Author Topic: Exclusive Garhwali Language Stories -विशिष्ठ गढ़वाली कथाये!  (Read 48345 times)

Bhishma Kukreti

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एक दबाल
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 Story by: Mahesha Nand
(मेरी पांचवीं पुस्तक की मुख्य कथा)
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घैंणू बसग्याळ लग्यूं छौ। बसग्याळ गरीब मौ खुंण काल जन हूंद। न बौलु कनू मिल्द, न ध्याड़्यू काम। काम लग्यूं हो त सि अलल-दलल (जी भरकर) कै खंदन्। निथर तौंकS लंघड़ पुंणा रंदिन।
राजु कौं कS बि खांण-पींणा कुदिन हूंणा छा। वेन अपड़ि ब्वे थैं उज्ययां मरसा ढिंड्डौं थैं सिल्वटम् पिस्द देखी बोलि-- "ब्वे अमंणि बि तु मरसै धप्ड़ि अर झंग्वरु पकांणी छै ? ब्वे तै खांणा द्येखी त अब बिखळ्यांण पोड़ि ग्या। हरड़ै दाळ पकौदि। स्वत्या जयीं च।" राजुन् टरकंणि कैनि।
ब्वेन औंदा मा झंग्वरौ बळिंडु धैरी बोलि--- "बल ब्वेयी जी हूंदि त र् वै क्यांकि छै। मै रौSड़ लगीं च मरसा खांणै ? हरड़ै दाळ त भग्यान खाला।"
राजू दगड़्या बुद्दि बि उबSरि वुक्खमी छौ। वे थैं कळकळि लगि ग्या। तबSरि वे कि ब्वेन् वे थैं धै लगैनि। बुद्दि खुड़बुट अपड़ा ड्यार आ। वे कि ब्वेन् वे संणि दुकSनिम् फट्यांद बोलि--- "बुद्दी! जS बा दुकSनिम् जौदि अर लाला दादा जीम् बोली कि ब्वेन बोलि बुन कि आदा किलु हरड़-मलकै दाळ द्ये दिंया उधार। पैंसा पाछ द्ये द्यूला। जु दादा जी दाळ द्ये द्याला त लुकै कि ल्है। निथर पैंछा मंगदरौन् आंण।" बुद्दि दाळ ल्हींणू दन्कि ग्या।
बुद्दि ब्वे वे थैं जग्वळीं छै। वु बिंड्डि अबेरम् आ। अन्दि सार वु रूंण बैठि ग्या--- "मयड़ी, मि उंद आंणू छौ अर बाठम् रौड़ि छौं अर दाळ खत्ये ग्या।"
भरि निरSस्या बुद्दि ब्वे। वे फर फितकेंण बैठि---- "हमू खुंणै एक दाळी दांणि बि अखरमासै ( अत्यंत कष्ट के बाद प्राप्त वस्तु) च। पगाळ कै कि त तु दाळ ल्है अर वां थै बि खौती ऐ ग्ये। त्यारा हतू फर ट्यौ (ताकत) नि छौ रै छ्वारा।" ब्वेन् वे थै सुटगिनी-सुटगिन् धड़कै द्या। बुद्दी किल्लाबिब्रि मचि ग्या। बुद्यू रूंण राज्वी ब्वेन् बि सूंणि द्या। वS छिंछ्याट कै यूं कSड्यार आ।
"किलै चटगांणी छै भुली तु ये नौना थैं ?" वीन बुद्दि थैं अफु फर चिप्टै द्या।
"चुचि दीदी, दुब्यळि मूळौ थिंच्वंणि खांद-खांद फिचकांण (अरुचि) पोड़ि ग्या। लाला जिवोरु मा पगाळ कै कि त ये मा दाळ मंगा, यु पट्ट एक दबाल खौती ऐ ग्या। चटणांण नी त क्य ये कि मुंडि मलसंण ?"
"भुली! ये नौनै त मुंड्डी मलास तु। व दबाल दाळी येन खौती नी। वां थैं यु राज्वा बान मै थैं द्ये ग्या। राजु हरड़-मलकै दीळ द्येखी खिलपत ह्वे ग्या। भुली, ये कि दिंयीं दाळी दबाल मै खुंण समळौंण्य पैंछु ह्वे ग्या।" राज्वी ब्वे वे कि मुंडि मलसंण फर लगीं।
"चुचि दीदी त यु मैम् सकळि लगांदु कि येन तुम थैं दाळ द्या। सुद्दि-सुद्ये मार भनकै खा येन।"
बुद्दि उगससा ल्हींद ब्वन्नू--- "मयड़ी अफी त तिन बोलि छौ कि दाळ लुकै कि ल्है। पैंछा मंगदरौन् आंण। जु मि सकळि लगांदु त तिन राजु कौं थैं दाळ नि दींण छै।"
वूं द्विया ब्वयून् बुद्यू छकंण्य लाड कै द्या। बुद्या बिंगण्म सप्पा नि आ कि वेन मुंथौ सबसे अंगळति काम का।
Copyright@ Mahesha nand


Bhishma Kukreti

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कन्यदान (एक दबाल बटि) पाठकगणों! कृपया इस कहानी को अवश्य पढ़येगा
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Story by Mahesha Nand Pauri
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बचनसिंग अर हरसु मिस्त्र्यू छौ बकळु पिरेम। हरसु बचनसिंगौ मिस्त्रि, ल्वार अर हळ्या छौ। जै दिन बचनसिंग घौर अयुं रांदु छौ, तै दिन जु हरसु वूं कS ड्यार नि जौ त बचनसिंग वे थैं ऐड़ै-ऐड़ै कि धै लगै दींदु छौ। तब सगळ्य गौं कS बींगि जांदा छा कि अमंणि (आज) बचनसिंग ड्यार अंयु च।
बचनसिंगै अपड़ि गीडि छै। वु गाडि चलांदु छौ। वकि घौर-बोंणै गाडी छिंछ्याट कै दंनकणी छै। पंण बिधाता थैं ज्य नि सुवै ह्वलु,गाडि भेळ जुगता ह्वा। अदखिचरि कबलदर्यू भारु बिन्दी धौंणिम पोड़ि ग्या। बिन्दी अपड़ा द्वुया नौनौ थैं बौलु कै कि सैंतंण बैठि।
धरु-कखर्वा जु पुंगड़ा त्याड़म् दिंया छा सि वीन उंड मांगि द्येनि। हळ्या वूं कु हरसु छैं यि छौ। पंण व हरसु थैं न त हौळा अर न ल्वरकामा पैंसा दे सक्दि छै। एक दिन बिन्दी कूटा-दथड़ा पळ्यांणू ल्है ग्या। वीन सुदमतां मा बोलि-- "हरसू, ब्यट्टा कन काचि पांण धैरि तिन, यु दथड़ु त ऊळै अळ्यांणम् (कटंणम)लत्त मड़के ग्या।"
चरखा हरस्वी सैंण बिंदरा छै धौंकंणी। वीन कटम्म जन ब्वलेंद घैंणै टमाक मारि हो--- "जी, वन्नि बल त्यरि नि देंणि बांण अर वन्नि म्यरि कचकचि पांण।"
हरसु फर भरि बिनै ग्या बिंदरौ इन बुन। वेन कुटबाक छुबलै कि बोलि--- "काकी, यीं थैं ब्वन्न द्या। आंणु च बल कि अमंणि म्यरि त भोल त्यरि। म्यारा गैख जी मै तिरै कि क्वी धांण नि खांदा छा, न वु मै दग्ड़ि भिन्न-भौ कर्दा छा। काकी हम द्विया मौ कु पिरेम सगंढ(विशाल) रौ भस।"
हरसु वूंकु कटसल (कूटा-दथड़ा , हौळ आदि बणांण) पिरेम-भौ मि कनू छौ। नाजा समौ मा एकाद सुप्पि नाजै मीलि जांदि छै भस। बगत फ्वां-फ्वां सौंपळि मारि सटगी। बगतन बिन्द्या रिबड़्यां दिन बौड़ै द्येनि वीं कु ज्याठु नौनु सूरज गढ्वाळ रैफल मा भर्ति ह्वे ग्या।
इना गौं बटि मिस्त्रि, ल्वरकाम अर हौळ-तांगळै धांण छिछा(नस्ट ह्वा) त हरसु सुद्दि लंडखंण बैठि। वे कि जेठि नौनि कुळैं कि सि डाळि जन घळकि(बढि)। वेन जन्नि-कन्नि कै वीं खुंण नौनु ख्वज्या अर नौना बुबा मा फड़फड़ि (स्पष्ट बोलि) लगा--- "मै मा तुमSरा द्वी पौंणौ जिंमांण लैक बि नी च। तुम यीं नौनि थैं अब्बि ल्हि जांणा छंवा त ल्ही जा।"
बिन्दी थैं जै परमेसुरन फट्ये हो खुड़बुट वुक्ख। वीन जब नौनौ द्येखी त व फट्ट फटगर्ये गंया। वु अदगड़ मनिख जन छौ। वीन बचनौ भरि बरगबान कै द्या-- "न्यांणि-क्यांणि नौन्यू बुरु कनी छै हरसु तू। त्वे फर ह्वति (हिम्मत) नी च त मि करलु यीं कु ब्यौ। पंण मि नौन्यू बुरु नि हूं ण द्यूं। हरसू जु तु मै थैं अपड़ि गैख्यांण चितैली त यूं खुंणैं ना बोलि द्ये।" इतगा बोली व अपड़ा ड्यार आ। हरसु, बिंदरा अर यूं कि द्विया नौनी दंमणाट कै र् वै ग्येनि।
बिन्दिन हैंकS दिन सूरजौ खुंणै तार भेजी अर वे थैं घौर भट्या। सूरज अर हरसुन् सैरि पट्टि चंचाळि द्या तब धौसिनकै वूं थै जार-जख्यरा वळु मवसु अर जोड़ि-सौंजड़्यू नौनू मीली साकि।
सूरजन् वीं कु कन्यदान कैरि। वेदि मा जु रीति-रिवाज क्वी भै निबांद, वु सूरजन निबैनि। वेन ब्यौ मा स्यूंण बरोबर बि टूट(कमी) नि कैरि। वेन हरसु मा बोलि--- "भैजी म्यरि ब्वै हम थैं छ्वट्टै बटि अढ़ांणी रांदि छै कि तुमSरा हौळ अर चरखा भोर हम सैंतेंणा रां। अमणि मिन तुमSरु उणतुरु (कर्ज चुकांण) कैर्यालि।"
Copyright@ Mahesha Nand

Bhishma Kukreti

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        जिन्नु परांण : A Garhwali realistic Story
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Story by : Mahesha Nand
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आँखा कांणा, कंदूड़ बैरा, कम्मर डुंड्डि अर डगड्यांद हत। ख्वळि गिच्चि, फुल्यूं मुंड, लम्बा घुंज्जा अर दरदरि गत। इनि बान्यू मनिख च कूंता। चार बीसी अर पांच फर च। कुंता इकुलु बांदर सि डंड्यळि जग्वळूं (चौकदरि कन) ज्यूंदि बंण्यूं च खबेस। चार नौना, चार ब्वारी सौब बस्यांन् दुरु परदेस। अफी पकांणि, अफी खांणि हुंयी च। ज्ये पकंणू च, जन्नि पकंणू च, तन्नि खयेंणु च।
कूंता अपड़ा जोगो रूंणू च--- "हूंदि अमंणि ज्यूंदि बुढीड़, रुसै वे कु पकांदि वा। कांज्यु-कफल्यु ज्ये बि हूंदु सरदा कै खलांदि वा।" पंण जोगा ऐथर कै कि नि चली ? जै कS जोगम् जन ल्यख्यूं ह्वालु, वु तन्नि खालु। पापि पुटिग्या बान कूंता चुल्ला अगड़ि बैठ्युं च। खांणा पकांणू अफी पर्वांण बंण्यूं च। कूंतन जबक लगै-लगै कि भांडा औंदम् धैरि द्येनि। भुज्यू भदSळु मुल्या त तव्वा मैला औंदा धैरि द्या।
कूंता रुट्यू खुंणै ढबSड़ि आटु गंमजांणू च। आँखा सुख्यां छन पंण नाक गिल्लु च। नाक तर्र-तर्र आटम् चूंणू च। सर्र नाक फूंजि बुढ्यन् गर्र आटम् ओलि द्या, लतपत रुठळु पाथी चटंट भदSळम् धोळि दंया। आँखा त सप्पा दिखेंणी नि लग्यां छा। भदSळम् काचि भुज्जि अर ऐंच बटि काचु रुठळु। वेन उठा डडळु अर गंजमंज कै खैंडि द्या। भूका मारा तैन सौब बाड़ि जन, कळ्ळ-कळ्ळ घूळि द्या।
अद्दा रातम् पुटगि कन बैठि गुड़गुड़-गुड़गुड़, ढम्म-ढम्म। मचि उदरोळ पुटगि सम्म। बायु छुट्टि भम्म-भम्म। छर्र इना, छर्र उना, बुढ्या रिंगणू फळम्-फळम्।
सुबेर जबक लगैकि बिंगद बुढ्या-- हत-खुट्टा लतपत। ब्याळि खै छौ आलु-काचु, सुलार चूंणू पतपत। चर्री कूंण्यूं छर्क मरीं, खांदु भुर्यूं, खंत्ड़ि भुरीं, खांणै थकुलि सम्म भुरीं।
खुंट्यूं उंद लतग-पतग, भैर-भित्र गंद-बास। सिंटुला रिंगंणा खुंट्या(सीढ़ी) मत्थि, लींडि कुक्कुर लग्यां साSस। अफु फर अफी घिंणांद अर रूंद-रूंद ब्वाद कूंता--- "पापि मिरतू! तु मै कु किलै नि आंणी छै ? ज्यूं मि त्वे उंड भट्यांणू छौं, त्यूं तु फुंड-फुंड जांणी छै।"
Copyright@ Mahesha Nand
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Bhishma Kukreti

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मुळ्यरु नौना (आलसी बेटे)
Story by Mahesha Nand , Pauri

बुद्दिन् खौरि खा त स्यु इंजिनेर बंणि ग्या। तैकS बुबन् स्यु अढ़ा-- "ब्यट्टा, जु खौरि खांद, पस्यौ बौगांद तै थैं परमेसुर मुक लगांद। स्यु संगता गंणखे जांद।" बुद्दिन् अपड़ा बुबै अढ़यीं अंठम्म धैरि। त अमंणि तै थैं सौब गंणखंणा छन। दाना-सयंणा स्यवा लगांणा छन।
बुद्या कपाळ फर कुबुद्दि बैठि। वेन गुंण्या--- " एक कुल्लिन् वे थैं इंजिनेर बंणा। अर जु वु अपड़ा नौनौं थैं अंक्वै लैकबंद नि बंणै साक त वे खुंणै थुपंण्या।" बुद्दिन् अपड़ा नौना इन्नि अढ़ैनि। पराबेट इसकूलुम अढ़ाणू फट्येनि। जक्ख वेन ठम्म-ठम्म रुप्या द्येनि। बुद्दि यूं थैं अढांदु छौ--- "हे लोळा निरभग्यूं मि चार अना फीसा बान बि पगाळ मंगणू गौंम् जांदु छौ, तुम भग्यान छंवा जु कैम पगाळ त नि मंगणा छंवा। अंक्वै चेती रावा। बुरु बगत झंणि कै दिन ऐ जौ, कु द्येखि ग्या।"
पंण जन्नि सि अढ़येंणा, तन्नि सि फुंड-फुंड जांणा। तौबि बुद्दि कंगस्या कनू-- "छ्वारा अजि अदकचा छन। लवड़ा(भयंकर ठोकर) लगला त चेति जाला।
वेन नौना बजारम् किराया घौर फर सैंतनि। वूं खुंण क्वी टूट नि कैरि। वूंकि ज्यांकी सरदा कनी सी पकंणू। अलल-दलल कै खयेणू। बुद्दिन् सौब भला काम कैनि पंण एक खुट्टा कुलSड़ि लगांण वळु काम कै द्या।
कै बि नौना थैं पांण्यू गिलास तकै नि उठांण द्या। यां कS पैथर ध्यौ त वे कS भलै छा कि कै नौनौ बगत घौरै धांण सरांणमी नि जौ। वूं कु पंण्णौ, ख्यन्नौ बगत नि छिछौ। इलै वेन वूंम क्वी धांण नि सरा। भुज्जी, सिलेन्डर,रासन, दूध अर बजारै साब धांण अफु ल्हा। अपड़ि सैंण थै बि डटकारि द्या-- "भा रै! यूं नौनौम् क्वी धांण नि सरै। तौंकु बगत निखर्त ( बेकार) नि जौ, तौं थै पंण्ण द्ये चा तु मोरि जै।"
निरभगि नौनौं कि उल्टि फरक्या। वून झंणि क्य चिता। ब्वेन जु बिसरां वूं कु बोलि ह्वलु-- "बच्चा, अपड़ा खयांकि बिट्ठि (जुट्ठि) थकुलि वास बेसन मा धैरि दि त तैन फट्ट ना बोलि। जु ब्वल्ये ह्वलु--- चुल्ला फरा नळखम् पैप लगै कि वे थैं टंक्किम् घालि दि त तामा बि स्यु फिंगरे च। ब्वे-बाब बींगि ग्येनि--- द रै, फुटगुद्यौं! यि छ्वारा त चबट्ट कै अळगसि ह्वे ग्येनि।
तब ऐ ब्वे- बुबा फर अक्कल। तब खकळांद ( हार जाने के बाद की स्थिति) सि गंगजैनि-- "जु यूं थैं गौम सैंतदा, मोळा फंच्चौं कि घत्तSसरि करांदा, द्वी बेळि लंघड़ ले कि सिवळदा, हौळ लगवांदा, गोर चरवांदा, घत औंण फर कुल्लि काम करवांदा त यून कर्मगति रांण छौ। पंण यूं थैं डिसांणम् चाS , खांणू अर बार-बनी चरचरि-बरबरि धांण घुंळ्ळू मिन्नी रैनि अर यूं फर अळगस पसरेंणि रा त सि मुळ्यरु ह्वे ग्येनि।"
पाछ अतSसति (लाख पर्यत्न कर हार जाने के बाद अन्तिम समय में) फर ऐकि द्विया झंणौन् बोलि--- " निकम्मा नौनौ चुलै औता रै जंया, पंण कुनागर( बुरे दुरगुणों वाला) नौना नि हुंया।"
Copyright@ Mahesha Nand
Let Us Celebrate Hundredth Year of Modern Garhwali   Stories!



Bhishma Kukreti

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                 वूं दिनु दिल्ली मा
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Story by: Mahesha Nand
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भरि खौर्या दिन छा वु। रम्मु दिल्लिम् एक भांडौं कि दुकSनिम् छै सौ रुप्ये ठिकर्या नौकरी कर्दु छौ। चार सौ रुप्या त झुग्गि क्वी किराया छौ। तब उब्रि (शेष) द्वी सौ, यूं द्वी सौ रुप्यौं थै वु सगळ्या मैना पुकांदु छौ।
ठ्यिल्लम् मिल्दि छै द्वी रुप्यम् एक करछुलि भातै अर एक डडुळि सागै। सैरा दिन वु इतगै फर ढीम (संतुष्ट हूंण) कर्दु छौ। ब्यखुनि दां झुग्गिम् ऐकि द्वी रुट्टि लूंणम खै कि स्ये जांदु छौ।
एक दिन वे कS गौं कS नौना थैं सौ रुप्ये चाड (जरूरत) पोड़ि त वेन रम्मु मा सौ रुप्या पगाळ मंगि द्येनि। पाछ रम्मु मा सौ रुप्ये उबर्यां छा। यूं सौ रुप्यौन् चार दिन बि वे कS किसा उंद थौ नि खैनि।
रम्मु जब खलझाड़ ह्वे ग्या त ब्यखुन्यू पकांणू सप्पा नि रा। वेन पांणि प्या अर स्ये ग्या। एक दिन, द्वी दिन अर तीन दिन नीमी (व्यतीत) ग्येनि, रम्मु टंटांण बुख्या-बुक्खि रै ग्या। तीन दिन अर तीन रात वेन इन नी कि जु सौं ल्हींणु बि एक टींड गिच्चा घालि हो। चौथी रात वे सप्पा निंद नि आ।
कुरबुरिम् वेन परमेसुर सुमिरि----- "हे परमेसुर! तीन दिन अर तीन रात त मिन ठेलि येनि, क्य अमंणि बि मिन बुक्खि रांण! म्यारा बांठौ खांणु तिन कक्ख लुका ? ये औगार (शिकायत, मन का उमाळ) लगै कि वु रंगत्यांद-तंगत्यांद गोविन्दपुरि बटि पाड़गंज पैदल दुकSनिम् ऐकि लाला थैं जग्वंळ बैठि।
वेन दुकSन्या भैर सड़किम् छकंण्य कागज अर एक लिफपु द्येखि। लिफपा बटि एक रुप्यौ नौट दिखेंणू छौ। वेन वु लिफपु उफारि त् द्येखी-- एका नौटा पैथर सौ कु नौट बि छौ। वेन सर्ग जना नेळी (द्येखी) परमेसुरौ बोलि---" हे परमेसुर! क्य अछीकि तिन म्यरि खौरि अपड़ा आंखौन् द्येखि यालि ? परमेसुर त्यरि लिल्यौ क्वी अन्तु नी।"
वेन पाछ धीत तोड़ी छोला अर कुल्चा खैनि अर परमेसुरौ हत जुड़िनि। रम्मु थैं जब दिल्लि मंगा वूं दिन्वी ओद आंद त वे कS आंखौंम् अंसधरि छंमणै जंदन।
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Garhwali Fiction, Friendship
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                    मन्वा दगड़्या
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(दगड़्या दिवस फर म्यारु पिरेम)
Story By Mahesha Nand
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मन्नु गौ जन मनिख छौ। वु दगड़्यों कS पल्ला पोड़ि त वे फर वूंकि भामि लगि ग्या। मन्नु थैं वु जक्ख भट्यांदा वु तक्खी दन्कि जांदु छौ। स्यु दगड़ा बान जक्खि-कक्खिम् फुंद्या बंणि जांदु छौ। पखंणा छन बल कि मि कर्दु देसै मेस अर मै कु हूंदु चल्यूं (चालु) कु भेस।
भलि कंगस्या (कामना) लेकि यु सौब भलु कन चांदु छौ। भल्यार कना दंदोळम् मन्नु सब्यूं कु ऊपि (नापसंद) बंणि ग्या। दगड़्या ऐका पैथर रांदा अर यु ऐथर। जक्ख कड़ु ब्वन्नै नौमत आंदि त मन्नु अफी ऐथर ऐ जांदु छौ।
मन्नु अपड़ा चित स्ये इन चितांदु छौ कि वे का दगड़्या वे कि पुलबैं कैरSला। पंण वु त पीठि पैथर वे कि कौलि कर्दा छा। कंद्वरा (कै कि गुप्त बात ) सुंण वळा मन्नु थैं बिंगाणी लग्यां रांदा छा कि स्यु त तन च, वु त यन च।
तौबि मन्नु यूं कु दगड़ु नि बिरै साकि। दगड़्या चकड़ेति कैरुन् अर मन्नु अपड़ा सकळा ध्यौ ले कि यूं कS ऐथर-पैथर रौ। जक्खम दगड़ा बान मुकरंगै(लड़ै-झगड़ा) कनौ घत आंदु त स्यु आँखा बूजी फक्कम् मुकरंगै कर्दु।
मुकरंगै कर्दि दां दगड़्या सुरक--सुरक मुक लुकांण बैठिनि। पाछ बींगि द्या मन्नुन् सैरि सार-तार। वे कS घटपिंडौ सकळु मनिख बि सुरक घटपिंडै लुकि ग्या। ब्वादन बल कि अब मन्नु बि अपड़ै दगड़्यों जन चंट-चकड़ेत ह्वे ग्या।
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Copyright@ Mahesha Nanad
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Realistic and inspirational Modern Garhwali Story

                दुरंगा टल्ला
Garhwali Story by: Mahesha Nand

घ्यपळुन् गुंट्ठि भै कि कौलि (मजाक) कै कि बोलि--- "थ्व रै गुंट्ठि भै, मास्टर छंवा अर सि छंवा कुतरंण्या झुलौं पैरी हळ्या सि बंण्या। अंक्वै बरांडेड सूट-बूट पैरी रावा धौं।"
गुंट्ठि अपड़ि गरिब्या दिन नि बिस्रि छौ। वे थैं अपड़ि खयीं खौर्या दिन्वी ओद (याद) ऐ ग्या। वेन घ्यपळु थैं अढ़ांद बोलि---- "ज्वनिम नि द्येखि बल देस अर बुढींदां ह्वा खबेस। जौं दिनु हौंस-उलार छै तौं दिनु दुरंगा टल्लौन् नांग ढका त मुंथन् लिकैकि (चिरढ़ैकि) बोलि --- हे रां द! तै गुंट्ठि भै कS बि बौढ़ला कबि दिन। तक्ख द्याखा धौं दुरंगा टल्ला कन चिंमलांणा (चमकंण) छन।"
गुंट्ठिन् अपड़ा झुल्लौं द्येखी बोलि---- "टक्क लगै कि सूंण भुला! म्यारा दिन बौढ़ी ऐ ग्येनि। अब यि झुल्ला जन बि छन पंण टलंया नि छन त अज्यूं बि मुंथा (दुनिया) लिकांणी लगीं च। मुंथौ मुक दुरंगा टल्ला जन हूंद। उब्बरी काळु त उब्बरी गोरु। लारा-लत्ता बल द्वी अर मुक वी। भुला, जमज्यळौं मूंजा (झुर्री) पोड़ि ग्येनि। भोळ तु ब्वल्लि-- न बै दिदा! मूंजा पोड़ि ग्येनि। हैंकु मुक ल्हौ त त्वी बोल, हैंकु मुक कक्ख बटि ल्हौं ?"
घ्यपळ्वा मुक उंद मूंजा छा पुड़्यां छकंण्या। वेन अप्ड़ि जमज्यळि जबकैनि अर वुक्खुम् बटि सट्ट सट्गि ग्या।
अछीकी (सच मा) जु क्वी कै कS झुल्लौं द्येखी वे थैं गंणख (सम्मान दींण) त वु हूंचू (ओछू) मनिख च। बरांडेड झुल्लौं पैरी मनिखौ मोल नि हूंदु, मोल हूंदु वे कS उच्चा-सच्चा ध्यौंऊं (विचारू) का।
Copyright @ Mahesh Nand
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Augar: A fine Garhwal Story illustrating subconscious mind and love
Critical Review of Modern Garhwali Short Stories -163
    Analysis of Garhwali short story ‘Augar’
   Critical Review of Garhwali Short stories written by Mahesha Nand-1
     
                           Review by Bhishma Kukreti

       Mahesha Nand is among younger generation of Garhwali fiction makers. Mahesha Nand already published two Garhwali fiction collections and third short story collection is in the press. Two story collections proved that Mahesha Nand is one of the modern stars of Modern Garhwali Story World. 
‘Augar’is the story of love of Gobindu for Fyunli. Gobindu sees Fyunli under Hisar shrub and then under Gweeral and then under many trees, shrubs and lastly into cloud web. When the reader reaches to the story end the end surprised the reader and readers start jumping from the bad, chair or where he is. That is the beauty of marvelous love story.
       Mahesha Nand is successful in crating love aroma, the joy of meeting and pain of separation and then going for finding the lover. The reader presumes that reader is reading a folk story and the end makes reader aware that it is modern story.
  Mahesha Nand is the master of simplest way for storytelling. His phrases are pure Garhwali and you will seldom find Urdu words.  Mahesha’s Garhwali vocabulary is before British era. Mahesha Nand creates rural Garhwal images in reader’s mind effectively. His dialogues match with the characters.  From the beginning, reader is anxious for knowing the end of story and that is mastery of Mahesha that reader has to jump after reality.
Copyright@ Bhishma Kukreti 22/8/2016
Critical Review of Garhwali Short story by Mahesha Nand to be continued in -2
Critical Review of Modern Garhwali Short Stories to be continued…163
Let Us Celebrate Hundred and Third Year of Modern Garhwali   Stories!
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Bhishma Kukreti

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Garhwali Story
          सगोरबंद मूसु
Mahesha Nand

एक सगोरबंद मूसन् डंग्या पुंगड़ु द्येखि। वुक्ख गारै-गारा हुंया छा। माटौ एक बि बुरकुंण नि छौ। वेन वे पुंगड़ा बटि उब्ब बांझा डांडा जना एक डुंड खौंणी अर वुक्ख बटि गदाल माटु सारी ये पुंगड़म् माटा इड़प (ढेर) लगै द्येनि। पुंगड़ि बंणि ग्या नजिलि फांगि। वेन वुक्ख कुटळिनी खुबरै कि कौंणि-झंग्वरु बूती द्या।
पाछ वुक्ख कौंणि-झंग्वरा बोट बिफ्रि ग्येनि। बाल ह्वे ग्येनि गरगरी। बाल बथौं मा हलकंणी। ब्यौली सि बिस्वार जन झलकंणी।
छकंण्या निकज्जा, कुसSग्वर्या मूसा वे कS पुंगड़ा द्येखी ममळांण-जजळांण बैठि ग्येनि-----" तै पुंगड़ा द्याखा धौं, कौंणि-झंग्वरै बालुन कन तंणसट्ट बंण्यू च। बाल कन छन, जन ब्वलेंद ब्यौली धौंप्यलि ह्वलि !"
कुस्ड़ि मूसौन् सौंगि सराक बिंगा-- "हे भै, तन नि जजळा धौं अर मुस्यौ लगै द्या धौं। द्वी मिलट मा सर्रा पुंगड़ा थैं चबट्ट कै द्या धौं।"
एक बिरSळु छौ यूं कS दोब बैठ्यूं। वेन कंद्वरा सूंणि द्येनि। वेन् सरेलम् बोलि कि यूं मूसौं थैं खांण स्ये पैलि अढ़ै द्यूंदु। वेन बुजगिला बटि सुरक अपड़ि मोंण नकने कि बोलि-- "हे भै मूसौं! पखंणा छन बल कि हैंकै द्येखि लै-पैरीं(खूबसूरत), फट फुटि म्यारा बाबै, स्ये किलै नि मांगि ह्वलि! तुम इन बथा कि तै पुंगड़्म् माटु कैन सारी ? नाज कैन बूती ? नेळि-गोडि, धांण-धंद्दा कैन कैरि ? पुंगड़ै जगदरि कैन का ?"
सब्यून बोलि --- "सगोरबंद मूसन।"
बिरSळन् चटचटाग बोलि-- "त तुमSरा पेटम् जळत किलै पोड़ि ? तुम बि कैर ल्या धौं मीनत। हत-खुट्टा हलैल्या त खैल्या। निथर थुंथरि फुट्यां कS सि रैल्या। हैं कै मीनत द्येखी जजळैल्या त जौळि-जौळी मोसु ह्वे जैल्या।"
Copyright@ Mahesha Nand

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Garhwali Short Story
               मयळ्दि माया
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Story by : Mahesha Nand
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माया अर दिवान एक घैंणा बांजा बोंणम् बैठी माया लगांणा छा। माया ब्वन्नी--- "तुम थैं मि उत्गि पिरेम कर्दु जतगा सर्ग जून स्ये, धरति समोदर स्ये, हिंवाळि कांठि ह्यूं स्ये। क्वी बि एक हैंकS बटि नि बिगळेंदा। सौं घैंटा कि हम बि एक-हैंकS बटि सप्पा नि बिगळ्यौला।"
तबSरि यूंकS पिछ्वड़ि एक डाळा पैथर बटि माया ब्वल्यां यी सब्द ऐनसैन(हू ब हू) सुंण्येंनि। माया अकळा-चकळि सि टपरांद रै ग्या। बैं छोड़ा डाळा पैथर बटि बि इन्नि सुंण्या। दैं छोड़ा डाळा पेथर बटि बि माया बोल सुंण्येंनि---- "मि तुम थैं उत्गि पिरेम -------।" दिवान वीं थैं टक्क लगै कि दिखंणू छौ। माया खिलपत ह्वे ग्या। वीन भरि पन्यरि(निढाल) ह्वेकि बोलि--- "म्यारा दीवाना! द्येख, म्यरि माया सकळि च। डाळि-बोट्यूं बटि बि म्यरि मयळि बाच सुंण्येंणी च। मि तुमSरि माया छौं अर तुम म्यारा दीवाना।"
"अछीकि तु इनि माया छै ज्वS काळु ज्वाप मारि दींद। मि त्यरि माया झिबलांण मा नि अळझंण चांणू छौं।" दिवानन् स्वीं पटSसुल्कि(सीटि) मारि अर तीन डाळौं कS पैथर बटि सूरज, किसन अर अमन अपड़ा-अपड़ा मुबैल ऐंच उठै कि माया समंणि खड़ा ह्वे ग्येनि। सूरज ब्वन्नू---- "माया तु अब अपड़ि मयळि मुखड़ि अर मयळि बथु मा हैंकS थैं नि बमै(बहकाना) सक्दि। जै दिन तिन मै मा बि इन्नि मयळि माया लगा, मिन त्यरि बाच रिकौड कैर्यालि छै। सूरज, अमन अर किसन थैं तु बमांणि रै वूं खुंण त्यारा ये रिकौड थै व्हटसैप फर भिजंणू रौं। दिवान बि त्यरि माया मा रिब्ड़ि ग्ये छै वे थैं त्यरि सकळि सूरत दिखांणा बान हमन् यु डरामा कैरि।"
माया खुंणै सरमा मारा मुक लुकांण असौंगु ह्वे ग्या।
Copyright@ Mahesha Nand

 

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