Author Topic: चरक संहिता का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Charak Samhita  (Read 9624 times)

Bhishma Kukreti

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अतिसार (पेचिस )  व गुदा ग्रह रोगों का प्रकार

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  उन्नीसवां     अध्याय  (  अष्टोदरीय   अध्याय,   ) ३ (३ )   पद   बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १५२
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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अतिसार छै छन - वातजन्य अतिसार , पित्तजन्य अतिसार , कफजन्य अतिसार , भयजन्य अतिसार , शोकजन्य अतिसार। 
उदावर्त्त  (मल मूत्र रुकण ) का प्रकार - वातजन्य , मूत्रजनय , पुरीष (विष्टा )  जन्य, शुक्र जन्य , छर्दि  (वमन ) जन्य, क्षव )छेंक या खांसी )  जन्य।  ३ (३) । 
 
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २३३  बिटेन    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद

Bhishma Kukreti

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गाँठ , प्लीहा , कास ,  श्वास , हिचकी , तीस , वमन , अपचन, शिरो रोग , हृदय रोग ,उन्माद कारण

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  उन्नीसवां     अध्याय  (  अष्टोदरीय   अध्याय,   )  ३ (  ४)  पद   बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १५३
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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पांच गुल्म  (गाँठ ) छन -वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य , सन्निपातजन्य अर रक्तजन्य। 
पांच प्रकारा प्लीहा/तिल्ली  दोष - वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य , सन्निपातजन्य अर रक्तजन्य।
पांच प्रकारा कास - वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य , क्षत जन्य  अर क्षय जन्य।
पांच प्रकारा श्वास - महा , ऊर्घ्व , छिन्न , तमक , छुद्र।
पांच प्रकारा हिचकी - महती , गम्भीरा , व्यपेता ,छुद्रा , अन्नजन्य।
पांच किस्मै  तीस - वातजन्य , पित्तजन्य , आम जन्य , क्षयजन्य अर औपसर्गिक कारणुं से।
वमन का प्रकार - दूषित अन्न भक्षण से , वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य , सन्निपात जन्य।
पांच प्रकारा अपचन - वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य, भोजनन द्वेष , भोजन उपरान्त अचानक श्रम।
पांच प्रकार का शिरो रोग - वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य , सन्निपात जन्य व कृमि जन्य।
पांच प्रकारा  हृदयरोग - वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य , सन्निपात जन्य व कृमि जन्य।
पांच पांडुरोग - वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य , सन्निपात जन्य व माट खाण से।
पांच प्रकारा उन्माद - वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य , सन्निपात जन्य व आगंतुक (बाह्य कारण) ।  ३ (४) । 
 
 
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २३३   बिटेन    तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद

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रोगुं  किस्म

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  उन्नीसवां     अध्याय  (  अष्टोदरीय   अध्याय,   )  ३ (५ )  पद   बिटेन  ३ (६ )  तक
  अनुवाद भाग -  १५४
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चार अपस्मार (मिर्गी ) -  वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य अर सन्निपातजन्य
चार आँखक अर चार कंदूड़ो रोग , चार प्रतिश्याय , चार मुखरोग , चार ग्रहणी दोष , चार मद , चार  मूर्छा -यी सब अपस्मार जन हि वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य अर सन्निपातजन्य।
चार प्रकारा शोष (सुकण वळ रोग ), साहस , संधारण (मल मूत्र वेग रोक ) , क्षय तथा विषम , भोजनजन्य।
 चार किस्मौ  नपंसुक्ता - वीर्य दोष , ध्वज दोष , बुढ़ापा से शुक्राणु क्षय स।  ३ (५ ). । .
शोथ तीन प्रकारौ - वातजन्य , पित्तजन्य , कफजन्य। 
तीन प्रकारा किलासकोढ़ /चरम रोग - लाल , ताम्र अर सफेद।
तीन प्रकारौ  रक्त पित्त - उर्घ्वगामी , अधोगामी अर उभयगामी।  ३ (६ )।
 
 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ    २३४
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विभिन्न रोगुं  किस्म
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  उन्नीसवां     अध्याय  (  अष्टोदरीय   अध्याय,   ) ३ (७ )   पद   बिटेन ३ (८ )    तक
  अनुवाद भाग - १५५ 
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जौर  द्वी प्रकारौ- ठंड से उतपन्न हुयुं ,जैमा गरमी उपचार की इच्छा हूंदी  अर  गरमी  से उतपन्न  जौर जैमा ठंड से उपचार की इच्छा हूंदी। 
द्वी किस्मौ व्रण - शारीरिक अर  बाह्य कारणु से।
द्वी आयाम - बाह्य अर अभ्यांतर
द्वी गृध्रसी   किस्म - वातजन्य अर  वात -कफजन्य
द्वी किस्मा कामला - कोष्ठाश्रय अर शाखाश्रय
आम द्वी प्रकारक -  अलसक अर विषूचिका (विश्वी )
द्वी प्रकारक वातरक्त - शुष्क अर आर्द्र।  (३ (७ ) ।
उरूस्तम्भ (घुंड, खुट  जकड़न )  -  एक प्रकारक -त्रिदोषजन्य
संन्यास - एक प्रकारक त्रिदोष जन्य - मन व शरीर आश्रित
एक प्रकारक महागद - यथार्थ तत्व नि जणन।  ( ३ (८ ) ।
 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २३४   बिटेन  २३५   तक
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कृमि , प्रमेह अर योनि रोगुं  प्रकार
 
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 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  उन्नीसवां     अध्याय  (  अष्टोदरीय   अध्याय,   )   ४ पद   बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १५६
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कृमियों क बीस  जाति छन -  मूक (जूं ) , अर पिपलिकायें।  यी द्वी प्रकारा कृमि बाह्य मल  (पसीना ) से पैदा हूंदन।  केशाद कृमि, ओमाद , लोमद्वीप , सौरस , औदुंबर अर जंतुमता यी छै  रक्तजन्य ;
अंतराद , उदराद , हृदयचर , चुरु , दर्मपुष्प , सौगंधिक , महागुद   यी सात कफजन्य कृमि छन।
कर्करुका ,मर्क रुका , लेलीह , सशुलका , सौसुराद यी पांच पुरीष जन्य  कृमि छन। यी बीस कृमि छन।
प्रमेह बीस तरां का छन - शुक्लमेह , शुक्रमेह , शनैमेह ,सिकता मेह , लालामेह ,उदक मेह , इक्षुमेह ,सांद्रमेह , सांद्रप्रसादमेह यी दस प्रमेह कफजन्य प्रमेह छन। 
क्षार मेह , कालमेह , नीलमेह ,लोहितामेह , मंजिष्ठामेह ,हरिद्रामेह , यी छै पित्तजन्य  प्रमेह छन।
वसामेह , मजामेह ,हस्तीमेह व मधुमेह यी चार प्रमेह वात जन्य प्रमेह छन।  ये अनुसार प्रमेह बीस ह्वे गेन।
योनि रोग बीस छन यथा -यात्तिकी , पैतिकी ,श्लैष्मिकी , अर सन्नीपात्तकी , बाकी सोळआ दोष वातादि , दुष्य रक्तादि क संसर्ग से अर प्रकृति निर्देशन से  हूंदन यथा -रक्तयोनि , अरजस्का , अचरणा ,प्राक्चरणा ,उपलुप्ता ,परिलुप्ता , उदावर्तिनी , कर्णिनी , पुत्रनी , अंतर्मुखी , सूची मुखी , शुष्का , वामिनी , षंडयोनि , अर महायोनि यी बीस योनि रोग छन।
न्नीसवां     अध्याय  (  अष्टोदरीय   अध्याय,   )   ४ पद
 
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भौं भौं रोगुं  मूल कारण

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 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  उन्नीसवां     अध्याय  (  अष्टोदरीय   अध्याय,   )   पद  ५  बिटेन   ९ तक
  अनुवाद भाग -  १५७
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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बुल्यां या नि बतायां सौब  प्रकारा रोग वात , पित्त अर कफ छोड़ि नि  ह्वे सकदन।  वात पित्त अर कफ से ही सौब रोग हूंदन।  जन पंछी सरा दिन भर उड़णो उपरान्त बि अपण छाया उललंघन नि कौर सकद तनि शरीर का धातुओं विषमता से हुयां रोग वात , पित्त , कफ नि  छोड़ सकदन।  वात , पित्त , कफ इ स्थान (रसादि , वस्ति आदि ० , संस्थान (आकृति , लक्छण ) , प्रकृति (कारण ) ,की विषमता देखि एवं यूंसे उतपन्न हूंदन यो बुद्धि मान बुल्दन।  ५ ।
प्रायः जथगा बि रोग सरैलौ  भितर हूंदन सि वात , पित्त अर कफ से बिगळ्यां  नि  हूंदन।  आगंतुक रोग वात , पित्त अर कफ से बिगळ्यां /अलग हूंदन।  स्वतःशरीर से हुयां रोग तै आगंतुक रोग अनुसरण करद।  इनि आगंतुक रोगक पैंथर शरीरक रोग बि ह्वे जांदन।  जन कि चोट लगणम जौर हूण।  इलै अप्रधान अर प्रधान  अर मूल कारणों भली भाँती विश्लेषण करी  चिकित्सा करण  चयेंद। ६ - ७।
ये अष्टोदरीय' अध्याय म बीस प्रकारौ तीन ; एक प्रकारा तीन ; तीन तरां तीन ; द्वी किस्मक आठ ;चार प्रकारा दस ; बारा किस्मा पांच ; चार किस्मक आठ , छै प्रकारक द्वी अर सात तरां  तीन रोगों बारा म बात होइ।  ८ - ९।
अब उन्नीसवां अष्टोदरीय  अध्याय  समाप्त ह्वे।  १९ अध्याय। 

 
 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २३६   बिटेन   २३७  तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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Bhishma Kukreti

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नानात्मज  रोग (  ८० वात , ४०  पित्त व  २० कफ जन्य रोग )

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  बीसवां      अध्याय  (  महारोगाध्याय  )   १ पद   बिटेन  १०  तक
  अनुवाद भाग -  १५८
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अब अगनै ' महारोग' अध्याय क बखान करला जनकि भगवान अत्रेन बोली छौ।  १ , २। 
रोग चार तरां क हूंदन - आगंतुक , वात , पित्त , कफ जन्य।  यूं चर्युं म एक समानता च दिक् हूण या पीड़ा। वेदना म समानता च।  प्रकृति अनुसार रोग द्वी प्रकारक हूंदन -आगंतुक अर निज (शरीर क भितर)।  यूं रोगुं अधिष्ठान व आश्रय  द्वी हूंदन - मन अर शरीर।  किन्तु रोग असंख्य छन।  किलैकि प्रकृति , कारण , नाम , आदि अधिष्ठान (दूषित रस , रक्तादि ) लक्छण , आहार विहार , का भेद असंख्य छन।  इलै रोग बि असंख्य ह्वे जांदन।  आगंतुक रोगों का मुख्य कारण दांतक लगण , गिरण , अभिचार , अभिशाप , अभिषंग (कोसना ) , चोट लगण , वध , बंधण , दबाण , डुडड़न बंधण , जळण -डड्याण , अस्त्रक लगण , बजर पड़न ( बिजली गिरण ) यी सब सूक्ष्म भूत तत्व क उपद्रवों कारण छन।  जौं शरीर जन्य रोगुं मुख्य कारण वात , पित्त अर कफ की विषमता च।  आगंतुक अर निज रोगुं क मूल प्रेरक कारण - असात्मेइन्द्रियार्थ -संयोग व प्रज्ञापराप अर परिणाम छन।  यी चर्री    बढ़ी  एक दूसर से परस्पर मिल जांदन।  फिर बि संदेह उतपन्न नि करदन।  एक दगड़ मिलण पर बि लक्छण अलग अलग दिखेंदन। 
 आगंतुक रोग पैल शरीर पर वेदना उतपन करदो अर पैथर  वात , पित्त व कफ की विषमता उतपन्न करद।  निज रोगम पैल पित्त , वात अर कफ म विषमता उतपन्न हूंदी अर पैथर दर्द उतपन्न हूंद।  तिनि दोषों क शरीर म स्थान विभाग बुल्दन जनकि मूत्राशय , पकाशय (पुटुक ) , कमर , जंगड़ ।  , खूटों हड्डी यी वायु (वात )  स्थान छन।  यूंम बि पकाशय विशेष वायुक स्थान च।
पसीना , रस , लुतुक , आमाशय क तौळौ भाग पित्त क स्थान छन , आमाशय पित्त क मुख्य स्थान च।
छत्ती , मुंड , ग्रीवा व संधि आमाशय क मथ्या भाग  अर  मेद कफक स्थान छन। यूंमा छत्ती कफक विशेष स्थान च। 
यि वात , पित्त व कफ सरा शरीर म चलणा रंदन अर चलदा चलदा कुपित या अकुपित अवस्थाम रैका शुभ या अशुभ लक्छण उतपन्न करदन।  यथा - प्रकृति भूत , स्वस्थ रैकि शुभ लक्छण शरीर की पुष्टि , बल कांति  वृद्धि , कांति की उज्ज्वलता , अर कुपित रूप अशुभ लक्छणों तै उतपन्न करदन।
विकार (रोग )  द्वी प्रकारक हूंदन - सामन्य अर नानात्मज।  सामन्य - वातादि दोष जु प्रत्येक मीलिक  रोग उतपन्न करदन। नानात्मज जब वातादि दोष परस्पर मीलिक ना अलग अलग स्वतंत्र रुपन रोग उतपन्न करदन।  यूं मदे सामान्य रोग क बारा म अध्याय १९ म बताये गे।  नानात्मज रोगों बारा म ये अध्याय म व्याख्या होली।  यथा ८० प्रकार क वात रोग , ४० प्रकारक पित्त रोग अर २०  बीस प्रकारक कफ रोग छन।३-१०।   
 
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८० वात (वायु ) विकार
 
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 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  बीसवां      अध्याय  (  महारोगाध्याय  )   पद  ११
  अनुवाद भाग -  १५९
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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पैल वात जन्य रोगुं  बात करे जाय।  जनकि - नंगुं टुटण , खुट फटण , खुटुं पीड़ा , पादभ्रंश , खूट सीण , वातखुड्डका , गुल्मग्रह , पिंडलियुं म ऐंठन , गृधसी , जानुभेद अर जानुविश्लेष , उरूस्तम्भ, उरसाद , पंगुला, गुदभ्रंस , गुदार्ति, वृषणोंत्क्षेप (अण्डकोशक मथि खैंच्यांण )  , शिश्नम खिंचाव , वंक्षण म मल रुकावट , पूठ छल  फटण , मलभेद , उदावर्त, लंगड़ापन , कुबड़ापन , नाटापन , तीकरग्रह , पृष्ठग्रह, पंसलीयुं  पीड़ा ,
पेटम मरोड़ , हृदय मूर्छा , हृदय धड़कन बढ़ण , छाती पीड़ा , छातीक रुकण , हथ सुकण , गौळ अकड़न , घाटै (गळा नस ) अकड़न (मन्यास्तम्भ ) , स्वरभंग, मुख  (जबड़ा ) खुलाक खुला रौण, ओंठ फटण , दांत टूटण , दांत शिथिलता , गूंगापन , वाणी रुकण , मुखम कसैलापन , शुष्क मुख , स्वादौ ज्ञान नि हूण , गंध ज्ञान अभाव , घ्राणशक्ति म अभाव , कन्दूड़ वेदना , कन्दूड़ नि सुणेन , उंचो सुण्याण , बैरोपन , जड़ पलक , पलक संकुचित हूण , शंख , कनपटी फटण , कपाळ फटण , मुंड पीड़ा , बाळुं भूमि फटण , आर्दित वात , एकांग रोग , सर्वांग रोग , पक्षाघात , आक्षेपक , दंडापतनक , थकान , चक्कर आण , कम्पन , विषाद , जम्माइ , चिंता , अति प्रलाप , ग्लानि , रुक्षता , कर्कशता, लाल लाल रंगै चमक , निंद नि आण , काच रोग , आँखुंम वेदना , आंख्युं पलटेण, भ्रुवों संकुचित हूण , अस्थिर चित्त , यी ८० (अस्सी ) प्रधान वात  विकार छन।  वात  विकार असंख्य छन िखम मुख्य वात विकारुं बात  ह्वे।  ११। 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २४०   बिटेन   २४१  तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद
 

Bhishma Kukreti

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वात /वायु रोग निदान

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  बीसवां      अध्याय  (  महारोगाध्याय  )   पद  १२  बिटेन  १३  तक
  अनुवाद भाग -  १६०
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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इखम बतायां या नि बतायां वातविकारोंम अपण स्वाभाविक कर्मोंन , अर अपण लक्छणोंन पछ्याणि वायुक एक भाग देखिक संदेहरहित ह्वेक कुशल  चिकित्स्क वातरोग तै पछ्याणदु।  यी यी छन जनकि - रुक्षता (रूखापन ) , हळकोपन , विशदता , शीतलता , गति , अदृश्यत्व, यी वायु स्वरूप छन।  वायु क कर्मों से पछ्याणक - शरीर क जै भागम वायु आश्रय लींद , खसकण , दूरखसकन (भ्रंश ) , विस्तार , हर्ष , विषाद , तीस , मर्दन की पीड़ा , आवर्त्तन, हलणै -चुबणै पीड़ा , चेष्टा आदि कम्पन , कर्कशता , कठोरता , पृथक्करण , दुंळ करण , लाल रंग , कषैला रस, मुख की विरसता , सुख्यूं मुक , डा , शून्यता , संकोच , जड़ता, लचकण आदि वायु कर्म छन।  यूं लक्छणों तै वात रोग समजण चयेंद। ये वायु रोग की मधुर , अम्ल , लवण , स्निग्ध व उष्ण क्रियाओं से चिकित्सा करण  चयेंद। स्नेहन , स्वेदन ,आस्थापन , अनुवासन , नस्य कर्म , भोजन , मर्दन , उबटनलगाण , परिषेक स्नान आदि वात  विरोधी कर्मों तै  मात्रा , प्रकृति , काल का हिसाब  से प्रयोग करण  चयेंद।  यूं सब कर्मों म वैद्य लोक वस्ति अर आस्थापन (स्नेहवास्ति )  तै अधिक महत्वपूर्ण मणदन।  यी शीघ्रता से पक्वाशाय म पौंछि वायु तै जड़ से खत्म कर दींद।  इन अवस्था म वायु क पूर्ण शांत नि  हूण पर बि सरैलो भितर वायु शांत ह्वे जांद।  जन वनस्पतियों म जड़ नाश से पट्टी , फूल , फल कु नाश अवश्यम्भावी हूंद।  १२ - १३
 
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*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  २४१   बिटेन  २४२   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम
 
चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली  , चरक संहिता का प्रमाणिक गढ़वाली अनुवाद , हिमालयी लेखक द्वारा चरक संहिता अनुवाद , जसपुर (द्वारीखाल ) वाले का चरक संहिता अनुवाद

Bhishma Kukreti

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४० पित्तजन्य विकार
 
चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद   
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  बीसवां      अध्याय  (  महारोगाध्याय  )   पद  १४   बिटेन   तक
  अनुवाद भाग -  १६१
गढ़वाळिम  सर्वाधिक पढ़े  जण  वळ एकमात्र लिख्वार-आचार्य  भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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अगनै पित्तजन्य रोगुं छ्वीं लगौला - पित्त विकार - निकट की आगक तैंचि , जळणो जलन , जळण , सब अंगों म जळण जन धक -धक , धुंआ जन वमन आण , खटास , जलन , शरीर भितर  गरमी , अंगों म दाह (गरमी ) , अधिक पसीना आण , बगल म पसीना आण , अंगुं  बिटेन दुर्गंध आण , लाल हौर  रंग हूण , अंगुं फटण , रक्त म बदबू , मांस म बदबू , त्वचा जलन , मांस जलण , त्वचा -मांस फटण, ऊपरी त्वचा फटण , लाल लाल फुंसी (घमौरियां ) , नकसीर /रक्तस्राव , लाल लाल चकते , झाईं , बगलक मांस  फटण , मुख म कामला /कटुता , मुख बिटेन दुर्गंध आण , बिंडी तीस  लगण , भोजन म अतृप्ति;  मुख , गळ, गुदा , शिश्न अर आँख पकण ; ऊर्जा नाश , आँखूं  समिण  अंध्यर , मल मूत्र क हौर या पीलो  हूण।  यी ४० चालीस पित्तजन्य मुख्य रोग छन।  उन पित्तजन्य रोग असंख्य छन यी मुख्य छन।  १४। 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   २४२  बिटेन   २४३  तक
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