Author Topic: स्व० चन्द्र कुंवर बर्त्वाल जी और उनकी कवितायें/CHANDRA KUNWAR BARTWAL  (Read 37119 times)

पंकज सिंह महर

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आकांक्षा

मैं बनू वह वृक्ष जिसकी स्निग्ध छाया मे कभी
थे रुके दो तरुण प्रणयी,फिर न रुकने को कभी
मैं बनू वह शैल जिसके, दीन मस्तक पर कभी
थे रुके दो मेघ क्षण भर,फिर न रुकने को कभी
मैं बनू वह भग्न गृह, जिसके निविड़ तम में कभी
थे जले दो दीप क्षण भर, फिर न जलने को कभी
मंगलो से जो सजा था मधुर गीतों से भरा
मैं बनू वह हर्ष, जाता जो न फिरने को कभी

पंकज सिंह महर

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नन्दिनी

मुझे प्रेम की अमर पूरी में अब रहने दो!
अपना सब कुछ देकर कुछ आँसू लेने दो!
प्रेम की पूरी, जहा रुदन में अमृत झरता,
जहा सुधा का स्रोत उपेक्षित सिसकी भरता!
जहा देवता रहते लालायित मरने को;
मुझे प्रेम की अमर पूरी में अब रहने दो!
मधुर स्वरों में मुझे नाम प्रिय का जपने दो!
मधुरितु की ज्वाला में जी भर कर तपने दो!
मुझे डूबने दो यमुना में प्रिय नयनो की!
मुझको बहने दो गंगा में प्रिय वचनों की!
मुझे रूप की कुंजो में जी भर फिरने दो!
मधुर स्वरों में मुझे नाम प्रिय का जपने दो!
अलके बिखराए, आँसू में नयन डुबोये,
पृथ्वी की अपने तन-मन की याद भुलाए,
मै गाऊंगा विपुल पथो पर,शुन्य वनों में,
नदियों की लहरों में, कुंजो की पवनों में,
दुखी देवता-सा ऊपर को द्रृष्टि उठाए,
अलके बिखराए, आँसू में नयन डुबोये! 
कहा मिलेगी मर कर इतनी सुन्दर काया,
जिस पर विधि ने है जग का सौन्दर्य लुटाया,
हरे खेत ये, बहती विजन वनों की नदिया,
पुष्पों में फिरती भिखारिनी ये मधुकरिया!
मेरे उर से उमड़ रही गीतों की धारा
बनकर ज्ञान बिखरता है यह जीवन सारा
किन्तु कहा वह प्रिय मुख जिसके आगे जाकर
मैं रोऊ अपना दुःख चटक सा मंडराकर
किसके प्राण भरू मैं इन गीतों के द्वारा
मेरे उर से उमड़ रही गीतों की धारा
मेरे कांटे मिल न सकेगे क्या कुसुमो से?
मेरी आहे मिल न सकेगी हरित द्रमो से?
मिल न सकेगे क्या शुचि दीपो से तम मेरा?
मेरी रजनी का ही होगा क्या न सबेरा?
मिथ्या होगे स्वप्न सभी क्या इन नयनो के?
मेरे कांटे मिल न सकेगे क्या कुसुमो से?
कहा मिलेगी मर कर इतनी शीतल काया?
कहा मिलेगी मर कर इतनी सुन्दर काया?
नदी चली जायेगी, यह न कभी ठहरेगी!
उड़ जायेगी शोभा, रोके ये न रुकेगी!
झर जायेगे फूल, हरे पल्लव जीवन के,
पद जायेगे पीट एक दिन शीत मरण से!
रो-रो कर भी फिर न हरी यह शोभा होगी!
नदी चली जायेगी, यह न कभी ठहरेगी!
मेरी बाहें सरितो सी आकुल होकर,
दिशा-दिशा में खोज रही है वह प्रिय सागर,
जिसे ह्रदय पर घर कर मिलती शांति चिरंतन,
जिस की छवि में खो जाता युग-युग को जीवन,
जिसे देख कुछ न दीखता फिर पृथ्वी पर,
मेरी बाहें खोज रही है वह प्रिय सागर,
मेरे पथ में हँसी किसी की फूल बिछाती,
याद किसी की मुझ को शुचि करने को आती,
उठता जब तूफान, गगन में मेघ गरजते,
अंधकार के चिन्ह न पथ के मुझ को मिलते,
मूर्ति किसी की तब हँस-हँस कर आगे आती,
मेरे पथ में हंसी किसी की फूल बिछाती;
तुम प्रकाश हो, मुझ में दुःख का तिमिर भरा है,
तुम मधु की शोभा हो, मुझमे कुछ न हरा है,
तुम आशा की वाणी, मैं निराश जीवन ह,
तुम हो छठा हँसी की, मैं नीरव रोदन हु,
तुम सुख हो, मेरे दुःख का सागर गहरा है,
मुझे मिलो हे, तुममे मधुर प्रकाश भरा है,
मैं चुपचाप सुना करता हु ध्वनि आशा की,
पीता हूँ शोभा अपनी ही अभिलाषा की!
देखा करता हूँ चुपचाप तटों पर आती,
उन लहरों को, जो सहसा हँस कर फिर आती!
मुझे चाह है सजल प्रेम की मृदु भाषा की,
मैं चुप चाप सुना करता हूँ ध्वनि आशा की!
नाम तुम्हारा ले-ले कर आहे भरता हूँ,
मैं पृथ्वी पर सजल नयन लेकर फिरता हूँ,
खोया सा बैठा रहता नदियों के तट पर,
सुनता लहरों के स्वर, तरु विपिनो के मर्मर,
राहों में पथिको के दल देखा करता हूँ,
नाम तुम्हारा ले-ले कर आहें भरता हूँ!
यौवन के पथ पर जाकर ऐसे ही मन को-
लुटा ओर आँखों में लेकर के रोदन को,
जो सुख होता धोखा खा कर पछताने में,
जो सुख होता फिर-फिर कर धोखा खाने में,
अमर वही सुख तो करता नश्वर जीवन को,
यौवन के पथ जा कर ऐसे ही मन को-
प्रेम देव हे! हे बसंत के कोमल सहचर!
सुधा पिलाने वाले हे देवता मनोहर!
किया न तुम ने जिस को पीड़ित निज वाणों से,
व्यर्थ हुआ उसका जीवन ही इस पृथ्वी पर,
प्रेम देव हे! हे बसंत के कोमल सहचर!

पंकज सिंह महर

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पर प्राण तुम्हारी वह छाया

मैंने न कभी देखा तुमको,
पर प्राण तुम्हारी वह छाया-
जो रहती है मेरे उर में
वह सुन्दर है पावन सुन्दर!
मैंने न सुना कहते तुमको
पर मेरे पूजा करने पर
जो वाणी-सुधा बरसाती है
वह सुन्दर है पावन सुन्दर!
मैं उस स्पर्श को क्या जणू
पर मेरी गीली पलकों पर
जो मृदुल हथेली फिरती है
वह सुन्दर है पावन सुन्दर!
मैंने न कभी देखा तुमको
पर प्राण तुम्हारी वह छाया-
जो रहती है मेरे उर में
वह सुन्दर है पावन सुन्दर!

पंकज सिंह महर

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मुझको पहाड़ ही प्यारे है

प्यारे समुंद्र मैदान जिन्हें
नित रहे उन्हें वही प्यारे
मुझ को हिम से भरे हुए
अपने पहाड़ ही प्यारे है
पावों पर बहती है नदिया
करती सुतीक्षण गर्जन धवानिया
माथे के ऊपर चमक रहे
नभ के चमकीले तारे है
आते जब प्रिय मधु ऋतू के दिन
गलने लगता सब और तुहिन
उज्ज्वल आशा से भर आते
तब क्रशतन झरने सारे है
छहों में होता है कुजन
शाखाओ में मधुरिम गुंजन
आँखों में आगे वनश्री के
खुलते पट न्यारे न्यारे है
छोटे छोटे खेत और
आडू -सेबो के बागीचे
देवदार-वन जो नभ तक
अपना छवि जाल पसारे है
मुझको तो हिम से भरे हुए
अपने पहाड़ ही प्यारे है

पंकज सिंह महर

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बहन कुँवरी की स्मृति
(अपनी बहन कुँवरी की स्मृति में जिसका १९३८ मे निधन हो गया था)

बहिन! स्वर्ग मे हो तुम क्या मेरी बातो को

सुन पाती हो? उठ वसंत के इन प्रांतो में

मैं करता हूँ आंसूं भर कर याद तुम्हारी!

बुला लिए है अपने पास उमा औ पारी

दोनों मैंने, पर इन दोनों मे कोई भी-

वैसी नही बहिन! बचपन मैं जैसी तुम थी!

मुझे याद आती है उन बीते वर्षो की,

बचपन की, बचपन के चंचल हर्षों की,

सेबों के डालो पर चढ़ कर उन्हें झुकाना,

और ललाई भरे सेब पुलकित हो खाना

कभी खुबानी के डालों को हिला हिला कर

छाया को पीली खुबानियों से देना भर!

शीत पूष में,नभ में थे बादल घिर आते,

चलती तीक्षण हवा थी,व्यर्थ पवन में बहते

बर्फीली तूफ़ान हिमालय के उर से थे!

जम जाती थी बर्फ टोपियों पर,पावों के

तलवे के निशाँ पर, हिम के कुटी बनाते

फिरते रहते थे बाहर ही गाते गाते!

और दुसरे दिन जब धूप निकल आती थी

तब वह पीली धुप हमें कित्तनी भाती थी!

पंकज सिंह महर

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मैं न चाहता युग युग तक
पृथ्वी पर जीना
पर उतना जी लूँ
जितना जीना सुंदर हो
मैं न चाहता जीवनभर
मधुरस ही पीना
पर उतना पी लूँ
जिससे मधुमय अन्तर हो
मानव हूँ मैं सदा मुझे
सुख मिल न सकेगा
पर मेरा दुःख भी
हे प्रभु कटने वाला हो
और मरण जब आवे
टैब मेरी आंखों मैं
अश्रु न हों
मेरे होंठों मैं उजियाली हो।

ये पंक्तियाँ चंद्र कुंवर बर्त्वाल के समग्र जीवन को समझाने के लिया पर्याप्त हैं। ये पंक्तियाँ साधारण नहीं, कविता की संरचना और शब्द प्रयोग में एक गहरी अन्विति और संश्लिष्ट लिया हुई हैं सतही रूप में ये पंक्तियन जीवन विमुख, उदास या हारे हुआ जीवन का एक वर्नातामक चित्रभर हैं.जिसमें एक क्षिप्रा गति है और रंग है -जो शब्दों के मध्यम से अभिव्यक्त हुआ है। ये इसी मंगलमयी पंक्तियाँ उत्कृष्ट काव्य की चरम अनुभुतियुं से निकली हैं जो विश्व के चेतानामन को आलोकित करने लगाती हैं ।
चंदर कुवर बर्थ्वाल को अपने असाधारण कवि होने का पुरा भंथा-छोटी उम्र मैं ही उन्हें सही साहित्य की परख हो गई थी.वह अपने कवि होने की महत्ता को समझाते थे .aपाने कृतित्व को समझाते थे- शायद अपने कृतित्व का आलोचक उनसे बार दूसरा कोई नहीं हो सकता- इससे भी वह भलीभांति परिचित थे-


मैं मर जाऊंगा पर मेरे

जीवन का आनंद नहीं।

झर जावेंगे पत्रकुसुम तरु

पर मधु-प्राण बसंत नहीं


जीवन मैं संतोष से लबरेज इन ध्वनिपूर्ण पंक्तियों मैं यथार्थ का अद्भुत सौन्दर्य पूरी चमक के साथ अपनी उपस्थिति को दर्ज करता है -"मेरा सब चलना व्यर्थ,हुआ, मैं न कुछ करने मैं समर्थ हुआ"। रोग शएय्या पर दस्तक देती मृत्यु से उपजी छात्पताहत के मध्य "यम् और मृत्यु पर ढेर सारी कवितायन इस बात की पुष्टि करती हैं की क्रियाशील उर्जा का कीडा उनमें मौजूद था।

"मुझे ज्वाला मैं न डालो मैं न स्वर्ण , सुनार हूँ ।

मत जलाओ , मत जलाओ मैं न स्वर्ण ,सुनार हूँ ।"


मृत्युबोध पर ये पंक्तियाँ कोई असाधारण कवि ही रच सकता है ."यम्"उनकी अन्यतम कविताओं में से है .कुल २८ वसंत और २४ दिन देखे चंद्र कुंवर बर्थ्वाल ने .इतनी कम आयु पी-यानि शताब्दी का एक चौथी हिस्सा.इतनी कम जीवन अवधि में सम्पूर्ण जीवन और उसके रहस्यों को समझना उनकी असधार्ण प्रतिभा को ही प्रदर्शित करती है .वह प्रसाद,पन्त और निराला के समकालीन थे.उस दौर के बेहतरीन लेखकों,कवियों संगत और दोस्ती उन्हें नसीब थी- यह वह दौर था जब छायावाद अपने चरम उत्कर्ष पर था। एक तरह से छायावाद लगभग अपना कार्य निष्पादित कर चुका था । किंतु किसी रचनाकार का अपने अतीत से मुंह मोड़ना इतना आसान नहीं होता -चंद्रकुन्वर भी उससे अलग-थलग नहीं रह सके .उनको छायावाद के प्रमुख स्तम्भों का सानिध्य प्राप्त होने के बावजूद अपने को छायावादी कवि कहलाने से बचते रहने पर भी -वे चाहते तो उसी परम्परा का निर्वाह कर अपना स्थान सुनिश्चित कर सकते थे । परन्तु ,उनहोंने ऐसा नहीं किया। दरअसल उन्हें अपने इक नए रस्ते की तलाश थी । नई उर्वरा जमीं की तलाश थी । प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की भूमिका उस समय बनाई जा रही थी उसमें भी अपनी कविता के पल्वित-पुष्पित होने की सम्भावनायें उन्हें ज्यादा नहीं दिख रही थीं । इसीलिए उन्होने छायावाद और प्रगतिवाद का सारतत्व तो ग्रहण किया अवश्य , किंतु अपना दृष्टिकोण उन सबसे अलग रखा|

साभार- http://harisuman-samvedna.blogspot.com/

पंकज सिंह महर

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प्रकाश हास


किस प्रकाश का हास तुम्हारे मुख पर छाया
तरुण तपस्वी तुमने किसका दर्शन पाया?
सुख-दुख में हंसना ही किसने तुम्हे सिखाया
किसने छूकर तुम्हें स्वच्छ निष्पाप बनाया?
फैला चारों ओर तुम्हारे घन सूनापन
सूने पर्वत चारों ओर खडे, सूने घन।
विचर रहे सूने नभ में, पर तुम हंस-हंस कर
जाने किससे सदा बोलते अपने भीतर?
उमड रहा गिरि-गिरि से प्रबल वेग से झर-झर
वह आनंद तुम्हारा करता शब्द मनोहर।
करता ध्वनित घाटियों को, धरती को उर्वर
करता स्वर्ग धरा को निज चरणों से छूकर।
तुमने कहां हृदय-हृदय में सुधा स्रोत वह पाया
किस प्रकाश का हास तुम्हारे मुख पर छाया?

jagmohan singh jayara

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प्रकृति के चतेरे कवि चंद्र कुँवर बर्त्वाल जी की कवितायेँ पढ़कर अपना कवि मन कविताओं में डूब गया. कवि की अनुभूति  "मुझे इस बात का दुःख नहीं कि कविता के प्रसिद्ध उपासको मे मेरी गिनती नहीं हुई, इसका समय ही नहीं मिला| " चन्द्र कुंवर बर्त्वाल....कसक भरी है.  पंकज सिंह महर जी. ......दुर्लभ प्रस्तुति के लिए आभार प्रकट करता हूँ'

"जिग्यांसू"   

पंकज सिंह महर

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प्रेम का मानवीय रूप


पर जगत बलवान है तुम क्षुद्र प्रेमी प्राण हो
मानवों के बीच प्रेम करना यदि पाप था,
क्यों बने हम तरु नहीं नीले द्रमो के बीच मैं
हम खिलते फूल ही एक ही मधु के उदय से,
कापते हम साथ प्रेयसि एक ही शीतल पवन से!

पंकज सिंह महर

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अनाचार वह कौन?

हे भीषण, तुम जल में, थल में, महाकाश में,
लगे हुए हो अविश्रांत, किसके विनाश में,
अनाचार वह कौन? नाश जिसका करने को,
प्रलय साज में सजा रुद्र तुमने अपने को?
बरस रहीं निर्मम ज्वालाएं नभ में जिनके,
आघातों से जलते नगर-ग्राम तिनकों से,
मरते हैं निरीह नर-नारी पृथ्वी भर में,
हाहाकार उठ रहा है निर्दय अम्बर में,
कठिन दासता से विमुक्त मनुजों के जीवन,
रोग शोक दारिद्रयहीन सुन्दरतम यौवन,
घृणा, द्वेष से हीन प्रेम के भाव मनोहर,
पावेगी पृथ्वी क्या इतनी बलियां देकर?

 

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