Author Topic: Articles & Poem by Sunita Sharma Lakhera -सुनीता शर्मा लखेरा जी के कविताये  (Read 28064 times)

Sunita Sharma Lakhera

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शिक्षा और संस्कार

सुंदर संस्कारवान समाज का निर्माण  बच्चों में पड़ने वाली दृढ  नीव पर आधारित होती है ! यदि नीव कमजोर होगी तो देश  की नाव भी डगमगाती रहेगी ! इस दिशा में प्रत्येक  व्यस्क को कार्यरत रहना होगा !
बच्चे का जीवन सफेद कागज जैसा होता है. उस पर व्यक्ति जैसे चाहे, वैसे चित्र उकेर सकता है. बच्चे को जिस दिशा में मोड़ना हो सरलता से मोड़ा जा सकता है. एक दृष्टि से यह मन्तव्य सही हो सकता है पर यह सर्वांगीण दृष्टिकोण नहीं है. क्योंकि हर बच्चा अपने साथ आनुवंशिकता लेकर आता है, गुणसूत्र (क्रोमोसोम) और संस्कारसूत्र (जीन्स) लेकर आता है. सामाजिक वातावरण भी उसके व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता  है. इसका अर्थ यह हुआ कि संस्कार-निर्माण के बीज हर बच्चा अपने साथ लाता है. सामाजिक या पारिवारिक वातावरण में उसे ऐसे निमित्त मिलते हैं, जिनके आधार पर उसके संस्कार विकसित होते हैं.

शिक्षा का अंतिम लक्ष्य सुंदर चरित्र है। मनुष्य के व्यक्तित्व के सभी पहलुओं का पूर्ण और संतुलित विकास करता है। इसके अंतर्गत बच्चों का भावनात्मक और आध्यात्मिक विकास ही होता है।उच्च स्तरीय शिक्षा द्वारा बच्चों में पाँचों मानवीय मूल्यों सत्य, प्रेम, धर्म, अहिंसा और शांति का विकास होता है।आज की शिक्षा मनुष्य को विद्वान एवं कुशल डॉक्टर, इंजीनियर या अफसर तो बना देती है परंतु वह अच्छा चरित्रवान इंसान बने यह उसमें होने वाले संस्कारों पर निर्भर करता है।एक पक्षी को ऊँची उड़ान भरने के लिए दो सशक्त पंखों की आवश्यकता होती है उसी प्रकार मनुष्य को भी जीवन के उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए दोनों प्रकार की शिक्षा की आवश्यकता होती है। सांसारिक शिक्षा उसे जीविका देती है और आध्यात्मिक शिक्षा उसके जीवन को मूल्यवान बनाती है।

शिक्षा और संस्कार  एक दूसरे  से जुड़े हैं ! शिक्षा और संस्कार से ही देश का निर्माण हो सकता है। जब व्यक्ति में शिक्षा का विकास होगा, तब वह विकास की ओर आगे बढ़कर समाज के लिए कार्य करेगा।समाज के बदलाव के लिए व्यक्ति में अच्छे गुणों की आवश्यकता होती है और इसकी नीव बाल्यकाल में ही रख दी जानी चाहिए ! बच्चों  को तीन गुणों  से  प्रखर बनाएं जिससे वह समाज के प्रति अपनी शक्ति  व् अपना  कर्म  भी सकरात्मक रखेगे  ! ये गुण हैं  , ज्ञान  ,कर्म  व् श्रधा ,जब यह तीनों गुण व्यक्ति में होंगे, तो वह समाजसेवा में आगे बढ़ेगा। आज जो रास्ट्र व्यापी अनैतिक्वाद  प्रदूषण  हमारे  समाज को दूषित कर रहा है उसका मूलभूत कारण  बच्चों में संस्कारों का आभाव और इसका दोष वयस्कों पर आता है जो स्वयं भी अपने भारतीय अमूल्य संस्कारों के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं ! बाहय  सभ्यता का आँख मूँद कर अनुसरण करना ही  हमे पतन की ओर  ले जा रहा है !

 प्राय: देखा जाता है कि माता-पिता अपनी संतान के लिए भौतिक सुख-सुविधाओं के साधन जुटा देते हैं, शिक्षा एवं चिकित्सा की व्यवस्था कर देते हैं,किन्तु उनके लिए सर्वांगीण विकास के अवसर नहीं खोज पाते। कुछ अभिभावक तो ऐसे होते हैं, जो उनकी शिक्षा और आत्मनिर्भरता के बारें में भी उदासीन रहते हैं। उचित मार्गदर्शन के अभाव में अथवा अधिक लाड़-प्यार में या तो बच्चे कुछ करते नहीं या इस प्रकार के काम करते हैं, जो उन्हें भटकाने में निमित्त बनते हैं। ऐसी परिस्थिति में हर समझदार माता पिता का यह दायित्व है कि वे अपने बच्चों की परवरिश में संस्कार-निर्माण की बात को न भूलें।

हम सभी को याद रखना होगा कि शब्दों का और भावों का निरिक्षण करते हुए दूसरों के मान सम्मान को प्रमुखता देना ही संस्कारवान होने के लक्षण होते है , जो हमे बच्चों को  घर ,स्कूल  और सामाजिक परवेश में सिखाते रहना होगा !रास्ट्र  निर्माण  की  दिशा  में  बच्चों  की अपेक्षा  वयस्कों  की  नैतिक  जिम्मेदारी अधिक है वे अपनी भूमिका को पूरी निष्ठा  से निबाहें और सुंदर परिवेश का निर्माण में सहभागी बने ! आयें बच्चों को गुरुकुल पद्धति  में  सिखाये  जाने  वाली  परम्पराओ से अवगत कराएं और उन्हें गुणवान ,ज्ञानवान और आदर्श  नागरिक  बनाने   में  अपने  दायत्व  को  भरपूर निबाहे !

Sunita Sharma Lakhera

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आत्म मंथन

दिलों में बुझ रहे मानवता के दीप है,
हर सडक पर खून की बरसात है ,
आगे बढकर कोई मदद क्यूँ करे,
कुशाशन से मिलता क्रूर प्रहार है !

इंसानी विभिस्ता में गमगीनियों सा माहौल है !
नैतिकता अधमरी ,चीत्कारों से अंतर्मन काँपा है !

दहसत फ़ैलाने वालो से न डर ,हौसला रख !
मंजिल अब दूर नहीं , साँसों के आवेग को परख !!

जीवन की तन्हाईयों में खुद की तलाश कर ,
परायी पीड में अपना जीवन निसार कर ,
वक्त के थपेड़ों की उथल पुथल ,
सब्र का मोल समझ जीवन उन्नत कर !!

बेसहारों का तुझे अडिग संबल बनना होगा !
पतझड़ झेलते बुजर्गों का आत्मबल बनना होगा !!

समाजसेवा देता आत्मसंतोष ,मन से हटाता आक्रोश !
आत्म मंथन अमृत समान , जीवन में लाये नया जोश !
___________________________________________________
सभी आदरणीय सदस्यों को सादर नमस्कार !

Sunita Sharma Lakhera

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दरख्त की व्यथा
************************
तुम्हारी हर शाख पर
कई चुनरी , धागे बांधकर ,
मनौतियों का भार लादा गया ,
दुखियारों का मनमीत बन ,
तूने बाँहें पसार सबका साथ दिया
बना तू सुख दुःख का संबल
आस्था का बंधन
एकता का परिचायक
जहाँ लगे दुखों की कतार
पीपल "औ " बरगद
तेरे रिसते घाव
अतृप्त आत्मा
बाट जोहती रही
सदियों से अपलक
अपने कर्णधार का
रोक सके ....
टोक सके ....
इस अन्धविश्वास को
कि मैं मुक्त करता
लोगों के संताप को ,
आह्ह .............
और मेरा संताप
युगों से पराधीन
अंतहीन .....
अस्तित्व की तलाश
वनस्पति जगत
की स्वछंदता
से वंचित
बंधा हूँ
प्रकृति की उर्जा
कैसे पहुंचे
चुनरियों के नीचे
वनदेवी मेरी माँ
के आँचल से छीनकर
मन्दिरों के प्रांगण में
लाकर बाँध दिया
मुझे उद्धारक मान
और तुम्हारे पापों
का परिणाम भुगत रहा
अपने जन्म को कोस रहा
नहीं बनना .......
मुझे पूजनीय वृक्ष
चाहता ममत्व बस .....
जो मानव ने दिया नही
बंधन बाँधने खोलने
के सिलसिले में
मेरे इर्दगिर्द
चक्कर काटने में
क्या मेरे अंतर्मन में
झाँका कभी
टटोला कभी
कि मैं निष्प्राण नहीं ,
संवेदना रहित नही
चाहता प्यार का
सुंदर संसार
आशा "औ " विश्वाश
का समागम
रहे बरकरार
बांधो प्रेम का
बंधन आपस में
अच्छे कर्मो के
आधार से
काटो अपने पापों को
ईश्वर है सबका
सबसे बड़ा संबल
पूजो उसे हर
मानव 'औ " जीव में
चुनरी है ...
नारी श्रृंगार
सम्मान की सदा
हकदार .....
मेरी हर शाख
तुमे देगी आशीष
गर अपना लो
मेरी हर सीख !!

Sunita Sharma Lakhera

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महिला दिवस

 समाज को महिला दिवस की दरकार नहीं
एक दिवस से उसको कोई सरोकार नहीं
सुनियोजित करो अब पुरुष दिवस
महिलाओं को यूँ बरगलाने की जरूरत नही

हर जगह हर दिवस सम्मान कब दोंगे
किसी एक दिवस को ही क्यूँ पूजोगे
कोख से लेकर मृत्यु तक बहिस्कार
ऐसा अनर्थ कब तुम सब छोड़ोगे

एक दिवसीय सम्मान नही माँग रही
युगों से समाज से प्रश्न पूछ रही
अधिकारों की बड़ी बड़ी बातें छोडो
अपने हालातों से जो खुद ही जूझ रही

महिलाएं भी अपने कर्तव्य समझें
हक पाने के लिए कदम बढ़ाएं
अपने वर्ग के दर्द को समझें
अपने प्रति हो रहे दुर्व्यवहार को समझें

नारी अराध्य भी तो पतिता भी
उद्धारक , सवेदनशील व् क्रूर भी
लडको को सिर पर बैठाना
अत्याचारों की गुहार क्यूँ फिर भी

नारी तुम शील ,शालीनता व् धैर्य की धवल किरण बनो
पुरुष तुम नशा , घृणा व् हिंसा को त्याग सुदर्शन चरित्र बनो

पुरुष व् महिलाएं ..सम्मान एक दूजे का करो
सुंदर सुदृढ़ समाज की परिकल्पना साकार करो

Sunita Sharma Lakhera

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आज ' विश्व गौरैया दिवस ' है ......
सभी प्रकृति प्रेमियों को शुभकामनाये

गौरिया
जाने तू कहाँ गयी
हमारी बचपन की
प्रेरणा
प्यारी गौरिया
तेरा फुदकना
मेरे आँगन
सुबह साँझ
बजती थी
कानो में
मीठी धुन
सुबह मेरी खिड़की
से अंदर आती
बनकर मेरी
प्रिय सखी
किताबों पर चोंच मारती
तुम
मानो कहती
तुम समझती
हो दुनिया के अनंत रहस्य
तुम बिन
आज सूनी ..
मेरी खिड़की
रोज निहारु बाट
शायद तुम
खेल रही
कोई खेल नया
मानव
को जागृत
करने का कोई
नया दिलचस्प
खेल
पर मेरी उदासी
तेरे चहकने पर
होगी खत्म
बस बहुत हुआ
अब न सता
आ लौट आ
अपने घर
प्रिय सखी
तुझ बिन सूना
मेरा आँगन ....

Sunita Sharma Lakhera

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 उत्तराखंड में महिलाओ  पर बढ़ते उत्पीडन पर  मन के उदगार ...
.
इंसानियत

इंसानियत चरमरा उठी
पाषाण ह्रदयों के प्रहार से
शब्द बिखर गए
भावों की गरिमा
बिक रही सरे बाज़ार
कदम ठिठक गए
रूह रुसवा हुई
मित्रता की ठगी से
आचरण की विभस्ता
मन की कोमलता
पर वज्रपात करती
आज की संवेदनहीनता
रिश्तों में आडंबर
कागजी भावनाएं
मुर्दादिल इंसान
वहशी ख्वाहिशे
चित्कारती धरती
गरजता आसमां
दहला रही अंतर्मन
क्यूकर विश्वाश करे
मनुजता खो गयी कहीं
बहिनों का सत्कार नहीं
बेटियों की चाह नहीं
प्रेयसियों के पीछे रहना
अर्धांगिनी हो शालीनता भरी
बेटियों के दहेज़ पर बवाल
बहुओं को दहेज संग अपनाना
कराह रही है हर कोख
नीलाम होती तुलसी
सुर्ख़ियों में कत्लेआम
निरुतर सवाल अपराधी बलवान
नफरत सस्ती मुहब्बत महंगी
जीवन क्रीडा अंधकारमयी
दुआवों पर रस्मी पहरा
हर शक्स का दर्द बड़ा
अहंकार की कश्ती पर खड़ा
क्षणभंगुरता भूल रहा
अनमोल जीवन खो रहा
जीवन के झंझावतों में
जिन्दगानियां बिखर रही !

Sunita Sharma Lakhera

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कवि मन
जीवन की संभावना
रहस्यमयी भयावह
स्मृति विस्मृति के
आँचल कवि मन

मन का भटकाव
उन्मुक्त उड़ान
का सुदृश्य दर्पण
बनता कवि मन

समस्यायों का सुलगना
पन्नो पर उकेरना
समाजसेवा हेतु अर्पित
सदैव सजग कवि मन

दर्द की पराकाष्ठा पर
रिश्तों में सम्भावना
तलाशता सदैव यह
जिज्ञासु कवि मन

समाज के हर रंग
का अदभुत दर्शन
सुनहरे सपनो का
सूक्ष्मदर्शी कवि मन

शब्दों का उपवन
भावों का गुलशन
छूता हर अंतर्मन बने
समय साक्ष्य कवि मन


सभी सम्मानित सदस्यों को सादर नमस्कार !

Sunita Sharma Lakhera

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कवि मन

जीवन की संभावना
रहस्यमयी भयावह
स्मृति विस्मृति के
आँचल कवि मन

मन का भटकाव
उन्मुक्त उड़ान
का सुदृश्य दर्पण
बनता कवि मन

समस्यायों का सुलगना
पन्नो पर उकेरना
समाजसेवा हेतु अर्पित
सदैव सजग कवि मन

दर्द की पराकाष्ठा पर
रिश्तों में सम्भावना
तलाशता सदैव यह
जिज्ञासु कवि मन

समाज के हर रंग
का अदभुत दर्शन
सुनहरे सपनो का
सूक्ष्मदर्शी कवि मन

शब्दों का उपवन
भावों का गुलशन
छूता हर अंतर्मन बने
समय साक्ष्य कवि मन


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समुद्र शाश्वत सत्य

समुद्र शाश्वत सत्य
जिस पर बढ़ते सबके पग
रेत पर अंकित चिन्ह
खो जायेंगे लहरों संग
सदियों से चल रहा
सदियों तक चलता रहेगा
जीवन म्रत्यु का यही क्रम
सिकन्दर हो या गजनी
समुद्र के थे बटोही
दुनिया पर शिकश्त करने
वाले इसी रेत पर गए थे मिल
जीवन में करें ऐसा कर्म
मानवता के पदचिन्ह
धो न सके कभी कोई लहर
समुद्र है स्वर्ग का मार्ग
रेत कर्मो का धरातल
म्रत्यु को प्राप्त होने से पूर्व
छोड़ जाओ पीछे अपने निशाँ
वक़्त की हर आँधी के बवंडर में
उदघोषित होता रहे तुमारा सम्मान ![/size]

Sunita Sharma Lakhera

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