Author Topic: Articles & Poem by Sunita Sharma Lakhera -सुनीता शर्मा लखेरा जी के कविताये  (Read 26900 times)

Sunita Sharma Lakhera

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 135
  • Karma: +14/-0
नारी तेरी यही कहानी....



सुबह से सांझ की सफाई तक  ,

चूल्हा ,दफ्तर ,घर आंगन तक ,

वंश बढ़ाने से पढ़ाने तक ,

नारी तेरी यही कहानी !



अपने स्वाभिमान को तिलांजली देने तक ,

दुःख -वेदना में भी मुस्कुराने तक ,

लट्टू सी रिश्तों की बागडोर निभाने तक ,

नारी तेरी यही कहानी !



बीमारों की बीमारी से अपनी बीमारी तक ,

बूढों की सेवा से अपनी पीड़ा तक ,

तानो व् तिरस्कृत स्वर व् दहेज अग्नि तक ,

नारी तेरी यही कहानी !



संघर्ष ,अधिकारों व् प्रताड़ना तक ,

अचल त्रिकाल के प्रतिकार तक ,

पिछड़ी उद्दंड  मानसिकता के प्रहार तक ,

नारी तेरी यही कहानी !

Sunita Sharma Lakhera

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 135
  • Karma: +14/-0
आयें दहेज़ लोभियों को परिभाषित करें

द --------- दरिन्दे व् अभिशाप हैं समाज पर ऐसे लोग ,
हे --------- हैवानियत बरसाते हैं बहुओं पर ऐसे लोग ,
ज ---------जहरीले विकृत परिवार में दिखेंगे ऐसे लोग ,
लो --------लोग वर पक्ष के वधु पक्ष से धन- मान हडपने वाले लोग ,
भी --------भीषण कुंठित मानसिकता वाले क्रूर व् रूखे लोग !
यों -------योजनाबद्ध तरीके से करते हैं वध बेटियों का ऐसे लोग !

दहेज़ लोभियों को पहचाने और अपनी बेटियों का जीवन बचाएँ

Sunita Sharma Lakhera

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 135
  • Karma: +14/-0
मेरी परछाई

कभी आईने  का धूल सा  ,
कभी जीवन का फूल सा  ,
कभी खिलखलाता सा ,
कभी मुरझाया सा ,
कभी मस्त पंछियों सा ,
कभी सुस्त घोंगा सा ,
कभी प्यारा दुलारा सा ,
कभी लगता अंगारा सा ,
कभी बूढा बरगद  सा ,
कभी नन्हा पौधा सा ,
कभी बहती सरिता सा ,
कभी गंभीर समुन्द्र सा ,
मेरी परछाई मेरी  प्रेरणा सा !१०/१०/२०१२

Sunita Sharma Lakhera

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 135
  • Karma: +14/-0
रिश्तों  का  दर्पण

आत्मा के भीतर तक संवेदनाओं का  धरातल पैदा करता है ' रिश्ता '! रिश्तों का अमरत्व  त्याग , स्नेह व भावना दर्पण  में निहित होता है ! यह  वह  अहसास होते हैं जिनके विभिन्न आयाम होते हैं ! इंसान सामाजिक प्राणी है  और संसार में जीवन यापन करने के लिए रिश्ते उसे आत्मबल देते हैं ! उसके जीवन में प्रत्येक रिश्ते की अनमोल पहचान होती है !

जिन्दगी के प्रारंभिक कड़ी  में माँ बाप के परिवार से प्राप्त रिश्ते उसके लिए अनमोल होते हैं फिर जब वह प्रथम बार घर से बाहर निकलता है तो पारिवारिक परिवेश से बाहर निकलता है!  पारिवारिक  परिवेश से बाहर उसे मित्रों का वह अनूठा संसार मिलता है जिसमें वह बहुत  आनंद ,स्नेह और अटूट विश्वास के बंधन में बंध जाता है ! उसके बाद जीवनसाथी और उससे जुड़े नवीन रिश्तों के अनुपम संसार में वह सुख दुःख  में अपने आस पास रिश्तों का सुंदर संसार देखता है !

रिश्तों की बागडोर तभी मजबूत बनती है जब उसमे श्रधा  ,अटूट प्यार और विश्वास हो ! रिश्ते अपने आलोकिक चमक  तभी प्राप्त करता है जब उसे संजोना और निभाना  आये ! एक दूसरे   के मान स्वाभिमान का ध्यान रखा जाये ! किन्तु सम्बन्धों की प्रगाढ़ता दोनों तरफ निबाही   जानी   चाहिए ! जिन्दगी में वसंत की भांति होते हैं रिश्ते ,इनमें जरा सा भी दरार  या खटास आ जाये तो रिश्तों की कड़वाहट जीवन में पतझड़ के समान बन जाती है ! यदि रिश्तों में संदेह या द्वेष आ जाए तो इसके परिणाम त्रासदी के मार्गी  बन जाते हैं ! जिस प्रकार मीठी वस्तुओं पर चींटियों का आक्रमण होता है इसी प्रकार इर्ष्या , संदेह , द्वेष , कट्टु बोल  रिश्तों में दीमक समान है , जो सम्बन्धों को शनै:  शनै:  खोखला करती जाती है !

यदि आप अपने इर्द गिर्द रिश्तों की सुंदर वाटिका चाहते हैं तो एक कुशल  माली की भाँती उनका ख्याल भी रखना होगा ! खून के रिश्तों  में गरिमा तो होती है किन्तु सामाजिक दायरों में सिमटे मानवीय रिश्ते भी वही देख रेख और अपनत्व चाहते हैं ! जिस रिश्ते की नीव कमजोर हो और आपसी आत्मीयता का आभाव हो तो उस रिश्ते की गरिमा की उम्र छोटी होती है ! यदि अपने अहं को बनाये रखने के लिए यदि एक दूसरे के मन को आहत करेंगे तो समय के साथ उसका भावनात्मक आधार की चरमरा जायेगा

जीवन  के हर मोड़ पर हमे अपने परिजन , परिचित और अजनबी लोग मिलते जो भावनात्मक कड़ी से हमारे रिश्तों रुपी माला में मनकों की भाँती सम्मिलित होते चले जाते हैं ! कुछ रिश्ते जीवनपर्यन्त  साथ रहते हैं तो कुछ अपनी  खट्टी  ,मीठी  और कसैली यादों की दास्ताँ पीछे छोड़ जाते हैं ! रिश्तों की डोर बड़ी कमजोर होती है , इसे मजबूती हमारी आपसी संवेदनाएं देती है ! एक दूसरे की प्रेरणा बनना चाहिए और एक दूसरे के आत्मसम्मान पर विशेष ध्यान देना चाहिए !

रिश्तों  की नीव बरकरार रखने के लिए आत्मीयता ,एक दूसरे  के दुःख कम करने के भाव , विश्वाश और आकर्षण  नितांत आवश्यक निधि है ! इन गुणों को दोनों पक्षों द्वारा निभाया  जाना अनिवार्य  होता है ! रिश्तों की पकड़ मजबूत बने रखने के लिए आपसी स्नेह मौलिक है ! उपहास करना और मजाक करना ...दोनों की परिधि स्पष्ट रखनी चाहिए  नही तो वहां कड़वाहट  भर जाएगी ! हमे तो समाज में रिश्तों के  कुशल शिल्पकार की भूमिका में खरा साबित होना होगा तभी हमारी कला की इस संसार में प्रशंसा होगी !रिश्तों में पात्रता और पवित्रता मौलिक हैं !

मित्रता के  रिश्ते में विश्वास  अहम होता है ! अपने अहं या स्वयं को ऊँचा साबित करने के लिए अपने मित्रों के जज्बात के साथ खिलवाड़ से आपको सकून तो मिल जायेगा किन्तु उस उपहास से आहत मन प्रतिशोध की चाह जीवन तक बर्बाद कर सकता है ! हर रिश्ते में मर्यादा का आचरण मान्य है ! रिश्तों को निभाने में वाणी अहं कड़ी है जो संबंधों में मधुरता या विकृता का मापदंड तय करता है ! प्रत्येक व्यक्ति  के मानसिक ,सामाजिक और पारिवारिक आवश्यकता भिन्न होती है ! ऐसे में एक दूसरे के साथ भावनात्मक  संबंध रखने पर ही रिश्ते सफल होते हैं ! जीवन में अक्सर ऐसा भी होता है की खून के रिश्ते आँसू देते हैं  किन्तु परायों से प्राप्त आत्मीयता व्यक्ति विशेष की जीवन दशा व् दिशा बदल देती है ! पुरानी कहावत  यहाँ फीकी पड़ जाती है कि इस जहाँ में केवल खून के रिश्ते महत्वपूर्ण होते हैं !

  आधुनिकता का आवरण अब रिश्तों पर दिखने लगा है ! आज की आधुनिकता की दौड़ में रिश्तों को स्वार्थ और आत्मीयता के आभाव ने पूरी हिला कर रख दिया है ! खून के रिश्ते हो या आपसी विश्वास के रिश्ते ...सभी पर इर्ष्या और द्वेष का रंग घुलने लगा है     आज के परिवेश में एक दूसरे से प्रतिशोध , गिरता आत्मविश्वास , झूठा दंभ , आत्म केन्द्रित जीवनशैली  और संबंधों का व्यवसायीकर्ण  दिखने में आ रहा है जिसका मुख्य कारण धर्म के प्रति अरुचि जो अशांति और अवसादों जैसे मनोवेगों को बढ़ावा दे रहा है !

हम सभी को ध्यान रखना होगा हर रिश्ते के लिए अहं  वह जहर जो तब तक डसती रहेगी जब तक आपसी सम्बन्ध विच्छेद न हो जाये !आपसी सामजस्य  और आत्मीयता  रिश्तों के लिए अमूल्य धरोहर है !  बस एक कथनी  जो किसी शायर कि जुबानी है सदैव याद रखनी होगी --"   जिंदगी की किताब के कुछ पन्ने होते है! कुछ अपने और कुछ बेगाने होते हैं! प्यार से संवर जाती है जिंदगी! बस प्यार से रिश्ते निभाने होते है !"   

Sunita Sharma Lakhera

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 135
  • Karma: +14/-0
नवरात्रों के पावन सुअवसर पर दुर्गे माँ को समर्पित मेरी रचना .

जय जय माँ दुर्गे

मरणोंमुख जग को आश्वासित निस दिन करती तू हे दुर्गे माँ ,
व्यथित अंतर्मन को ज्योतिर्मय बनाती तेरी विराट छवि हे दुर्गे माँ ,
तेरी आभा मंडल में सुशोभित तेरे नौ स्वरुप हे दुर्गे माँ ,
इस सुप्तयुग को विश्व शान्ति की नव चेतना की प्रेरणा से भर दो हे दुर्गे माँ ,
अमानवता के मरण आचरण को मानवता के शुभ्र आचरण से भर दो हे दुर्गे माँ ,
वाणी बने प्रखर और ममता का हो अलंकर्ण तेरी महिमा में हे दुर्गे माँ ,
अहंकार और द्वेष से बंटते अपने बच्चों की रक्षा करना हे दुर्गे माँ ,
स्पन्दित कर दे आज तू हर श्रापित कण-कण को हे दुर्गे माँ ,
इस धरा की नियंता व् अभियंता तू ही तू हे दुर्गे माँ ,
तेरी इच्छा की प्रतिध्वनि से स्पंधित होता ये जीवन हे दुर्गे माँ ,
बिना सुकृत्य करे फलांक्षा बसती सबके हृदय में हे सर्वज्ञानी दुर्गे माँ ,
विषादित जीवन में भर दे गंगा सा त्याग और धैर्य हर ह्रदय में हे दुर्गे माँ ,
तेरी तटस्था और संवेदनशीलता बनाती मनुष्य को स्थितप्रज्ञे हे दुर्गे माँ ,
तेरी हम निस दिन करें तेरी ही वंदना हे विश्व कल्याणी हे दुर्गे माँ !!

Sunita Sharma Lakhera

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 135
  • Karma: +14/-0
इंसानियत पर सवाल

अनेक रूप बदलकर तुम क्या परख रहे हो ?
क्या चरित्र  के बुनकर बन इतरा रहे थे ,
सत्यांकन  हो जिस उर में उसका पारखी है पारस !

समुंद्र में उफान दिखाकर तुम क्या परख  रहे  हो ?
क्या अपनी  तीव्र लहरों की संरचना से डरा रहे  थे ,
उसके  विराट हृदय में लहरों का स्नेह है बसता !

 अग्नि ज्वाला बन तुम  क्या परख  रहे  हो ?
क्या अपनी उष्णता  का दम्भ भर रहे थे ,
अग्नि पावक भी तो है वो यज्ञ  की  शान !

कंटक  बन तुम क्या परख रहे हो ?
क्या अपने प्रहार से लहू की धार देख रहे थे ,
कंटक शूल भी तो है जीवन संघर्ष का  पथ प्रेरक !

मेघ बनकर तुम क्या परख रहे हो ?
क्या अपनी गर्जन का प्रभाव दिखा रहे थे ,
मेघ विपदा भी हैं तो धरा की भी है अमृतधारा !

मृदा  बनकर तुम क्या परख रहे हो ?
क्या अपनी  माँ के  गर्भ  का शोषण देख रहे थे ,
मृदा कब्र भी है तो है वो जीवनदायिनी !

पवन बन तुम क्या परख रहे हो ?
क्या अपने वेग से सृष्टी को आतंकित कर रहे थे ,
पवन आपदा भी तो है वह भी जीवन तरंग !

काष्ठ  बनकर तुम क्या परख  रहे  हो ?
क्या  अपने  बल से डरा  रहे थे ,
काष्ठ  मारक  भी है वो भी  तारक !१९/ १०/२०१२

Sunita Sharma Lakhera

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 135
  • Karma: +14/-0
जीवंत मृत्यु

जुदा होते रिश्तों पर वर्षों अश्रुं हम बहाते हैं ,
कुछ छल से ,कुछ विपदा से ,तो कुछ यम के मारे हैं !

मौत यदि क्रूर तो जीवन कटु सत्य है ,
रिश्तों को खोकर दुःख सहने की हिम्मत जो बढती है !

दूसरों को सुख न दे सको तो उनको दुःख भी नही देना है ,
पल पल जीते हुए भी इस संसार में मरकर जीना है !

लोग हमसे मरणॊपरांत जुदा नही होते हैं ,
वे तो जीवन भर परछाई बन साथ हमारे चलते हैं !

हमारे चेतन मन में जो गमहीन विचार होते हैं ,
उनका प्रतिपल हमे त्याग कर चित को शांत करना है !

भावना में लायें श्रेष्टता और कर्मों को सत्मार्गी बनाना है ,
देह की नश्वरता को समझ जीवंत मृत्यु निभाना है !

आभारी केवल परम पितामह का बनना है ,
सुख दुःख में एक सा रहकर जीवन जंग जीतना है !!
२०/१०/१२

Sunita Sharma Lakhera

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 135
  • Karma: +14/-0
                                           
                                              मन

मन बहुत कोमल होता है और इसको वश में रखना कठोर व्रत  के समान होता है ! यदि मन अंतर्द्वंद  का शिकार होता है  तो प्राणी   का मस्तिष्क असंतुलित हो जाता है! जिन मनुष्य का मन शीघ्र  विचलित हो जाता है उसके परिवार में अनुशाषनहीनता  , अवव्यवस्था  , दुराचार जैसे गुण  पनपने लगते हैं ! मनोनिग्रह   अत्यंत महत्वपूर्ण धरोहर है ! इसके बिना न तो आत्मिक संतोष और न ही समृद्धि  प्राप्त होती है ! प्रत्येक  मनुष्य का मन भिन्न भिन्न आनंद में संतोष  प्राप्त करता है ! भौतिक आनंद जिसमें  भौतिक सुखों  की  वृद्धि  के लिए हर पल  अग्रसर रहता है  और फलांक्षा  में मन  में संतोष अथवा तृष्णा धारण कर  लेता है किन्तु जिस मन को आलौकिक  आनद  को  प्राप्त  करना होता है व् ब्रह्म  ज्ञान  की खोज  में  तत्पर रहता है वह अपने को  ईश्वर के हवाले  कर हरेक परिस्तिथि में संतोष और आनद प्राप्त करता है ! मन  को तीन शक्तियाँ अपने नियंत्रण में रखती है -सतोगुण , रजोगुण  और तमोगुण ! प्रत्येक व्यक्ति के मन में इन तीनो शक्तियों  का स्वरुप विद्यमान रहता है ! बस  अनुपात का फर्क ही एक मनुष्य को  दूसरे से अलग करता है !
 मानव मन में अस्तिरथा  की स्तिथि का कारण भी यही है ! इस मन के दो भाव हैं - चेतन और अवचेतन ! अवचेतन मन को अशुभ नही कहना चाहिए !  अपितु यह हमारे अतीत के कर्मो का भंडारण   है  जिससे सदैव सीख मिलती है ! चेतन मन  अहंकारी और भावुक होता है किंतु  अवचेतन मन  पर  करुणा  और धैर्य का प्रभाव रहता है  !  मन में नित्य दिन  दोनों भावों का समावेश  होता है ! जिसमें  वक्त और परिस्तिथि के हिसाब से उसमें घटत और बढ़त  होती है !
चेतन  मन को अवचेतन मन की ओर ले जाना कठिन है इसीलिए उसकी प्राप्ति  के लिए सत्संग अत्यंत आवश्यक  है , जिसका गुण एकाग्रता है ! यह मन तब भटकता है  जब हम स्वयं  की खोज नही करते ! हम निरर्थक  विवादों  में  दिलचस्पी  और  दूसरों  के  कार्य  कलापों  की  जानकारी  एकत्र  करने में उत्सुकता रखते हैं , अपने दोषों को भूलकर  , दूसरों के दोषों में अपना अमूल्य समय खराब करते हैं  ,तो मन चंचल होकर भटकता  रहेगा !
मनोनिग्रह   कोई सरल कार्य नही ! इसके लिए आत्मविश्वाश  और दृढ निश्चय अत्यंत आवश्यक है ! सबसे पहले निर्मल और पवित्रता युक्त शुद्ध आचरण  को जीवनशैली  बनाना होगा ! मन की इन अशुद्धियों को एक एक करके तोडना होगा ! घृणा , क्रोध , भय , ईर्ष्या , लोभ  और पराकर्षण का त्याग  आवश्यक हैं ! यह  तभी संभव है जब हम सतोगुण को बढ़ने वाली क्रिया और सात्विक भोजन पर ध्यान दें ! सारा  ध्येय  सैट , चित ,आनंद की प्राप्ति  होनी चाहिए ! जिन्हें अपने मन को सतोगुण की ओर  मार्गी  बनाना है  , उन्हें  दुर्भावनाओं , शिकायतों  और छोटी सोच से बचना चाहिए ! बोझिल मन को इस अवस्था की प्राप्ति मुश्किल से होती है !
हमेशा  सृजनशीलता की ओर तत्पर रहना चाहिए  ! आत्मनिरीक्षण  द्वारा प्रत्येक दिवस के घटित कार्यकलापों पर आत्ममंथन  अत्यंत आवश्यक है ! मन को सदैव अंत : कर्ण  में तीक्ष्ण  दृष्टी  से देखना चाहिए और उनमें उत्पन्न विचारों को शोध मनुष्य द्वारा किया जाना अनिवारिय है  की  वह कुमार्गी या सुमार्गी बन रहा है !
अन्तत : मन को नियंत्रित कर सुखी जीवन यापन करना मनुष्य का परम धर्म होना चाहिए जो उसे शुद्ध आचरण और संतोष की अविरल धारा की ओर अग्रसर करती है !

Sunita Sharma Lakhera

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 135
  • Karma: +14/-0
सहनशीलता

सहनशीलता  का अर्थ है अपने भीतर शील प्रवृति एवं सहने की शक्ति का समायोजन करना ! सहनशीलता द्वारा मनुष्य कठिनतम परिस्तिथि में भी स्वयं को असहाय नहीं समझता ! सहनशीलता एक आनुवंशिक गुण न होकर अर्जित गुण है  जो समय व् परिस्तिथि के अनुरूप व्यक्ति के अंदर विकसित  होती चली जाती है ! आत्मविश्वास  यदि हमारे स्वाभाव में प्रबल हो तब हम स्वयं को सहनशीलता की परिपाटी में विजयी साबित कर पायेंगे ! मनुष्य में यह गुण तभी आएगा जब वह किसी भी बात से व्यग्र , उग्र या उतेजित न होकर अपने व् अपने समाज में रहने वाले लोगो के विचारों के साथ तालमेल बैठाते  हुए ही अपने निर्णय आगे लायें !
सहनशील होने के लिए हमे  आत्मविश्वास के साथ क्षमा  भाव भी विकसित  करना होगा जिससे हम दूसरो के  वचनों  व् कर्मों से प्रभावित न हो पाएं !हमे अहंकार  दिखाई ही नही देता !पर उससे होने वाले नुक्सान का बोध देर से होता है !वाणी और व्यवहार  व्यक्ति के चिंतन  व् व्यक्तित्व की खरी कसौटी है ! समयित बोलने वाले असम्यित बोलने वाले से अधिक आत्मविश्वासी  और उन्नंत ह्रदय वाला होता है !छोटी-छोटी  प्रतिक्रियाओं में हम अक्सर बड़े फैसले कर बैठते हैं।  भूल जाते हैं कि हमारे इन फैसलों से रिश्ते खंडित हो  जाते हैं, भावनाएं तड़क जाती हैं। अपने क्रुद्ध व्यवहार की  प्रतिक्रिया से हमें सब वापिस  मिल जाता है, पर रिश्तों की नीव भी उजड़  जाती है ! सहनशील व्यक्ति अल्पभाषी व् मृदुभाषी होता है ! हमारी वाणी में वशीकरण  मन्त्र  होते है जिसका इस्तेमाल  करने का सलीका हमारे भीतर होना चाहिए ! आत्मसम्मान  के साथ साथ  दूसरे   के स्वाभिमान को भी उतना ही सम्मान तभी दे पायेंगे जब हम अपने ह्रदय  में  रुपी सहनशीलता  कमल को खिला दें ! शुभ विचार परमार्थ के मार्गी है जो एक आत्मविश्वासी सहनशील व्यक्ति  के  मस्तिक  में पनपते हैं !
 प्रेम एक आत्मिक गुण है  इसे जताया नही जाता अपितु निभाया  जाता है जो एक सहनशील  व्यक्ति  की पहचान होती है !सहनशीलता रुपी गुण की प्राप्ति हेतु सर्वप्रथम उन कारणों  को समझने होंगे जिनकी वजह से हम अपना मानसिक असंतुलन खोकर दूसरों के साथ दुर्व्यह्व्हार करने लगते हैं !आत्मज्ञान ही मनुष्य को सहनशील बनता है जो सत्संग द्वारा प्राप्त होता है! जो लोग प्रतिकूल परिस्तिथि में स्वयं को समयनुसार ढाल लेते हैं और समय के अखंड प्रवाह में सहनशीलता के साथ बहते बहते एक दिन पूज्य शालिग्राम बन जातें हैं तो ऐसे लोग हमारे आदर्श बन जाते हैं व् महापुरुष कहलाते हैं ! तो आयें सहनशीलता रूपी गुण  को अपनाकर  अपना जीवन उन्नत बनाएं !

Sunita Sharma Lakhera

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 135
  • Karma: +14/-0
---GARJIA  TEMPLE , RAMNAGAR , UTTARAKHAND

TOURIST  RESORT


14 KMs  from  Ram Nagar ,on the way to Ranikhet this temple stands on huge rock in midst of river Kosi  Its heritage Garjia village . Its  one of the amazing temple of goddess Parvati  with surrounding  picturesque beauty .The whole area was earlier covered with dense forest which now is cleared by the locals . Maximum people are devotees , priests and their families. Kosi  river is life line of the people as well as fauna of Jim Corbert  National Park .Its the place of  meditation and trekking.. Its a great  panaroma of  ecstasy of vivid flora and fauna .

THE  LEGEND
 In the Markendeya Purana, the Kosi is described as the primal force. Due  to the violent nature of the Kosi during monsoon season, legend says that Parvati, daughter of Himalayas and the wife of Shiva, after defeating the demon Durg, became known as the warrior goddess Durga who transformed into Kaushiki. In Ramayana, the river Ganges is depicted as her elder sister.On this rock where the temple stands was the place where Goddess Parvati  worshipped  and sought blessing of  being married to lord SHIVA .


The legend also   goes that this place was earlier covered with dense forests. But the people living here saw Goddess Parvati’s idol  on the mountains.Seeing the sights of her idol, the commoners built Garjia Devi’s temple  here on the same rock . It is believed that the ancient  temple flowed to its current place with a flood in the river Kosi from NEPAL . Bhairav  when saw it floating wanted to stop it but could not do so. Bhairav then asked Goddess Parvati to stay with him at the same place. It is believed that since then Devi Garjia has been living in the same place as Upeta. In ancient times Goddess Parvati was also known by the name Upeta.

THE  FAITH

Thousands of devotees arrive during Kartik Poornima, a Hindu holy day celebrated on the fifteenth lunar day of Kartik (November – December). It is also known as the festival of lights of the gods.The Kartik Purnima festival also coincides with the Sikh festival of Guru Nanak Jayanti..  On the occasion of kartik  poornima, as a special  bath  large number of devotees take a dip in the river Kosi. In addition to this, people visit this place on the auspicious Shivraatri  in huge numbers.


THE   SIGNIFICANCE


The temple is one of the most ancient temples of India. It is believed that Devi Garjia blesses the devotees only after the completion of Baba Bhairon’s puja with the offerings of  KHICHDI before leaving the shrine ..Devotees offers coconut, vermilion, incense, lamp, red Chunnerie etc as offerings to  goddess Parvati . Mere remembrance of Devi Parvati can solve all problems. Devi Parvati is the ultimate life and energy source and devotion to her relieves a person from all tensions and problems. She is also known as Kalratri. She belongs to the Gaur community and hence is also called Mahagauri. Devi Parvati blesses all her devotees and solves all of their problems. the unmaaried , the separated or those facing family problems  offer  bell by tying  them  on the railings  and umbrella to Bhairav . After being blessed they have to revisit  the shrine  to open the knot of bell .. goddess parvati has special affection for couples .

TABOOS

To reach the shrine barefooted  from 1 km distance  and with fasting.. avoid visit during Monsoon when the whole temple gets submerged in the Kosi river .N avratris  is  the occasion  of complete fasting and meditation.

----------------------------------------------- JAI GARJIYA MAA--------------------------------------------

 

Sitemap 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22