Author Topic: गिरीश चन्द्र तिवारी "गिर्दा" और उनकी कविताये: GIRDA & HIS POEMS  (Read 69965 times)

विनोद सिंह गढ़िया

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 1,676
  • Karma: +21/-0

विनोद सिंह गढ़िया

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 1,676
  • Karma: +21/-0


....चुनावी माहौल पर 'गिर्दा' की एक कविता.....

यह रंग चुनावी रंग ठेरा, इस ओर चला, उस ओर चला,
तुम पर भी चढ़ा, हम पर भी चढ़ा, जिस पर भी चढ़ा, घनघोर चढ़ा,
गालों पर चढ़ा, बालों पर चढ़ा, मूछों में चढ़ा, दाढ़ी में चढ़ा,
आंखों में चढ़ा, सांसों में चढ़ा, धमनी में चढ़ा, नाड़ी में चढ़ा,
हाथों में चढ़ा, पांवों में चढ़ा, घुटनों में चढ़ा, जोड़ों में चढ़ा,
खुजली में चढ़ा, खांसी में चढ़ा, फुंसी में चढ़ा, फोड़ों में चढ़ा,
आसन में चढ़ा, शासन में चढ़ा, भाषण में उदघाटन में चढ़ा,
न्यासों में-शिलान्यासों में चढ़ा, यशगान-गीत-कीर्तन में चढ़ा,
उल्फत में चढ़ा, हुज्जत में चढ़ा, फोकट में चढ़ा, कीमत में चढ़ा,
मंदिर में चढ़ा, मस्जिद में चढ़ा, पूजा में चढ़ा, मन्नत में चढ़ा,
पुडि़या में चढ़ा, गुड़िया में चढा़, पव्वे में चढ़ा, बोतल में चढ़ा,
कुल्हड़ में चढ़ा, हुल्लड़ में चढ़ा, कुल देखो तो टोटल में चढ़ा,
चहुं ओर चढ़ा, घनघोर चढा, झकझोर चढ़ा, पुरजोर चढ़ा,
यह रंग चुनावी रंग ठैरा, इस ओर चढ़ा, उस ओर चढ़ा ।।


विनोद सिंह गढ़िया

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 1,676
  • Karma: +21/-0
गिर्दा की एक चुनावी कविता।
« Reply #102 on: March 22, 2014, 11:42:36 AM »


गिर्दा की एक चुनावी कविता।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
आज ही के दिन हम सबके चहिते

गिरीश चंद्र तिबाडी 'गिर्दा" ka
निधन: 22 अगस्त 2010 huwa tha .

unka ek parichey :
इन्हें कुमाउ में जनकवि माना जाता है ..
उनका जन्म 9 सितंबर, 1945 को अल्मोड़ा के ज्योली हवालबाग गांव में हंसादत्त तिवाडी और जीवंती तिवाडी के घर हुआ था। वह आजीवन जन संघर्षों से जुड़े रहे और अपनी कविताओं में जन पीड़ा को सशक्त अभिव्यक्ति दी। उत्तराखंड के जनकवि गिरीश चंद्र तिवाडी ‘गिर्दा’ का 22 अगस्त 2010 सुबह हल्द्वानी में देहांत हो गया। वह काफी समय से बीमार चल रहे थे। उनकी अंत्येष्टि 23 अगस्त 2010 सुबह पाईन्स, नैनीताल में सम्पन्न हुई।
एक और परिचय

गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ (Girish Tewari ‘Girda’)
(माताः स्व. जीवंती देवी, पिताः स्व. हन्सादत्त तिवारी)
जन्मतिथि : 9 सितम्बर 1945
जन्म स्थान : ज्योली (तल्ला स्यूनरा)
पैतृक गाँव : ज्योली जिला : अल्मोड़ा
वैवाहिक स्थिति : विवाहित बच्चे : 2 पुत्र
शिक्षा : हाईस्कूल- राजकीय इंटर कालेज अल्मोड़ा
इंटर- एशडेल स्कूल, नैनीताल (व्यक्तिगत)
जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ः 1966-67 में पूरनपुर में लखीमपुर खीरी के जनपक्षीय रुझान वाले कार्यकर्ताओं से मुलाकात।
प्रमुख उपलब्धियां : आजीविका चलाने के लिए क्लर्क से लेकर वर्कचार्जी तक का काम करना पड़ा। फिर संस्कृति और सृजन के संयोग ने कुछ अलग करने की लालसा पैदा की। अभिलाषा पूरी हुई जब हिमालय और पर्वतीय क्षेत्र की लोक संस्कृति से सम्बद्ध कुछ करने का अवसर मिला। प्रमुख नाटक, जो निर्देशित किये- ‘अन्धायुग’, ‘अंधेरी नगरी’, ‘थैंक्यू मिस्टर ग्लाड’, ‘भारत दुर्दशा’। ‘नगाड़े खामोश हैं’ तथा ‘धनुष यज्ञ’ नाटकों का लेखन किया। कुमाउँनी-हिन्दी की ढेर सारी रचनाएँ लिखीं । गिर्दा ‘शिखरों के स्वर’ (1969), ‘हमारी कविता के आँखर’ (1978) के सह लेखक तथा ‘रंग डारि दियो हो अलबेलिन में’ (1999) के संपादक हैं तथा ‘उत्तराखण्ड काव्य’ (2002) के रचनाकार हैं। ‘झूसिया दमाई’ पर उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण संकलन-अध्ययन किया है। उत्तराखण्ड के कतिपय आन्दोलनों में हिस्सेदारी की। कुछेक बार गिरफ्तारी भी हुई।

!!!!
by kundan

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
 
क्या करें?
 
हालाते सरकार ऎसी हो पड़ी तो क्या करें?
हो गई लाजिम जलानी झोपड़ी तो क्या करें?
हादसा बस यों कि बच्चों में उछाली कंकरी,
वो पलट के गोलाबारी हो गई तो क्या करें?
गोलियां कोई निशाना बांध कर दागी थी क्या?
खुद निशाने पै पड़ी आ खोपड़ी तो क्या करें?
खाम-खां ही ताड़ तिल का कर दिया करते हैं लोग,
वो पुलिस है, उससे हत्या हो पड़ी तो क्या करें?
कांड पर संसद तलक ने शोक प्रकट कर दिया,
जनता अपनी लाश बाबत रो पड़ी तो क्या करें?
आप इतनी बात लेकर बेवजह नाशाद हैं,
रेजगारी जेब की थी, खो पड़ी तो क्या करें?
आप जैसी दूरदृष्टि, आप जैसे हौंसले,
देश की आत्मा गर सो पड़ी तो क्या करें?
यह कविता उत्तराखण्ड के जनकवि श्री गिरीश चन्द्र तिवारी “गिर्दा” ने दिनांक 8 अक्टूबर, 1983 को नैनीताल में हुई पुलिस फायरिंग के बाद लिखी थी।     

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
 
क्या करें?
 
हालाते सरकार ऎसी हो पड़ी तो क्या करें?
हो गई लाजिम जलानी झोपड़ी तो क्या करें?
हादसा बस यों कि बच्चों में उछाली कंकरी,
वो पलट के गोलाबारी हो गई तो क्या करें?
गोलियां कोई निशाना बांध कर दागी थी क्या?
खुद निशाने पै पड़ी आ खोपड़ी तो क्या करें?
खाम-खां ही ताड़ तिल का कर दिया करते हैं लोग,
वो पुलिस है, उससे हत्या हो पड़ी तो क्या करें?
कांड पर संसद तलक ने शोक प्रकट कर दिया,
जनता अपनी लाश बाबत रो पड़ी तो क्या करें?
आप इतनी बात लेकर बेवजह नाशाद हैं,
रेजगारी जेब की थी, खो पड़ी तो क्या करें?
आप जैसी दूरदृष्टि, आप जैसे हौंसले,
देश की आत्मा गर सो पड़ी तो क्या करें?
यह कविता उत्तराखण्ड के जनकवि श्री गिरीश चन्द्र तिवारी “गिर्दा” ने दिनांक 8 अक्टूबर, 1983 को नैनीताल में हुई पुलिस फायरिंग के बाद लिखी थी।     

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
मोरि कोसि हरै गे कोसि

जोड़ – आम-बुबु सुणूँ छी
गदगदानी ऊँ छी
रामनङर पुजूँ छी
कौशिकै की कूँ छी
पिनाथ बै ऊँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
कौशिकै की कूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

क्या रोपै लगूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
क्या स्यारा छजूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

घट-कुला रिङू छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
कास माछा खऊँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

जतकाला नऊँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
पितर तरूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

पिनाथ बै ऊँछी मेरि कोसि हरै गे कोसि।
रामनङर पुजूँ छी मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

जोड़ – रामनङर पुजूँ छी,
आँचुई भर्यूँ छी, – (ऐ छू बात समझ में ? जो चेली पहाड़ बै रामनगर बेवई भै, उ कूँणै यो बात) -
पिनाथ बै ऊँ छी,
रामनगङर पुजूँ छी,
आँचुई भर्यूँ छी,
मैं मुखड़ि देखूँ छी,
छैल छुटी ऊँ छी,
भै मुखड़ि देखूँ छी,
अब कुचैलि है गे मेरि कोसि हरै गे कोसि।
तिरङुली जै रै गे मेरि कोसि हरै गे कोसि।
हाई पाँणी-पाणि है गे मेरि कोसि हरै गे कोसि।।

भावार्थ: दादा-दादी सुनाते थे कि किस तरह इठलाती हुई आती थी कोसी। रामनगर पहुँचाती थी, कौशिक ऋषि की कहलाती थी। अब जाने कहाँ खो गई मेरी वह कोसी ? क्या रोपाई लगाती थी, सेरे (खेत) सजाती थी, पनचक्की घुमाती थी। क्या मछली खिलाती थी वाह !….. आह ! वह कोसी कहाँ खो गई ? जतकालों को नहलाती थी (जच्चा प्रसूति की शुद्धि)। पितरों को तारती थी। पिनाथ से आती थी, रामनगर पहुँचाती थी। रामनगर ब्याही पहाड़ की बेटी कह रही है कि – कोसी का पानी अंचुरि में लेने के साथ ही छाया उतर आती थी अंचुरि में माँ-भाई के स्नेहिल चेहरे की। कहाँ खो गया कोसी का वह निर्मल स्वच्छ स्वरूप। अब तो मैली-कुचैली तिरङुगली (छोटी) अंगुली की तरह रह गई है एक रेखा मात्र। हाय, पानी पानी हो गई है। मेरी कोसी खो गई है।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
स्व श्री गिरीश
तेवरी गिर्दा की एक अदभुत रचना
आस्तिक या नास्तिक
..........................
मुझको आस्तिक कहो कि
नास्तिक इसकी कुछ परवाह नही
कुछ चाह नहीं
हाँ, प्रयत्न यह अवश्य करूँगा
खोज सत्य की रहे निरंतर
रहे उम्र भर
कायर कहो कि कहो बहादुर
इसकी कुछ परवाह नहीं
कुछ चाह नहीं
हाँ प्रयत्न यह अवश्य करूंगा
दुश्मन से संघर्ष बढ़े
और बढ़े उम्र भर
जो कुछ बोलूं, साफ़ सरल सीधा बोलूं
भले मेरी बातो से दिग्गज जन की
नाक-भों चढ़े उम्र भर

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
रात उजली पै घाम निमैलो,,,,,,, डान कानन केसिया फूलो,
शिवज्यु कें मारी मुट्ठी रंगे की,,,,,,, सार हिमाल है गो छ रंगीलो,
शिवज्यु कें मारी मुट्ठी रंगे की,,,,,,, सार हिमाल है गो छ रंगीलो,
हुलरी ए गे बसंत का परी....... होगी जो गाथा रंग पिंगलो.....

https://www.youtube.com/watch?v=QP5sAueu0no

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0
रात उज्याली, घाम निमैलो
डान-कानन् केशिया फूलो
शिवज्यु कैं मारी मुठ्ठी रंगे की
सारो हिमाल है गो छौ रंगिलो
हुलरी ऐगे बसंत की परी
फोकी गो जां-तां रंग पिंघलो
पिंघली आज नानों की झगुली
पिंघला ठुलों का टांक पिंघला
पिंघल पूर धरती पिछौड़ी
पिंघला आज अकासा बदला
हुलेरी ऐगे बसंते परी।
ध्यान टुटो छार फोक्का जोगी को
आज बिभूत जांलै पिंघली गे
मुल-मुल हंसै हिमालै की चेली
सुकिली हंसी थोलनै अनमनी गे
हुलरी ऐगे बसंतै की पारी।
बंण-बोटन फुटी गई पूङा
कैरू-किल्मोड़ी कांन मौलीणा
हरिया सार में पिंघलो दैंणा
हुलरि ऐगे बसंतै की परी।
सुर-सुर हवा पड़ी फगुने की
ठुम-ठुम बण परी नाचण फैगे
फर-फर उड़ो बसंती आंचल
सुर-बुर ही में कुरकुताली लैगे
आनुवाद
रात जुन्याली कि दिन गुनगुने हैं
केशिया-बुरांश ऐसे फ़ूल खिले हैं
मारी हो शिबजी ने मुट्ठी रंगों की
की हिमाला में न्यारे रंग बिखरे हैं
उतर रही है परी बसंती

 

Sitemap 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22