Author Topic: Exclusive Garhwali Language Stories -विशिष्ठ गढ़वाली कथाये!  (Read 35512 times)

Bhishma Kukreti

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जब पैली और आख़री बेर झुंगारू भात बणै छे।
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 गढवाली संसमरण , समलौण - हरी लखेड़ा
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शीर्षक देखीक अंदाज लगि गे होलु कि क़लम कना जांणै च।
जै तै पता नी बतै द्यूं कि झुंगारू बरसाती फ़सल हूंद। बारीक बीज हूंदन और साट्टी क तरां कूटीक सफेद दाना निकलदन जै कुण झंगरियाल बोलदन। आज त कत्ती तरह क पकवान माँ इस्तेमाल हूंद पर गाँव मा पलेऊ मा डालद छे। झंगवारे की खीर भी बणांद छे। झंगवार कु भात भी बणद छे।
म्यार झंगवार कु अनुभव भात तक ही च।
मी चार मा पढदु छे। अब जब तक मी नी बतौं कि मी पढदु भी छे त आप तैं कनकै पता चलण कि मी पढदु भी छे। उमर रै ह्वेली दस साल। बनचूरी क गौंखड्या स्कूल माँ हम द्वी भै पढदु छे। बडु भै पाँच मा और मी चार मा। वे टैम पर चार और पाँच क विद्यार्थी रात कुण भी स्कूल मा रंद छे। पाँचवीं की बोर्ड की परीक्षा हूंदि छे त मास्टर जी कुछ त विद्यार्थीयों क ख़ातिर और कुछ अपर नौकरी क ख़ातिर कोशिश माँ रंद छे कि रिज़ल्ट बढिया रौ। यन भी ह्वे सकद कि रात अकेला डर लगदी रै ह्वेली।
मे पर विशेष क्रिपा छे किलै की प्रधानाचार्य गोकुल देव कुकरेती जी मेरी नानी क गाँव बणांस क छे मतलब मेरी मा क मामा जी। जान पहचान तब भी काम आंदि छे जी।
ह्वे यन च कि वे दिन माँ तै पुंगड क्वी काम रै ह्वाल। चुल्लू माँ झुंगारू चढ़ै गे और मे कुण ब्वाल की कर्ची चलाणै रै और पक जालु त आग बुझा दे। दादा आलु द्वी भै फांणु झुंगारू ख़ै कन चलि जैन। पकुद कन च बतै त ह्वालू पर याद नी। हाँ त मी जोबरी क ढक्कन उठै क कर्ची चलैक क दिखणै रौं कि पक च कि ना। मितै पता छे कि चावल पकांदन त पाणी पस्यै कन माँड़ निकालि दींदन। झुंगारू क भी यनि हूंद ह्वाल। काफ़ी देर तक थडकणै रै और फिर एकदम सुखी गे। मीन स्वाच पाणी कम ह्वे गे मिज़ाण और द्वी गिलास पाणी डालि दे। खूब थडीकि गे त पसाण शुरु कर। हाथ लगै त रबड़ी बण्यूं छे।
दादा रात क स्कूल करीक सुबेर दस बजे तक खाणुक आंद छे ख़ै कन स्कूल जांद छे । मीन स्वाच हरि तेरी त बजण वाली च! बस्ता उठै और भुखि स्कूल क बाट लगि ग्यूं । वे ज़माना मा दरवाज़ों पर तालु नि लगांद छे, बस बंद करीक चलि जांद छे। बीच मा दादा मील पर बात ही नी कैरि। बताण भि क्या छे। दादा भी भुखि वापस ऐ गे!
स्कूल हाफ टैम हुयूं छे। भूख से बेहाल। माता जी मुंड माँ एक थैला धर्यूं आंद दिखे गे। रोटी सब्जी बणै क लाईं छे।
दादा तै जब सब पता चल त द्वी चार ज़रूर जमै ह्वेली पर याद नी!
वे क बाद कभी झुंगारू क भात बणाणू क मौका नी मील।


Bhishma Kukreti

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आज फादर्स डे च बल!
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 हरी लखेड़ा

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एक क़िस्सा याद ऐ गे ।
काका बीमार रंदन। लगभग एक साल ह्वे गे ठीक से चल फिर बि नि सकदु। काकी पिछल साल स्वर्ग सिधारि गे छे । पड़ोस मा रामू की ब्वारी खाण पींण क ध्यान रखद। तीन बेटा छन बडु रमेश बंबई रंदु, मंझलु उमेश कनाडा और छोटु महेश दुबाई । ज़रूरत पड़न पर ऐ भी जांदन ।
महेश की उम्र ह्वे गे पर व्या नी हूणै। क्वी अपर बेटी दीणकु तैयार नी। दुबाई नी लिजै सकदु बल। पता नी क्या बात च । कैन ब्वाल तनखा कम ह्वेली बल। कत्ती छन जु अरब देशों माँ काम करणै छन पर बच्चों तै दगड नि रखी सकद । जब बेटी वाल तै यन समाचार मिलदन त साफ ना बोली दींदन कि दुबाई वाल तै बेटी नी दीण।
जन बि च ठीक च। बंबई वालु त साल द्वी साल मा गाँव ऐ बि जांद पर कनाडा और दुबाई वाल चार साल पैली ऐ छे । माँ क अंतिम क्रिया मा बी नी ऐ सक। वीसा क चक्कर च बल।
पाँच साल पैली बीमार पैडि छे, बंबे वालु गाँव ऐ और द्वी भैयूं तै खबर कर। ऐ गेन ।
तिन्नी बेटों तै दगडी देखीक काका पण प्राण ऐ गे। फिर तिन्नी अपर अपर देश चलि गेन।
अचानक तबीयत ज़्यादा ही ख़राब ह्वे गे। बंबई वाल बेटा कुण फ़ोन कर और रूंद रूंद ब्वाल अब नि बचदु भगवान उठाणै भी नी। एक हफ़्ता बाद रमेश ऐ गे । हालत ख़राब ही लग! द्वी भायूं कुण फ़ोन कर कि क्वी उम्मीद नी दिख्याणै! आख़री दर्शन करणै त ऐ जौ। फादर्स डे भी नज़दीक ही च।
अगली हफ़्ता वी भी ऐ गीन। काका शरीर से कमजोर त छे पर दिल ख़ुश ह्वे गे। फादर्स डे मनाई।
रात मा तिन्नी भै गपशप करणै छे डिंडाला माँ। उमेश की लाईं कैनैडियन ह्विस्की पीणै छे। एक छोटी सी चुस्की भीतर पिता तै भी पिलै ।
बात ही बात मा उमेश न ब्वाल -
भाई मेरी भगवान से प्रार्थना है कि पिता जी को और कष्ट न दें। जाना तो एक दिन सबको ही है । अब देखो न कनाडा से इतनी दूर आना जाना भी कम लफड़े वाला काम नहीं है और मंहगा भी।
महेश ने हामी भरद ब्वाल-
हाँ सही कह रहे हो । दुबाई से तो और भी लफड़ा है, छुट्टी भी मुश्किल से मिलती है।
साले पासपोर्ट अपने पास रख लेते हैं ।
रमेश चुप ही रै। बोलण भी क्या छे! वी भी कौन से ख़ाली रंद।
काका कान मा बात चलि गे । मन ही मन मा स्वाच ठीक त बुनै छन। फिर सब से गीन।
सुबेर काका तै हिलै त सुन्न । रात मा कब साँस रुक पता ही नी चलु!
सारी क्रिया कर्म निपटैक सबी अपर अपर घोंसला कुण लौटि गेन


Bhishma Kukreti

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हरी मिर्च।
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(संस्मरण )
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हरी लखेड़ा

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भीष्म कुकरेती जी की पेज पर और उत्तराखंड रसोई विज्ञान ग्रुप मा आजकल उत्तराखंडी व्यंजन मा सब हरी मिर्च क स्वाद चखणै छन, जन हरी मिर्च नि ह्वेक हरि क आशीर्वाद ह्वा।
क्वी बुनै ये मा विटामिन सी, ए, बी-६, आइरन, कौपर, पोटेशियम, कार्बोहाइड्रेट, और कुछ छुट्टी गे ह्वा त वी भी हूंद ।
हरि मिर्च बल पाचन शक्ति बढ़ांद, स्किन चमकांद, वजन घटांद, और डायबिटीज़ से बचांद!
आप ही बतौ जै चीज़ मा यतना गुण छन वा हरि कु प्रसाद ही बुले जालु न।
पता नी कै कै तै पता ह्वालु पर बतै द्यूं कि म्यार गाँव बनचूरी क सग्वाड मा मिर्च त मिर्च, धनिया, हल्दी, ल्याहसुण, प्याज़, की खेती हूँदी छे । जख्या और भांगुल त अफीक जमी जांद छे। कहावत च त्यार पुंगडु मां जख्या भांगुल जामुल! अब त वनि भी सब वनि भी बांझ पड्यां छन!
मिर्च की पैली पौद उगांद छे! लगातार पानी की ज़रूरत। स्कूल क रस्ता मा पाणी क स्रोत छे त पौद की पाटली कु देखभाल क जिम्मा स्कूल्या छ्वारौं कु छे! पौद तैयार हूंण क बाद सग्वाड मा लगै दींद छे । एक महीना मा फल शुरु!
अरे भै, मिर्च त मिर्च ही च ! जु लगांद च और जै पर लगदी च वी जांणदन।
पाँच छै सालुक रै होलु तब! दगड्यों कि पता नी क्या ठाणी रै। ब्वाल कि हरी मिर्च खांण से नज़र तेज हूंद । पैलि त विश्वास नि ह्वे पर स्वाच कि नज़र तेज ह्वा भौं न ह्वा नुक़सान त कुछ नी। एक आध मिर्च त खै ही लींदु छे!
सग्वाड ग्यूं और दनादन पाँच छै मिर्च चबै दीन! आंखूंद पाणी बगणै रै, गिच्च मा सी सी पर परवाह इल्ले । बतै कैतै नी। बाद मा द्याख त जीभ और सारी गल्वाड पर छाला पड़ीं छन। रात मा न रोटी सब्ज़ी दे पर नि खये । मा न पूछ क्या बात च, मीन गिच्च चौडु करीक बतै कि छाला पड्यां छन। सारी बात बताण पड । तीन दिन तक दूध भात खै।
बौटम लाइन या च कि हरी मिर्च या मिर्च क बिना मसाला नी हूंद पर हिसाब से। यन नी ह्वा कि खाल चमकाण क चक्कर मा गिच्च जीभ -गल्वाड -चमिक जावन।
हरि क प्रसाद समझीक खैन, प्रसाद चुटकी भर हूंद, पेट भरीक ना!!


 

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