Author Topic: चरक संहिता का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Charak Samhita  (Read 786 times)

Bhishma Kukreti

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यवागू (लापसी , खिचड़ी ) क रोग नाशम प्रयोग  -१

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

  (महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  दूसरो  अध्याय १७  बिटेन  - २७  तक
  अनुवाद भाग -   २१
अनुवादक - भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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 यांक अगवाड़ी यवागू से भल हूण  वळ  बनि  बनि क रोग अर नाश पर नाना प्रकार की औषधियों से सिद्ध यवागू बारा  म बुले जाल।  १७
पिप्पली , पिप्पली मूल, चविका/पहाड़ी पिप्पली, चित्रक , सोंठ से बणायिं  यवागू अग्निवर्धक व शूलनाशक हूंदी।  १८ । 
कैथ , बेलगिरी गूदा , चांगेरी , तक्र (छांच ), दळिम ,  से बणायिं यवागू पाचनी (पचाण वळि )  अर ग्रहणी (मल रोकु )  हूंद।  पंच मूल ( शाल पर्णा , प्रिश्नि पर्णी , कटेरी , बड़ी कटेरी , गोखरू ) से सावित यवागू वातविकार म उपयोगी हूंद।   १९  । 
शालपर्णी , खरैंटी , बेलगिरी , पीठापर्णी से बणाई अर अनार से खट्टी  हुयीं   यवागू  पित्त -शेष्म व अन्य अतिसार रोगम  हितकारी च। २० ।
 बखरा दूध, दूध  से अद्धा पाणि ये म मिलैक , नेत्रवाला, कमलगट्टा , सोंठ , पिठवन ये  चार औंस लेकि यवागू सिद्ध करण  चयेंद।  यु यवागू रक्तातिसार नष्ट करदी।  २१ । 
अतीस , सोंठ , का  चूर्ण से छह गुणो पाणि से यवागू सिद्ध करण  , ये तै अनार से खट्टो करण से रक्तातिसारम द्यावो। मूत्र कृच्छ रोग म गोखरू अर कटेरी क चूर्ण से छह गुणो पाणि म यवागू सिद्ध करी एमा फणित ( राव या अधपकयूं गुड़ ) डाळ द्या।  २२ । 
विडंग , पिप्पलीमूल, सहजन, अर मरिच  क चूर्ण से छह गुणा सिद्ध हुईं यवागू म सुवर्चिका लूण , डाळी रोगी तै दीण से कृमि नष्ट हूंदन।  इखम पाणि स्थान म छांच प्रयोग करण चयेंद। २३ ।
द्राक्षा , अनंतमूल , खोलें /लज्जा , पिप्पली /लौंग , सूंठ कु  चूरा क पाणिम मिलैक  क्वाथ तै यवागू दगड छह गुणा  पाणि म पकावो।  ठंडो हूण पर शहद मिलाण से तीस संतुष्ट हूंद ।  सोमराज जी से सिद्ध हुईं यवागू विषघ्नी (खयों विष )  नष्ट करदो।  २४ । 
सुंगरौ मांश रस म यवागू सिद्ध करण  से यवागू पुष्टिकारक हूंद।  भुन्यां ग्युं सत्तू  से बणी यवागू मोटापा कम करद।  २५ । 
घी वळि , टिल युक्त लुण्या  यवागू स्निग्ध हूंद।  सरैल तै स्निग्ध करदी।  तिलों दगड कुछ चौंळ  मिलाओ , यवागू सिद्ध करीक ये म लूण डाळो।  कुशक जलड़ , औंळा फल को चूर्ण तै छह गुणा पाणिम मिलैक क्वाथ बणाइक म श्यामक चौंळ सिद्ध कारो तो यु यवागू सरैलम  रुक्षता उतपन्न करदी।  २६ । 
दशमूल  (शालपर्णी , प्रिश्नपर्णी , कटेरी , वृहती, गोखरू, बिल्व, श्योनक, अरणी , गंभारी , पाठा ) से सिद्ध हुयीं यवागू खासू , हिचकी , स्वाश अर कफ रोग दूर करद।  समान रूप से घी व तेल म भुनीं यवागू म पाणि स्थान पर मदिरा प्रयोग से सिद्ध यवागू पक्वाशय पीड़ा शांत करदी।  २७ । 



*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charka  Samhita,  First-Ever Garhwali Translation of Charak Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charak Samhita


Bhishma Kukreti

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यवागू (लापसी , खिचड़ी ) कु  रोग नाशं महत्व - २
चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

  (महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  दूसरो  अध्याय  २८  बिटेन  - ३५ तक
  ड़ो मांश म सिद्ध भाग -   २२
अनुवादक - भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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 हरी भुज्जि , मांश ,तिल  , उड़द , यूंको चूरा , या क्वाथ से सिद्ध यवागू मल भैर  करदी।  फळिंडो दाणी (जामुन गुठली ) , आमौ हड्यल (आम गिरी ), कच्चो कैथ , कच्चा बेलगिरी से सिद्ध यवागू स्तम्भक याने  रक्तस्राव वळ मल रोकू हूंद।  २८
जवाखार, चित्रक , हींग , अमलवेत से सिद्ध यवागू मल तै भेदन करी  भैर करदी।  जंगी हरड़ , पीपल  मूल अर सोंठ से सिद्ध यवागू कफ वाट आदि रोगोंपरिपाक करी मल तै भली भाँती भैर करदी।  २९
छाच म सिद्ध करीं यवागू घी बिंडी  खाण से हुईं विकार नष्ट हूंद।  छाच अर  पिय्याक (खल )   म सिद्ध करीं  यवागू  अधिक तेल खायउँ विकार म दिए जांद।  ३०
गौड़ी मांस म सिद्ध करीं यवागू तैं अनार , औंळा क  खटै  मिलाण से विषम ज्वर मिट जान्दो।  सामान जौ अर घी तेल म भुनीं पीपली अर औँळा का चुरा या क्वाथ म सिद्ध करीं यवागू  कंठ विकारों म हितकर च।  ३१
कुखड़ो मांस  रसम   सिद्ध करीं यवागू शुक्र मार्ग पीड़ाम हितकारी हूंद। पाणी स्थान पर दूध अर घी , उखमा उड़द दाळ या पीठ तैं  घी व  दूध म  सिद्ध यवागु  शकर वृद्धिकारक हूंद।   ३२
पोइ  चूरा दही पाणिम  सिद्ध यवागू धतूरा मद  व अन्य मद समाप्त करणम हितकारी हूंद। चिरचिटे  चौंळ  दूध अर  छिपड़ु  मांश म सिद्ध यवागू भूक नाश हूंद। उखम जल व  सामान्य चावल प्रयोग नई हूंदन।  ३३

 ये अध्याय म २८ प्रकारौ  यवागू बुले गेन अर   पंचकर्म   (वमन , विरेचन , नस्य , आस्थापन , अनुवासन ) योग्य औषदि भी बताये गेन।  मूलनि फलनि वार्ता पैल  अध्याय म ह्वेई गे।  ३४, ३५

*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

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आरग्वधीय का छह योग से रोग नाश

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

  (महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  तीसरो   अध्याय  / आरग्वधीय अध्याय ,  १  बिटेन  - तक
    अनुवाद भाग २३
अनुवादक - भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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 अब आरग्वधीय अध्याय की व्याख्या करला।  इन भगवान आत्रेय न बोलि, अध्याय आरम्भ आरग्वध से ह्वे ,  इलै ये अध्याय नाम  आरग्वधीय च।  १, २
आरग्वध से लेकि सर्ज तक यूँ तीन श्लोकों म छह योग छन। , यूं  तैं  गौड़ी पित्त दगड़ पीसिक काम म लाण  चयेंद - १- अमलतास , पनवाड़ , छुट  करंज, वासा पत्ता , गिलोय , मैनफल, हल्दी अर दारुहल्दी ,२ -  विरोजा , देवदार , खैर , धावन , नीम पत्ते, विडंग , कनेर कु     बक्कल छाल, ३- भोजपत्रे  गाँठ , ल्यासुण , सिरस  बक्कल ,   जटामासा , गूगल , कृष्ण गंधा , ४- मरवा , इंद्र जौ ,  सातवन , कूठ , चमेली कुंगळ पत्ता , ५- वच , हरेणु/मेंहदी बीज, निशोथ , जमालगोटा, भिलावा , गेरू , रसांजन , ६- मनशिला , हरिताल , घौरs धुंवासा /म्वास , छुटि इलाइची , कासीस फूल , पठानी लोध , अर्जुनौ  बक्कल ,   नागरमोथा , सरज्ज /राल। 
यूं मादे एक योग तै  चूरण  बणैक गौड़ी पित्त  दग्ड़ पीसण , तब ये मिश्रण तै राय तेल म मिलैक द्रव रूपम लगाण  से कुष्ठ रोग , नयो किलास , बाळ झड़न , कुष्ठ भेद , दाद , भगंदर , चर्मकील , निपकण्या गाँठ , खाज शीघ्र नष्ट हूंदन।  ३-७

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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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Bhishma Kukreti

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कोढ़ , दाद , खज्जि , फुन्सियों   आदि कुण  औषधि


चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

  (महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  तीसरो अध्याय  / आरग्वधीय  अध्याय,  ८  बिटेन  - १७ तक
  अनुवाद भाग -   २४
अनुवादक - भीष्म कुकरेती

  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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कूठ , दारू हल्दी -हल्दी , तुलसी , प्रबल /लमिंड, नीम पत्ता , अश्वगंधा, देवदारु, सहजन, सफेद राई , धनिया, कैवर्त्त  मुस्ता , चोरक यूं 15 औषधियों तैं  सामान परिमाण म चूरा क्रीक मिलाण चयेंद।  पुनः ये मिश्रित चूरा तै छल म पीसिक सरैल पर लगाण  चयेंद।  उबटन से पािल सरैल पर तेल लगाण।  ये उबटन से खज्जि , छुटि छुटि फुंसी , नि दबण वळ फुन्सी , कोढ़ , सूजन आदि नष्ट ह्वे  जांदन।  ८, ९
कूठ , गिलोय , नीला थोता , दारू हल्दी , कशिश , कमीला , नागर मोथा , पठानी लोध , कल्हार पुष्प , राल , मैनशिल , हरताल , कनेर छल , यूं १४ /चौदह  औषधियों चूर्ण तैं  सरैल पर घुषणो दीण चयेंद।  घुसण से पािल तेल मालिश आवश्यक च।  यांसे दाद , खाज , कोढ़ , किटिभ /जूं , कोढ़ , पामा विसर्प , विचर्चिका, स्राव युक्त फुन्सी , नष्ट ह्वे  जांदन।  १०, ११
 मनशिल , हरताल , मरिच , लया तेल , आक को दूध , मिलैक लेप लगाण से कोढ़ समाप्त हूंद। िखम सब कुछ मिश्रण आक   को दूध म हूंद ना कि  पाणि म ।  नीला थोता , विडंग ,काळी  मरिच , कूठ , पठानी लोध , मनशिल , का चूर्ण तेन आक का दूध म मिलैक लगाण  चयेंद।  १२
रसौंत , पनवाड़ बीज , यूँ तै कैथ का पत्तों रसौ  दगड़ मिलैक लगाण से कोढ़ नष्ट हूंद।  पाणि  नि  मिलाण।  नाटो करंज बीज, चक्रमर्द , अर कूट तै गोमूत्र म मिलैक  कोढ़ रोग मुक्त हुए जांद। ।  १३
हल्दी -दारु हल्दी , कुट्ज बीज , करंज बीज , चमेली कुंगळ पत्ता , कनेर की भितरौ  बक्कल , टिल नाल भष्म , लगाण से कोढ़ मिटदो।  १४
मनशिल , कुट्ज  छल , कूट , जटामांसी , चक्रमर्द , करंज , भोजपत्र ै गाँठ , कनेर मूल, यी आठों द्रवों तैं द्वि द्वि  तोला लेकि तुषोदक एक आढ़क अर धाक जळाण से  उतपन्न रस एक ाधक (8 सेर )  पाक करण  चयेंद।  पाक इथगा तक करण चयेंद कि कड़छी पर चिपकण लग जाव।  ये द्रव कु लेप से कोढ़ नष्ट हूंद। १५ , १६
अमलतासौ पत्ता , मकोय पत्ता , कनेर पत्तों छल , पीसिक लेप तै सरैल पर घूसिक कुष्ठ रोग नष्ट हूंद। १७


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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , कोढ़ , त्वचा रोग , फुंसियों हेतु औषधियां
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charka  Samhita,  First-Ever Garhwali Translation of Charak Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charak Samhita, Ayurveda Medicines for Lepracy , Skin diseases

Bhishma Kukreti

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वात विकार  व वातरक्त विकार म  औषधि
चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

  (महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  तीसरो अध्याय  / आरग्वधीय  अध्याय,  18  बिटेन  -२२  तक
  अनुवाद भाग -   २५
अनुवादक - भीष्म कुकरेती

  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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झाड़ीदार बेर /केर , गहथ , देवदारु , रात्ना , उड़द , अलसी , अरंडी बीज , कूट , बचा , सौंफ ,यवचूर्ण यूं  तेन अम्ल का दगड़  पीसिक प्रलेप बणाइक , गरम कौरी वातरोगी कुण प्रयोग कारो।  १८
जलप्राप्य प्रदेश  का जानवरों मांश , माछों मांश , यूंसे बणायूं वेसवार ( अस्थि रहित मांश तै  भाप म पकाइक।  सिलवट म पीसिक  तब  येमा गुड़ , घी , पिप्पली , मरिच मिलाण  से बणदु ) तै गरम करिक लेप से वायु रोग दूर हूंद। घी तेल , वासा ार मजा का स्नेहों तैं  दशमूल या चंदन आदि सुगंधित द्रव्य  दगड़  मिलैक लेप से वातविकार नष्ट हूंद।  कै बि रूपम पाणि  प्रयोग बर्जित हूंद  १९
जौक आटो क यवखार तै छाच म पीसिक पुटुक पर लगैक पीड़ा नष्ट हूंद। कूट , सौफ , बच , जौ तै  तिल  तेल ार कांजी /अम्ल म मिलैक लेप से वातविकार नष्ट हूंदन।  २०
सौंफ , सोया , मुलेठी , महुवा , खरैंटी , प्रियाल /पयाल , कशेरु , गौड़ी घी , विदारी कंद , खड़ी शक़्कर पाणि दगड लेप बणायिक प्रयोग से वातरक्त रोग म लाभ हूंद ।  २१
रात्ना , गिलोय , मुलेठी , खरैंटी अर अतिबला , जोक्क , ऋषभक , गाय दूध , गाय घी ,मधुशेष याने मधुमखियों निर्मित  माोम सिद्ध कर्युं लेप वातरक्त रोग म लाभप्रद हूंद।  २२

*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charka  Samhita,  First-Ever Garhwali Translation of Charak Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charak Samhita , चरक संहिता में वात विकार  व वातरक्त विकार म  औषधि , आयुर्वेद में वात विकार  व वातरक्त विकार म  औषधि

Bhishma Kukreti

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मुंड पीड़ा अर रीढ़ पीड़ा  कुण शांति निदान

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  (महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  तीसरो अध्याय  / आरग्वधीय  अध्याय,   २३ बिटेन  २५ - तक
  अनुवाद भाग -   २६
अनुवादक - भीष्म कुकरेती
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तगर , उत्पल (नीलो कमल ) , चंदन,  कूठ , का मिश्रित कर्ण तेन घी म मिलैक मुंड पर लगैक मुंड -पीड़ा म लाभ हूंद।  २३
पुण्डरीक काष्ठ , देवदारु , कूठ , मुलैठी , इलायची , सफेद कमलगट्टा  , नीलो कमल गट्टा , अगर, रोहित घास , पद्मक , चोरक , तै घी म मिलैक मुंड पीड़ा म शांति मिलदी।  पीसणो पाणी मिलाण।  २४
रास्ना , दारू हल्दी , हल्दी , जटामांसी , सौंफ अर सोया , देवदारु , मिश्री , जीवंती मूल, को चूर्ण तै घी , तिलो तेल (समान  मात्रा )  , ग्राम करिक पार्श्व शूल (रीढ़ पैथरो भाग, Lateral  Spine  ) म लेप करण चयेंद। २५

 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस
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चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद, चरक संहिताम  सर पीड़ा , पार्श्व शूल पीड़ा निदान
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  फुक्यूं  , विष , त्वचा जलन आदि  निदान


चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

  (महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  तीसरो अध्याय  / आरग्वधीय  अध्याय,  २६  बिटेन  - तक
  अनुवाद भाग - २७   
अनुवादक - भीष्म कुकरेती

  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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सिंवळ  (शैवाल ) , कमल , नीलो कमल , लोटी बेत , कमल केशर , पुण्डरीक , खस , पठानी लोध , प्रियंगु पुष्प , हरी  चंदन , चंदन तै पाणिम पीसिक , सब द्रव्यों सामान घी म मिलैक लेप करण  से त्वचा क अग्नि डाह को डा ( दुःख  ), जळन शांत ह्वे जांद।  २६
श्वेत दूध , प्रियंगु , जल बेतस , मुलैठी , नीलो कमल , दुबल , घमासा जड़ , दाभ (कुश ) ,कोश  मूल, बालक, होगला पाणि  दगड़ पीसिक , मलम लगाण  से त्वचा जलन शांत हूंदी।  २७
छड़ीला , इलायची , अगर , कूठ, चोर पुष्पी , तगर , दालचीनी , देवदारु , यूं तै पाणिम पीसिक  मलम प्रयोग से शीत /ठंडक शांत हूंद।  सीरीस सँभालु पत्तों दगड पीसिक मलम से  विष दोष नष्ट हूंद।  २८ 
सिरस , खस , नागकेशर , पठानी लोध , चूर्ण सरैल पर घुसण  से त्वचा रोग व पसीना आण म प्रयोग हूंद। तेजपात , नेत्रवाला , पठानी लोध खस, श्वेत चंदन पाणि दगड़ पीसिक लेप से सरैल गंध नष्ट हूंद।    २९
सिद्ध अर ऋषियों से पूजित कृष्णात्रेय पुनर्वसु न रोगो तै नष्ट करण  वळ ३२ सिद्ध योग जगत का वास्ता लाभौ कुण ब्वाल।  ३०
                    इति आरग्वधीय अध्याय समाप्त (तीसरो अध्याय समाप्त ) .

 
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संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान 
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charka  Samhita,  First-Ever Garhwali Translation of Charak Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charak Samhita


Bhishma Kukreti

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षड विरेचन (६०० विरेचन तंत्र /  व क्वाथ पद्धति )

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

  (महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  चौथो अध्याय  (षडविरेचन ) ,  १  बिटेन  12 - तक
  अनुवाद भाग -   २८
अनुवादक - भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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एक अगनै 'षडविरेचन' से आरम्भ करण वळ अध्याय का अवतरण करदां।  भगवान आत्रेयन  बोली।  १, २।   
ये तंत्र म छह सौ विरेचन योग छन ना कम ना अधिक। 
(विरेचन' शब्द उभय अर्थी  च।  सरैल को  अधो (तौळ )  भाग से मल नि: सारण को नाम बि विरेचन च तो  उर्घ्व (मथि जिना ) भाग बिटेन   वमन रूप संसोधन  रुपया कर्म कुण बि विरेचन बुले जांद)।   
विरेचन द्रव्यों छह आश्रय छन - दूध , मूल , त्वचा /बक्कल ) ,पत्ता , पुष्प अर फल।
कषायों  पांच जाति  छन ,(लूण छोड़ि ), कषायों की कल्पना पांच प्रकारै  च।  पचास महाकषाय छन अर पांच सौ कषाय छन।  यु संक्छेप म बोली आल।  ३। 
छह सौ विरेचन योग छन।  इखम संक्छेप म बुले जाल।  विस्तार से कल्प उपनिषद म बुले जाल। ४  । 
मदन फल का कल्प म १३३ विरेचन योग , बन्दाल का कल्प म ३९ , कड़वी तुम्बी कल्प म ४५, पीला फूल वळि  तोरी  /गुदड़ी  कल्प म ६० , कुट्ज फल कल्प म १८ , कडुई तोरी म विरेचन ६० योग , यी वमन विरेचन का योग छन।  अब अधोगामी (तौळ ) विरेचन योग्य  योग बुले जाल - श्यामा मूल (निशोथ ) अर त्रिवृत्त  (सफेद निशोथ ) का ११० योग , अमलतास का १२ योग , लोध विधि का १६ योग , महावृक्ष  कल्प मा २० , शिकाकाई क ३९ , अर जमालगोटा कल्प का ४८ योग छन।  ये प्रकार से ६०० विरेचन योग बणदन।  ५। 
विरेचन क्रिया औषध्यूं  छह आश्रय छन - दूध , मूल, बक्कल /त्वचा , पत्ता , पुष्प अर  फल।  ६। 
कषाय (क्वाथ ) की जाति  छन -  मधुर कषाय (मिठ रसों से बण्युं ), अम्ल क्षय खट्टा रसों से बण्युं ), कटुकषाय (कड़ो रसों से बण्युं ), तिक्त कषाय (तीखो रसों से बण्युं ), कषायकषाय (कसैला रसों से बण्युं ) यूँ पाँचों तै ये तंत्र म कषाय बुल्दन।  पर लूण रस से कषाय  नि  निर्मित हूंद।  ७।
क्वाथ /कषाय तैयार करने पांच विधि छन - स्वरस  क्वाथ, कल्क /चूर्ण  क्वाथ /कषाय ,  शृत क्वाथ, शीत क्वाथ , फांट  क्वाथ।  ८। 
स्वरस क्वाथ - यंत्र या हाथ से दबैक जो रस आंदो वो स्वरस हवाई। रस रहित द्रव्य तै पत्थर आदि म पीसिक जु बणदु  (चूर्ण या आटो ) वो कल्क बुल्दन।  आग म उबाळि जु बणदु  स्यु शृत ह्वे।  भौत गरम जलम  रात भर कुट्यु द्रव्य से जु क्वाथ बणदु  स्यु शीत अर  द्रव्य तै कूटिक पाणिम धरिक  फिर मीनदीक जु किट्ट रहित सार  मिल्दो वाई तैं  फांट बुल्दन। ९-११। 
 यूंमा स्वरस म कल्क से बिंडी , कल्क म शृत से बिंडी, शृतम शीत से बिंडी , शीत म फांट  से बिंडी  सामर्थ्य व शक्ति हूंद।  इलै कषाय कल्पना समय रोगी क सामर्थ्य  देखि  विचार - व्याधिबल , आतुरबल /रोगी सामर्थ्य बल   अनुसार करण चयेंद।  यी सब क्वाथ सब सवस्थाओं म उपयुक्त नि  हूंदन अर्थात  बलवान रोग/ बलवान रोगी  म  अल्प  बलीय क्वाथ  या मध्य बलीय    लाभकारी नि होंद।   इनि , अल्प बल की अवस्था म अधिक रस क्वाथ समर्थ नि  हूंद।  १२। 

 
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान 
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charka  Samhita,  First-Ever Garhwali Translation of Charak Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charak Samhita


Bhishma Kukreti

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500 महाकाषाय/ क्वाथों  व्याख्या

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

  (महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )
 खंड - १  सूत्रस्थानम , चौथो अध्याय ,  १३ 
  अनुवाद भाग -   २९
अनुवादक - भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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पैली  जु बुले गे  वु पचास महा काषाय  (क्वाथ ) छन।  अब ऊंकी  व्याख्या करदां।  जनकि -
जीवनोकुण हितकारी,  देह पर घुसणो  कुण , भेदण लैक ,  संघानीय (योग /जुड़ण लैक ,)  , दीपनीय (अग्नि वर्धक ) , वळ छह काषायों /क्वाथों एक वर्ग हूंद ।
बलकारी , शरीर  कांती /चमक बढ़ाण  वळ, गौळ स्वच्छ करण वळ (स्वर हेतु ) ,   मनs  कुण, यु चार कषायुं  कु  दुसर क्वाथ वर्ग ह्वे। 
तृप्तिघ्न (जब रोगी खली पेट हो किन्तु लग बल पुटुक भर्यूं  च। तैं दूर करण वळ  ), अर्श/बवासीर   व्याधि म  हितकारी , कोढ़ नाशक , खज्जि नाशक , कृमि (कीड व वाइरस आदि ) नाशक व विष विनाशक यी छै  कु तिसर क्वाथ वर्ग।
दूध वर्धक , दूधौ शुद्धिकरण , शुक्र /वीर्य  वर्धक , शुक्र शुद्धिकरण , म  हितकारी  क्वाथ यु चौथो  चारुं क्वाथ वर्ग च। 
मल बंध करण  (दस्त रुकणम)  हितकारी,  दोष का कारण जब मलम उचित रंग नि  आवो तब हितकारी, मूत कमकरण  वळ , मूतौ रंग सुधारण वळ , मूत्रवर्धक , यु पांच क्वाथों  पंचों वर्ग।
कासु हर (कसु हरण वळ ) , श्वास हर ( दमा  हरण वळ ), सूजन कम करण , ज्वर नाशी , श्रम  (थकावट ) हर , यी पांच कु छटों  क्वाथ वर्ग च।
जलन हारी , शीत हारी , त्वचौ  चक्कत्ता  हर्ता ,  अंगों ऐंठन  हारी ,  यी पांच क्वाथों वर्ग।
रक्त रोधक (ल्वे रोकू ), पीड़ाहारी , चेतना लाण वळ , संतति जनक , आयु वर्धक जन पांच से बण्युं  क्वाथ वर्ग।
ये अनुसार पचास महा क्वाथ बणदन।  क्वाथों लक्षण अर उदारण  संक्छिप्त म दिए गेन।  एक एक महा काषाय म दस दस अवयव वळ कषायों छ्वीं  अगवाड़ी करला।  इन अनुसार ५०० कषाय बणदन।  अर्थात जेवनीय  पचास कषायों  का दस दस अवयव वळ कषाय /क्वाथ छन।  १३।   
 
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

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 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Chark, क्वाथों की व्याख्या , कषायों की व्याख्या

Bhishma Kukreti

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वेदनास्थापन, वीर्यवर्धक , छेदक, भूक वर्धक , लेखनीय , संघनीय   पादप सूची

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

  (महर्षि अग्निवेश व दृढ़बल प्रणीत  )
 खंड - १  सूत्रस्थानम , चौथो अध्याय (षडविरेचन ) ,   बिटेन  - तक
  अनुवाद भाग -   ३०
अनुवादक - भीष्म कुकरेती
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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वेदनास्थापन - शरीरै वेदना मिठैक सरैल तै स्वस्थ कर्ण वळ ह्वे वेदनास्थापक -
जन - जीवक, ऋषभक, मेदा, महामेदा, काकोली , क्षीरकाकोली , मुद्गपर्णी/मूंगपर्णी  , माषपर्णी /उड़दपर्णी , जीवन्ति , मुलैठी,  यी दस जीवनवर्धक छन। १  । 
क्षीरबिदारी , दूधी, खरैंटी, काकोली, क्षीरकाकोली , कंधी, उलटकंबल /भारद्वाजी, विदारीकंद , ऋष्यगंधा, यी वीर्यवृद्धिकारक छन। २ ।
नागरमोथा , कूट , हल्दी, वच , अतीस, कुटकी, रोहणी, चित्रक, करंज, सफेद वच  यी दस  लेखनीय  छन।  ३ । 
निशोथ ,  आक , एरंड , कलिदारी , जमालगोटाजड़ , चीतामूल /चित्रक , कर्ज , शंखनी, कटुकी, अर सत्यानाशी भेदक /छेदक (विशेषत: मल छेदक)। ४ ।   
मुलैठी, गिलोय, पिठवन , पाठा, मजीठ, सिमळो गूंद , धाय पुष्प , पठानी लोध , प्रियंगु पुष्प, कटूफल यी  संघनीय अर्थात कै अन्य दगड़  प्रयोग वळ  पादप छन।  ५ । 
पिप्पली , पिप्पलीमूल, चविका, चीतामूल, जवाण/अजवाइन,  भीलव बीज , हींग, यी दीपनीय/अग्नि वर्धक  (भूक वृद्धिकारक ) छन।  ६
यूँ छह से बण्यूं   क्वाथ वर्ग च।  १ । 

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