Author Topic: Bal Krishana Dhyani's Poem on Uttarakhand-कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी  (Read 35047 times)

devbhumi

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लोग कहते हैं....

लोग कहते हैं
अब बदलने लगा  हूँ मै
जब से तुम से
मिलने बिछड़ने  लगा  हूँ मै

सब कुछ अब भूल ने लगा हूँ मै
पराग बन जब से घुलने लगा  हूँ मै
साये में धूप जब से मेरे आती नहीं
कविता मेरी तब से  वो गाती नहीं

हम अब तक कहां जा चुके हैं
और हम  अब कहां तक जाने वाले हैं
जिस सड़क पर चल रहे हम दोनों
वो भी अपनी मंजिल को जानती नहीं

तुमसे बहुत प्यार करता हूँ मैं
बस मिलता हूँ तुमसे और बिछड़ता हूँ मैं
रुकना मैं  भी बहुत चाहता हूँ मगर
पर वो मजबूरी मुझे रोकने देती नहीं 

किताबें तो बहुत पढ़ीं  है  मैंने 
पर क्या पढ़ था  कुछ अब याद नहीं
एक वादा जो किया था मैंने तुमसे
बस वो ही मुझे बस अब भी याद रहा

लोग कहते हैं....

बालकृष्ण डी ध्यानी
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devbhumi

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आज भोल मां

आज भोल मां
यनि पिसी गियूं
खिटखिटू करदु रैंग्याई
मेरु ज्यू को उमाळ
ट्टकार  पौड़ी  झर
औरि मि सिर गियूं
आज भोल मां  ...............

यखुली मां  बैठी
मिल सोच ये बात
कन आंदि जांदी छे
बिगेर विंकी ये स्वास
हात मां ना राई
विंको ये हात
मि ये तीर पार
तू वै तीर पार
आज भोल मां  ...............

उड़ादि  घुघूती छुछी
ऐजा बैठा मेर साथ
ले जा मेरु रैबार
उडी की वै  तीरी पार 
राली बैठी हेरदी
मेर सोंजड़या व्हाळि  वै पार
ज्यू मां विंकी तू
मेर जोडि दे सांस
आज भोल मां  ...............

किंगरी का झाला 
ऊ पांगरी का  डाला
अपड़ा ढूँगा औरृ
अपड़ा ऊ गार
चार भांडा मिल छ्या खोज्याई
अपड़ा गोरुं थे मिल किलै रुलाई
साथ समुदर पार छ्या बैठ्युं
तेर याद आई ग्याई तेर याद
आज भोल मां  ...............

बालकृष्ण डी ध्यानी
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परै ह्वैगे

मेरि कविता 
मेरि नि राई
जैन बांची ,विंकी ह्वैगयाई
मेरि कविता   ..............

क्दगा जतन दग्डी क्दगा रतन दग्डी
लयखि मिल पाई
आज किले वा मेसे इन
बिराणि ह्वै चलि गयाई
मेरि कविता   ..............

आखर...२ जोड़ी...२
कै बाटा ना कै लाटा थे ना छोड़ी
जबैर वा उतरि
ऐ जिकोडी का  कोर पान मां
मेरि कविता   ..............

कबि मि हैंसे दे
कबि मि  रुळैगे
यकुलांस सारू ऊमाळु मेरु सरेगे
सरणी जाणि छे आज कै घार मां
मेरि कविता   ..............

जख बि तू रैई
सदनी तू रजि खुसी रैई
जुगराज कैजा अप्डू पहाड़ थे
बूती जा मौल्यार
हर कूड़ा  हर  खल्यांण मां
मेरि कविता   ..............

बालकृष्ण डी ध्यानी
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प्छताणु  छौं मि

छिमा कैरि द्यावा मिथे
( प्छताणु  छौं मि ) .... २
आधार कि रेघा एक ही छ
( रेघी द्याव तुम  ) .... २
छिमा कैरि द्यावा मिथे

भर्युं बि अर खाली बि  छौं
सैत्युं तुमन पाळी बि  छौं
इन ना शिकार कैर म्यारा
छिमा कैरि द्यावा मिथे .....

भूख्युं छौं मि तिसु बि छौं
अफु भूमि मां कठुक कोचि गियूं मि
भागि छ्या अब परति ऐग्युं मि
छिमा कैरि द्यावा मिथे .....

बाबा  मेर बोई मेरि
भुला कख छन कख छ दिदि
ले ले एक बारी अंग्वाली मिथे
छिमा कैरि द्यावा मिथे .....

बालकृष्ण डी ध्यानी
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ऐ कबिता लेखी मिल.

स्योणु छौं
मि तै निंद किलै नि आणि चा
मै से  दूर वा यखुली अफि
किलै अर कख चलि जाणि चा

कन चिंता लागि मै तै रे
मेरु बरमान मि तै तू बतै दे रे
कपाव मां पड्युं ऐ ताण तै रे
मेरु जिकुडु तू फुण्ड सर कै दे रे

कन जणन मिल   
क्या मैंल च मि तै  सताणु
मैते पता नि ऊ खैल
क्या खेळ खेळी कि जाणू

सरबट कन हुँयुं चा मेरु
यन अंधारी यखुलि रति मां
ज्यूंदा राला ऊ सब्द सदनी
जून लिखण बाट मि बतै गैई

जगणु छौं औरृ बल लिखणु छौं
निंद अब मेर छलबलाट कन लगि
जोर जोरिक कि वा टिटाट कन लगि
झटपट ऐ कबिता लेखी मिल....३

बालकृष्ण डी ध्यानी
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मि खन्कल

खन्कल रेग्यू मि
नि जान कैकु नि
पाथो नपि.. २  कि
किलै कमै रुपै हजार

कन लाणी माया मिन 
कण ज्यू यौ परण
आज मिलणु गे  छो मि 
लागि  बरसू को फेर

सुपिना मि  देख्दु  नि
आंख्युं पौडी जांद  रिंग
कैमा आनि छ अन्वार
नि जानि कैकु छौ मि

रुब्सी खुट्योंन मेरु
चाल मेर अग्वाडी को
कब आलू सज मेरु
ब्यौना जयमाली  को

खन्कल रेग्यू मि  .....

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शब्द

शब्दों में क्षमता होती है
हंसती है  कभी  वो रोती है
मजबूर कर देती है सोच ने के लिये
अपने से ही कुछ कर ने के लिये

किसी को अपना बना देती
किसी को वो परया कर देती  है
कल्पना की उड़ान में उड़ने वाली
यथार्त की पहचान भी करा देती  है

सामर्थ्‍य भरा है उस मे सारा 
गुण अलंकारों का उसका खेल न्यारा
सजती है संवरती अपने से वो 
अपने आप से  ही वो निखर आती है

ध्रव तारे जैसा सितारा है वो
अँधेरे में दीपक का सहारा है वो
ज्ञान की है वो बंद ऐसी कुंजी
जिसको पाने में  ना लगती पूंजी

बिखरे पड़े हैं समझना  है बस
उन मे गोते लगाकर तैरना है बस
भाव सागर भी वो पार कर देंगे
उन शब्दों को समेटना है बस

शब्दों में क्षमता होती है

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शब्द

शब्दों में क्षमता होती है
हंसती है  कभी  वो रोती है
मजबूर कर देती है सोच ने के लिये
अपने से ही कुछ कर ने के लिये

किसी को अपना बना देती
किसी को वो परया कर देती  है
कल्पना की उड़ान में उड़ने वाली
यथार्त की पहचान भी करा देती  है

सामर्थ्‍य भरा है उस मे सारा 
गुण अलंकारों का उसका खेल न्यारा
सजती है संवरती अपने से वो 
अपने आप से  ही वो निखर आती है

ध्रव तारे जैसा सितारा है वो
अँधेरे में दीपक का सहारा है वो
ज्ञान की है वो बंद ऐसी कुंजी
जिसको पाने में  ना लगती पूंजी

बिखरे पड़े हैं समझना  है बस
उन मे गोते लगाकर तैरना है बस
भाव सागर भी वो पार कर देंगे
उन शब्दों को समेटना है बस

शब्दों में क्षमता होती है

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कुछ पल ठहर 

कुछ पल ठहर , ऐ  हम सफर
बातें करें हम आप  की 
मन तू  मचल  ना ऐसे मचल
परवाह करें हम आप  की 

रुकती नहीं जो दौड है
दौडती जा रही जो पहर पहर
बन जा नजर पल पल नजर
रखें  तुझे हम  प्यार से

भूल न जाओ तुम , ये है  डर
बस डर जाऊं  मै इस ख्याल से
थोड़ा निखर और निखर
बन जा तू इस दिल आफताब से

सजने लगी फुलों की डगर
तु ने छु आ जब उस आँख से
ढुलक ने लगी है मेरी  नजर
तेरे हल्के से उस एहतराम से

बढ़ने लगी है मदहोशीयां
ना जाने किस इजहार  से
छाने लगा है अब ये नशा
पहले पहले तेरे खुमार से

कुछ पल ठहर ......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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कुच त दडियू छ

कुच त दडियू छ
त्यारू .... म्यारू वै सैण मां
कोसिस कि इखुलि मिन   हजार
वैगे सबि बेकर वार पार
कुच त दडियू छ .....

ज्यू को खोळ कु घोळ मां
आज किलै घुंग्याट हुनु  छ
यखरि मां बैठीं यखरि माया मेरि
किलै छिबड़ाट आज कनि छ
कुच त दडियू छ .....

यों बथों को संस्याट
ऊ चखुलों कु च्युंच्याट
कंदूड़ ऐणु कै कु बबड़ाट
किलै हुनि ईं जिकोड़ि मां धकध्याट
कुच त दडियू छ .....

आँखि नि विं हेर सकि
विं दगडी  ई जिकुड़ि  नि बोळ स्की
कनि छ वा कख छ वा रुसि
विं थे वख जै कि  नि भेंट स्की
कुच त दडियू छ .....

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