Author Topic: गिरीश चन्द्र तिवारी "गिर्दा" और उनकी कविताये: GIRDA & HIS POEMS  (Read 69571 times)

पंकज सिंह महर

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न्यूजर्सी, अमेरिका में UANA द्वारा आयोजित कार्यक्रम में नरेन्द्र सिंह नेगी के साथ जुगलबन्दी करते गिर्दा

http://www.youtube.com/watch?v=xK_7KV-44J4

Vidya D. Joshi

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जैंता एक दिन त आलो ये दुनी में
चाहे हम ने ल्या सकूं, चाहे तुम नि ल्या सको
जैंता क्वै न क्वै त ल्यालो, ये दुनी में
जैंता एक दिन त आलो ये दुनी में……
  I do believe    o din jarur aayagaa

पंकज सिंह महर

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हम ओढ़, बारुड़ी,ल्वार, कुल्ली-कफाड़ी,जै दिन यो दुनी धैं हिसाब ल्यूंलो,
एक हांग नि मांगूं, एक भांग नि मांगू, सब खसरा खतौनी किताब ल्यूंलो।
यां डाना काना हीरा हरया छ्न,यां गाढ़ गध्यारा मोत्यूं भरया छ्न,
यो माल खजान सब हमरै तो छू, हम एक एक पाई को हिसाब ल्यूंलो।
जो ल्वै को सिखा जो मौकु गुजरी, जौ मन सुकू मन मे कतल भईं,
हर ल्वै को तोपक, हर धुरि को ढुंगक, हर एक कतल को जबाब ल्यूंलों।
हम ओढ़, बारुड़ी,ल्वार, कुल्ली-कफाड़ी,जै दिन यो दुनी धैं हिसाब ल्यूंलो,
एक हांग नि मांगूं, एक भांग नि मांगू, सब खसरा खतौनी किताब ल्यूंलो।।


हिन्दी भावार्थ

हम मैहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं,एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।
यहां पर्वत पर्वत हीरे हैं, यहां सागर सागर मोती हैं,
ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे।
जो खून बहे, जो बाग उजड़े, जो गीत दिलों में कत्ल हुए,
हर कतरे का,हर गूंचे का,हर ईंट  का  बदला मांगेगे। 
हम मैहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं,एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।।

हेम पन्त

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गिर्दा द्वारा कुमाउंनी भाषा में लिखी गई यह पंक्तियां मूलत: उर्दू शायर "कैफ़" की कविता का कुमाउंनी रुपान्तरण है. पंकज दा ने जो हिन्दी भावार्थ दिया है वो कैफ़ की मूल पंक्तियां है. रानीखेत इलाके में मजदूरों के आन्दोलन को समर्थन देने के लिये गिर्दा गये थे (शायद 1980 के दशक में). तब गिर्दा ने कैफ़ की पंक्तियां सुना कर मजदूरों में जोश भरने की कोशिश की, लेकिन गिर्दा को लगा कि यह बात अगर मज्दूरों की अपनी भाषा में ही कही जाये तो ज्यादा असरदार होगी. तब गिर्दा ने इसका कुमांऊंनी रुपान्तरण किया. इस कविता की यह कहानी मैने गिर्दा के ही श्रीमुख से सुनी थी.

हम ओढ़, बारुड़ी,ल्वार, कुल्ली-कफाड़ी,जै दिन यो दुनी धैं हिसाब ल्यूंलो,
एक हांग नि मांगूं, एक भांग नि मांगू, सब खसरा खतौनी किताब ल्यूंलो।
यां डाना काना हीरा हरया छ्न,यां गाढ़ गध्यारा मोत्यूं भरया छ्न,
यो माल खजान सब हमरै तो छू, हम एक एक पाई को हिसाब ल्यूंलो।
जो ल्वै को सिखा जो मौकु गुजरी, जौ मन सुकू मन मे कतल भईं,
हर ल्वै को तोपक, हर धुरि को ढुंगक, हर एक कतल को जबाब ल्यूंलों।
हम ओढ़, बारुड़ी,ल्वार, कुल्ली-कफाड़ी,जै दिन यो दुनी धैं हिसाब ल्यूंलो,
एक हांग नि मांगूं, एक भांग नि मांगू, सब खसरा खतौनी किताब ल्यूंलो।।


हिन्दी भावार्थ

हम मैहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं,एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।
यहां पर्वत पर्वत हीरे हैं, यहां सागर सागर मोती हैं,
ये सारा माल हमारा है, हम सारा खजाना मांगेंगे।
जो खून बहे, जो बाग उजड़े, जो गीत दिलों में कत्ल हुए,
हर कतरे का,हर गूंचे का,हर ईंट  का  बदला मांगेगे। 
हम मैहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे,
एक खेत नहीं,एक देश नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे।।

हेम पन्त

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गिर्दा की 2 पंक्तियां

दिल लगाने में वक्त लगता है, डूब जाने में वक्त लगता है.
वक्त जाने में कुछ नहीं लगता, वक्त "आने" में वक्त लगता है.

पंकज सिंह महर

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बात मुद्दों की उठाओ तो कोई बात करें


बात मुद्दों की उठाओ तो कोई बात करें,
लोग जो खुद में एक मुद्दा बने बैठे हैं,
ऎसे लोगों से बचाओ, तो कोई बात करें।
क्यों लड़ी थी, वह लड़ाई बताओ हम सब ने?
इस सवालों पर भी आओ तो कोई बात करें।
एम०पी० या एम०एल०ए० की बात थी क्या वो?
बात इस बात पर भी लाओ, तो कोई बात करें।
बत्तियां, लाल-नीली-हरी, बहुत चमका लो,
थोड़ा उजियारा भी लाओ, तो कोई बात करें।
दीप कुटिया में भी जलाओ, तो कोई बात करें।
जल-जंगल-जमीन की बही क्या दोगे?
बात अपने बंगले की सुनाओ, तो कोई बात करें।
मेरे निचुड़े हुये चेहरे को क्या घूरते हो?
आईना खुद को दिखाओ तो कोई बात करें।
राज करना ही नहीं राजनीति है यारो....!
नीति का राज चलाओ, तो कोई बात करें॥

हेम पन्त

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भविष्य में भयमुक्त, उदार समाज की कल्पना करते हुए लिखा गया "गिर्दा" का यह गीत उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध गायक नरेन्द्र सिंह नेगी जी ने अपनी कैसेट "उत्तराखण्ड रैली मां" में सन 1994 में गाया था. उस समय उत्तराखण्ड राज्य की मांग को लेकर चल रहा आन्दोलन अपने चरम पर था. यह गीत अब एक जनगीत बन चुका है, विभिन्न आन्दोलनों और रैलियों में लोग इसे आशावादिता और एकजुटता प्रदर्शित करने के लिये गाते हैं. गाने का हिन्दी रुपान्तरण मेहता जी ने इसी टापिक की पिछली पोस्टों में लिख दिया है.

ततुक नी लगा उदैख, घुणन मुनई न टेक
जैता एक दिन तो आलो, ऊ दिन यो दुनी में
ततुक नी लगा उदैख, घुणन मुनई न टेक
जैता कभि न कभि त आलो, ऊ दिन यो दुनी में....

जै दिन काटुलि रात ब्यालि, पौ फाटला दो कङालो-२
जैता एक दिन तो आलो, ऊ दिन यो दुनी में
जैता कभि न कभि त आलो, ऊ दिन यो दुनी में....

जै दिन नान ठुलो नि रौलो, जै दिन त्यरो-म्यरो नि होलो-२
जैता एक दिन तो आलो, ऊ दिन यो दुनी में
जैता कभि न कभि त आलो, ऊ दिन यो दुनी में....

जै दिन चोर नी फलाला, कै को जोर नी चलोलो-२
जैता एक दिन तो आलो, ऊ दिन यो दुनी में
जैता कभि न कभि त आलो, ऊ दिन यो दुनी में....

चाहे हम नि ल्यै सकूं, चाहे तुम नि ल्यै सको-२
जैता क्वै-ना-क्वै त ल्यालो, ऊ दिन यो दुनी में
जैता एक दिन तो आलो, ऊ दिन यो दुनी में
जैता क्वै ना क्वै त ल्यालो ऊ दिन यो दुनी में

पंकज सिंह महर

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गिर्दा द्वारा १ अप्रैल, १९८१ को लिखित कविता

इस वक्त जब मेरे देश में,
पेश किये जा रहे हैं,
पेड़, पेड़ों के खिलाफ,
पानी, पानी के खिलाफ,
और पहाड़, पहाड़ों के खिलाफ,
किसानों के खिलाफ किसान,
जनता के खिलाफ, जनता,
नक्सलवादियों के खिलाफ,
रुपहले पर्दे पर नक्सलवादी,
खबरों के खिलाफ, अखबार,
ओ मेरे देश के सम्पादको!
जब तुम इस वक्त,
जो हो, जैसे हो,
हम जानते हैं,
तुम समझते हो,
उसके खिलाफ क्यों नहीं हो रहे हो?

पंकज सिंह महर

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1992 का नैनीताल शरदोत्सव उस वक्त मनाया जा रहा था, जब ममता बिष्ट नाम की एक ९ वर्षीया लड़की का शव मिला था और अपराधियों के न पकड़े जाने से जनता गुस्से में थी, इस पर गिर्दा की काव्य टिप्पणी-

पानी भरे ताल में,
ग्रहण लगे चन्द्रमाओं की तरह,
रोशनियां झिलमिला रही हैं ताल में,
तिलमिला रही हैं मछलियां,
छोटी-छोटी,
गहरे कहीं, बड़े-बड़े,
डाम पड़े हैं जगह-जगह,
दहकते हुये आइरन सोल्डर से,
दागा गया हो पूरा जिस्म जैसे,
खबरें आ रही हैं,
आत्महत्या कर ली मछलियों ने,
पानी में डूबकर,
बहुत बड़ा होता है,
थाल भर पानी,
ग्रहण के लिये,
और चुल्लू भर पानी भी,
बहुत होता है....................

पंकज सिंह महर

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1962 में राजकीय इण्टर कालेज से हाईस्कूल करने के बाद गिर्दा अपने घर से स्वछन्द विचरण के लिये निकल पड़े, इसी बीच उनका सम्पर्क सुप्रसिद्ध रंगकर्मी ब्रजेन्द्र लाल शाह जी से हुआ और ये भी रंगमंच की ओर मुड़ गये। जीवन के अगले पड़ावों में ख्यात रंगकर्मियों और कलाकारों के सम्पर्क में आये, लेनिन पन्त और तारा दत्त सती जी से रंगमंच की बारीकियां सीखीं। इसके बाद गिर्दा गीत और नाटक प्रभाग, आकाशवाणी में नौकरी करने लगे, स्व० जीत जरधारी और बंशीधर पाठक "जिग्यासू" के माध्यम से गिर्दा ने रेडियो प्रसारण में अपने कई कार्यक्रम दिये। तारा दत्त सती जी के सथ मिलकर मोहिल माटी और रामायण नृत्य नाटिकायें लिखी तो लेनिन पन्त जी के साथ अंधाधुन्ध नाटक का निर्देशन और संगीत रचना की। इसी दौरान धनुष यग्य और नगाड़े खामोश हैं, नाटक भी लिखे। बाद में मिस्टर ग्लांड, अन्धेर नगरी और भारत दुर्दशा नामक नाटकों का निर्देशन भी किया। गिर्दा ने अनेक कुमाऊंनी गीतों का धुन सहित हिन्दी में भी अनुवाद किया है। उर्दू से कुमाऊंनी और कुमाऊंनी से उर्दू रचनाओं का भी अनुवाद इन्होने किया। फैज की प्रमुख रचना "हम मेहनतकश जग वालॊ" का कुमाऊनी अनुवाद "हम कुल्ली कबाड़े, ओड़ बारूडी़" इसका एक उदाहरण है।
       गिर्दा जनगीतों के माध्यम से संघर्ष की प्रेरणा देते हैं, गिर्दा पहाड़ के किसी भी जनांदोलन से कभी अलग नहीं रहे, चिपको आन्दोलन हो या शराबबन्दी या पहाड़ों के पर्यावरण से खिलवाड़ करती कार रैलियां, उत्तराखण्ड आन्दोलन आदि सभी संघर्षों में गिरदा ने अपनी कविताओं से हमेशा आन्दोलनकारियों का हौंसला बढ़ाया है। आज गिर्दा उत्तराखण्ड में जन आन्दोलनों के पर्याय बन चुके हैं, गिर्दा केवल इन आंदोलनों की रीढ ही नहीं बल्कि कलम के सिपाही भी हैं, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लेखों के माध्यम से इनके विचार छपते रहते हैं। ननीताल समाचार, पहाड़, जंगल के दावेदार, उत्तरा, जागर, युगमंच, शिखर संगम आदि संस्थाओं से इनकी करीबी सहभागिता है।
        हमारी कविता के आंखर (डा० शेखर पाठक के साथ), शिखरों के स्वर (दुर्गेश पन्त के साथ) नगाड़े खामोश हैं (नाटक), धनुष यग्य (नाटक), रंग डारि दियो हो (संकलन-सम्पादन) इनकी प्रकाशित रचनायें हैं। लोक गायक झूसिया दमाई पर ये शोध कार्य भी कर रहे हैं।
       गिर्दा नें राजीव कुमार निर्देशित फीचर फिल्म "वसीयत" में अभिनय भी किया है।

 

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