Author Topic: चरक संहिता का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Charak Samhita  (Read 11346 times)

Bhishma Kukreti

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सम्यक विरेचन ,विरेचन आयोग
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , सोळवां  अध्याय  ( चिकित्सा प्राभृतीय  अध्याय )   पद  १  बिटेन  - तक
  अनुवाद भाग -  १२२
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
- !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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संशोधन कार्य अनन्तर 'चिकित्सा प्राभृतीय 'नामक अध्याय क व्याख्यान करला जन भगवान आत्रेयन बोली छौ।  १ , २।
चिकत्सा प्राभृत म चिकत्सा म कुशल या साधन संपन विद्वान् ,शानवान , शास्त्रवान ,शाश्त्र क अध्ययन कर्युं वळ ,वैद्य जै  मनिख तै वमन , विरेचन द्वारा संशोधन करांद वो  मनिख वमन अर विरेचनसंयक योगक सुख भोगदु। अफ़ु  तै वैद्य मनण वळ मूर्ख वैद्य जै  व्यक्तिक वमन व विरेचन संशोधन करांद  वो  वमन व विरेचन संशोधन क अतियोग क कारण  दुःख भोगद। ३, ४। 
सम्यक विरेचन का लक्षण -शरीर म कमजोरी आण ,हळको पन , शरीर म ग्लानि , रोगों क घटण , भोजन म अनिच्छा ,हृदयक शुद्ध हूण ,रंग निखरण ,भूख तीस , समय पर  वेग  हूण ,बुद्धि इन्द्रिय अर मन शुद्धता ,प्रसन्नता ,अपां वायु तौळ  जाण  अर  जठराग्नि क क्रमशः बढ़न ,यी सम्यक योगक लक्षण छन।  ५ , ६।
विरेचन आयोग क लक्षण -मुक  बिटेन थुड़ा  थुड़ा थूक  या औषधक भैर आण , हृदयक जड़ता ,वमन आण जन कफ अर पित्त मुकम आण ,पुटुक म आफरा ,भोजन म अनिच्छा , वमन इच्छा , शरीर म निर्मलता अनुभव नि  हूण ,भारीपन , जंघड़ , टंगड़ म पीड़ा ,निंद  नि  आण ,शरीर अर  गौळ म ठंडापन ,सर्दी जुकाम हूण ,अपान वायु रुक जाण ,यी विरेचन आयोगक लक्छण छन। ७ , ८।

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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   १९६  बिटेन    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद

Bhishma Kukreti

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विरेचन अतियोग लक्छण

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , सोळवां  अध्याय  ( चिकित्सा प्राभृतीय  अध्याय )   पद  ९  बिटेन  २३ - तक
  अनुवाद भाग -  १२३
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विरेचन का  अतियोग  का लक्छण -

गुदा बिटेन प्रथम कर्मानुसार मल , पित्त , कफ अर वायु भैर  आंदन पर पैथर रक्त चढ़दो।  यु  ल्वे ,  मेद मिश्रित , या कफ मिश्रित या पित्त मिश्रित , जल जन ,लाल , या काळो जन हूंद। रोगी तै वायु कारण मूर्छा ऐ जांद। यी अति योगक लक्छण छन। ९ -१०।
वमन अतियोगम  बि  विरेचन  अतियोग का  यी  लक्छण हूंदन। पर शरीर का कटिभाग से मथि यि  लक्छण -वातरोग अर जबान  रुकण  बिंडी सि  हूंदन। इलै रोगी तै कार्य कुशल वैद्य म जैका आयु अर सुख युक्त करण  चयेंद , पाखंडी म नि  जाण।  ११ -१२। 
संशोधन योग्य व्यक्ति - अपचन ,अरुचि , मोटापा ,पाण्डुता , निस्तेज ,पीलापन , शरीर कु भारीपन ,बिन कुछ कर्यां थकान महसूस हूण ,उदासी , शरीर पर छुटि छुटि फुंसी आण  , कोठ (छप्पे ) उठण (दांत सिल्ल )  ,खज्जी हूण , आलस , थकान , निर्बलता, शरीर बिटेन  दुर्गंध आण ,मन बैचैन , सुस्ती ,कफ या पित्त बढ़न , निंद नि आण ,या निंद  बिंडी आण ,नपुंसकता , निरुत्साह ,भयानक सुपिन आण ,बल कांति  नाश हूण , खाणा खाण पर बि पुष्ट नि हूण , जैमा  यि लक्छण  बढना  होवन  वै  तै संशोधन करण  चयेंद। इलै  अधिपाक आदि लक्छणों देखि बल अर दोष अनुसार वमन , विरेचन रूपी संशोधन दीण  हितकारी च। १३ -१६।
संशोधन का फल -उपरोक्त विधि से कोष्ठ (उदर ) साफ़ हूण पर जठराग्नि बढ़ जांद ,रोग शांत ह्वे जांदन ,शरीर वास्तविक स्तिथि म ऐ जांद।  इन्द्रियां मन बुद्धि निर्मल ह्वे  जांदन।    शरीर म बल,  शक्ति सामर्थ्य , संतान  अर पुरुसत्व पैदा ह्वे जांद। बुढ़ापा देर से आंद  अर  रोगी देर तक ज़िंदा रौंद।  इलै मनुष्य  दोष -संचय कालम अर संशोधन कालम वमन  विरेचन कार्य  की युक्तियुक्त रूप म कारो। लंगड़ अर पाचन रुपी संशमन क्रिया द्वारा बशम कर्यां  दोष कबि  फिर बि प्रकट ह्वे सकदन; परन्तु दोष संशोधन करे जांदन वो फिर कबि प्रकट नि हूंदन। किलैकि दोष या वृक्षों अवशेष रौण पर रोगों उतपति संभव च। औषध द्वारा रोग क जड़ कटण पर संशुद्ध हुयां  व्यक्ति तै पथ्यकारक व सरैल बढ़ण  वळ भोजन दीण  चयेंद। जनकि घी , मांसरस, दूध ,हृदय कुण हितकारी अर मन  तै अछू  लगण वळ यश दिए जाय। सरैल पर तेल मालिश ,उबटन लगाण , नयाण ,निरुह वस्ति ,अनुयासन वस्ति क प्रयोग करण  चयेंद। यांसे सुख मिल्दो अर व्यक्ति चिरंजीवी हूंद। १७ -२३। 

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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  १९७   बिटेन  २००    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

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अतियोग हूण पर वैदकी
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , सोळवां  अध्याय  ( चिकित्सा प्राभृतीय  अध्याय )   पद २४   बिटेन  - तक
  अनुवाद भाग -  १२४
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अतियोग हूण पर वैदकी  -
जै व्यक्ति पर अतियोग क लक्छण होवन वै  तै उ  ु औषधि घी म खलाओ  जो जो रोग  वैपर छन अर मधुक अर्थात जीवनीयगण से सिद्ध तेल अनुवासन वस्ति रूपम दिए जाय।  जै व्यक्ति म आयोग क लक्छण होवन वै तै पुनः स्नेह अर  स्वेद देकि पूर्व म बुलिं मात्रा समय बल स्मरण करी फिर से संसोधन कुण  द्यावो। स्नेहन , स्वेदन संशोधन अर पेयन विधि  पूर्वक क्रम से नि हूण जु रोग उतपन्न ह्वे जांदन ऊंकी  चिकित्सा 'सिद्धिस्ठान ' अध्याय म चर्चा होली। पैलि  ज्वा मात्रा दे छे वांसे  बिंडी दिए जाय। २४ -२६।
शरीर तै धारण करण  वळ  धातु छन वो कारणों विषमता से घटद -बढ़द  छन अर  शरीर क धातु कारण की समानता से सामान रौंदन। विषम अर सैम धातुओं क सदा  स्वभाव से नाश हूंद। ये सम व विषम की निरंतर प्रवृति म इन कारण रौंद कि  वूंक वृद्धि अर क्षय हूंद अर्थात साम्य व विषमता पैथर  क्वी ना क्वी  कारण  अवश्य हूंद। बिना कारण  यूंक  स्वभाव म अंतर नि  आंद। धातु एक क्षण बि  विषम अवस्था म नि  रै  सकदन। यु  यूंक  धर्म च। सब पदार्थों उतपति  का  कारण हूंद किन्तु विनाश कार्य म कारण  नि  हूंद। इलै  कुछ आचार्य पदार्थों निरंतर विनाश की अपेक्षा नि करदन। कुछ विद्वान् पदार्थ नाशम उत्पादक कारण अभाव तै विनाश कारण मनदन। २७ -२८। 

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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   १९९   बिटेन    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

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Bhishma Kukreti

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चिकित्सा परिभाषा व लक्षण
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , सोळवां  अध्याय  ( चिकित्सा प्राभृतीय  अध्याय )   पद  २९   बिटेन  ३८  - तक
  अनुवाद भाग -  १२५
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 अग्निवेशन  आचार्य  पुनर्वसु तरफ देखि बोली - भगवन ! जब धातु  अफि अपण  स्वभावम  ऐ  जांदन त चिकित्सा साधन सम्पन वैद्यों साध्य कर्म क्या छन ? तब क्या काम ? अर तब कौं विषम हुयां  धातुओं चिकत्सा करदन ?अर  जब धातु सदा विषम ही रावन  तो तब चिकित्सा क्या हूंदी ? अर जब विषमता नाश हूणी  च तो तब वैद्य किलै  चिकत्सा करदन ? तब अग्निवेश न बोलि - २९ -३०।
हे सौम्य ! जु युक्ति महर्षियों न बुद्धि द्वारा देखि वो सुणो। नित्यागमनशील काल नाश क कारण क तरां नाश क कारण क आभाव से पदार्थों नाश कारण नि बण  जांद। क्वी बि पदार्थ जन उतपन्न हूंद तनि ही श्रीगर्गामी होण से नष्ट ह्वे  जांद। वैक  विनाश म क्वी कारण नि  हूंद। वैमा  कै संस्कार क आधान नि  करे  जै  सक्यांद।  पदार्थों क नाश क कारण पता नि  चल सकद किलैकि नाशक कारण ही अभाव च।  जन नित्य कालक बि नाश हूंद  दिखेंद  च किन्तु ये नाशक कारण पता नि  चलद किलैकि यु काल भौत शीघ्रगामी च। धातु भी काल जन शीघ्रगामी छन इलै यूंक नाश कारण  नि  हूण से इ  अज्ञात च।  धातुओं की पूर्वावस्थाओं के निरोधम बि  क्वी कारण नी   च।  जौं  क्रियाओं विषम हुयां धातु समानवस्थाउं म आंदन त उं क्रियाऊं तै रोगों  चिकित्सा बुल्दन, या चिकित्सा वैद्यों क कर्म बुल्दन। शरीर क अंदर धातुउं म विषमता नि  ह्वावो अर समानावस्था म ही रावन इलै चिकित्सा क्रिया करे  जांद।  काल बुद्धि , इन्द्रियों अतियोग आयोग या मिथ्यायोग यूं  विषम कारणों तै छुड़न से संयोग रूप म कारणों क सेवन करण से धातु विषम नि  हूंदन अर विषम धातु सम ह्वे जांदन। चिकित्सा कुशल वैद्य सामान कारणों से धातु सामान करणो जतन कारा।  इन करण  से वैद्य शरीर क सुख अर दीर्घायु प्रदान करद।  मनुष्य तैं  सुख अर दीर्घायु प्रदान करण से इहलोक अर परलोक द्वी लोकों म धर्म , अर्थ अर काम दीण  वळ  हूंद।  ३१ -३८।   
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २००   बिटेन २०१     तक
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चिकित्सा प्राभृतीय सारांश
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , सोळवां  अध्याय  ( चिकित्सा प्राभृतीय  अध्याय )   पद ३९   बिटेन  - तक
  अनुवाद भाग -  १२६
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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चिकित्सा प्राभृत म वैदक गुण ,वैद्य विपरीत मूढ़ ,वैदक अवगुण , संसोधनक सम्यक योग ,अर अतियोगक लक्षण ,भौत दोषों लक्षण ,संशोधन गुण ,चिकित्सा सूत्र रूप , चिकित्सा म युक्तियुक्त  हूण म शंका समाधान ,चिकित्सा प्रायोजन ,यी सब बात आत्रेय ऋषिन  चिकित्सा प्राभृत ' अध्याय म बतायिन। ३९ - ४१। 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २०१  बिटेन    तक
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सिर  रोगुं मुख्य मुख्य कारण
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 खंड - १  सूत्रस्थानम , सत्रहवाँ  अध्याय  ( क्रियन्तशिर सीयं     अध्याय )   पद  १  बिटेन  - ११ तक
  अनुवाद भाग -  १२७
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अब रोगुं  तैंउपदेश करणो  इच्छा से 'क्रियन्तशिरसीयं' नामौ   अध्याय ब्याख्या करला जन आचार्य अत्रे न बोलि।  १ -२।
अग्निवेशन पूछि बल हे दोषुं  नाश करण वळ  महर्षि ! सिर संबंधी रोग कतना छन ,हृदय संबंधी रोग कतना  छन, वात आदि दोषुं संसर्ग भेद से कुल कतना रोग ह्वे जांदन ? क्षय रोग कति प्रकारक हूंदन ? पिड़काएं कथगा किस्मा छन ? अर  दोषुं  गति कै प्रकार क छन ? बताणै कृपा कारो।  ३ -४।
अग्निवेशक वचन सुणि  गुरु श्रीन बोलि -हे सौम्य जु बि तुमन पूछ वैक बड़ा म ध्यान से सुणो -सिर रोग पांच प्रकारा छन  अर पांचि प्रकारा  हृदय रोग हूंदन। दोषों वात -पित्त -कफ परिणाम से  हूण वळ ६२  प्रकारा छन। क्षय १८  प्रकारा  छन, प्रमेह मधुमेह कारण हूण  वळ फोड़ा ७ प्रकारक ,अर  दोषुं  गति तीन प्रकारक च। एतै इ अब विस्तार से सूण।  मूत आदि क उपस्थित वेग तै रुकण से , दिनम सीण से  व रातम बिजण से , नशा करण से ,ऊंचो या बिंडी बुलण से ,पाळु (ओस ) से,सामिणा वायुक झोंक से ,अति स्त्री भोग से , प्रतिकूल गंध सुंघण से , धूल ,धुंवा -बर्फ या धुप सेवन से ,गरिष्ठ , खट्टा , धनिया मर्च  बिंडी खाण से ,भौत ठंडो पाणी पीण से ,सिर पर चोट लगण  से ,अजीर्ण हूण से ,आँस रुकण से ,बादलों आण से ,  देस -काल  बदलण से ,मानसिक बिक्षोभ से  , अथवा  (भ्युंचळ व उल्कापत हूण से ) यूं  से वात पित्त -कफ दूषित  ह्वेका सिर रक्त तै दूषित करदन। रक्त दूषित हूण  से सिरक  नाना प्रकार का लक्षण वळ  निम्न  दोष पैदा हूंदन  ।५ -११।
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २०२   बिटेन   २०३  तक
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शिर क्या च ,  शिर का रोग व  सिर  का वायु जनित रोग

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 खंड - १  सूत्रस्थानम , सत्रहवाँ  अध्याय  ( क्रियन्तशिर सीय   अध्याय )   पद   १२ बिटेन २१  तक
  अनुवाद भाग -  १२८
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प्राणधारियूं  प्राण अर सब ज्ञानेन्द्रिय यखी छन अर जु  सरैलक अंगु मदे सबसे श्रेष्ठ अंग च वै तैं शिर (सिर ) बुल्दन। १२।
सिर म हूण वळ रोग - अधकपाळी (अदा मुंड दुखण ),सरा सिर दुखण ,प्रतिश्याय (सर्दी जुकाम ) , मुखरोग , नाक क रोग ,आंख्युं रोग , सिर म  चक्कर आण, लकवा , मुंड हलण ,गळ बंद हूण ,गौळ नि मुड़ण ,जबड़ों भिंच्याण ,अर  दुसर  वात आदि से उतपन्न व कृमि से उत्पन्न रोग सिर म हूंदन ।   वात , पित्त , कफ व कृमियों से उत्पन्न पांच प्रकारो रोग (१९ वां अध्याय म )  छन  वूंक एक एक कौरि लक्छण सुणो जु महर्षियुं न बोलि। १३- १५।
ऊंचो बुलण  से ,बिंडी बुलणन , मद्य आदि तीक्ष्ण पदार्थ पीण से ,रातम बिजण से ,ठंडी वायु स्पर्श से , अतिमैथुन से ,मल मूत्रादि वेग रुकण से , मुंड पर चोट से , अतिविरेचन से , अति वमन से ,  अंसदरी (आंसु ) रुकण से ,शोक से , अति डौर से , गर्रु उठाण से ,अतिमार्ग म चलण से , परिश्रम से वायु कुपित ह्वेक  सिरम घुसिक ,सिराओं बढ़न से मुंडम अति शूल उत्पन्न करद। ये शूल से कनपट्टी दुखदन , गर्दन फटद ,भौं मध्य कपाळ म डा , अर माथा गरम हूंद। कंदूड़ ुंम आवाज आंदी ,इन लगद जन आंखि  भैर  आणा छन , शिर घुमद प्रतीत हूंद ,सर फटण प्रतीत हूंद ,शिराओं अंदर स्पंदन प्रतीत हूंद ,गर्दन जड़ लगद , गौळ नी   हलणो लगद ,उष्ण व स्निग्ध आराम दीणा छन लगद।  यी सब वायु जनित शिर रोग  का लक्छण छन। १६ -२१
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पित्त व कफ  जन्य शिरा रोग

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 खंड - १  सूत्रस्थानम , सत्रहवाँ  अध्याय  ( क्रियन्तशिर सीय   अध्याय )   पद  २२  बिटेन  - २९ तक
  अनुवाद भाग - १२९ 
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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पित जन्य शिरा रोग -
कडुवा , खट्टा , लुण्या , छार पदार्थों क सेवन से ,शराब पीण से ,क्रोध से , धुंवा से ,आग से , पित्त क कुपित हूण से सिर पर रोग हूंदन। यां  से सिर म जलन ार पीड़ा हूंदन अर शीत उपचार से सेळ पड़दि।  आँख जळदन , तीस लगद ,चक्कर अर पसीना आंदन।
कफय शिर रोग म निरुद्योग  आलस्य मय सुखमय जीवन जीण ,दिनम सीण ,गुरु , भारी स्निग्ध-घी  आदि पदार्थों सेवन से , श्लेष्मा या कफ पुनः कुपित ह्वेक शिर विकार पैदा करद। मुंडम धीमी  धीमी  पीड़ा हूंद, मुंड सियूं सियूँ  सी लगद ,सर जड़ व भारी ह्वे  जांद ,तंद्रा , काम करणो अनिच्छा ,अळ गस , भोजन से अरुचि ह्वे जांद।
त्रिदोष जन्य शिर रोग -
वातक कारण  चक्कर आण  अर कम्पन , पित्तक कारण  जलन , मूर्छा  व तीस ; कफक कारण भारीपन ,अर तंद्रा इन  त्रिदोष जन्य शिर  रोग  म हूंद।
कृमि जन्य शिर रोग -टिल , दूध , गुड़ यूंक  अधिक सेवन से , अजीर्ण दुर्गन्धयुक्त सड्युं -गळ्यूं  भोजन करण से , गड़बड़ भोजन करण से ,शिरक  वात्त आदि  बढ़ि शिरम रक्त , कफ , मांश तै दूषित करी  रोग उत्पन्न करदन। पाप करण  वळक शिरम क्लेद से कीड़ा उत्पन्न ह्वेका  घृणा जन रोग उत्पन्न हूंदन। यां से कटण , दुंळ्याण/छेदन  जन पीड़ा हूंद , खाज दुर्गंध  ,सूजन हूण मिसे जांद।  यी लक्षण व कृमियों देखि कृमि रोग समझण चयेंद। २२- २९

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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २०५   बिटेन  २०६   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद ,

Bhishma Kukreti

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 त्रिदोष , कृमि जन्य हृदय रोग


चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , सत्रहवाँ  अध्याय  ( क्रियन्तशिर सीय   अध्याय )  ३०   पद   बिटेन ४०  - तक
  अनुवाद भाग -  १३०
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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१ ) शोक उपवास, परिश्रम, शुष्क व स्वल्प भोजनों से कुपित ह्वेका वायु हृदय म जैक ये तै दूषित करी तीब्र बेदना उतपन्न करद। यांसे  कमण , ऐंठन /मरोड़ जन बेदना , जड़ता, मूर्छा , ज्ञानाभाव,चक्कर आण जन लक्छण  वात जन्य हृदय बेदना  का हून्दन। भोजनक जीर्ण हूण म यि लक्छण बढ़ जान्दन।
२ )- पित्त जन्य हृदय शूल -गरम , खट्टा ,नमकीन , छार ,कटु रस्क अधिक सेवनन  ,अजीर्णावस्था म भोजन करणन ,मद्यपानन ,क्रोध या घाम म बैठण या चलण से,  पित्त  हृदय म पौंछ  जांद अर जल्दी कुपित ह्वे जांद, कुपित ह्वेक तीब्र बेदना पैदा करद । ये कारण  हृदय म जलन , मुख म कडुवापन , खट्टा डंकार आण , बिन कुछ कर्यां थकौट, तीस , मूर्छा , चक्कर आण , पसीना आण ,पित्त जन्य हृदय विकार का लक्छण छन।
३ )- कफजन्य हृदय शूल - भौत परिश्रम म भोजन करणन , भारी भोजन  या स्निग्ध सेवन से चिंता न करण से ,शारीरिक चष्टाओं कम करण से , बेफिक्री से सीण से  या बिंडी सीणन   कफ कुपित ह्वेका  हृदय तै दूषित करद।   जां से  हृदय सुस्त ,गिल्ल झुल्ला से ढ़क्यूं  जन , भारी प्रतीत हूंद अर  आलस , अरुचि अर इन लगद  जान कैन हृदय म पत्थर धरी होलु।
४ )- त्रिदोष जन्य हृदय शूल -तिनि दोषों मिलण से   तिन्नी  दोषों क लक्छण उतपन्न हूंदन।  यूं  तै त्रिदोष जन्य शूल बुल्दन। 
५ )-कृमि जन्य दोष - त्रिदोष जन्य  हृदय रोगुंम दुरात्मा , तिल , दूध , गुड़ , सड़युं  भोजन करद  वैक हृदय म एक गाँठ ,उतपन्न ह्वे जांद अर  रस क संकेदन  भाग सड़न बिसे जांद। रस संकेदन से कृमि उतपन्न ह्वे  जांदन। यी कृमि हृदय बिटेन  हृदय क  क  हौरी  जगा सौरण लग जांदन  जैसे  कृमि हृदय  तै खाण  लग जांदन।  यिन  अवस्था म तीब्र बेदना हूंद जन बुल्यां स्यूणन बिद्याणु  हो। शस्त्रों से हृदय तै कटदन ,हृदय म पीड़ा अर  खज्जी उतपन्न हूंद। यूं लक्छणों तै  कृमिजन्य  हृदय रोग  समजिक   विद्वान वैद  तै शीघ्र मृत्यु करण  वळ  रोग की चिकित्सा करण  चयेंद। ३०-४०।   
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २०६   बिटेन  २०७   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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दोष संसर्ग जनित ६२ विकार

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम , सत्रहवाँ  अध्याय  ( क्रियन्तशिर सीय   अध्याय ) ४१   पद  ४४  बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १३१
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!

वात आदि रोगों क एक हैंको से संसर्ग से ६२ विकार हूंदन-
बढ़्यां वात ,पित्त , कफ का परस्परक संसर्ग से सन्निपात जन्य १३ रोग हूंदन। द्वी दोषों अधिकता अर एक की न्यूनता (वात -पित्त  बढयूं कफ न्यून , पित्त -कफ बड्युं अर  वात कम वाट कफ बड्युं अर पित्त कम )  से तीन ; एक दोष की वृद्धि द्वी की न्यूनता से तीन ; ये हिसाबन  ६ सन्निपात छन।  हीन , मध्य व अधिक भेद से यी छह सन्निपात हूंदन , वात , पित्त अर कफ तिनि बढ़न से एक इनमे तेरा किस्मा क सन्निपात ह्वे।
अब द्वी दोषों भेद  बुल्दां -बड्युं वात ,पित्त , कफ मदे क्वी बि द्वी दोषों परस्पर मिलण से नौ भेद ह्वे जांदन। यु संयोग एक एक दोष की वृद्धि से छह ६ प्रकार का अर तीनों क सामान वृद्धि से तीन प्रकार क हूंद। ६ प्रकार क यथा -वृद्ध वात अधिक ,वृद्ध पित्त ,वृद्ध पित्ताधिक , वृद्ध वात ; वृद्ध वाताधिक ,वृद्ध कफ , वृद्ध कफअधिक ,वृद्ध वात वृद्ध पित्ताधिक ,वृद्ध कफ वृधकफाधिक ,वृद्ध पित्त यी छह प्रकारक। तीन प्रकारक यथा -कृद्ध समवात ,वृद्ध समवात कफज  ,वृद्ध समपित्तकफज।  ये हिसाबन नौ प्रकार क ह्वे।  पृथक रूप से बढ्यां  वात ,पित्त , कफ से रोग तीन प्रकारक हूंदन। वृद्ध पित्तज , वृद्ध कफज अर वृद्ध वातज। इन हिसाबेन बढ्यां दोषों से २५ भेद बणदन अर कम हूण से बि २५ भेद बणदन। वृद्धि व क्षय क अलावा अन्य भेद बि  मिल्दन यथा - एक दोष की वृद्धि एक दोष की समता व एक दोष क क्षय। यान से १२ भेद बणदन जु ५० भेड़ों से अलग छन।  ये हिसाबन ६२ भेद ह्वेन।  ४१ -४४। 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २०७  बिटेन   २०८  तक ,
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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