Author Topic: भरत नाट्य शास्त्र का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Bharata Natya Shast  (Read 3790 times)

Bhishma Kukreti

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  विषाद भाव अभिनय:  विषाद  भावौ पाठ खिलण

Performing Dejection  Sentiment  in Garhwali Dramas
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 45
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या )
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
-
ततभिनयेत्सहाान्वेषणोपायचिंतनोत्साहविघातवैमनस्यनि::श्वसितादिभिरनुभावैरुत्तममध्यमानाम्।  (7 ,67  कु  परवर्ती गद्य ) 
गढ़वाली अनुवाद - -
विषाद  पाठ खिलणो  कुण  कै सहायकै  अन्वेषण करण, उपायों /ब्युंतों पर विचार करण , उलाराम हीनता, खिन्न हूण , अर  दुश्वासी (निश्वास ) हूण  जन करतब करण चएंदन। 
 गढ़वाली म  भाव  उदाहरण - - --
चोरुं द्वारा धन चोरी, संविधान विरुद्ध अपराध हूण पर, , हार पर , हथम लियोन काम पूर नि हूण पर , एक का पैथर  विपदा आण पर ज्वा  दुःख चित्तवृति हूंद वो विषाद  भाव ह्वे । 
गढ़वाली लोक गीतम /अंछेरी गीत म विशद भाव
            सुवा पंखो त्वेकू मी साड़ी द्युलू     
                          त्वे सणि    लाड़ी मै गैणा द्यूंल़ू
                          नारंगी मै त्वेकू चोली द्युलू
                         सतरंगी त्योकू मि दुशाला द्योलू
                          सतनाजा त्योकू मि डीजी द्योलू
                           औंल़ा सरीको त्वे डोला द्योलू
                            सांकरी त्वेकू मि समूण  द्योलू
                            झिलमिल आइना त्वे कांगी द्योलू
                            न्यूती की लाडली त्योकू बुलौलू
                           पूजिक त्वे साड़ी घर पठौल़ू

भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म  विषाद   भाव ; गढ़वाली नाटकों म विषाद  भाव , गढ़वाली गद्य म विषाद    भाव , गढवाली लोक कथाओं म  विषाद भाव
Raptures,   Dejection   Sentiment in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature, Dejection  Sentiment  in Garhwali Poetries , Dejection    Sentiments  in Garhwali  Proses

Bhishma Kukreti

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औत्सुक्य भाव अभिनय:  औत्सुक्य  भावौ पाठ खिलण

Performing Eagerness Sentiment  in Garhwali Dramas
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 46
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या)
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
-
दीर्घनि:श्वसिताधोमुखविचिंतननिद्रातंद्रीशयनाभिलाषादिभिरनुभावैभिनय: प्रयोक्तव्य: (७ , ६९ परवर्ती गद्य )
गढ़वाली अनुवाद - -
औत्सुक्य भावौ  पाठ खिलणौ  कुण  चिंता , निंद , तंद्रा, सीण अर  अभिलाषा जन  करतबों प्रयोग करे जांद।
उत्सुक मनिख झुकिक लम्बी उस्सवासी  छुड़द , इष्ट जनों व िष्ठ वस्तु की मिलणै  उतकंठा से औत्सुक्य भाव उतपन्न हूंद। 
 गढ़वाली म  भाव  उदाहरण - - --
 गढ़वाली  गीत नाटक 'चक्रव्यूह  (राकेश भट्ट वळ  ) म जब अभिमन्यु द्रोणाचार्य रचित 'चक्रव्यूह  पुटुक  जान्दो तो भैर पांडव उत्सुकता से अभिमन्यु का मार्ग दिखणा  रंदन  अर  युधिष्ठर आदि को ौत्सकी भावो  पाठ  खिलं दर्शनीय हूंद। 
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म ,  औत्सुक्य भाव ; गढ़वाली नाटकों म  औत्सुक्य भाव , गढ़वाली गद्य म   औत्सुक्य भाव , गढवाली लोक कथाओं म   औत्सुक्य भाव
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Bhishma Kukreti

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निद्रा भाव अभिनय:  गढ़वाली स्वांगुंम निद्रा भावो  पाठ खिलण

जसपुर, गढवाल म खिल्यां स्वांग आधारित उदाहरण

Performing Slumber Sentiment  in Garhwali Dramas
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 47
(गढ़वाली लोक नाटकों से उदाहरण युक्त व्यख्या)
  s = आधी अ   
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती 

तामभिनयेद्वदनगौरववशरीरावलोकननेत्रधूर्णनगात्रविजूम्भणमान्द्योच्छवसितसन्नगात्रताsक्षिनिमीलनादिभिरनुभावै:
। ७ , ७० परवर्ती गद्य ) ।             
गढ़वाली अनुवाद - -
निद्रा भावौ  पाठखिलणो  कुण आंख्युं झपकाण, सरैलौ झुलण , जमै आण /लाण , अळगस  दिखाण , लम्बी सांस छुड़न , सरैल तै  ढीलो ढालो छुड़ण अर आँखि  बुजण , आँख मरोड़न  जन करतब दिखाये जांदन। 
 गढ़वाली म  भाव  उदाहरण -
एक दै सं १९६७ लगभग हम छात्रों न जसपुर (ढांगू पौड़ी गढ़वाल )  का एक कृषि क्षेत्र पुर्यत  म इनि  लोक स्वांग खेली छौ।  एक सासू न अपण  जंवाई  तै कुछ बिंडी  घी खलाइ  दे।  खाणो  उपरान्त वाई जंवै  तै मिलणो  गांवक नौनी ऐ गेन।  नौनी अल्हड़ता का स्वांग करणा तो जीजा का निंदन बुरा हाल।  चुहुल की इच्छाधारीस्याळियों  परिहास व जीजा को निंद म जाण  को  सुंदर संगम वळ  लोक स्वांग छौ यु।  कलाकार प्रेम कुकरेती , रमेश जखमोला आदि। 
हमर एक अध्यापक कक्षा म कुर्सी म ही से जांद छा।  तो हम छात्रुंन गोर म कत्ति  दैं   अध्यापक श्री क सीणो  स्वांग कौरि छौ।  .
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म  निद्रा  भाव ; गढ़वाली नाटकों म  निद्रा भाव , गढ़वाली गद्य म  निद्रा  भाव , गढवाली लोक कथाओं म   निद्रा भाव
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अप्पसार भाव अभिनय: अप्पसार/मिर्गी  भावौ पाठ खिलण

 गढवाल म खिल्यां नाटक आधारित  उदाहरण
Performing Epilepsy Sentiment  in Garhwali Dramas
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 48
  s  = आधी अ   
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
-
तस्य स्फुरित:र्नि: श्वसितोत्कम्पितधावनपतनस्वेदस्तम्भनवदनफेन
जिह्वापरिलेहनादिभिरनुभावैरभिनय: प्रयोक्तव्य: I
 ( ७ ,७२ परवर्ती गद्य ) 
गढ़वाली अनुवाद - -
 अप्पसार या मिर्गी भावो पाठ खिलणो कुण जिकुड़ी धड़कण, उस्वासी लीण, कम्मण, दौड़ण , भ्यूं पड़ण , पसीना दिखाण , स्तम्भित हूण, मुख  बिटेन  फ्यूण  ( झाग )लाण, जीबि  से झाग पर टक्कर मरण जन
करतब दिखाण  चयेंद। 
 गढ़वाली म अप्पसार  भाव  उदाहरण - - --
  जब भूत लगद तो पश्वा (जैपर भूत लग्युं हो ) कुछ मिर्गी रोगी करतब कार्डो . हम जब छूट छा तो हमन गोर मा  भूत न छळयूं  खेल खेली छौ . सोहन लाल कुकरेती न भूतन छळयूँ का अभिनय करी छौ जन बुल्यां  वे पर मिर्गी आयीं हो।  अभिनय बड़ो ही वास्तविक लगणु   छौ हथ -खुट झटकण ,  कबि  एक तक दिखण , उस्वासी छुड़ण  मुख से फ्यूण (झाग  ) लाणो  स्वांग बि  सोहन कुकरेती न करी छौ।
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म अप्पसारभाव ; गढ़वाली नाटकों म अप्पसार  भाव , गढ़वाली गद्य म अप्पसार     भाव , गढवाली लोक कथाओं म  अप्पसार  भाव
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सुप्त भाव अभिनय:  सुप्त भावौ पाठ खिलण

 गढवाल म खिल्यां नाटक आधारित  उदाहरण
Performing  Dream Sentiment  in Garhwali Dramas
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 49
  s  = आधी अ   
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती

 तदुच्छवसितसन्नगात्रक्षिनिमीलनसर्विन्द्रियसम्मोहनोत्स्वप्नयितादिभिरनुभावैरभिनयेत् II  ७, ७४ कु परवर्ती गद्य II
-
गढ़वाली अनुवाद - -
सुप्त भावो पाठ खिलणों कुण  लम्बी लम्बी  सांस (उस्वासी ) ,  लणमणो सरैल  ( शिथिल ), बुज्यां  आँख, सबि इन्द्रियों तै लणमण दिखाण , थिर ह्वे जाण , अर सुपिन म जन बड़बड़ाण  जन करतब करण चयेंद। 
 गढ़वाली म  सुप्त  भाव  उदाहरण - - --
गढवाली लोक नाटकों में सुप्ति /सुप्त   भाव
अर्जुन का सपना
क्या सुपिनो होये मेरो राजा , राति का बिखैमा मेरो राजा।
सुपिनो मा देखे मेरी राणी वसुधरी कोठा मेरी राणी
जैं  राणी को होलो ठै ठै को रंग
कोठायों झुलाया मेरी राणी
स्युंदोळो दिखेन्ड मेरी राणी
धौळी जैसी फाट मेरी राणी

भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
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विबोध भाव अभिनय:   विबोध भावौ पाठ खिलण

 गढवाल म खिल्यां नाटक आधारित  उदाहरण
Performing Awakening   Sentiment  in Garhwali Dramas
( इरानी , अरबी शब्दों क वर्जन प्रयत्न )
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 50
  s  = आधी अ   
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
तमभिनयेज्जृंभणाक्षिपरिमर्दनशयनेमोक्षणादिभिरनुभावै (७, ७६  कु परवर्ती भाग ) -
गढ़वाली अनुवाद - -
विबोध   भावो  पाठ खिलणौ  कुण  जमै लीण , आँख मिंडण , खटला /डिसाण  त्यगण , जन करतबों प्रयोग हूंद। 
 गढ़वाली म  विबोध  भाव  उदाहरण - - --
अर्जुन वासुदत्ता प्रेम प्रसंग लोक गीत म विबोध भाव कु  उदारण -
            द्रोपती अर्जुन सेयाँ छया
                रातुड़ी होयें थोडं स्वीणा ऐन भौत
                सुपिना मा देखद अर्जुन
                 बाळी वासुदात्ता नागुं कि घियाण ,   
                मन ह्वेगे मोहित , चित्त ह्वेगे चंचल 
                 वींकी ज्वानी मा कं उलार छौ   
                  वींकी आंख्युं  मा माया को रैबार छौ   
                 समळीक मुखड़ी वींकी अर्जुन घड्याण बिसे गे
                 कसु  कैकु जौलू मै तै नागलोक मा
                 तैं नागलोक मा होला नाग डसीला
                मुखड़ी का हँसीला होला, पेट का गसीला
              मद पेंदा हठी होला, सिंगू वाल़ा  खाडू 
                  मरखोड्या  भैसा  होला  मै मारणु आला
                  लोहा कि साबळी होली लाल बणाइ
                 चमकादी तलवार होली उंकी पैळयाँयीं
                 नागूं की चौकी बाड़ होलो पैरा
                 कसु कैकु जौलू मैं तै नागलोक मा
              कमर कसदो अर्जुन तब उसकारो भरदो ,
                अर्जुन तब सुसकारो भरदो
                मैन मरण बचण नागलोक जाण
                रात को बगत छयो , दुरपदा सेइं  छयी   
               वैन कुछ ना बोले चाल्यो , चल दिने नागलोक
               मद्पेंदा हाती वैन चौखाळी चीरेन
               लुवा की साबळी  नंगून तोड़ीन   
                तब गै अर्जुन वासुदत्ता  का पास
                  घाम से घाम, पूनो जसो चाम
                नौणीवालो नाम , जीरी वल़ो पिंड
                सुवर्ण तरूणी छे , चंदन की लता 
                पाई पतन्याळी, आंखी रतन्याळी
                 हीरा की सी जोत , ज़ोन सी उदोत
                 तब गै अर्जुन सोना रूप बणी 
                वासुदत्ता वो उठैकी  बैठाए अर्जुन
                वींको मन मोहित ह्व़े ग्याई
                   तब वीन जाण नी दिने घर वो
                   तू होलो मेरो जीवन संगाती
                  तू होलो भौंर मै होलू गुलाबो फूल
                   तू होलो पाणी मै होलू माछी
                   तू मेरो पराण  छई, त्वे मि जाण न देऊँ   
                    तब तखी रै गे अर्जुन कै दिन तै
                    जैन्तिवार  मा   दुरपदा की निंद खुले ,
                   अर्जुन की सेज देखे वीन कख गये होला नाथ
                     जांदी दुरपदा कोंती  मात का पास
                     हे सासू रौल तुमन अपण बेटा बि देखे
                     तब कोंती माता कनो सवाल दीन्दी
                     काली रूप धरे तीन भक्ष्याले
                         अब मैमू सची होणु आई गए 
                     तब कड़ा बचन सुणीक दुर्पति
                     दणमण रोण लगी गे   
                    तब जांदी दुरपदी बाणो कोठडी
                    बाण मुट्ठी बाण  तुमन अर्जुन बि देखी
                    तब बाण बोदन , हम त सेयान छया
                    हमुन नी देखे , हमुन नी देखे
                    औंदा मनिखी पुछदी दुरपता
                    जांदा पंछियों तुमन अर्जुन बि देखे
                   रुंदी च बरडान्दी तब दुरपदी राणी
                    जिकुड़ी पर जना चीरा धरी ह्वान
                    तीन दिन ह्वेन वीन खाणो नी खायो
                    ल़ाणो नी लायो
                    तब आंदो अर्जुन का सगुनी कागा
                    तेरो स्वामी दुरपति, ज्यूँदो छ जागदो 
                   नागलोक जायुं वासुदत्ता का पास   
                   तब दुरपता को साँस एगी
                    पण वासुदत्ता क नौ सुणीक   वा
                    फूल सी मुरझैगी डाळी सी  अलसेगी 
                   तिबारी रमकदों झामकदों
                        अर्जुन घर ऐगे

स्रोत्र : डा गोविन्द चातक
 सन्दर्भ : डा शिवा नन्द नौटियाल
ये लोक गीत म  तब तखी रै गे अर्जुन कै दिन तै
  जैन्तिवार  मा   दुरपदा की निंद खुले ,
   अर्जुन की सेज देखे वीन कख गये होला नाथ
     जांदी दुरपदा कोंती  मात का पास म विबोध भाव च
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म  विबोध  भाव ; गढ़वाली नाटकों म  विबोध भाव ;गढ़वाली गद्य म विबोध   भाव ; गढवाली लोक कथाओं म  विबोध  भाव
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अमर्ष भाव अभिनय:  अमर्ष भावौ पाठ खिलण

 गढवाल म खिल्यां नाटक आधारित  उदाहरण
Performing Indignation  Sentiment  in Garhwali Dramas
( इरानी , अरबी शब्दों क वर्जन प्रयत्न )
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 51
  s  = आधी अ   
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती

तमभिनयेच्छिर:कम्पनप्रस्वेदनाधोमुखचिंतनध्यानाध्यवसायोपायसहायान्वेषणादिभिरनुभावै:। ७. ७७ परवर्ती गद्य  । 
-
गढ़वाली अनुवाद - -
अमर्ष पाठ खिलणो  कुण  मुंड कम्पण, पसीना दिखाण , मुख तौळ लटकाण , चिंतन ध्यान दिखाण  , ध्यान दिखाण , उपाय सुचण , सहायता जन करतब दिखाये जांदन। 
 गढ़वाली म अमर्ष  भाव  उदाहरण - - --
एक गढवाली नाटक  ' बखरों  ग्वेर स्याळ  ' म  अमर्ष    भाव
जवान ग्राम प्रधान -क्या भै काऴया ! क्या चयाणु च ?अदबुडेड़ काऴया- प्रधान बेटा ! एक सटिफिकेट  चयाणु च
ग्राम प्रधान - सूण ! काका बाड़ा ड्यारम हूंद . क्यांक सटिफिकेट ?
काऴया - म्यार नौनु किलास  मा फस्ट आयि।  गरीबी सटिफिकेट चयाणु च।
ग्राम प्रधान बेइजती करणो भाव मा - हूँ ! अबे त्यार नौनु कथगा बि नंबर लैजालु।  करण त वैन मजदूरी ही च।  अबि जा भोळ ली जै सटिफिकेट .... काऴया (भैर जांद जांद ,  कुछ देर ध्यान मग्न रौंद , भगवान  जिना  दिखुद , गुस्सा मा  स्वत:  ) - मी  बि अपण बुबाक  काऴया नीछौं जु मि अपण नौनु तैं बीए पास नि करौं !

भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म  अमर्ष  भाव ; गढ़वाली नाटकों म  अमर्ष भाव ;गढ़वाली गद्य म   अमर्ष भाव ; गढवाली लोक कथाओं म   अमर्ष भाव, भीष्म कुकरेती  कु  गढ़वाली नाटक म अमर्ष भाव
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अवहित्थ भाव अभिनय: अवहित्थ  (छल, कपट ) भावौ पाठ खिलण

 गढवाल म खिल्यां नाटक आधारित  उदाहरण
Performing Dissimulation  Sentiment  in Garhwali Dramas
( इरानी , अरबी शब्दों क वर्जन प्रयत्न )
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 52
  s  = आधी अ   
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
तस्यान्यथाकथनावलोकितकथाभंगकृतकधैर्यादिभिरनुभावैरभिनय: प्रयोक्तव्य:।  ७, ७९ परवर्ती गद्य ।  -
गढ़वाली अनुवाद - -
अविहत्थ  (छल कपट ) भावो पाठ खिलणों  कुण  अंसगत  बोल, तौळ दिखण , अस्पष्ट वाणी, प्रयोग , कृत्रिम धीरज,जन क्रियाओं  करतब दिखाए जांद। 
 गढ़वाली म अवहित्थ  (छल )  भाव  उदाहरण - - --
  रामलीला म मंथरा -कैकयी संवाद दृश्य व रावण द्वारा सीता हरण दृश्य  छल कपट /अवहित्थ  भाव  उदारण
अवहित्थ अर्थात छल कपट।  गढ़वाली लोक नाटकों म भौत दैं  कपट  पाठ  खिले गे।   रामलीला म मंथरा कु  कैकयी तै राम तै बौण  पठाणो  ब्यूंत कपट भाव कु  प्रदर्शन इ  च।
रामलीला म इ  रावण द्वारा मुनि भेष म सीता से भीख मंगण  कपट भाव प्रदर्शन च। 
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म   अविहत्थ भाव ; गढ़वाली नाटकों म  अविहत्थ भाव ;गढ़वाली गद्य म  अवहित्थ  भाव ; गढवाली लोक कथाओं म   अवहित्थ भाव
Raptures in Garhwali Poetries, Dissimulation  Sentiments  in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature,   Dissimulation  Sentiments   in Garhwali Poetries,   Dissimulation   Sentiments in Garhwali Proses


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उग्रता भाव अभिनय:  उग्रता भावौ पाठ खिलण

 गढवाल म खिल्यां नाटक आधारित  उदाहरण
Performing Violence Sentiment in Garhwali Dramas
( इरानी , अरबी शब्दों क वर्जन प्रयत्न )
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 53
  s  = आधी अ   
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती
तां  च वधबंधननिर्भर्त्सनादिभिरनुभावै रभिनयेत। 
 भरत नाट्य शास्त्र अध्याय - ७, ८० कु  परवर्ती गद्य
-
गढ़वाली अनुवाद - -
उग्रता पाठ खिलणो  कुण  हत्त्या , बंधण , प्रताड़ित करण (पिटण , हल्ला करण ), अर  काट /भर्त्सना  करणो  करतब  दिखाये जांद। 
व्याख्या -
चोर , डाकू , अपराधी, झूठ बुलण  वळों  पकड़े  जाण  पर ज्वा चित्तवृति हूंद  वा  उग्यरता  च।  अपराधी तै मारो , कूटो , बुरी भली सुणायें  जन इच्छा हूंदी।  कबि कबि हत्त्या क ज्यू बि  बुलयाँद होलु। 
 गढ़वाली म  उग्रता  भाव  उदाहरण - - --
भीम बाजा नाच गाण म उग्रता भाव दर्शन -
 
 बाला दैणी  होई जैन तेरी
 दैणी होई जैन त्यरी वा सौ मण कि गदा
 परतिज्ञा को दानि बाला
 सौ मन कि गदा वाला तेरी होली नौ मन कि ढाल
बाला जंगलूं  जंगलूं बाला
 भाबरु  भाबरु तुमकू रै गेन भारत पियारा
डाल़ा को गोळ हिलैकी बाला
डाल़ा मा बैठयाँ कौरौ कि पटापट पतगे लगाई दिने
चांदी छैला चौक मा बाला
नौ खारी रीठों  को मेरा जोधा पिसम्यल्लो बैण याल़े 
सौ मन का गोला भीम रे जोधा
सर्ग चूलेने असी असमान अपतां  फेंकने हाथी
पर मेरा बाला. भीमसेण जोधा 
स्रोत्र ; अबोध बंधु बहुगुणा  एवम डा शिवा नन्द नौटियाल

भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
गढ़वाली काव्य म   उग्रता भाव ; गढ़वाली नाटकों म  उग्रता भाव ;गढ़वाली गद्य म   उग्रता भाव ; गढवाली लोक कथाओं म   उग्रता भाव
Raptures in Garhwali Poetries,  Violence Sentiments  in Garhwali Dramas and Poetries and in miscellaneous  Garhwali  Literature, Violence  Sentiments   in Garhwali Poetries,  Violence   Sentiments in Garhwali Proses


Bhishma Kukreti

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मति भाव अभिनय: मति भावौ पाठ खिलण

 गढवाल म खिल्यां नाटक आधारित  उदाहरण
Performing Resolution Sentiment in Garhwali Dramas
( इरानी , अरबी शब्दों क वर्जन प्रयत्न )
 
 भरत नाट्य  शास्त्र  अध्याय - 6, 7 का : रस व भाव समीक्षा - 54
भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद  आचार्य  – भीष्म कुकरेती   
  s = आधी अ   
तामभिनयेच्छिष्योपदेशार्थविकल्पसंशयच्छेदादिभिरनुभावै: I
(  भ ना . ७,  ८१ कु परवर्ती गद्य )

गढ़वाली अनुवाद , व्याख्या  - -
  मति पाठ खिलणो कुण च्यालों तै उपदेश दीण , कै जटिल प्रश्न कु  अर्थ सुनिश्चित करण अर  संशय दूर करणो  करतब दिखाये जांदन।   
भौं भौं शास्त्रुं /आख्यानों / पुरण घटनौं उदारण चिंतन अर  विचार करण  पर विषय तै समुचित ढंग से समजण /समजाण  से ज्वा जानकारी मिलदी  वै  भावो कुण  मति  भाव  बुल्दन। 
 गढ़वाली म  भाव  उदाहरण - - --
 गढवाली लोक नाटक में मति    भाव (डऴया गुरुं। कनछेदी /नाथ गुरुं  गीत )
गोपीचंद गीत
ऋद्धि  को सुमिरों सिद्धि को सुमिरों सुमिरों सारदा माई।
अर  सुमिरों गुरु अविनाशी को , सुमिरों कृष्न कनाई।
सदा अमर नि रैंदी धरती माता , बजर पड़े टूट जाई।
अमर नि रैंदा चंद , सुरजि छुचा , मेघ घिरे छिप जाई।।१।।   
माता रोये जनम कूं , बहिन रोये, बहिन रोये छै मासा।
तिरिया रोये डेढ़ घड़ी कूँ , आन करे घर बासा।।२।।
कागज़ पतरी सब कुई बांचे करम नि बांचे कुई।
राज घरों को राजकुंवर , बुबा करणी जोग लिखाई।। ३ ।।
सुन रै बेटा गोपीचंद जी बात सुनो चित लाई।
कंचन कया , कंचन कामिनी मति कैसे भरमाई।।  ४।। 
अलख निरंजन अलख निरंजन, सुन रे बेटा गोपीचंद जी बात सुनो चित लाई।
अलख निरंजन , अलख निरंजन जपो रे भाई , हो भव सागर पार
 
भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
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 गढ़वाली काव्य म  मति  भाव ; गढ़वाली नाटकों म मति  भाव ;गढ़वाली गद्य म   मति भाव ; गढवाली लोक कथाओं म   मति भाव
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