Author Topic: स्व० चन्द्र कुंवर बर्त्वाल जी और उनकी कवितायें/CHANDRA KUNWAR BARTWAL  (Read 37134 times)

पंकज सिंह महर

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"इतने फूल खिले"
चंद्र कुंवर बर्त्वल की चुनिंदा कवितायें

पहाड़ प्रकाशन ने स्व० चन्द्र कुंवर बर्त्वाल जी की कविताओं का एक संग्रह प्रकाशित किया है।

Itne Phul Khile – Chandra Kumar Bartwal ki Chuninda Kavitayen.

Selected poems of great hindi poet Chandra Kunwar Bartwal. (20 aug 1919 – 14 sep 1947)
These poems were selected by Uma Shankar Satish, calligraphies by Ashok Pandey and introduced by Shekhar Pathak and Govind Chatak.

Information
Language: Hindi
Year: 1997
Pages: 56
Status: Print Copy Available
Price: Rs 80.00


source- http://www.pahar.org/drupal/node/381

Dinesh Bijalwan

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Maharji  Thanks for  the beautiful poems. The  collection  is  really good.  This thread  offers a treat to the fans of  Late Chandra Kunwar Bartwal.    He died in such a young age, still he left a  treasure of  poems  for  us. 

पंकज सिंह महर

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मसूरी में स्थित कवि चन्द्र कुंवर बर्त्वाल जी का स्मारक

पंकज सिंह महर

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घर की याद


(१) घर छोडे वर्षो बीत गये
मैं हिमगिरी पर हु घूम रहा
देखता द्र्श्य, जब नये नये
बर्षो भी बर्फानी पहाड़
घनघोर शोर करती नदिया
सुनसान पर्वतों पर फेली
पीडा से पीली चान्दनिया
नव देवदार के जंगल मैं
छिप कर गाने वाली चिडिया
ये हि सब मेरे साथी रहे
घर छोडे वर्षो बीत गये

(२) मैं किस प्रदेश मै आ पंहुचा
है चारो ओर घिरे पर्वत
जिनका हिम झरनों मै झरता
जिनके प्राणों को झरनों का
संगीत मधुर मुखरित रखता
जिन के नीचे सुंदर घटी
धनो भी पीली पड़ी हुई,
जिस से सुगंधी की मिर्दु लहरे
मरुत मैं उड़ती विकल रही
पर्वत से निकली हुई नदी
घाटी मैं गाती घूम रही
अपने लहरीले हाथो मै'
हिम के फूलो को नचा रही
जिस के तट पर फूलो से पड़
पीली लातिकाए झुकी हुई
भोरो के क्याकुल चुबन से
आवेश-अवश हो काप रही 

(३) मैं लता भवन मैं आ ठहरा
कोकिल मेरे ऊपर कुकी
फूलो से झर झर सुरभि झरी
केसर से पीत हुई भ्रमरी
केसर से दुर्बा ढकी हरी
कितना एकांत यह पर है
मैं इस कुञ्ज मैं दुर्बा पर
लेटूगा आज शांत हो कर
जीवन मैं चल चल अब थक कर
ये पद जो गिरी पर सदा चढ़े
छोटी से घाटी मैं उतरे
सुनसान पर्वतों से होकर
घनघोर जंगल मैं विचरे
ये पद विश्राम मांगते अब
इस हरी भरी धरती मैं आ
जो पड़ न थके थे अभी कभी
वे अब न सकेंगे पल भर भी

(4)अब ये आँखे बाहर के सुख के
उदासीन अति होकर के
अपने हि दुःख के सागर मैं'
धीरे धीरे है ढलक रही
अब इन्हें न बहला पायेगी
इस सारे जग की सुन्दरता
कोई भी रोक नहीं सकता
अब अंशु का झरना झरता

(५)विष पान किया मैंने जग का
जिस भी ओरो को अमृत मिले
जिस भी ओरो को फूल मिले
मैं ने कांटे हि सदा चुने
वह विष अंगो मैं उबल रहा
वे कटे उर मैं कसक रहे 

(६) जीवन भरा दुसाहस दुःख सह कर
जीवन भर पीडा भी रो रो कर
जो शांति सुखी को मिलती है
वह मरण शांति हो मेरी
हे आज समाप्ति सुख दुःख की
आखिरी हिचकिया ये मेरी
हैं आज रुदन का अंतिम दिन
आखरी सिसकिया ये मेरी
जाने किस परदेशी जन की
आंखे मेरे तन लख कर के
इस कुञ्ज भवन मैं पड़ा हुआ
छलछला आएगी करूणा से
जो शांति थकित को मिलती है
वह मधुर शांति हो मेरी

साभार- श्री दीपक बेंजवाल, www.orkut.com

पंकज सिंह महर

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बसंत आगमन


देखो पादप हुए नये फिर,
मन में पतझड़ की आश लिए.
नईं कोपलियों संग देखो,
नव उमंग और तरंग लिए.
कोयल की मधुर कूक से,
स्वागत का है संगीत बजा.
प्रकृति की सुनहरी थाली में,
बहुरंगी पुष्पों का प्यार सजा.
जीर्ण-शीर्ण पातों को त्यागे,
पादप फिर से रंगीन हुए.
भारत माता के अभिनन्दन को,
परिधान रेशमी लिए हुए.
आओ मिलकर हम भी बदलें,
अपने रूढ़, बैर बिचारों को.
कुछ शिक्षा लें इस प्रकृति से,
अपनाकर श्रद्धा और विश्वासों को

Barthwal

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श्री स्व. चंद्र कुंवर बर्तवाल जी की पुण्य तिथि पर श्रधा सुमन. उतराखंड को येसे कवि और महान हस्ती पर  नाज़ है. ये बडा अच्छा संयोग है कि आज हिन्दी दिवस भी है. हम सबके लिये ये गर्व की बात है कि कुंवर जैसे कवि उत्तराखंड से है.
पुन: श्रधा सुमन
-प्रतिबिम्ब बडथ्वाल
अबु धाबी, यू ए ई

Devbhoomi,Uttarakhand

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कुंवर बर्तवाल जी की पुण्य तिथि पर श्रधा सुमन

चन्द्रकुंवर बर्तवाल

(20 अगस्त 1919- 14 सितम्बर 1947 ई.)

चन्द्रकुंवर बर्त्वाल का जन्म चमोली, गढवाल के मालकोटी ग्राम में हुआ। बचपन प्रकति की रम्य गोद में व्यतीत हुआ। उच्च शिक्षा देहरादून तथा प्रयाग विश्वविद्यालय में हुई, किंतु स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण गांव लौट गए। वहीं अल्पायु में इनका स्वर्गवास हो गया। बर्त्वाल की कविताओं की प्रमुख विशेषता प्रकृति के साथ तादात्म्य, गहन सौंदर्य-बोध तथा कोमलता है। 1981 में इनकी रचना 'बर्त्वाल की कविताएं (तीन खण्डों में) प्रकाशित हुई।



Devbhoomi,Uttarakhand

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मेघ कृपा
जिन पर मेघों के नयन गिरे
वे सबके सब हो गए हरे।

पतझड का सुन कर करुण रुदन
जिसने उतार दे दिए वसन
उस पर निकले किशोर किसलय
कलियां निकलीं, निकला यौवन।

जिन पर वसंत की पवन चली
वे सबकी सब खिल गई कली।

सह स्वयं ज्येष्ठ की तीव्र तपन
जिसने अपने छायाश्रित जन
के लिए बनाई मधुर मही
लख उसे भरे नभ के लोचन।

लख जिन्हें गगन के नयन भरे
वे सबके सब हो गए हरे।

स्वर्ग सरि

स्वर्ग सरि मंदाकिनी, है स्वर्ग सरि मंदाकिनी
मुझको डुबा निज काव्य में, हे स्वर्ग सरि मंदाकिनी।

गौरी-पिता-पद नि:सृते, हे प्रेम-वारि-तरंगिते
हे गीत-मुखरे, शुचि स्मिते, कल्याणि भीम मनोहरे।
हे गुहा-वासिनि योगिनी, हे कलुष-तट-तरु नाशिनी
मुजको डुबा निज काव्य में, हे स्वर्ग सरि मंदाकिनी।

मैं बैठ कर नवनीत कोमल फेन पर शशि बिम्ब-सा
अंकित करूंगा जननि तेरे अंक पर सुर-धनु सदा।
लहरें जहां ले जाएंगी, मैं जाउंगा जल बिंदु-सा
पीछे न देखूंगा कभी, आगे बढूंगा मैं सदा।
हे तट-मृदंगोत्ताल ध्वनिते, लहर-वीणा-वादिनी
मुझको डुबा निज काव्य में, हे स्वर्ग सरि मंदाकिनी।

प्रकाश हास

किस प्रकाश का हास तुम्हारे मुख पर छाया
तरुण तपस्वी तुमने किसका दर्शन पाया?
सुख-दुख में हंसना ही किसने तुम्हे सिखाया
किसने छूकर तुम्हें स्वच्छ निष्पाप बनाया?
फैला चारों ओर तुम्हारे घन सूनापन
सूने पर्वत चारों ओर खडे, सूने घन।
विचर रहे सूने नभ में, पर तुम हंस-हंस कर
जाने किससे सदा बोलते अपने भीतर?
उमड रहा गिरि-गिरि से प्रबल वेग से झर-झर
वह आनंद तुम्हारा करता शब्द मनोहर।
करता ध्वनित घाटियों को, धरती को उर्वर
करता स्वर्ग धरा को निज चरणों से छूकर।
तुमने कहां हृदय-हृदय में सुधा स्रोत वह पाया
किस प्रकाश का हास तुम्हारे मुख पर छाया?

पंकज सिंह महर

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स्व० बड़थ्वाल जी ने लार्ड मैकाले द्वारा भारत में शुरु की गई शिक्षा और शिक्षितों पर मार्मिक व्यंग्यात्मक पंक्तियां "मैकाले के खिलौने" नाम से लिखी थी, जिसकी कुछ पंक्तियां प्रस्तुत हैं-

मेड इन जापान खिलौने से,
सस्ते हैं लार्ड मैकाले के,
ये नये खिलौने, इनको लो,
पैसे के सौ-सौ, दो-द- सौ।
अंग्रेजी अच्छी बोलते ये,
सिगरेट भी अच्छी पीते ये,
ये नये खिलौने, मैकाले के।

ये सदा रहेंगे बन सेवक,
हर रोज करें झुककर सलाम,
हैं कहीं नहीं भी दुनिया में,
मिलते इतने काबिल गुलाम,
ये सस्ते बहुत, इन्हें ले लो,
पैसे के सौ-सौ, दो-दो सौ॥

पंकज सिंह महर

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अपने गांव पंवालिया के बारे में वे लिखते हैं-
 
मेरे गृह से सुन पड़ती, गिरि बन से आती,
इसी स्वच्छ नदियों की, सुन पड़ती विपिनों की,
मर्मर ध्वनियां, सदा दिख पड़ते द्वारों से,
खुली खिड़कियों से हिमगिरि के शिखर मनोहर,
उड़-उड़ आती क्षण-क्षण शीत तुषार हवायें,
मेरे आँगन छू बादल हँसते गर्जन कर,
झरती वर्षा, आ बसन्त कोमल फूलों से,
मेरे घर को घेर गूंज उठता विहगों का दल,
निशि दिन मेरे विपिनों में उड़ते रहते।
कोलाहल से दूर शांत नीरव शैलों पर,
मेरा गृह है, जहां बच्चियों सी हंस-हंस कर,
नाच-नाच बहती है, छोटी-छोटी नदियां,
जिन्हें देखकर, जिनकी मीठी ध्वनियां सुनकर,
मुझे ज्ञात होता जैसे यह प्रिय पृथ्वी तो,
अभी-अभी ही आई है, इसमें चिन्ता को,
और मरण को स्थाने अभी कैसे हो सकता है?

 

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