Author Topic: Dr Hari Suman Bisht, famous Novelist-प्रसिद्ध उपन्यासकार डॉ हरिसुमन बिष्ट  (Read 9268 times)


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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'आछरी-माछरी' को 2015 का सृजनगाथा डॉट कॉम सम्मान
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उत्कृष्ट कथा लेखन के लिए 2015 का 'सृजनगाथा डॉट काम सम्मान' कथाकार डॉ. हरिसुमन बिष्ट को उनके उपन्यास 'आछरी माछरी' के लिए प्रदान किया जायेगा।
उन्हें सम्मान स्वरूप 21,000 की नगद राशि, प्रशस्ति पत्र, शॉल और श्रीफल प्रदान कर अंलकृत किया जायेगा। यह सम्मान उन्हें 11 वें अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन (मिस्र-28 फरवरी) में प्रदान किया जायेगा ।
पिछले 9 वर्षों से संचालित साहित्य, संस्कृति और भाषा की अंतरराष्ट्रीय वेब पत्रिका सृजनगाथा डॉट कॉम (www.srijangatha.com) द्वारा विशिष्ट रचनात्मक व कलात्मक लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए दिया जाने वाला यह सम्मान अब तक गीताश्री, डॉ. सुधीर सक्सेना, डॉ. राजेश श्रीवास्तव, श्री राकेश पांडेय, श्री प्रबोध कुमार गोविल जैसे रचनाकारों को दिया जा चुका है ।
चयन समिति में सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर(पटना), वरिष्ठ लेखिका-समीक्षक डॉ. रंजना अरगड़े(अहमदाबाद), सुपरिचित दलित कवि असंगघोष(जबलपुर), व वरिष्ठ लेखक व संचार विशेषज्ञ डॉ. सुशील त्रिवेदी (आईएएस, रायपुर) थे ।

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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BIO-DATA & SHORT LITERARY PROFILE 

   
Name               Dr. Harisuman Bisht   
Father’s Name         Shri R.S. Bisht
Date of Birth & Place      01 January 1958, Kunhil, Bhikyasen,
 Dist.- Almora, Uttrakhand (India)
Postal Address         A-347, Sector-31,
               Noida, U.P.-201301 (India)
               Mob. No.-09868961017
               E.Mail.id- harisuman_bisht@yahoo.com

Educational             M.A.(Hindi)Kumaon University,Nainital     

Qualifications         Ph.D.-Agra University, Agra. 

Works Published :-

NOVELS
1.   MAMTA (1980)
2.   AASMAN JHUK RAHA HAI (1990)         The Novel received literary acclaim from all the quarters.
3.   HONA PAHAR (1999)
4.   AACHHARI- MACHHARI 2006. (TRANSLATED FROM HINDI TO MARITHI)
5.   BASERA (2011).   
SHORT STORIES      
1.   SAFED  DAAG (1983).
2.   AAG AUR ANYA KAHANIYAN (1987).
3.   MACHHARANGA (1995).
4.   BIJUKA (2003).
5.   UTTARAKHAND KI LOK KATHAYAN (2011).
6.   MELE KI MAYA. (2009)

TRAVELOGUE            ANTARYATRA 1998 ( TRANSLATED FROM HINDI TO BANGLi)
   
SCREEN PLAY               KHWAB-EK UDATA HUA PARINDA THA
(Hindi Film Rajula)

PLAY               1.   DECEMBER 1971 KA EK DIN
(Directed by- Moh. Asharf;  No. of Stage ShowThree.)

               2.   AACHHARI-MACHHARI
(Directed by- G.D. Bhatt/Hem Panth;  No. of Stage                   Show-Two.)

               3.   LAATA (Directed by- Himmat Singh ;  No. of Stage                                                                        Show-One. )
OTHERS   
1.      INDRAPRASTH BHARATI QUATARLY HINDI         LITERARY MAGZINE (Edited- up to Dec.-2015)

2.      DIWANI VINOD   
(Translated from Kumauni to Hindi)

3.         APNI ZABAN MEIN KUCHH KAHO (Edited       1983)
      (Translated from Russian to Hindi)
      This Book won The Soviet Land Nehru Award for           Literature of the year (1984)



AWARDS/HONOURS 

1.         Received Aradhakshri Puraskar for literary        journalism in the year 1993.
2.         Received Dr. Ambedkar Sevashri Samman in the        year 1995.
3.         Received Akhil Bhartiya Ramvriksh Benippuri       Samman in the year 1995 from Hazari Bagh,               Jharkhand.
4.         Received Rashtriya Hindi Sevi Sahstrabadi        Samman in the year 2000.
5.         Received Shailesh Matiyani Katha Purskar in the              year 2012 from  Rashtrabhasha Parchar Samiti         Madhya Pradesh.   
6.         Received Vijay Verma Katha Purskar in the year              2014 from Mumbai (Maharashtra).
7.         Received Srijan Gatha.Com Purskar in the year               2015 from Egypt. 
8.         Also received many awards from Local, social and            Literary Field.
9.         A number of my Novels and short stories have been       translated into various  Languages.
10.          Some of my creative work (Novels and Short Story        Collections) had been topic of a thesis for       M.Phil,Ph.D. Degree in the various Universities.
11.         Writing regularly on literary topics in almost all the       well known Hindi periodicals.
12.         Also a broadcaster on the All India Radio-Short       Story, Radio Play and Literary Talks.   




(Dr. Harisuman Bisht)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dr Hari Suman Bisht साहित्यकार डॉ हरि सुमन बिष्ट
Published by Mahi Singh Mehta · July 27 at 6:42pm ·
यहाँ छोलियार शब्द उत्तराखण्ड़ के जन जीवन में रचा-ंबसा है। शब्द जो हमें उत्तराखण्ड़ की लोक संस्कृति का जीवंत अहसास कराता है। जो
हमें सोचने-ं समझने के साथ-ंसाथ लोक धुन पर थिरकने को मजबूर करता है।
जी हाॅ, मैं यहां छोलिया नृत्य के कलाकारों की बात कर रहा हूं। जो शादी-ंब्याह, मेले-ंठेले में शुभ कार्य में हमारा मनोरंजन करते हैं। वे सिर्फ मनोरजन भर नहीं करते बल्कि उत्तराखण्ड़ की सांस्कृति विरासत को जीवन्तता प्रदान करते हैं।
जी, मैं उसी छोलियार फिल्म की बात कर रहा हूं-ंबड़ी मजेदार फिल्म है। मैंने तयकर लिया है-ंउचय फिल्म जैसे ही रिलीज होगी, अपने पूरे परिवार के साथ इसको देखने का मौका छूटने नहीं दूंगा। मेरे परिवार में सिर्फ कुमाऊनी-ंउचयग-सजय़वाली बोलने व सम-हजयने वाले ही नहीं हैं पंजाबी, बंगाली, मलयाली भाषी भी हैं-ंउचय वे सभी इस फिल्म का आनंद ले सकते हैं। देश-ंउचयदुनिया के लोग भी इस फिल्म का आन्नद ले सकते हैं। क्योकि इस फिल्म की कहानी, समवाद हिन्दी में है। यह फिल्म छोलियार उत्तराखण्ड की सांस्कृतिक पृष्ठ भूमि पर बनी है। जो कि हिन्दी में है। उत्तराखण्ड़ के महत्वपूर्ण सांस्कृति पक्ष को रखने वाली यह फिल्म छोलियार शायद पहली हिन्दी फिल्म है। Dr Hari Suman Bisht
छोलियार उत्तराखण्ड़ के कलाकारों की अपनी फिल्म है। उसमें उनके जीवन की अंतरकथा है। कलाकार जो अपनी कला के लिए जीते हैं। फिल्म उनके जीवन में पेट भरने का साधन भर नहीं है-ंबल्कि छोलियारों के सामाजिक, आर्थिक, व्यवसायिक स्थिति को भी उजागर करती है-ंयहमें उत्तराखण्ड के लोक कलाकार के जीवन के विषय में सोचने-ंविचार करने को मजबूर करती है। यह फिल्म किसी छोलियार को उसके अपनी संस्कृति विरास्त के संवर्धन के कार्य के लिये उसे किसी सैनिक के राष्ट्र सेवा धर्म के समतुल्य खडा कर देती है। छोलियार फिल्म इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण एंव गंभीर विषय को लकेर बनी फिल्म है। इस फिल्म में दीपक की भूमिका महत्वपूर्ण है ही अन्य सभी कलाकार जो लोक जीवन से उभर कर आये हैं उनका अभिन्य कार्य सराहनीय है

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dr Hari Suman Bisht साहित्यकार डॉ हरि सुमन बिष्ट
Published by Mahi Singh Mehta · May 5 ·
My hindi article on Forest Fire in Uttarakhand. Hope you would like this article. There is slight mistake in some spelling while converting the text into unicode. Hope you will ignore the same.
पहाड़ पर आग: आग पर सवाल
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डाॅ0 हरिसुमन बिष्ट
पहाड़ जल रहे हैं। आग का ताण्डव चल रहा है। उसे देखने के लिए वहां कोई नहीं है। पहाड़ खाली हो चुके हैं। मीडिया में आग को देख रहे हैं। जान माल के नुकशान पर चल रही चर्चायें बेनतीजा हैं। पहाड़ पहली बार नहीं जल रहे हैं-ंउचय यह सिलसिला गत कई दशकों से चल रहा है-ं मीडिया तब इतनी सुर्खिया नहीं बटोरता था,और दर्शकों को आग की भयावह तस्वीर देखने को नहीं मिलती थी। गत कुछ दिनों से पहाड़ की यह आग देखने को मिल रही है। आग
उत्तराखण्ड में हो, हिमाचल प्रदेश की या फिर जम्मू कश्मीर की, तीनों राज्य सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इन्ही राज्यों में प्राकृतिक अस्थिरता से कहीं अधिक राजनैतिक अस्थिरता है। बहरहाल इस विषय पर यहां चर्चा करना उचित नहीं है। जल, जगंल और जमीन पर पहाड़ के लोगों का कोई हक नहीं है। इसलिए पहाड़ जल रहे हैं, राजनैतिक ऋषियों के बयानों से
महानगरों में रह रहे प्रवासी आग की तपिस महसूस कर रहे हैं। लेकिन वे असहाय हैं। सोशल मीडिया पर सवेदना संदेश भेजने के सिवाय कुछ कर भी नहीं सकते। इसके कारण भी हैं। तीन दशक पहले गर्मी शुरू होते ही प्रवासियों का पहाड़ लौटना शुरू हो जाता था। साल में एक-ंउचयमाह के लिए पहाडों में रौनक लौट आती थी। बच्चे से लेकर बू-सजये तक का जीवन का एक वर्ष खुशी-ंउचयखुशी व्यतीत हो जाता था। अब ऐसा नहीं है। प्रवासी अब पहाड़ नहीं लौटते। लौटने वालों का प्रतिशत दस से कम होगा। प्रवासियों की अपनी जल-ंउचयजमीन और जंगल से विमुखता क्यों हुई, इसके कारण को तलाशने की आवश्यकता नहीं महसूस की गयी। यह दायित्व सियासत दानों का था-ंउचय वे केवल वोट लेने के लिए
गाॅव-ंउचयगाॅव जाते रहे-ंउचय यह सिलसिला वहीं तक सीमित रहा। पहले जल की बात करते हैं। गत तीन दशको में आये भूकम्पों ने पहाड़ों को हिलाकर रख दिया है। हिमालयी क्षेत्र में भूगर्भ शास्त्रीयों के अनुसार धरती के गर्भ में लगातार हलचल चल रही है-ंउचय जिसके प्रमाण धरती जब-ंउचयतब देती रहती है, धरती के भीतर चल रही उथल पुथल से जल के स्त्रोत खत्म हो गये हैं। मैं अपने गाँव की बात कर रहा हूँ। पिछले दशक से यहां पानी पीने को नशीब नहीं है। गाँव की औरते गाँव से पांच किलोमीटर नीचे रामगंगा, से पानी लेने जाती हैं। गाँव के लोग पट्टी पटवारी से लेकर सरकार के आला अफसरों, मंत्री-ंउचयमुख्यमंत्री तक अपनी गुहार लगा चुके हैं। कोई सुनवायी नहीं होने के उपरान्त गाँव छोड़ने को मजबूर हुए हैं। पहाड़ का एक समृद्ध गाँव आज विरान हो चुका है। जगंल पर ग्राम पंचायत का अधिकार नहीं रहा। मु-हजये याद है, गाँव-ंउचयगाँव में ग्राम पंचायत की बैठकंे होती थी-ंउचयबैठकांे में गाँव के दैनिक जीवन से जुड़ी समस्याओं का निदान -सजयूं-सजया जाता था-ंउचय निदान अर्थ पर आधारित न होकर श्रमदान पर होता था। ईधन,चारा और उसकी सुरक्षा का अधिकार ग्राम पंचायत के पास सुरक्षित रहता था। मौजूदा वन अधिनियम के कारण अब ऐसा नहीं है। ग्रामीण
लोंगों को दैनिक चीजों की आवश्यकता को पूरा करने की व्यवस्था का भरोसा यह वन अधिनियम नहीं दे पाता। जब से साॅयल कन्जरवेशन ने वनों का जिम्मा उठाया है, ग्रामिणों का जंगलों से कोई लगाव नहीं रहा। इस अधिनियम ने गाँव का वनों से रिश्ता खत्म कर दिया। पहले ग्रामीण खरपतवार को नष्ट करने, जंगलों में घास के लिए जाते थे। वे
आग लगने पर उसे बु-हजयाते भी थे। यही पहाड़ की घरती है। जहां से गौरा पंत ने चिपकों आन्दोलन की शुरूआत की थी। अब किसी पर्वतीय महिला से गौरा पंत का अनुशरण करने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। पतरौल की नियुक्ति और उसके दायित्व ग्राम पंचायत सुनिश्चित करती थी।समय-ंउचयसमय पर घास-ंउचयलकड़ी ग्रामीणों को उपलब्ध हो जाती थी। अब यह सब सपना है। जब जंगल पर हक नहीं रहा, तो पालतू जानवर रखने की आवश्यकता नहीं रही। जिनके पास एक दो जानवर थे उन्होनें भी पानी और चारा के अभाव में मुक्त कर दियें। पहाड़ पर सिंचाई के साधनों की कभी समुचित व्यवस्था नहीं की गयी-ंउचय ऐसा आरोप/ प्रत्यारोप उत्तराखण्ड राज्य के बनने से पूर्व की सरकार पर लगते थे, आज भी उस स्थिति में मूल भूत परिर्वतन नहीं हुआ है। इन आरोपों का आधार तत्कालीन उत्तर प्रदेश की लखनऊ मैं बैठी
सरकार के माथे म-सजया जाता था कि वह देश-ंउचयकाल परिस्थितियों के अनुरूप योजनांँ नहीं बनाती। क्यांेकि पहाडों की भौगोलिक परिस्थितियां एकदम भिन्न होती हैं-ंउचय उत्तराखण्ड़ राज्य बनने के बाद के आरोप-ंउचयप्रत्यारोप जस-ंउचयतस बने रहे। नया राज्य बनने के बाद आम जीवन को हास्य का पात्र बनने के सिवाय कुछ नहीं मिला। खेत बंजर हंै, सिंचाई की
व्यवस्था नहीं, पीने का पानी नहीं। पूरा पहाड़ का जीवन वर्षा पर आधारित है। बरसात के मौसम में ही वर्षा का इंतजार नहीं होता था जब तब वर्षा हो ही जाती थी-ंउचय अब पहाड़ों में वर्षा नहीं होती। बर्फ गिरनें का इंतजार की जरूरत ही नहीं। मौसम ने अपना मिजाज बदल दिया है। पहाड़ों पर आग लगने का यह भी एक प्रमुख कारण है। जिसकी चपेट
में उत्तराखण्ड के 13 जिलें हैं, उनमें भी सबसे अधिक पौड़ी ग-सजयवाल, अल्मोड़ा और चमौली जिले हैं। आग इन जंगलों में खुद लगती है या लगायी जाती है-ंउचय यह जांच का विषय है। किन्तु इतना तो कहा ही जा सकता है -ंउचय जब से ग्राम पंचायत से उसके मौलिक अधिकार छीने गये हैं-ंउचय उन्होंने जल-ंउचयजंगल और जमीन से उस रूप में नाता भी तोड़ दिया है। अब जंगल में आग लगती है, तो कोई भी ग्रामीण आग बु-हजयाने नहीं जाता। यह सच है। उसका अपने ही जंगलों से कोई लगाव नहीं रहा। हाँ, इंतना तो फिर भी दावा किया जा सकता कि ग्रामीण जो भी गाँव में हैं-ंउचय वह जंगल की आग बु-हजयाता नहीं तो आग लगाता भी नहीं है। वह जानता है-ंउचयजल-ंउचयजंगल और पहाड का अटूट संबंध है-ंउचय इनमें से एक भी कमजोर पड़नें पर पहाड़ का अस्थित्व समाप्त हो जाएगा। इस आग के लिये जिम्मेदार कौन है। वे लोग जो पहाड़ की
जल-ंउचयजमीन और जंगल के लिए कानून बनाते हैं। वे लोग जो चीड़-ंउचयदेवदार और बांज,बुराशं इमारती लकड़ी और लीसा के लिये जंगल का दोहन कर रहे हैं, या फिर बडे़-ंउचयबड़े बांधांे का निर्माण तथा कारपोरेट घरानों के द्वारा लगाये जा रहे बड़े-ंउचयबडे़ प्रोजैक्टों के लिए तैयार की जा रही जमीनों की खरीद फिरोक्त करने वाले लोग या फिर वन दोहन और वनों का अवैध और जमीन का खनन करने वाले लोग हैं। पहाड़ से विस्थपित व्यक्ति यह भली भांति जानता है-ंउचय कौन है वह व्यक्ति जो पहाड़ के जलने पर खुश हो रहा है। इन छोटी-ंउचयछोटी बातों पर यदि जन प्रतिनिधि हमारे सोचंे तो अगले ग्रीष्म में पहाड़ों में आग नहीं लेगेगी, पहाड़ पर हेलिकापटर से जल वर्षा नहीं करनी पडे़गी, समय पर वर्षा होगी, बर्फ भी गिरेगी और ऐसी पारिस्थितिकी आपदा का सामना भी नहीं करना पड़ेगा।

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The man who weaves stories of people who have built cities

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