Author Topic: चरक संहिता का गढवाली अनुवाद , Garhwali Translation of Charak Samhita  (Read 1348 times)

Bhishma Kukreti

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  इन्द्रियां (आंख , नाक , जीब ,लुतुक, कंदूड़ ) अर मन,  बुद्धि व आत्मा विचार   
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

 
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अटों  (इन्द्रियोपक्रमणीय )  अध्याय ,  १   बिटेन  -१८  तक
  अनुवाद भाग -   ६१ 
गढ़वालीम  सर्वाधिक  अनुवाद करण  वळ अनुवादक  - आचार्य  भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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आहार अर  'स्वस्थ -चतुष्क'  बुलणो  उपरांत  'इन्द्रियोपक्रमणीय 'नामौ अध्याय क व्याख्यान करे जाल जन भगवान आत्रेय न बोली छौ।  १-२ । 
ये आयुर्वेद प्रक्रमणम पांच इन्द्रिय छन।  पंचि इन्द्रियोंक ग्राह्य द्रव्य छन। पांच इ इन्द्रियों अधिष्ठान छन।     पंचि इन्द्रियोंक अर्थ पांच प्रकारो च , पांच प्रकारो ज्ञान छन इन पूर्व ज्ञानियोंन  बोली छौ । ३। 
मन इन्द्रियों अतीन्द्रीय या सूक्ष्मतम रूप च।  एइ मन तै सत्व बुल्दन।  कुछ मन तै चित्त बुल्दन।  यु मन अपण विषय अर आत्मा की श्रेष्ठता का  अधीन  च, ार इन्द्रियों चेष्टा कारण च।  अर इन्द्रियों चेष्टा व्यापर व प्रतीति का कारण मन ही च।  ४। 
वास्तवम मन एकि  च , किन्तु इन्द्रियों अपण अपण द्रव्य म विषयो संकल्प परिवर्तन होण से एक पुरुषम अनेक मन अनुभव हूंदन।  वास्तव म मन एकि च अनेक ना।  किलैकि एकि  समयम एक मन अनेक इन्द्रियों म प्रवृत/झुकाव नि  ह्वे सकद इलै  एकि  समय सब इन्द्रियों  क प्रवृति चेष्टा नि  हूंदी।  ५। 
जै  गुण ( सत्व , रजत , तमस )  वळ   मन बार बार अनुसरण करद, मुनि जन मन तै वै  इ  गुण  वळ  बतांदन।  किलैकि जै गुणै  अधिकता होली वै गुणो  मन बि  होलु।  ६। 
इंद्रियां  मन तै संग लेकि  इ विषय (गंध , स्वाद , दृश्य ,श्रवण  आदि ) ग्रहण करण म समर्थ हूंद।  मन रहित इंद्रियां  विषय ग्रहण नि  कर सकदन।  ७। 
आँख , श्रोत्र /कंदूड़ नाक , जीब , त्वचा यी पांच इन्द्रियां  छन।  पांच इन्द्रियों पांच ग्राह्य विषय छन  अर आकाश अग्नि , जल अर पृथ्वी।  इन्द्रियों पांच  अधिष्ठान छन  अर चक्षु गोलक द्वी , द्वी भैरक कंदूड़ , जीब , द्वी नासिका /नकध्वड़  अर लुतुक /त्वचा।  इन्द्रियों पांच विषय छन -शब्द , स्पर्श , रूप ,रस अर  गंध।  इन्द्रिय ज्ञान बि  पांच प्रकारौ  हूंद -,   चक्षु ज्ञान , श्रोत्र ज्ञान , गंध ज्ञान , रस ज्ञान व स्पर्श ज्ञान।  ८ - ११।
यूं  पंची  इन्द्रियों विषय , मन व आत्मा यूंको एक दगड़ संयोग हूण  से उतपन्न  हूंदन।  यु स्थायी ज्ञान च।  ये दृष्टि से यी पांच पांच पदार्थों समूह छन।  १२। 
मन , मन अर्थ , बुद्धि अर  आत्मा यी आध्यात्म द्रव्यों अर गुणों संग्रह छन।  अर जु कर्म द्रव्य म आश्रित च वैतै क्रिया बुल्दन।  शुभ द्वी लोकोंम कल्याणकारी (मन व भौतिक संसार )  ,  अशुभ निन्दित, प्रवृति अर निवृति यी  कारण छन। १३। 
अनुमान द्वारा जणण योग्य इन्द्रियां पंचभूतों के विकार समुदाय से उतपन्न हुईं छन , तो भी तेज आँखुंम श्रोत्रों म आकाश, पृथ्वी  गंधम ,  जल रसम अर वायु त्वचा म विशेष रूप से रौंदन।  १४। 
यूंमा  जु जु इन्द्रियां जै  जै  भूत से बणी छन  वो विशेष रूप से वै वै इ भूत से निर्मित विषय तै ग्रहण करदन।  यी समान स्वभाव वळ हूण  से समान जातिवादी विषय तै ग्रहण करणम समर्थ हूण  से प्रधान भूतात्मक विषय ही ग्रहण करदन।  जन आँख तेजस च तो तेज का पैथर दौड़दी कंदूड़ अंतरिक्ष जन्य छन तो शब्दों पैथर दौड़दन , स्पर्श वायु पैथर , जीब रस का पैथर अर  घ्राण  पृथ्वी पैथर दौडदन।  १५। 
यूंका  मन का साथ इन्द्रिय का विषयम अतियोग ,  आयोग या मिथ्यायोग हूण  से विकृति/विकार  या रोग उतपन्न ह्वेका अपण अपण ज्ञान-नाशौ कुण  उद्यत ह्वे जांदन।  समयोग से इन्द्रिय स्वभावम रैकी अपण अपण ज्ञानै वृद्धि करदन।  उचित योगन वृद्धि हूंद।  १६। 
मन का विषय (सुख , दुःख , प्रयत्न  , )  चिंतन करद।  इलै मन व बुद्धि क समान संयोग  स्वस्थता कारण च ार मन व बुद्धि का अतियोग या हीनयोग या मिथ्यायोग  अर्थात विकार /रोग कारण हूंदन । १७। 
इलै अपर प्रकृति म स्तिथ मन सहित इन्द्रियूं तै स्वस्थ तथा अपण अर्थम रखणs  कुण , विकार से बचाणो कुण निम्न कारणों द्वारा प्रयत्न करण चयेंद -    उचित अनुकूल रुपन इन्द्रिय  अर   विषयक  संयोग नअति , नहीन , नमिथ्या संयोग से , एवं बुद्धि द्वारा भली प्रकार देखि कर्मों तै उचित रूप से करण से अर देश /स्थान , काल , आत्मा गुण का अविपरीत , हितकारी वस्तुओं सेवन से इन्द्रियां उपतप्त(व्यथित ) नि ह्वेकि प्रकृति अवस्था म रौंदन।  इलै अपण  व सरैलो, आत्मा का   कल्याण चाहकुं  तैं    सदद्वृत का (पंचि  इन्द्रियों तैं मन संग संयुक्त करि  ) मन, वचन , अर कर्म से पालन करण चयेंद।  ये सदद्वृत पालन से आरोग्यता, व इन्द्रिय विजय द्वी मिल जांदन। १८। 


उचित *संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस , १०७ पृष्ठ ब्रिटेन  ११०  तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charaka  Samhita,  First-Ever Garhwali Translation of Charaka  Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charaka Samhita   


Bhishma Kukreti

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आचार विचार का  महत्व  -१
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

 
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अटों अध्याय (इन्द्रियोपक्रमणीय ) ,  पद १९  बिटेन  २० - तक
  अनुवाद भाग -   
गढ़वालीम  सर्वाधिक  अनुवाद करण  वळ अनुवादक  - आचार्य  भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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ये सद्वृत तैं सम्पूर्ण रुपम  बुल्दन -दिबता ,गौ , ब्राह्मण,गुरु (ब्वे बाब , पौण बि ) , वृद्ध  (विद्यावृद्ध, धनवृद्ध आयुवृद्ध , शूरवृढ ), सिद्ध (तापस , भिक्षुक ), आचार्य (जंद्यो  दिँदेर /उपनयन करंदेर गुरु ) यूंकी पूजा सेवा करण  चयेंद।  अग्निहोत्र द्वी समय  सुबेर -स्याम करण  चयेंद।  दोषो तै नाश करण वळि औषधि  वनस्पतियां धारण करण चयेंद।  द्वी समय नयाण  चयेंद। गुदा /मल स्थल  बार बार स्वच्छ व खुट सदा पवित्र /स्वच्छ रखण  चयेंद। बाळ , दाढ़ी , मूछ , नंग ,अर  गुह्य स्थलों बाळुं पंद्रह दिन म तीन दैं पांच पांच दिन उपरांत कटण  चयेंद।  नित्य सुद्ध वस्त्र पैरण चयेंद , पुळेणु रौण अर सुगंध लगाण चयेंद।  १९। 
 उत्तम भेष धारण कौर, मुंड बाळुं पर कंगुल लगाण चयेंद , मुंड , कंदूड़ , त्वचा क तेल मालिश कारो, नित्य प्रायोगिक धूम्रपान कारो,  घर या भैर क्वी मीलो तो कुशल क्षेम पुछण चयेंद, कट्ठण  अवसरों पर बि सोचि काम करण  वळ ,  सुंदर , हंसमुख मुख दिखेण वळ , होम करण  वळ ,यज्ञ - देव यज्ञ ,पितृयज्ञ , ब्रह्म यज्ञ , वैश्वदेव यज्ञ , नृयज्ञ करण  वळ , दान दिंदेर , चौबटों तै सिवा लगाण वळ , दिबतौं तै न्योछावर दीण वळ , पौणुं  पूजा करण  वळ ,  ब्वे बाबु -दादि -दिदा  तैं श्रद्धायुक्त   अन्न व  वस्त्र दीण वळ , हो , समय पर हितकारी व मिठु वचन ब्वालो , जितेन्द्रिय , दनयमि धर्मात्मा हो; दुसराक उन्नति कर्मों  से ईर्ष्या करण  वळ  हो कि   मेरि  बि  उन्नति हो  किन्तु फलम ईर्ष्या करंदेर नि हो , चिंतारहित , निडर , साहसी , आहार व व्यवहार छोड़ि लज्जाशील हो , महत्वाकांक्षी हो , निपुण , क्षमाशील हो , अपकारी तैं बि क्षमा करण वळ , धर्म म चित्त लगाण वळ आस्तिक हो , विनय , बुद्धि , विद्या, अभिजन/अभिजात अर आयुम ठुल्ला /बड़ा , सिद्ध तप से बड़ होवन ,आचार्य आदि की सेवा करंदेर  हो।  छतरु , लाठ /लाठी  धारी , व्यर्थ म नि बुलण वळ ,जुट पैरण  वळ ,अपण अगवाड़ी  चार हथ  तक देखिक चलण चयेंद।  मंगलजनक क्रियाशील (सकारात्मक ) राओ , मैला वस्त्र , कांड युक्त , हाड मांस , रंगुड़ वळ , फुट्युं घौड़ वळ ,स्नानागार , पूजा स्थल छुड़ण वळ हो।  शर्म थकान से पैल इ  व्यायम छोड़ण  वळ हो।  सब प्राणियों म बांधव भाव वळ हो , क्रोधी मनिखों तै पुळ्याण  वळ हो , डर्यूं  तै ढाढ़स दीण वळ , दीं नो सहायता करण वळ हो , सत्य प्रतिज्ञा वळ , शांति प्रेमी , कठोर वचन सैण वळ , अक्रोधी , क्रोधियों तै शांत करण वळ ,द्वन्द -राग -द्वेष नष्ट करण वळ  हो।  २०।   
 
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  १११ 
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charaka  Samhita,  First-Ever Garhwali Translation of Charaka  Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charaka Samhita 


Bhishma Kukreti

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आचार - व्यवहार – भाग – २

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

 
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अटों   अध्याय ((इन्द्रियोपक्रमणीय )  पद  २१  बिटेन  - तक
  अनुवाद भाग -   
गढ़वालीम  सर्वाधिक  अनुवाद करण  वळ अनुवादक नि लीण - आचार्य  भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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झूठ नि  ब्वालो ,  दुसरौ  धन नि  ल्यावो, दुसराक घरवळि तै नि चावो , दुसराक सम्पति नि  चावो , बैर नि करण , पाप नि कार, पाप मन म नि लाव , दुसरों गुप्त बात नि जाणो , दुसरक निंदा नि कारो , अधार्मिक व राजा विरोधी क संग नि बैठो।   , बौळ्या , पतित , नीच कर्मी, भ्रूणघाती , दुष्ट, क दगड़ नि बैठण।  अनभ्यस्त घ्वाड़ाम नि बैठण , उतकट आसन म बिंडी देर नि बैठण , बिन डिसाण  को , किटासी स्थल , उच्च- निस  स्थलम ,  नि  सीण।  उच्च -निस व  उच्चो  स्थलों म नि घुमण।  ,अनावश्यक  उच्चा डाळम नि चढ़न , तीब्र पर्वाही पाणीम नि नयाण , गदन /नदी डाळौ छैलम नि बैठण , अग्नि लपटों चारि  और नि फिरण।  ऊंचा नि हंसण।  शब्दों दगड़  नि पदण।   , बिन मुख ढक्यां -  जमै  , नि  लीण ,  नि  छिंकण हंसण नी।  बिन मुख ढक्यां - नाक नि कुर्याण , दांत  नि किटकिटाण।  बिन मुख ढकी - नंग नि रगड़न , माटम नि  लिखण , माट नि  कर्यांण , क्याड़ नि  तुड़न , माटs ढिंड नि फुड़न ,हडका नि बजाण , अंगों तै बिन उद्देश्य ट्याड़  नि करण ना हलाण।  ज्योति , सूर्य अग्नि , तीब्रगनी , अपवित्र चिटा , जन निन्दित वस्तु नि दिखण।  मुर्दा देखि  हुंकार नि भरण।  ग्राम दिबता ध्वज , धज, गुरु , ब्वे -बाब ,आचार्य, पूज्य आदरणीय , प्रशस्त , कल्याणकारी वस्तुओं छैल नि लंगाण।  राति मंदिर /देवालय , ग्राम दिवता  भवन , चोकम , चौबट , बगीचा , मड़घट , , बढ़ स्थल म नि रौण।  इखुलि  इकुलासी भवन , घणो बौण  म नि  जाण।  पाप वृति वळ कज्याणि , सेवक , दगड्या , का साथ नि  दीण।  अपण से श्रेष्ठों संग का विरोध नि  करण , अफु से निम्न प्रवृति वळ साथ नि दीण।  कुटिल क चाह नि करण ,  दुष्ट का आसरो नि  लीण , कैकुण  भौ  (भय ) पैदा नि  करण।  अतिसाहस , अतिसीण , अतिबिजी , अति स्नान , अति भोजन , अति पीण , नि करण।  घुंड उठैक देर तक नि रण।  सम्यणक  वायु , घाम , ओस , तीब्र वायु , छोड़ दीण।  सांप , दाढ़ वळ शेर , सींग वळ पशुओं न्याड़ ध्वार नि  जाण।  झगड़ा शुरू नि करण।  बिन सावधानी अग्नि पूजा नि करण।  जुठ भोजन तै दुबर आग म गरम नि करण।  थकान मिटाईं  बिन मुख अर  मुंड  नि  धूण।  नंगी ह्वेक नि नयाण।  नयाणे  धोती /अब जंग्या  से मुंड नि पुंछण।  बाळु समिणा  भाग नि  झपोड़न।  जौं वस्त्रों से नयायी हो वों  तै तभी नि पैरण।  रत्न , मणि , पूज्य भगवान को नाम छूयां व  नाम बुल्यां  . बगैर घर बिटेन भैर नि  आण।  पूज्य वस्तुओं पैथर  से अर अमंगल , अपूज्य वस्तुओं दक्षिण-पैथर  नि  जाण।  २१।   
 
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ ब्रिटेन  ११२ , ११३   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
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चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली
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Bhishma Kukreti

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भोजन करणो  विधान

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

 
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अटों   अध्याय ((इन्द्रियोपक्रमणीय )  पद   बिटेन २२   - तक
  अनुवाद भाग -   ६४
गढ़वालीम  सर्वाधिक  अनुवाद करण  वळ अनुवादक  - आचार्य  भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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यूं  अवस्थाओं म भोजन नि  करण - रत्न तै हथम  लियां  रहित ,  सम्मान  दियां  बिना , वस्त्र सहित, गायत्री जाप बिना , हवन  कर्यां बिना , देवों दियां बिना , माता पिता , पौण , गुरु आचार्य, वरिष्ठों, आश्रितों तै खलायों बिना, हाथ खुट धुयां बिना , सुगंधित पुष्प धारण बिना।  तथापि इन स्थिति म बि  भोजन नि   करण   - मलिन  मुख से, उत्तर दिशा म ,अन्य मन से , गंध वळ का दियूं , बिन भक्ति दियूं , अपवित्रता से दियूं/मिल्युं , भूको द्वारा परोस्यूं , पात्र  रहित, मैला पात्रों म, मैलो या अनुचित स्थान म , कुसमय म , किटास वळ स्थल , बिन अग्नि दियां ,बिन अभिमंत्रित , निंदा करदा।  बासी भोजन नि करण।  मांस, हरड़ , सुख्यूं शाक ,फल एक रातौ  बासी खये  जै सकेंद  च।  खाणा पूरो नि खाण  कुछ पात्र म बच्यूं  हूण चयेंद।  किन्तु दही , दूध शहद , लूण , सत्तू अर  घी जुठो नि  छुड़न  अपितु पूरो खाण।  रातम  दही नि खाण , सत्तू रातम नि खाण  अर अकेला नि खाण, भौत मात्रा म सत्तू  नि  खाण  , दुबर  नि  खाण ,  जौ  सत्तू पाणिम भिगाइक  नि खाण  सत्तू दांत काटिक  नि  खाण , ।  २२। 
 
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   ११४ 
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charaka  Samhita,  First-Ever Garhwali Translation of Charaka  Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charaka Samhita

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चरक संहिताम मैथुन नियम

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

 
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अटों   अध्याय ((इन्द्रियोपक्रमणीय )  पद   २३  बिटेन  २५ - तक
  अनुवाद भाग -   ६५
गढ़वालीम  सर्वाधिक  अनुवाद करण  वळ अनुवादक  - आचार्य  भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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बिना झुकी  छिंकण, खाण , सीण  नि  चयेंद। मल मूत्र करद  दैं दुसर कार्य नि करण , पैल  मल मूत्र का वेग  को निराकरण कारो।   वायु , आग , सूरज , गुरु , ब्वे -बाब,ब्राह्मण , जल यूंका जिना  मुख करी नि  थुकुण, ना इ यूं  जीना मल मूत्र का त्याग करण ।  बाटोम  बैठ्वाकम  (बैठणो स्थल ) बिसौणम , भोजनो समय मुतण  नि  चयेंद।  जप , हवन , पठन ,बलि पवित्र क्रियावो स्थल म सींक /सिंगान  नि चुलाण  चयेंद।  २३। 
स्त्रियुं तिरस्कार नि करण।   स्त्रियों पर बिंडी  विश्वास बि  नि करण  चयेंद।  स्त्रियों से भेदयुक्त बात नि करण  चयेंद।  रजस्वला, रोगिणी, कुष्ठ रोगी , अचतुर, निंदा  युक्त  रोगी ,  जु अफि  नि  चावो , पर पुरुष चाहक, पर स्त्री आदियूं  दगड सम्भोग नि करण अर  गुदा  व मुख मैथुन नि  करण।  देवालय , चौबट , चौक,बगीचा , मड़गट ,बध्यभूमि,औषधि , गुरु बामण , ब्वे -बाब, मंदिर   का न्याड़ ध्वार , द्वी कालों (सुबेर -स्याम ) , निषिद्ध तिथियों , अपवित्र अवस्था, औषध खायें बिना, बिन मैथुन इच्छा, शिश्न म उत्तेजना बिना ,  नीनू पेट, बिंडी अघायूं, मूत्र वेग समय मैथुन नि करण  चयेंद।  २४।
 गुरु , की निंदा नि करण चयेंद।  अपवित्र अवस्था म कर्म , चैत्य,पूजा , देव ाहावन , अध्ययन, पठन नि  करण  चयेंद।  २५ । 
 
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   ११५ 
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charaka  Samhita,  First-Ever Garhwali Translation of Charaka  Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charaka Samhita


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चरक संहिताम अध्ययन   आदि  नियम

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

 
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अटों   अध्याय ((इन्द्रियोपक्रमणीय )  पद  २६   बिटेन  २७ तक
  अनुवाद भाग - ६६   
गढ़वालीम  सर्वाधिक  अनुवाद करण  वळ अनुवादक  - आचार्य  भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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जौं  अवस्थाओं   नि पढ़न  -
 जौं  अवस्थाओंम  अध्ययन नि करण  चयेंद - बिन ऋतु क बिजली चमकण , दिशाओं जळण पर , गाँव , नगर म आग लगण पर , भ्यूंचळ  औण पर ,  ब्यौ  आदि बड़  उतस्वों पर , विजयादशमी , दिवाळी , होळी अवसरों पर , गैणा  भ्यूं पोड़द  दैं (उल्कापात ) ,चंद्रग्रहण या सूर्यग्रहण दिन , कृष्ण पक्षै  चतुर्दशी , औंसी , प्रतिपदा जब जूनि  नि दिखेंदी, संध्या कालम , गुरु मुख  से बिना पढ़े , आखर खांद (छुड़द ) ,बिंडी , रूखी भौणम , स्वर रहित, रुक रुकि , बलहीन अवस्था म ,उच्च स्वरम , हीन  स्वर म।  २६। 
अन्य नियम -'
समय न  व्यय  कारो, नियमों उललंघन नि  कारो , रात म नि डबको , संद्या समयम खाण , अध्ययन , मैथुन , नींद कार्य वर्जित छन।   बच्चा , बृद्ध , लालची , लाटो , कुष्ठ रोगी , अनुत्साही , न्यळ्तो (नपुंषक ) , का दगुड़  नि करण , मदिरा , जुआ , वैश्या  म मन नि लगाओ।  गुप्त रहस्य नि ख्वालो।  कैको बि अपमान नि कारो, घमड़ नि करण।  कार्यों म मूढ़ नि रण।  गुणों म दोष नि दिखण।  निंदक , चुगलखोर  नि बणन।  ब्राह्मणै  निंदा नि करण।  जु अपण अनुकूल होवन  उन्कि  निंदा नि करण।  आचार्य , गुरु , गाँव वळ , बयोबृद्ध,  जनसमूह ,समाज ,    राजा का -भाई बंध , मित्र आदि, स्नेही , अनुरक्त , आपत्ति म सहायक यूं  तैं
 कबि बि भैर नि निकाळण।  २७। 

 
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य लेन
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ  ११६   
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली
 Fist-ever authentic Garhwali Translation of Charaka  Samhita, First-Ever Garhwali Translation of Charaka  Samhita by Agnivesh and Dridhbal,  First ever  Garhwali Translation of Charka Samhita. First-Ever Himalayan Language Translation of  Charaka Samhita


Bhishma Kukreti

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  मानसिक तनाव से दूर रौणै   विधि  

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

 
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अटों   अध्याय ((इन्द्रियोपक्रमणीय )  पद  २८   बिटेन  - तक
  अनुवाद भाग -   ६७

गढ़वालीम  सर्वाधिक  अनुवाद करण  वळ अनुवादक  - आचार्य  भीष्म कुकरेती

  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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भौत अधीर नि हूण , भौत उछदि /उच्छृंखल नि  हूण।  सेवकों पोषण करण।  अपण लोखुं , घरवळों  पर अविश्वास नि करण।  इखुलि सुख नि भुगुण। इखुलि  मिठि वस्तु नि खाण।  स्वाभाविक  व्यवहार ,आचार ,उपचार (वस्त्र फैशन आदि  )     म दुखी मनिख जन नि रौण,सभ्य ,  सौम्य बणि  रौण  ।  सब स्थलों म सब पर विश्वास नि करण, सब पर अविश्वास नि करण  अर  सब्युं पर संदेह बि नि  करण।  सब समय सुचण अर विचारण  म इ  नि  रौण।  कार्यो समय क उललंघन नि  करण।  अज्ञात स्थल म  नि  बैठण , नि  जाण।  इन्द्रियों बसम नि हूण।  चंचल मन इना उना  नि घुमाण।  बुद्धि अर ज्ञानेन्द्रियों पर बिंडनि  भार नि  दीण।  अधिक विषय सेवन नि  करण।  बिलम्ब से कार्य करण वळ  नि बणो।  जथगा क्रोध आयी उथगा  उग्र कर्म नि करण भैरों।  अर जथगा प्र्स्सन्न्ता हो उथगा प्रसन्नता  नि मनाण। बिंडी शोक अर  दुःखौ बस म नि हूण।  कार्य म सफलता म भौत प्रसन्न नि  हूण।  असफलता मिलण  पर मुख दीन , उदासीन नि  रखण।   बार बार प्रकृति नियम (जन्म -मोरण ) ध्यान म रखण।  शुभ कारण से कार्य शुरू करण चयेंद। इथगा कर याल तो  बस ह्वे  गे  अर बैठ नि  जाण।  पराक्रम /ऊर्जा नि  छुड़न  अर िन्दा याद नि  करण।  २८। 


 
*संवैधानिक चेतावनी: चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   ११७     ब्रिटेन   तक
सर्वाधिकार@ भीष्म कुकरेती (जसपुर गढ़वाल ) 2021
शेष अग्वाड़ी  फाड़ीम

चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली
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सद्वृत्ति को महत्व

चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

 
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  अटों   अध्याय ((इन्द्रियोपक्रमणीय )  पद  २९ से  ३४ तक   , 
  अनुवाद भाग -   ६८
गढ़वालीम  सर्वाधिक  अनुवाद करण  वळ अनुवादक  - आचार्य  भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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अपवित्र अवस्थाम गौ घी , अक्षत, तिल , कुशा व सरसों द्वारा अग्नि म हवन नि करण अर  प्रार्थना करण  चयेंद बल अग्नि म्यार शरीर से भैर नि  जा। वायु म्यार प्राणों तैं  धारण कारो।  विष्णु म्यार अंदर शक्ति भरे।  इंद्र बल संचार कारो।  कल्याणकारी जल मेम प्रवेश कारो।  ' आपो हिष्ठा मयो भुवस्ता न ऊर्जे दधातन ' ये मंत्र तै पड़द  दैं जल स्पर्श करदा  करदा स्नान  आचमन करण   चयेंद।  द्वी  समय भोजन उपरांत  होंठ अर खुट  सूखाण  चएंदन अर  मुंड ,आँख कंदूड़ , नाक तै जल स्पर्श करण  चयेंद।  तब अपण  हृदय व मुंड तै जल से स्पर्श कारो।  ब्रह्मचर्य  अर हौरुं  तै  ज्ञान दान की प्रवृति ,सब प्राणियों म आत्मवत् प्रवृति , सब प्राणियों से दया भाव ,अप्रतिग्रह ,  शांत   इन्द्रिय चित्त वळ बणो।  २९। 
पंचेन्द्रिय व यूंका पांच प्रकार ,मन अर  चार कारण , अर  सम्पूर्ण सद्वृत तै इन्द्रिययोग अध्याय म बुले गे।  जु मनिख सद्वृत आचरण करदो वु  सौ वर्ष तक निरोग रौंद।  साधुओं से पूजित ह्वेका मनुष्य लोक तै अपण  यश से भर दींदु, यश्वशी बण  जान्दो ।  धर्म अर अर्थ पांद।  सब प्राणियों प्रति बंधु भाव भर दीन्द। पुण्य कर्मो वळ मनिख अति उत्कृष्ट लोक (पद/ छवि )   पप्राप्त करद।  इलै सब्युं  तै सद्वृत पालन करण  चयेंद।  ये सद्वृत का अतिरिक्त जो  सद्वृत नि बुले गेन  ऊंको  बि  पालन हूण  चयेंद।  इन भगवान आत्रेय को अभिप्राय च।  ३०- ३४ I
इन्द्रियोप कर्मणोयो अध्याय समाप्त। 
 
*संवैधानिक चेतावनी : चरक संहिता पौढ़ी  थैला छाप वैद्य नि बणिन , अधिकृत वैद्य कु परामर्श अवश्य
संदर्भ: कविराज अत्रिदेवजी गुप्त , भार्गव पुस्तकालय बनारस ,पृष्ठ   ११९   
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चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली
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चिकित्सा  व वैद्य  आदि के सद्गुण
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चरक संहितौ सर्व प्रथम  गढ़वळि  अनुवाद 

 
 खंड - १  सूत्रस्थानम ,  नवों    अध्याय  ( खुड्डाक चतुष्पाद  )  १  पद   बिटेन  - तक
  अनुवाद भाग -   ६९
गढ़वालीम  सर्वाधिक  अनुवाद करण  वळ अनुवादक  - आचार्य  भीष्म कुकरेती
  ( अनुवादम ईरानी , इराकी अरबी शब्दों  वर्जणो  पुठ्याजोर )   
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      !!!  म्यार गुरु  श्री व बडाश्री  स्व बलदेव प्रसाद कुकरेती तैं  समर्पित !!!
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अब 'खुड्डाक चतुष्पाद ' ( चिकित्सा चार क्षुद्र  चरण ) की व्याख्या करदां जन आत्रेय भगवान न बोली थौ।  १ , २।
वैद्य , औषध ,परिचारक (nursing ) अर  रोगी यी  चिकित्सा का चार चरण छन।  ी चारि इ रोग निदान म गुणवान कारण अर्थात महत्वपूर्ण छन। ३। 
शरीरा  धातु, , बात , पित्त ,अर कफै विषमता नाम विकार च।  अर धातुं साम्यता /अनुकूलता हूणो नाम प्रकृति च। आरोग्यता सुख च ार रोग दुःख च।  वैदक शास्त्रम सुख -आरोग्यता च ार दुःख -रोग च।  ४।
धातुओं क विषम हूण  पर भिषक , रोगी , औषध अर परिचारक धातुं तै सम्यक करदन वे कुण 'चिकित्सा ' बुल्दन।  ५। 
सद्गुरु उपदेश से परिपूर्ण शास्त्र ज्ञान  ,  चिकित्सा शास्त्र को बड़ो अनुभव , चिकित्सा कार्य म कुशलता, चिकित्सा कर्म की सिद्ध हस्तता , पवित्रता , स्वच्छता यी वैद्या गुण  छन।  ६। 
 द्रव्य गुण -
बहुता , प्रचुरता , रोग दूर करणो  सामर्थ, अर जैसे  बनी बनी प्रकारौ कल्प निर्माण ह्वे  साकन , रस , वीर्य ,प्रभाव गुण सम्पन  ह्वान्वो, ठीक ऋतू म कट्ठा करे गे ह्वावो , यी चार गुण  औषध म हूण  चएंदन।  ७। 
परिचारक गुण -
सेवा कर्म को जणगर, कर्म कुशल ,रोगियों से प्रेम करण वळ , सुचिता यी चार गुण परिचारकौ  छन।  ८।
स्मरण शक्ति युक्त, वैद्यौ  बुल्युं मनण  वळ , निडर ,रोग व चिकित्सा से नि डरण वळ ,अपण  शिकैत भली प्रकार से बताण  वळ रोगी लक्षण छन।  ९।

 
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चरक संहिता कु  एकमात्र  विश्वसनीय गढ़वाली अनुवाद; चरक संहिता कु सर्वपर्थम गढ़वाली अनुवाद; ढांगू वळक चरक सहिता  क गढवाली अनुवाद , चरक संहिता म   रोग निदान , आयुर्वेदम   रोग निदान  , चरक संहिता क्वाथ निर्माण गढवाली
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