Author Topic: चरक संहिता का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Charak Samhita  (Read 24752 times)

Bhishma Kukreti

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भिन्न भिन्न सूजनों /शोथुं  लक्षण
 
चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अठारवां    अध्याय  (  त्रिशोथीय   अध्याय,   )   पद  ५   बिटेन  १०  तक
  अनुवाद भाग -  १४२
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
यूंमा इथगा  विशेष  च कि -शीत , रूखा ,लघु , विशद अन्न , खानपान , परिश्रम , उपवास , वामन , विरचनादि क भौत करणन अर अति  वर्त धरणन वायु कुपित ह्वेका त्वचा , ल्वे (रक्त ) ,अर मेड आदि धातुओं पर अधिकार करि शोथ उतपन्न कर दीन्द। यु वाट जन्य शोथ जल्दी उतपन्न हूंद अर उनी जल्दी समाप्त बि  ह्वे जांद।  एक रंग काळो , या लाल -काळो या स्वाभाविक रंगक रौंद।  यु शोथ गतिशील , धड़कन युक्त , कर्कश , कठोर , त्वचा फटण वळ , अर बाळ टुट जांदन।  रोगी तै इन लगद जन क्वी चिरणु हो ,  दबाणु हो , मेदन करणु ह्वावो , स्यूण घुप्याणो जन डाउ , किरमळुं चलण जन स्पर्श , लया बुरकण जन चलमलाट सि हूंद , सिकुड़द  अर फैलदो च।  यी वायु जनित शोथ क लक्छण छन। 
गरम , तीक्छ्ण , कड़ु , छार ,लुण्या , अर खट्टो पदार्थों खाणन , अजीर्ण अवस्था म भोजन करणन , आग , घामक अति सेवनन , पित्त कुपित ह्वेका त्वचा , मांस , रक्त पर प्रबल ह्वेक शोथ पैदा करद।  यु शोथ जल्दी पैदा हूंद अर जल्दी शांत बि हूंद।  एक रंग काळो , पीलो ,  नीलो , ताम्बा रंग जन हूंद , स्पर्श गरम अर कोमल बाल लाल भूरो या तांबौ रंग जन ह्वे जांदन।  यु शोथ गरम हूंद अर जलन हूंद , पीड़ा दिंदेर अर तपाण वळ , गरम लगद, पसीना आंद ।  ना इ स्पर्श अर  ना इ गरमी सहन कर सकद।  यी पित्त जन्य शोथ क लक्छण छन।
भारी , मधुर , शीत , स्निग्ध , भोजनों से , ज्यादा सीण पर , व्यायाम नि करण पर , बलगम , कफ कुपित ह्वेक त्वचा , मांश , रक्त पर अधिकार कर लींद अर शोथ उतपन्न करद ।  इन शोथ देर से शुरू हूंद अर देर इ म शांत हूंद।  एक रंग धुमैला  या सफेद , स्नेहयुक्त (चिपुळ ) , भारी स्थिर , नि हलण वळ , गाढ़ो व बाळुं अगर भाग रंग सफेद ह्वे जांद। स्पर्श अर गरमी  सहन ह्वे जांद।   यु कफ /बलगम जनित शोथ लक्छण छन।  अपण अपण कारणों द्वी दोष कुपित ह्वेका द्वी दोषुं लक्छण वळ शोथ उतपन्न करदन।  ये हिसाबन संसजन्य शोथ तीन प्रकारौ छन। 
तिनि दोषुं क मिलण से उत्तपन्न शोथ सन्निपातिक शोथ एक अलग शोथ च जाइका लक्छण तिनि दोषुं लक्छण हूंदन।
ये हिसाबन  प्रकृति भेद से शोथ द्वी प्रकारक - बाह्य व शारीरिक ; तीन प्रकारौ - वातज , पित्तज  अर कफज  ; चार प्रकारक - वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य अर सन्निपातजन्य; सात प्रकारौ - वातज , पित्तज , कफज अर वातपैत्तिक , वात श्लैष्मिक  पित्तश्लैष्मिक , अर सन्नीपातक हूंदन।  पर सूजन दृष्टि से एकि प्रकारौ हूंद अर्थात सब म सूजन सामन्य च।  ५ - १०।   
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २२३   बिटेन  २२४   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद ,


Bhishma Kukreti

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पांच प्रकारक सूजनुं  लक्षण

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अठारवां    अध्याय  (  त्रिशोथीय   अध्याय,   )   पद ११   बिटेन  १७   तक
  अनुवाद भाग -  १४३
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!

सूजन हूण पर जैक सरैल सियूं सि  ह्वावो , पीड़ा ह्वावो , दबाणम फिर से चौड़ अळग ऐ जावो ,वै तै वातजन्य  शोथ (सूजन ) समजण चयेंद अर जैक रंग लाल काळो  ह्वावो  अर जु  रातम नष्ट ह्वे जावो अर स्वेदन ,उष्ण क्रिया वा मर्दन से ह्वे  जावो स्यु वातजन्य शोथ च। 
जै शोथ म रोगी तै तीस लगो , जौर की पीड़ा ह्वावो ,जलन ह्वावो , पकद ह्वावो ,पसीना आंद  ह्वावो , नरम पड़ जांदो ह्वावो ,गंध आंद  ह्वावो , स्यु पित्तजन्य शोथ हूंद। जैमा आँख , त्वचा अर मुख  पील पड़दा  ह्वावन ,पैल  बीचम सूजद  ह्वावो , त्वचा पतली ह्वावो , रोगी तै  अतिसार ह्वावो तो  ये तै  पित्तजन्य शोथ  समजण  चयेंद । 
जै  सूजन म ठंडो  चिताये जाव , पसीना नि  आवो , हिलण डुलण  नि  ह्वावो , जैमा खज्जि  होंद ह्वावो , रंग घूसर ह्वावो , दबाणम फिर उब उठि  जावो स्यु कफजन्य शोथ च।  जैमा कुश या  कटणन  से लहू नि  चूवो ,या कठिनाई से थोड़ा थोड़ा स्राव ह्वावो  स्यु कफजन्य शोथ हूंद। 
द्वी दोषुं से उपज्युं , द्वी लक्षणों वळ  द्वीदोषज शोथ हूंद अर सब दोषुं  मिलण से सब लक्षण वळ सन्निपातजन्य शोथ हूंद।  ११- १७। 

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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २२४   बिटेन  २२५   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद ,


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सूजन का उपद्रव , गौळक सूजन व  पित्त जन्य सूजन

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अठारवां    अध्याय  (  त्रिशोथीय   अध्याय,   ) १७    पद  २९  बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १४४
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
 
जु सूजन पुरुषों /मर्दों खुट बिटेन शुरू ह्वावो व मिहलाओं मुख बिटेन शुरू ह्वैक सरा सरैल म पसर जावो  वु कष्टसाध्य शोथ हूंद।  जु सूजन स्त्री या पुरुषक गुह्य भाग से शुरू ह्वेक सरैल म पसरद या जै शोथ म उपद्रव हो वो शोथ अति कष्टसाध्य हूंद।  १७ - १८।
उपद्रव - वमन , श्वाश , अरुचि , तीस , जौर , अतिसार , अर निर्बलता यी सात सूजन का उपद्रव छन। २०।
उपजिह्विका रोग - जब कफ कुपित ह्वेका जीबि जड़ म शोथ उतपन्न करद त वै सूजन तैं  'उप जिह्विका रोग बुल्दन। 
गळशुण्डिका -जब कफ कुपित ह्वेक गलग्रंथि क आश्रय लेकि शोथ उतपन्न करद त वे रोग तैं गळशुण्डिका रोग बुल्दन। 
गळगंड - जब कफ कुपित ह्वेक  गौळ क भैर सूजन पैदा कारो तो वे रोग तै गळगंड रोग  बुल्दन। जब कफ कुपित ह्वेक  गौळक भितर शोथ उतपन्न करद त गलग्रह (गौळक रुकण , आवाज फटण ) बुल्दन। २१ -२४। 
जब पित्त कुपित ह्वेक ल्वे (रक्त ) क दगड़ मिलि त्वचा म फ़ैल जावो त लाल रंगै  सूजन पैदा करदन  जै  तै विसर्प बुल्दन।  जब पित्त कुपित ह्वेक रक्त क दगड़ त्वचा म थिर ह्वे जांद त लाल रंगक शोथ तै पिण्डिका (फुंसी ) बुल्दन।  जब कुपित पित्त रक्त म जैक शुष्क ह्वे  जावो त नीलिका , तिल , व्यंग , चर्मकील , लसन , झाईं आदि रोग पैदा हूंदन।  जब कुपित पित्त कनपट्टी म ऐक रुक जावो तब शंखका भयानक रोग उतपन्न हूंद।  जब कुपित पित्त कन्दूड़क जड़ म ऐक रुक जावो तो जौरक अंत म भयानक सूजन उत्पन्न  हूंद जु  मारक  हूंद।  २५- २९।
 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २२५   बिटेन २२६    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
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वायु जनित सूजन


चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अठारवां    अध्याय  (  त्रिशोथीय   अध्याय,   )   पद  ३०  बिटेन ३५   तक
  अनुवाद भाग - १४५ 
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जब वायु कुपित ह्वेक प्लीहा (तिल्ली ) तैं उठाइ दींद तब पार्शों तै दबांद प्लीहा बढ़ जांद।  जब वायु कुपित ह्वेका हृदय , नाभि ,  बस्ति  , द्वी पार्श्व  क आश्रय ले लींद तब शूलयुक्त सूजन उत्पन्न हूंद जै तैं  गुल्म बुले जांद।  जब वायु कुपित ह्वेक सूजन व दर्द उत्पन्न करदी जंगसंधि से हूंद अंडकोष म जांद तब ब्रघ्न रोग उत्पन्न हूंद।  जब वायु कुपित ह्वेक त्वचा व मांस म मध्य उदर का अंदर पौंछि आश्रय लेकि सूजन उत्पन्न करद तब उदर रोग उत्पन्न ह्वे जांद।  जब वायु कुपित ह्वेक उदर पर स्थिर ह्वे जांद (ना तौळ जांद ना मथि )  तो  ' अनाह '  रोग बुले जांद।  अधिमांस , अर्बुद ,आदि रोगम सूजनै समानता हूणम नाम अर रूप से भिन्न हूण पर भी शोथ संग्रहम निर्देश करण  चयेंद। ३० -३५। 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २२७    बिटेन    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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रोहणी , याप्य  ,  साध्य , असाध्य रोग लक्षण

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अठारवां    अध्याय  (  त्रिशोथीय   अध्याय,   )  ३६  पद   बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १४६
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
 
जै व्यक्तिक वात , पित्त , कफ तिनि कट्ठा ह्वेका जीबी जड़ म स्तिथ हूंदन  अर सूजन व जलन उत्पन्न  करदन , अर भौं  भौं डा (पीड़ा ) दींदन , ये रोग तै रोहणी बुले जांदन।  ये रोगक कारण मनिख तीन दिन तक इ जिंदो रौंद।  ये मध्य जु कुशल चिकित्सक चिकित्सा कार त  रोगी बच जांद।  यु भयानक किन्तु साध्य रोग च।  चिकित्सा नि करण या मिथ्या चिकित्सा करण से रोगी मर जांद।  दुसर कोमल रोग इन छन जु योग्य या अयोग्य चिकित्स्क द्वारा चिकित्सा करण  पर बि आराम मिल जांद।  कुछ रोग असाध्य रोग छन जौं तै याप्य बुले जांद।  यूं रोगियों  भली चिकित्सा करण पर बि 'याप्य' ही रौंदन कुछ देर कुण अच्छा हूंदन।  ३६ - ४१।
एक हौर प्रकारक रोग हूंद जख म क्वी बि  चिकित्सा सफल नि हूंदी।  यूं  रोगों म मूढ़ इ कार्य करदन।  किन्तु विद्वान् चिकित्स्क इन रोगोंक चिकित्सा नि करदन।  रोग द्वी प्रकारा हूंदन - साध्य अर असाध्य।  मृदु अर  दारुण भेद से चार प्रकारा ह्वे  जांदन - मृदु साध्य , दारुण साध्य ; मृदु असाध्य अर  दारुण असाध्य।  ४२ - ४३।   
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २२७ ,  २२८   बिटेन    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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अन्य कारणों का सूजन अर  चिकित्सा पद्धति

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अठारवां    अध्याय  (  त्रिशोथीय   अध्याय,   )  ४४  पद   बिटेन  ४९  तक
  अनुवाद भाग -  १४७
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यी रोग  (पीड़ा), कारण आदि का कारण से वायु कुपित हवे ह्वेक भौं भौं चिकित्सा से शांत ह्वे जांद।  स्थान (आमाशय ,रसादि ) , संस्थान (आकृति गुल्म  अर्यूद ) ,  नामभेद से कथगा इ  ह्वे जांदन।  चिकत्सा कर्म म व्यवहारिक प्रयोग वास्ता अष्टोदरीय संग्रह करे गे।  इलै चिकित्सा कर्म म प्रकृतिक समानता से यु रोग वातजन्य , यु पित्तजन्य , यु कफजन्य  व्यवस्था बांचण  चयेंद।  रोगुं नाम नि जणन वळ  वैद कभी बि  चिकित्सा म लज्जा नि उठाये।  सब रोगों नाम नि छन।  क्वी एक दोष कै कारण से कुपित ह्वेक  दुसर जगा पौंछि भौं भौं किस्मक रोग उत्पन्न कर  दींदन।  इलै रोग क  स्वभाव व अधिष्ठान  तैं , वूं भेदों तैं अर रोगक विशेष कारण जाणि  वैद द्वारा चिकत्सा हूण  चयेंद।   जु  वैद ज्ञानपूर्वक उचित रूप से चिकित्सा करद  वु  चिकित्सा कार्य म  विभ्रांति म नि पड़द , भूल नि करद।  ४४ - ४९। 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २२८  बिटेन  २२९   तक
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त्रिशोथ क सार

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 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अठारवां    अध्याय  (  त्रिशोथीय   अध्याय,   )  ५०  पद   बिटेन  ५८  तक
  अनुवाद भाग -  १४८
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शरीरधारियों म वात , पित्त अर कफ सदा ही रंदन। यी या त  विकृत अवस्था म हूंदन या प्राकृतिक या स्वाभाविक अवस्था म हूंदन।  विद्वान् (वैद्य ) तै चयेंद कि वो यूं  तै पछ्याण कि  विकृतावस्था म छन  या प्राकृतिक अवस्था म।  काम करणम उत्साह , सांस्क भैर भितर आण , चेष्टा , रस , रक्त आदि धातु क गति तैं सामान रखण , पुरीष , मल -मूत्र आदि गमन शील वस्तुओं सणि  ठीक से भैर करण यी वायु क अधिकृत कार्य छन।  दिखण , अन्न पचाण , देखकी , उष्णिमा, भूक -तीस क लगण , शरीर की कोमलता , कांटी , मनै प्रसन्नता , बुद्धि हूण यी अधिकृत पित्त क कार्य छन।  चिकनाई , संधियों क बंधन , स्थिरता , भारपन , पुरुषत्व , बल , सहनशक्ति , मनै स्थिरता , धैर्य , लोभ नि हूण , यी अधिकृत कफ का कार्य छन।  वात , पित्त , कफ क्षीण हूण पर लक्छण बुल्दन - स्वाभाविक कर्मों म कमी आदि अर  स्वाभाविक कार्यों विरोधी म बढ़ोतरी आंदी।  जनकि  वायु क्षीण हूण पर उत्साह म कमी  अर  विषाद बड़द , पित्त की कमी म नि दिखेण , कफ की कमी म रुखोपन हूण।  बृद्धि क लक्छण बुल्दां -  दोष क स्वभाव म वृद्धि  लक्छण हूंदन जनकि -कफ की स्निग्धता , शीतलता , अर मधुरता , या प्रकृति च यांक  अति स्निग्धता , अति मधुरता या अति शीतलता वृद्धि च।  ये हिसाबन दोषों की प्रकृति ,  हानि व वृद्धि की परिक्षा हूण  चयेंद।  ५० -५५।
शोथों की संख्या , कारण , लक्षण , साध्य असाध्य यूंसे उत्पन्न रोगुं अर जौं रोगुंम शोथ पैल हूंद , ऊंको , रोगुं विधि , भेद से तीन प्रकारै प्रकृतिक ज्ञान ,दोषुं  स्वाभाविक कार्य , वृद्धि अर कमी लक्छण , यी सब मोह , रज दोष , लोभ , मान , मद ,सम्प्रिहा यूंसे रहित पुनर्वसु महर्षि न 'त्रिशोथ'अध्याय म बोल याल।  ५६- ५८।
 
 
 
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४८ रोगुं  सूची
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  उन्नीसवां     अध्याय  (  अष्टोदरीय   अध्याय,   )  १  पद  ३  बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १४९
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
 
अब ' अष्टोदरीय' अध्यायौ  व्याख्या करे जाल जन भगवान आत्रेयन उपदेश कार (१ -२ ) -
ये आयुर्वेद शास्त्र म चार प्रकारा  उदर रोग छन, आठ मूत्राघात छन ,आठ प्रकारा दूध दोष , आठ प्रकारक वीर्य दोष , सात प्रकारक कुष्ठ रोग , सात पिडका, सात बीसर्प , छह प्रकारा अतिसार , छै उदावर्त ,पांच गुल्म , पांच प्लीहा दोष  , पांच कास , पांच श्वास , पांच हिचकी , चार तृष्णा , पांच अर्दि -दमन , पांच प्रकारै अन्न म अरुचि , पांच प्रकारा शिरोरोग , पांच हृदय रोग , पांच प्रकारक पाण्डु रोग , पांच उन्माद।  चार अपस्सार ,चार चक्षु व्याधि , चार कंदूड़ो रोग , चार प्रति श्याया , चार मुख रोग , चार प्रकारक गृहणी रोग , चार प्रकारक मद रोग , चार मूर्छा , चार किस्मौ शोष  , चार क्लीवता , तीन प्रकारक शोथ ,तीन किलास ,तीन तरां रक्त पित्त ,द्वी प्रकारक जौर , द्वी किस्मक व्रण ,  द्वी तरां  आयाम , द्वी गृधसी , द्वी किस्मक कामला , द्वी प्रकारक आम , द्वी वातरक्त , द्वी किस्मक अर्श।  एक अस्तम्भ , एक सन्यास , एक महामद , बीस किस्मक कृमिभेद ,बीस तरां प्रमेह , बीस तरां योनि रोग।  ये हिसाबन ये शरीर म ४८ अड़तालीस प्रकारा रोगों गणना हूंद। ३। 
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २३१    बिटेन  २३०   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद

Bhishma Kukreti

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उदर रोग , मूत्र घात , वीर्य रोग का प्रकार
 
चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  १९ उन्नीसवां     अध्याय  (  अष्टोदरीय   अध्याय,   ) ३, (१ )   पद   बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १५०
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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यूँ तै स्पष्ट करदां -
आठ प्रकारक उदर रोग -  वातजन्य , पित्त जन्य , कफ जन्य , सन्नीपात जन्य , प्लीहोदर , बद्धोदार , छिद्रोदर , अर दकोदर।  आठ मूत्रघात - वातजन्य , पित्त जन्य , कफजन्य , सन्निपातजन्य , अश्मरी जन्य (गुर्दा  पत्थर ) , शर्करा जन्य , शुक्रजन्य व शोणित (रक्त )  जन्य।  स्त्रियों दूध क आठ दोष - वैवर्ण्य , वैगन्ध्य , वैरस्य , पैछिल्य, फेनसंघात , रूखापन , भारीपन , स्नेहन की अधिकता। 
वीर्य क  आठ दोष - पतळु , शुष्क , फेनयुक्त , मैलो , दुर्गन्धयुक्त , अति स्निग्ध (चिपुळ ) ,अन्य धातु मिश्रित , अवसादी या हीण सत्व।  (१ ) ।
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २३२    बिटेन    तक
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Bhishma Kukreti

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कुष्ठ , पिण्डिका अर विसर्प का प्रकार

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  उन्नीसवां     अध्याय  (  अष्टोदरीय   अध्याय,   ) ३ (२ )   पद   बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १५१
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आठ प्रकारा कुष्ठ - कपाळ , उदुंबर , मंडल , ऋष्यजिह्व , पुण्डरीक , सिष्म अर काकणिका। 
सात पिण्डिका - शराविका , कच्छपिका , जालिनी , सर्पणी , अलजी , विनता  अर विद्राभि। 
सात विसर्प - वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य , अग्नि , कर्दमक , ग्रंथि , अर सन्निपात जन्य (२ ) । .
 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २३२   
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