Author Topic: भरत नाट्य शास्त्र का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Bharata Natya Shast  (Read 1733 times)

Bhishma Kukreti

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रंगमंच शोभार्थ  दारु काष्ठ  कार्य व अन्य अलंकरण कार्य

भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय २  , पद /गद्य भाग   ८0, ८१   बिटेन   ८३/८४   तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -  ९५ 
बाबूलाल शुक्ल  शास्त्री कृत अनुवाद पृष्ठ -  ५३
s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न )
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार -   स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळि म सर्वाधिक अनुवाद करण वळ अनुवादक  आचार्य  – भीष्म कुकरेती   
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यु काठौ  कार्य बड़ी सूझ -बूझ , सोच विचार अर निरीक्षण से हूण चयेंद।  ये मा  विविध प्रकारै  शिल्प हूण चयेंद।  इखमा अनेक प्रकारौ पट्टी जु दिवालौ  तरां  दीख्यावो प्रयोग करण चयेंद।  भौं भौं प्रकारौ हाथी अर गुरा आकर कुर्याण /अंकन  चयेंद।  यूंमा सुंदर पुतळी  आकृति कुर्याण  चयेंद, वेदिकाओं नानाविध चित्र भैर निकळ्यां (निर्युह ) अर भितर  कुर्यां (कुहर )  हूण   चयेंद।  यूंक रचना भौं भौं कौंळ (शैली ) से हूण चयेंद अर  यूंको जाळ झरोखा /ढुड्यार एक विशेष अलंकरण का संग हूण  चयेंद।  यूं म खम्बों म सुंदर तुलायें /कड़ी /धरणी लगाए जावन अर जौं म विचित्र कबूतर की छतरियां पंक्तिबद्ध धरे जावन , अर भ्यूं पर धर्यां  खम्बों  पर  बि चित्रकारी रौण चयेंद।  ये प्रकार दारु कार्य ह्वे जाव तब दिवालों उठाणो  कार्य शुरू  हूण चयेंद।  ८१ से ८४

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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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चतुरस्र, विकृष्ट ,  त्र्यश्र  नाट्यगृहुं  निर्माण विधान

भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय २  , पद /गद्य भाग  ८४-८५   बिटेन  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -  ९६ 


s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न )
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार -   स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक अनुवाद करणवळ अनुवादक -  आचार्य भीष्म कुकरेती   
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दिवालों  तै उठांद  दैं क्वी खाम , खूंटी, गवाक्ष , मोरी /झरोखा/छाज या कूण  द्वारों समिण  नि  आण  चयेंद , या एक द्वारो समिण  हैंक द्वार नि  आण  चयेंद।  ८४-८५। 
यु नाट्यमंडप पख्यड़ो  उड्यार /कंदरा  जन  आकारौ हूण  चयेंद अर  द्विभूमि हूण  चयेंद अर्थात पैल  गहरो अर   धीरे धीरे उच्चो या दुतल हूण  चयेंद।  मोर्युं  से धीरे धीरे वायु आण -जाण चयेंद अर निवतु (तेज वायु रहित )  बि हूण  चयेंद अर गंभीर ध्वनि गुंजण  चयेंद । शिल्पियों तै निवत (जखम  तेज वायु नि  आवो )  हि  निर्माण करण चयेंद किलैकि निवत म सबि  वाद्यों ध्वनिम स्वर्गत गंभीरता बणी रौंद।  ८५-८७। 
दिवाल उठाणो उपरांत यूं  पर  पिस्युं शंख , सीप , बळु अर  कमेडू /चूनोन लिपण  चयेंद अर अंतम भैर बि कम्यड़ो /चूनो  से लिपण  चयेंद। ८७-८८।
 दिवालों लिपै पुतै , घुटाई करण  से दीवाल समतल  हूणो परांत  इ  दीवालों म चित्रांकन हूण  चयेंद।   ८८-८९। 
दीवालों चित्रों म  स्त्री पुरुष संबंधी लताबंध व अन्य स्त्री पुरुष क्रीड़ाओं का चित्रांकन   हूण  चयेंद।  ८९-९०। 
आयताकार नाट्यगृह क रचना बि इनि  करण  चयेंद।  ९०। 
चतुरस्र नाट्यगृह का लक्षण -
 अब मि चतुरस्रस नाट्यगृह का लक्षण बतांदु- नाट्य विज्ञता  तैं   शुद्ध भूमि पर विभागपूर्वक अवस्थित चतुरस्र नाट्यगृह चारो ओर ३२ हाथक  चौकोर , लम्बाई म निर्माण क़रण चयेंद। ९१-९२। 
आयताकार नाट्यगृह म जो बि विधि ,  लक्षण , मांगलिक कर्मकांड  बताये गेन वो सब  चतुरस्र नाट्यगृह म बि संपन हूण  चएंदन।  ९२-९३। 
चतुरस्र नाट्यगृह क सामान विभाग करी अर सूट से 32  हाथ नापद  भैर से  ईंट  से सटीक दीवाल उठाण  चयेंद। ९३। 
रंगपीठ म भितरो ओर  दिशा विचारानुसार शिल्पी दस स्तम्भ खड़ा कौरन जु ये  नाट्यगृह तै संबाळणम सक्छम होवन।  ९४।
स्तम्भों से भैरा  ओर दिखंदेरों  कुण बैठणो  कुण ईंट अर  काष्ठ द्वारा सीढ़ी जन आकर म पीठासन /बैठ्वाक निर्माण करण  चयेंद।  ९५। 
भूमि से एक हाथ मथि  उठद सीढ़ी जन दिखंदेरों  कुण इन  बैठ्वाक निर्माण हूण  चयेंद कि दिखंदेर भली भाँती मंच  देखि साकन।  ९६। 
अर तब विज्ञता शिल्पियों तै प्रत्येक दिशाओं म मंडप तै धारण करण  वळ  सुदृढ़  छै  स्तम्भ लगाण  चयेंद।  ९७।
यांक पैथर यूंक मथि  छै खंबा धरण  चएंदन।  यांक ंथी बिन्ध्या मुख वळ  आठ हथों पीठों / बौळी धरण  चयेंद।  यूं बौळ्यूं  मुख एक हैंको पर लग्यां हूण  चयेंद (विधास्य ) I . ९८। 
तब  ब्यूंतदार शिल्पियों तैं   छत तै धारण करण  वळ  धरणी  (बौळी /शहतीर )  संबाळणो  वास्ता लग्यां  स्तम्भों  /खामों  तै काष्ठ पुतलियों से अलंकृत करद  लगाण  चयेंद।  ९९। 
तब (रंगपीठ का पैथर ८ x ३२ भूखंड ) नेपथ्यगृह की रचना करण  चयेंद।  ये मा  रंगमंच का ओर खुलण  वळ एक जन द्वी द्वार हूण  चएंदन।  १००। 
रंगमंचो समिण वळ  भागम कौथिगेरुं  (दर्शक )  कुण  भितर आणो  एक प्रवेश द्वार निर्माण करण  चयेंद , अर नाट्य कर्मियों (नट्टों ) कुण  पर्वेशार्थ द्वार रंगमंच का समिण  हूण चयेंद।  १०१। 
चतुरस्र नाट्यगृहौ  रंगपीठ आठ हाथौ चौकोण (८ x ८ ) समतल वेदिका से युक्त रंगपीठक प्राणानुसार सुंदर रूपम  निर्माण कराये जाय।  १०२। 
वेदिका s   दैं -बैं  ओर पूर्व निदृष्ट प्रमाण अर  विधि अनुसार चारखम्ब्या ' मत्तवारणी; निर्माण कराये  जाण  चयेंद।  १०३। 
रंगपीठ की अपेक्षा उच्चो अर सैण द्वी प्रकारौ  रंगशीर्ष निर्माण करे जांद , विकृष्ट म वेदिका से उचु अर  चतुरस्र म सामान अर  समतल रंगशीर्ष निर्माण करे जाण चयेंद।  १०४। 
चतुरस्र  नाट्य गृह की याइ  विधि च।  अब मि त्र्यश्र  नाट्यगृह लक्षण बतांदु।  १०५। 
 त्र्यश्र  नाट्यगृह लक्षण -
नाट्यगृह  सल्लियों  तैं त्र्यश्र नाट्यगृह तै त्रिकोणाकृति म बणावन अर मध्यम रंगपीठ बि  तिकोण  ही चिणे  जाण   चयेंद।  १०६। 
नाट्यगृह क प्रवेश द्वार ये कोण  म चिणे  जाण  चयेंद अर पैथरो द्वार (कलाकारों वास्ता ) बि इनि  हूण  चयेंद।  १०७।
भित्ति/दिवाल  अर स्तम्भों विषय म  ज्वा  विधि चतुरस्र नाट्यगृह चिण्याण म हूंदन वाई विधि त्र्यश्र म बि हूंदन।  १०८। 
बुद्धिमानों द्वारा इनि यूं  नाट्यगृहों निर्माण करे जाय।  अब मि यूंकि पूजा विधान बतौल। १०९।   
 अब भरत नाट्य शास्त्र कु प्रेक्षागृह लक्षण अध्याय पूरो ह्वे  गे। 

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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी ,  ५४ से ६०  तक
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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रंगमंच प्रतिष्ठा विधान अर भौं भौं  देव थरपणौ विधान

भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय तिसर    , पद /गद्य भाग    १ बिटेन  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -  ९७
s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न  करे गे )
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार -   स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक अनुवाद करणवळ अनुवादक  आचार्य  – भीष्म कुकरेती   
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ये प्रकार से सबि लक्षणों से युक्त शुभ नाट्य गृहौ  चिण्याणो  उपरांत ,  एक सप्ता तलक उख  जपकर्ता बामणों  तैं गौड़यूं  दगड़  रौण  चयेंद।  १। 
तब नाट्याचार्य रात्रिक आगमन बेला ( संध्या ) म अपण  सरैल तै मन्त्रोच्चारित जल से ध्वेक /नयेक बिरण  घरम वास करिक  (इन्द्रियम संयम ) अर पवित्र ह्वेका तीन राति तक उपवास धरिक , नया वस्त्र पैरिक नाट्य गृह ार रंगमंच का डिबतौं  आवाहन करवाये।  २, ३ ,। 
तब सम्पूर्ण लोकों  सैं गुसैं  भगवान शिव , पद्म पुष्प से अवतरित ब्रह्मा श्री , देवगुरु वृहस्पति, भगवान विष्णु , इंद्र , कार्तिकेय, सरस्वती , लक्ष्मी, सिद्धि , मेघा, वृति, मति , सोम , सूर्य , मरुत, लोकपाल , अश्विनीकुमार, मित्र , अग्नि, स्वर , वर्ण, रूद्र, काल, कलि, मृत्यु, नियति, कालदण्ड, सुदर्शन चक्र, नागराज, गरुड़, वज्र, विद्युत् , समुद्र, गंधर्व, अप्सराएं, मुनि , भूत, पिशाच, यक्ष, गुह्यक,महासर्पगण, असुर, नाट्य विघ्नों , दैत्यों तथा अन्य रागसों ,  सबि नाट्यकुमारी, महाग्रामणी अर अन्य स्वतंत्र राजविगणो  तैं  हाथ नवैक प्रणाम करदा अपण अपण योग्य स्थानों म स्थित देव गणुं तैं  ंयुत दींद इन प्रार्थना करण  चयेंद -  हे भगवन ! तुम सबि आज रात यखी रावो अर हमर रक्षा करदा करदा अर हमर नाट्य कर्मों म अनुचर सहित सौ सैता कर्यां।  ४-११। 
जर्जर पूजा विधान -
तब सबि  दिबतौं एक दगड़ी पुजणो  वाद्यों प्रयोग कारो, अर नाट्य प्रसिद्धि बान  जर्जर देव की पूजा कारो।  १२। 
हे जर्जर ! तू इन्द्रौ  शस्त्र छे अर सभी दानवों नाशक छे।  सबि देवगण द्वारा तू वघ्नों नाशौ  कुण निर्मित करे गे  . तू हमर राजा तैं विजय अर शत्रुओं तै पराजय दे अर   तू गौ , ब्रह्मणों का हितकारी   ार नाट्यकर्म को सहायक ह्वे जा  ।  १३- १४। 
ये प्रकार  विधि से  पूजा  करी रातमनाट्य मंडप म  निवास करदा सुबेर बुद्धिमान नाट्याचार्य देव आमंत्रण को कार्य  शुरू कारन।  १५। 
यु रंगपूजन आर्द्रा, मघा,याम्या , तिनि पूर्वी , नक्षत्रों या अश्लेषा या मूल नक्षत्रों  म करे जाय।  एकागमन वळ पवित्र अर  वर्त   विशेषज्ञ नाट्याचार्य द्वारा रंगमंचो  उद्घाटन करद देव पूजन करण  चयेंद।  १६ , १७। 
दिनांत म आण  वळ  नाला, घोर अर दारुण नामौ  मुहूर्त म आचार्य तैं  नियमानुसार आचमन करदा दिबतौं की स्थापना करण  चयेंद।  ये देव पूजन म लाल रँगौ क ही सूत्र , कंगड़ा , उत्तम रक्तवर्णी चंदन , लाल पुष्प , ये इ  वर्णो  फल , प्रयोग हूण  चएंदन।  जौ , राई ,खीलों , धान क अक्षत नागपुष्पो मूल , चम्पक फल द्रव्यों दगड़ दिबतौं  तैं  बिठाण  चयेंद।  १८-२१। 
सबसे पैल  देवगणों तै बिठाणो कुण मंडल  निर्माण करण  चयेंद।   यु मंडल १६ बालिस्त , लम्बो चौड़ हूण  चयेंद अर  विधान पूर्वक इखम चार द्वार बि  धरे  जाण  चएंदन।  यांक मध्य म द्वी  तिरछी  रेखा बि खैंचण  चयेंद।  यूं रेखाओं से निर्मित क्वाठौं  दिबतौं  स्थापना हूण  चयेंद। 
ये मंडलक मध्य म  कमलासीन ब्रह्मा  तै स्थापित करण तब पूर्व दिशा म  भूत गणो  दगड़ भगवन शिव स्थापित करो अर  ये इ  दिशाम नारायण , महेंद्र, कार्तिकेय,सूर्य, अश्विनी कुमार , चंद्र ,सरस्वती।लक्ष्मी , श्रद्धा , मेघा ,की स्थापना करे जावन।   दक्खिण -पूर्व कोणम  स्वाहा दगड़ अग्नि, विश्वेदेवा ,गंधर्व,रूद्र अर ऋषिओं  स्थापना करे जाय।  दक्खिणम यम अपण अनुचर मय मित्र , पितरगण ,पिशाच , सर्पगण ,अर गुह्यगणो की स्थापना हो।  नैरऋत्य कोणम  राक्षस अर बहुत स्थापित करे जावन।  पच्छिमम जलाधिपति वरुणदेव अर समोदरों की स्थापना हूण चयेंद।  वायव्य दिशा (उत्तर पश्चिम ) म सातपवनों , पक्षी व गरुड़ की स्थापना ह्वावो।  उत्तर दिशाम कुबेर की भली भांति थरपे जाव अर इखम  मातृकौं अर गुह्यों दगड़ यज्ञ बि  थरपे जावन  ।  ईशानम नंदी , गणेश्वर , ब्रह्मर्षि अर भूतूं  संघों तै यथायोग्य स्थलों म थरपे  जावो।  २१-३१।



 
  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ - ६१ बिटेन ६७   
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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रंगमंच  स्थापना पूजन म भौं भौं  देवों   मंत्र अर  बलि विधान

भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  तिसर  ३   , पद /गद्य भाग ३२   बिटेन  ६०  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -  ९८ 


s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न  करे गे )
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार -   स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक अनुवाद करणवळ अनुवादक   आचार्य  – भीष्म कुकरेती   
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पूजा कुण पूर्व दिशा क स्तम्भ म सनत्कुमार , दक्षिण स्तम्भ्म दक्ष अर उत्तर दिशाम गणेश थरप जाव।  इनि  विधान अनुसार , विधिपूर्वक सबि दिबतौं  तै  अपण  अपण  स्वरूप अर  वर्णानुसार थरपे  जाय। तब  देव थरपणो   उपरान्त देव पूजन शुरू करे जाय।  ३२-३४। 
दिबतौं   तै  सफेद रंगै  माळा  अर चंदन दीण चयेंद।  गंधर्व , अग्नि अर  सूर्य तैं  लाल रंगै  माळा  दिये  जाण  चयेंद।  सबि देव गणो  तैं  एक एक कौरि  गंध , माळा अर धुप अर्पण कौरि तब विधिपूर्वक पूजा अर बलि कर्मकांड करण  चयेंद। ३५-३६। 
ब्रह्मा कु मधुपर्क द्वारा, सरसुतीक खीर द्वारा,अर शिव विष्णु व अन्य दिबतौं मोदकोंन पूजा करण  चयेंद।  घी अर  भातन अग्निक , अर भातन सूर्य व चन्द्रकु , मधु अर खीर से  गंधर्व , विश्वेदेवा अर ऋषिगणुं पूजा हूण  चयेंद।  यम अर मित्र पूजा मालपुओं अर  मोदकोंन करण  चयेंद।  पितरगण , पिशाच अर सर्पों पूजा दूध घी से हूण  चयेंद।  भूतगणों की पूजा पकान्न ,  मांस , मदिरा अर शीरा मदिरा , फलों रस अर मदिरा म डुबयां  चणा  से करे जाय अर  इनि 'मत्तवारणी' क बि  पूजा करे जाय। 
मछली युक्त पकवानोंन रागसों  पूजा हूण चयेंद अर सूरा व मांस चढ़ैक  दानवों पूजा हूण  चयेंद। 
पंडित लोक मालपुआ , लबसी अर भातन शेष दिबतौं पूजा कारन।  सागर अर नदियों  तै माछों पर पीठि से बणयां पकवानों  से पूजे जाय।  वरुण देवक पूजा वृत्त अर खेर से करे जाय।  मुनिगणों पूजा कंद मूल फल से करे जाय।  वायु  पंछियों पूजा विभिन्न भक्ष्यन  व भोजनन  हो।   नाट्यक सबि मातृका अर अनुचर संग कुबेर की लबसी -पुआ से पूजा करे जाय।  इनि  सबि डिवॉन तै  भौं भौं भोजन बलि चढ़ैक  पूजे जाव।  ३७ - ४५। 
अब मि मंत्र विधान सहित यूंका बलि कर्म बुल्दु -
ब्रह्मा कुण  मंत्र -
हे देवों महानुभाव पितामह ब्रह्मा श्री , मंत्रों से पवित्र बलि स्वीकार कारो।
शिव मंत्र -
हे देवाधिदेव, गण अधीश्वर,अर  त्रिपुरहंता हे महादेव , हे महायोगी, हे देवश्रेष्ठ शिव ! यीं  बलि तै स्वीकार कारो अर देव हमर बिघ्नों से रक्षा कारो।  हे देव मंत्र से पवित्र यीं  बलि तै स्वीकार कारो। 
विष्णु मंत्र -
हे असीम गति वळ , पद्मनाभ,हे डिवॉन श्रेष्ठ देव मंत्रो से पूजितबळि    स्वीकार कारो।
इंद्र मंत्र -
हे देव स्वामी ! वज्रहस्त , पुरंदर,शतकतु इंद्रदेव , विधिवत मंत्रो से पवित्र   बळि  स्वीकार कारो।
स्कन्द मंत्र -
हे दिवतौं  स्वामी , शिवक प्रिय  पुत्र , कार्तिकेय, हे षणमुख तुम प्रसन्न मन से यी बळि  ब तै ग्रहण कारो। 
सरस्वती मंत्र -
हे दिबतौं  पूज्य देवी सरस्वती  !  हे हरिप्रिये ! माता ! तुम मेरी भक्तिपूर्वक समर्पित बळि  स्वीकार कारो। 
राक्षसगण मंत्र -
अनेक कारणों से उद्भूत पौलत्स्य वंशी ! राक्षस श्रेष्ठ , तुम महासत्व  छा।   तुम  मेरी अर्पित  बळि  स्वीकार कारो।  ४६- ५४। 
देवियों मंत्र -
सरा संसार की , प्रजाजनों वंदनीय हे लक्ष्मी ,सिद्धि, मति अर  मेघा देवियो ! तुम मंत्र से पवित्र यीं बळि   स्वीकार कारो। 
पवन मंत्र -
हे पवनदेव ! तुम सबि भूतों  प्रभाव अर शक्तियों ज्ञाता छा अर लोक का जीवन छा इलै मन्त्रित बळि  स्वीकार कारो।  ५५-५६। 
अग्नि मंत्र -
हे दिबतौं  मुखस्वरूप ! देवश्रेष्ठ अग्निदेव ! तुमर धूम्र ही धज  च तुम हूत पदार्थसेवी छा।  मेरी मंत्र पूजित बलि स्वीकार कारो।
सूर्य मंत्र -
हे सबि ग्रहों म श्रेष्ठ ! तेजोराशि सूर्य ! तुम मेरी दियीं  बलि स्वीकार कारो।
चंद्र मंत्र -
हे ग्रहों अधिपति ! चंद्रदेव , द्विराज ! हे  जगत प्रिय  देव !  तुमकुण  ही प्रेरित मंत्रों से  पूजित  मेरी बलि  ग्रहण कारो ।
गणेश अर  नंदी मंत्र -
जौंमा  नंदी प्रमुख छन इन छन महागणेश्वरो ! भक्ति मात्र से यीं  बलि तै ग्रहण कारो।  या तुम तै इ  प्रेरित ह्वेका दियाणी च। ५७ -६०। 



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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -  ६७ -  ७२ तक
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद


Bhishma Kukreti

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रंगमंच म देव थरपण  मंत्र भाग - २ 

भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  तिसर  ३   , पद /गद्य भाग ६१   बिटेन   ७२ तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   ९९

s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न  करे गे )
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार -   स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक अनुवाद करणवळ अनुवादक  -  आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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भूतगणों मंत्र -
भूतों तै सदिनी प्रणाम , जौं  तै या बलि भली लगद।
हे कामपाल ! तुम तै  नित्य  प्रणाम , तुम कुण या बलि च। ६१। 
गंधर्व मंत्र -
नारद , तुंबरू तथा विश्वावसु जौंमा  प्रमुख छन सि सबि गंधर्व गण मेरी दियीं यीं  बलि  तै स्वीकार कारो। ६२।
यम व मित्र मंत्र -
सब लोकुं द्वारा पूजित हे भगवन  यम अर मित्र म्यार द्वारा दियां मंत्र अर बलि स्वीकार कारो।  ६३। 
नाग मंत्र -
पृथ्वी तौळ स्थित सर्पों  तै  बार बार नमस्कार ये पवन भक्षक नागगण ! पूजित ह्वेका तुम नाट्य गृह म सिद्धि द्यावो  । ६४।
वरुण मंत्र -
हंस प्रदेश का अधिपति ! भगवान वरुण ! तुम म्यार द्वारा पूजित ह्वेका समस्त समुद्रों , नदियों अर नदों से युक्त हो में पर प्रसन्न  ह्वावो।  ६५। 
 गरुड़ मंत्र -
हे परम् बलशाली, सर्वपक्षीगण का गुसैं , महात्मन , विनितपुत्र गरुड़देव ! तुम म्यर दियां  मन्त्रित  बलि  स्वीकार कारो।  ६६। 
कुबेर मंत्र -
हे धनाधिपति, यक्षों स्वामी , उत्तर दिशा का लोकपाल  भगवान कुबेर  !  तुम , यक्षुं , गुह्यकुं दगड़ मन्त्रित बलि स्वीकार कारो। ६७। 
नाट्यमातृकाओं मंत्र -
ऊं ब्राह्मी आदि  मातृकाओं तै बार बार प्रणाम।  हे सुंदर मुख वळि  मातृका ! म्यर द्वारा प्रस्तुत बलि स्वीकार कारो।  ६८। 
त्रिशूल मंत्र -
हे रुद्रौ शस्त्र ,! तुम म्यर द्वारा प्रस्तुत बलि स्वीकार कारो।
सुदर्शन मंत्र -
हे  विष्णु शस्त्र ! तुम म्यार द्वारा अर्पित पूजित बलि स्वीकार कारो ।  ६९।
काल अर कृतांत मंत्र -
सर्व  प्राण धनेश्वर कृतांत अर  काल , मृत्यु व नियति देव तुम म्यार द्वारा अमित बलि स्वीकार कारो।  ७०।
वास्तु देवता मंत्र -
अर  जु वास्तु देवता ये मत्तावारणी  म छन ये मंत्रों से सिद्ध बलि स्वीकार कारन।  ७१।
यांक अतिरिक्त जु  दिवता दशों दिशाओं , स्वर्ग ,  अंतरिक्ष  मा  छन सब म्यार द्वारा अर्पित बलि स्वीकार कारन।  ७२। 

 ,

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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ - ७३ बिटेन   ७५ तक
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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           रंगमंच गृह प्रवेशम घट थरपण
भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  तिसर  ३   , पद /गद्य भाग ७३   बिटेन  ८२ तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -  १०० 
s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न  करे गे )
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार -   स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक अनुवाद करणवळ अनुवादक -   आचार्य  भीष्म कुकरेती 

घट स्थापना -
जल से भर्युं , पत्तों माळा से सज्यूं घौड़  रंगमंचक मध्य स्थल म धरे जाव अर थोड़ा  सि सुवर्ण बि धरे जाय।  ७३।
अर सबि वाद्य यंत्रों तैं शुद्ध वस्त्रुं  से  ढकिs तब सुगंधित माळऊं , धुप अर  भोज्य पदार्थों  से पूजन करे जाव।७४   । 
तब सबि दिबतौं क्रमशः पूजनो परांत जर्जरो पूजन कारो जां  से बिघ्न नाश हो।  ७५। 
अपण कामनाधारी व्यक्ति ये जरजरौ मथि   सफेद वस्त्र, रुद्रौ फैड़ी पर नीलो वस्त्र , विष्णु की पूरी पर पीलो वस्त्र , स्कन्द की पूरी पर रक्त वस्त्र , तौळ की पौरयूं पर अनेक रंग का वस्त्र बंधण चएंदन अर उनी प्रकार का धूप , माला चंदन , आदि पदार्थ बी धरण  चएंदन  । ७६-७७।
इन प्रकारन धूप , माळा अर चंदन को अर्पणौ  पश्चात  सबि विधि विधान पूर करणो उपरांत बिघ्न नष्ट करणो बान जर्जर तै अभिमंत्रित करे जाय।  ७८। 
बिघ्न शांत करणो बान  बरमा दगड़ प्रमुख रूप से रण वळ देवगणों न  , हे जर्जर तुम तै पराम् सुदृढ़ ,बज्रो जन कठोर अर बड़ सरैल वळ बणायूं  च।  ७९।
सबि दिबतौं सहित बरमा श्री तुमर रक्छा कौरन।  दुसर पर्व की रक्षा भगवान शिव ; तिसरै भगवान विष्णु; चौथो कुमार कार्तिकेय अर पंचोंs  श्रेष्ठ नारायण रक्छा कौरन।  यी सबि देव तुमर रक्छा कर्यान अर तुम दिबतौं कुण  मंगलकारी ह्वेन।  ८०-८१।
हे रिपुदमनकर्ता ! जर्जर ! तुम तुम अभिमंत्रित नक्षत्रम हुयां  छा इलै तुम हमर राजा तै जय ार अभ्युदय द्यावो। ८२। 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -   ७६ बिटेन ७७ तक
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,

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   होम व कुम्भ  फुड़ण

भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  तिसर  ३   , पद /गद्य भाग  ८३  बिटेन  ९० तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -  १०१ 


s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न  करे गे )
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक अनुवाद करणवळ अनुवादक -   आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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ये प्रकारन जरजरौ  पूजन करि अर बलि दीणो उपरांत मंत्र अर आहुतियों दगड़ अग्नि म हवन करण  चयेंद।  ८३।
येई अग्नि से जळण  वळ छिल्लों तै  रज्जा अर नचनेरि /नर्तकी  का  दीर्घायु हेतु युंका चर्री ओर घुमावो  । ८४। 
अर सब  वाद्यों से राजा अर नचनरी तै प्रकाशित करे जाय तब मंत्रों से  अभिमंत्रित पवित्र जल से प्रोक्षण (छिड़कण ) कारो।  तब इन बुलण , तुम सबि उच्च कुल म जनम्यां , सब गुणों से युक्त छां इलै तुम तै जु बि जन्म से अर  गुणों से जू  बि  मील वो सदा उन्नी बणी  रैन।  ८५ - ८६।
बुद्धिमान पुरुष इनम राजा तैं समृद्धि क बान वचन बोलणो  परांत अभिनय व नाट्य कर्म प्रसिद्धि कुण आशीर्वचन बुलण चयेंद । ८७। 
देवी सरस्वती , धृति, मेघा , ह्वी ,श्री , लक्ष्मी , स्मृति , मति सबि मातृकाएं तुमर रक्षा कारन अर सिद्धि प्रदान करण वळ ह्वावन।  ८८। 
विधिवत हवि अर  मंत्रो द्वारा होम तै समाप्त करि नाटकाचार्य रंगमंच पर धर्युं  कुम्भ फोड़ि  द्यावो ।  ८९। 
ये कुम्भक नि  फुटण  से राजा तै शत्रु से भय उतपन्न ह्वे जांद अर कुम्भ टुटण  से शत्रु नाश हूंद।  ९०। 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ -   ७८ -७९ तक
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


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रंग प्रदीपन (उज्यळ  करण )
भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  तिसर  ३   , पद /गद्य भाग  ९१   बिटेन ९४   तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १०२


s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न  करे गे )
 पैलो आधुनिक गढवाली नाटकौ लिखवार - स्व भवानी दत्त थपलियाल तैं समर्पित
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गढ़वळिम सर्वाधिक अनुवाद करणवळ अनुवादक -   आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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रंग प्रदीपन -
ये अनुसार ये घौड़ फुटण पर नाट्याचार्य प्रयत्नपूर्बक जळदो द्यू लेकि  सरा रंगमंच तै प्रकाशित करे।  ९१ । 
वो वे द्यू  तै लेकि अतिशय शब्द सिंघनाद करदो , अंगुळी  घुमान्द , मरोड़दो , कुदद , दौड़द  द्यू क उज्यळ  सरा रंगमंच म घुमाओ।  ९२।
तब शंख व वाद्य वृन्द का निर्घोष व मृदंग अर पणव व सबि  वाद्य बजांद रंगमंच भूमि म युद्ध आयोजन कार ! ९३।
जु  ये युद्धम जोधाओं कट्युं , फट्यूं घाव रक्त से चमको तो  बड़ो शुभ संकेत हूंद अर सिद्धि सूचक हूंद ।   ९४। 
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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ - ७९ -८०   
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


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रंगदैवत्त पूजन अंतिम भाग
 
भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  तिसर  ३   , पद /गद्य भाग    ९५ बिटेन  तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   १०३


s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न  करे गे )
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गढ़वळिम सर्वाधिक अनुवाद करणवळ अनुवादक -   आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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रंग प्रतिष्ठान शुभ प्राप्ति अर  महात्म्य -
विधिपूर्वक रंग पूजन राजा कुण  शुभ हूंद। इनि  यु नगराक बच्चों , बुड्यों , जनपद वासिओं  कुण  कल्याणकारी हूंद।  ९५। 
अर  रंगमंचै पूजा विधिवत नि  हूण पर देवगण ठीक से नि थरपेण  पर नाटकौ विध्वंस अर राजा अनिष्ट हूंद।  ९६। 
जु यूं विधियों तै त्यागि स्वछंद ह्वेका नाट्य प्रयोग करद वाइको शीघ्र /चौड़  अवन्ति ह्वे जांद। ९७। 
रंगस्थल देवगणों पूजन वैदिक स्थल सैम हूंद इलै बिन रंगमंच विधिपूर्वक पूजा  (रंगमच भितर पेंच पूजा ) का अभिनय /नाट्य प्रयोग नि  करण  चयेंद। ९८।
रंगस्थल का स्थापित देवगण पुजे जाण पर रंगमंच तै पूज्य बणांदन अर सम्मानित हूण पर रंगकर्मियों आदि क सम्मान प्राप्त करवान्दन। इलै सबि  पर्यटन से रंग पूजा हूण  चयेंद  ९९।
आंधी से प्रेरित अग्नि उथगा शीघ्रता से नि जळांद  जथगा शीघ्र दूषित विधि द्वारा कर्युं  नाट्यकर्म छण मात्र म प्रयोक्ता तै नष्ट कर दींदो।  १००। 
इलै शास्त्र ज्ञाता विनम्र , पवित्र , व्रतौ  दीक्षित , शांत सुभावका नाट्याचार्य   से  रंगमंच (मंच भितर पैंची  पूजा ) पूजा कराण चयेंद।   १०१।
जु मनिख चित्तौ उद्वेग का कारण अयोग्य स्थान म बलि दींदो  वो मंत्रहीन आहुति दिंदेर जन हूंद अर  प्रायश्चित का भागी हूंद।  १०२। 
ये प्रकारन रंग दैवत्त की  जु पूजा विधि  बताईं  छन प्रयोक्तागण नया नाट्यगृह निर्माण अर  प्रदर्शन  अवसर पर अवश्य पूजा कारन।  १०३।
 अब तृतीय /तिसर अध्याय रंगदैवत्त  पूजन अध्याय  समापन हूंदो  II



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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ - ८०   
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 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,

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पूर्वरंग विधान

भरत नाट्य शाश्त्र  अध्याय  तिसर ,  चौथो    ,  १ पद /गद्य भाग   बिटेन   १६ तक
(पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्रौ प्रथम गढवाली अनुवाद)
  पंचों वेद भरत नाट्य शास्त्र गढवाली अनुवाद भाग -   


s = आधा अ
( ईरानी , इराकी , अरबी  शब्द  वर्जना प्रयत्न  करे गे )
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गढ़वळिम सर्वाधिक अनुवाद करणवळ अनुवादक -   आचार्य  भीष्म कुकरेती   
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ये प्रकार विधिवत पूजन उपरांत मीन पितामह बरमा  श्री से बोली - तुम शीघ्र आज्ञा द्यावो बल कु  नाटक खिले जाव ! I १। 
तब पितामह न बोले - ब्यटा ! तुम अमृतमंथन नाटक ख्यालो।  नाटक डिवॉन तै भलो लगद अर उंकुण उत्साहवर्धी बि  च।  २। 
हे विद्वान् ! मीन जै समवकार की रचना कार वो धर्म , काम  अर  अर्थ  को साधक च।  तुम अब ये नाटक का प्रयोग कारो।  ३।
ये समवकार का प्रस्तुत हूणो  उपरान्त दिबता अर दैत्यगण अभिनय , दृश्य , भावो , कल्पनाओं देखि  पुळेन।  ४। 
तब कै समयम कमलयोनि ब्रह्मा श्रीन मे से बवाल - हमर अपर  ये नाटक तै महात्मा शंकर समिण दिखौला।  ५। 
तब पितामह व देवगण भगवान शिवक निवास म गेन  अर विधिवत अर्चना उपरान्त उंन बोली - हे देवाधिदेव ! मीन जै समवकार की रचना कार वै  तै सुणनो  -दिखणो  कृपा कारो।  ६, ७ ।
भगवान शंकरन ब्रह्मा श्री से बोली - हम अवश्य दिखला।  तब ब्रह्मा श्रीन मीम ब्वाल - मुनि ये समवकार का प्रदर्शनै  तैयार कारो।  ८।
ये श्रेष्ठ मुनिगण  ! तब तब वे हिमालय पर्वतौ  प्रदेश पर जु  भौत सा पर्वतों से घिर्यूं छौ , जखम भौत सा भूतगण छा अर   जख  सुरम्य उड़्यारों  अर छिंछ्वड़ छा।  उख मीन पूर्वरंग विधान का उपरान्त  अमृतमंथन समवकार (नाटक ) व त्रिपुर दाह  नाटक डिम कु  प्रयोग कार।  ९ - १०।
तब सबि  भूतगण कार्य अर भावों प्रयोग देखि अति पुळेन अर भगवान शिवन  बि  अति  संतुष्ट ह्वेका ,   पितामह ब्रह्मा से ब्वाल- ।  ११।
हे महामते ! तुमन यु  नाटक  प्रयोग को श्रेष्ठ निर्माण कार जु यशदिंदेर , शुभ अर्थों साधक , पवित्र अर बुद्धि संवर्धक  च।  १२। 
स्याम दैं  संध्या समय जब मीन नृत्य निर्माण कार तब मीन ये तै अंगहारों  (शरीर का हलण - चलण ) से जो करणों  से मीलि  निर्मित हूंदन युक्त करदा और बि  सुंदर छन।  तुम यूँ अंगहारों का नाटक पूर्वरंगविधि म प्रयोग कारो।  १३।
     -------- पूर्व रंगा   द्वी प्रकार -
वर्धमानक , आसारित,, गीत , महागीत , की अवस्था म एको भावों का  भल  प्रकार  से अभिनय कर   सकिल्या क्या  ?  तुमन जो पूर्व रंग प्रयुक्त कार वु  शुद्ध पूर्वरंग च पर जब वर्धमानक आदि  मिल जाला तो मिश्रण  से यु पूर्वरंग  चित्र पूर्वरंग ह्वे  जांद।  १४- १६ ।

 

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  सन्दर्भ - बाबू लाल   शुक्ल शास्त्री , चौखम्बा संस्कृत संस्थान वाराणसी , पृष्ठ - ८३ बिटेन  ८६
 भरत  नाट्य शास्त्र अनुवाद  , व्याख्या सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती मुम्बई
भरत नाट्य  शास्त्रौ  शेष  भाग अग्वाड़ी  अध्यायों मा   
  भरत नाट्य शास्त्र का प्रथम गढ़वाली अनुवाद , पहली बार गढ़वाली में भरत नाट्य शास्त्र का वास्तविक अनुवाद , First Time Translation of   Bharata Natyashastra  in Garhwali  , प्रथम बार  जसपुर (द्वारीखाल ब्लॉक )  के कुकरेती द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का गढ़वाली अनुवाद   , डवोली (डबरालः यूं ) के भांजे द्वारा  भरत नाट्य शास्त्र का अनुवाद ,


 

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