula, and Ramganga.

On the occasion, many yatris voiced their experiences and worries about the condition of the rivers. They also had brought water from the river they had traveled along.

Gandhian Radha Bahen said in her address to the seminar, “The condition of the rivers is very critical. We have lost 70% of the Naule and Gadhere in Uttarakhand. The people are suffering from the repercussions of mega hydro projects. Government should change the concept of development.”

पंकज सिंह महर

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New year to kick off with Save River Campaign
 

Uttarakhand Nadi Bachao Abhiyan (Uttarakhand Save Rivers Campaign) will begin in the State from January 1. The campaign is a joint effort of various social organisations working in Uttarakhand.

Announcing the launch of the campaign in Dehradun here on Tuesday, convener of the campaign Shamsher Singh Bisht said that major rivers such as Ganga and Yamuna had their origins in Uttarakhand and thus such a campaign had greater relevance for the State.


He revealed that rallies would be organised at areas lying along the banks of all the 10 rivers of Uttarakhand.


He alleged that the practice of wrong policies on the part of the Governments was leading to constructions of dams on the major rivers of the State.


He said that such dams were only posing restrictions to the flow of river Ganga and also posing a threat to the settlements along its course. Bisht said that the commercialisation of river water was not in the interests of the nation.


"The growing pollution in rivers of Uttarakhand is a big concern for the environmentalists and the people", Bisht said.


He said that the year 2008 had been declared as a Save River Year under the Uttarakhand Save Rivers Campaign.


Bisht said the campaign would also focus on the prevention of pollution in the rivers.

 
   
SOURCE : The Pioneer, Wednesday, 19 December 2007 
 

sanjupahari

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Jai hooo....thnx for very informative news. I did talk to Prof. Shekhar Pathak Ji and Girda regarding that.
We must come up with a nice news to spread around the groups.
cheers
sanjupahari

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Protecting rivers, Almora women show the way
« Reply #9 on: January 27, 2008, 02:29:14 PM »

NEW DELHI: Global warming, climate change and environmental degradation are terms experts discuss on international fora. Women in Almora district of Uttarakhand may not be able to give the meaning of these words, but can tell you what they have done to preserve the environment, increase the water table and prevent deforestation.

Magistrate order


It was in 2003 that the District Magistrate declared that water from the Kosi river could not be used for irrigation, as it had to be pumped to provide drinking water to the city. The police were deployed along the river to implement the order.

At the same time, a Kumaon University survey said the flow of water in the Kosi fell from 985 litres per second to 85 litres between 1992 and 2003. If nothing was done, the river would dry up in 10 years. The non-glacial rivers in Uttarakhand also indicated a reduced flow, thanks to environmental degradation — cutting of forests and drying up of waterbodies due to increased withdrawals — and construction of hydro power projects.

This raised an among the people living along the Kosi, and the Laxmi Ashram, working in the area for 60 years for the education of girls, took up the challenge. In a bid to restore environment, its activist Basanti Behn worked with women at Luisal, Channi Bijoria, Kaphari and other villages in the Borara Valley, organising them into mahila sangathans.

In the next five years, the trees started regenerating naturally, denuded forests became green again and the water levels went up. Soon, 60 villages joined the movement to manage the forest on their own.

To give a further boost to the movement, activists of the Laxmi Ashram took out a week-long padayatra in May 2007 from the Pinnath forest, source of the Kosi, covering Someshwar, Mansa Nala and the Lodh Valley, says Radha Behn, chairperson of the Gandhi Peace Foundation, who has been and associated with the Ashram for 57 years now.

The Ashram then decided to involve other organisations to save not only the Kosi but also all other rivers in Uttarakhand, receiving spontaneous response from civil society groups and institutional organisations.

The Ashram organised simultaneous padayatras along the 14 rivers between January 1 and 15 and decided to observe an annual ‘River Day’ when people will work for conservation of rivers, clean them and plant saplings along the banks. The year 2008 was declared the “Save the Rivers Year.” Ms. Radha Behn, who initiated the programme, was elected its coordinator.

The campaigners have decided to meet the Chief Minister to work together on the initiative.


http://www.hindu.com/2008/01/27/stories/2008012753880800.htm

 

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