Author Topic: उत्तराखंड में जन्मे महान कवि / साहित्यकार : GREAT POET / LITERATE OF UK  (Read 57358 times)

पंकज सिंह महर

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'मंगलेश डबराल


जन्म: 16 मई 1948
 
जन्म स्थान काफलपानी गाँव, टिहरी गढ़वाल, उत्तरांचल, भारत
कुछ प्रमुख कृतियाँ पहाड़ पर लालटेन (1981); घर का रास्ता (1988); हम जो देखते हैं (1995)
विविध : ओमप्रकाश स्मृति सम्मान (1982); श्रीकान्त वर्मा पुरस्कार (1989) और " हम जो देखते हैं" के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार (2000) 

अन्य रचनायें

पहाड़ पर लालटेन / मंगलेश डबराल (कविता-संग्रह)
घर का रास्ता / मंगलेश डबराल (कविता-संग्रह)
हम जो देखते हैं / मंगलेश डबराल (कविता-संग्रह)
आवाज़ भी एक जगह है /मंगलेश डबराल (कविता-संग्रह)
यहाँ थी वह नदी / मंगलेश डबराल
त्वचा / मंगलेश डबराल
इन सर्दियोँ में / मंगलेश डबराल
पुरानी तस्वीरें / मंगलेश डबराल
गुमशुदा / मंगलेश डबराल

पंकज सिंह महर

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गोविन्द बल्लभ पंत का निधन ९८ वर्ष की अवस्था में २६ अगस्त १९९६ को हुआ था। अगर वे दो साल और जीवित रहते तो 'जीवेम शरदः शतम' की उक्ति को चरितार्थ करते. आश्चर्य है कि तत्कालीन संचार माध्यमों के लिए उनकी मौत कोई खबर नहीं बन सकी थी. वैसे देखा जाय तो इसमें आश्चर्य ही क्या है क्योंकि पंत जी उस युग के साहित्यकार थे जब साहित्य का मतलब सिर्फ साहित्य होता था ,साहित्यबाजी नहीं. यह भी कोई आश्चर्य की बात नहीं कि बहुधा लोग नाम की समानता के कारण उनमें और भारत सरकार के पूर्व गृहमंत्री तथा उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री पं० गोविन्द बल्लभ पंत में भ्रमित हो जाया करते थे. इस बारे में हिन्दी-कुमांऊंनी समाज में तरह-तरह के किस्से कहे-सुने-सुनाये जाते रहे हैं. 'हिन्दी साहित्य कोश' में भी गोविन्द बल्लभ पंत-१ और गोविन्द बल्लभ पंत-२ लिखा गया है. सुखद आश्चर्य है कि इसमें साहित्यकार पंत पहले स्थान पर हैं और राजनेता पंत दूसरे स्थान पर.

२९ जुलाई १८९८ में रानीखेत में जन्मे गोविन्द बल्लभ पंत ने अठारह-उन्नीस उम्र से काव्य रचना आरंभ की. १९१७ में उनके पहले काव्य संग्रह 'आरती' का प्रकाशन हुआ. १९२० में वाराणसी में कालेज की शिक्षा बीच में ही छोड़कर स्वाधीनता समर के सिपाही बन गए और बाबू शिवप्रसाद गुप्त के 'ज्ञानमंडल' से संबद्ध हो गए.इसके बाद मेरठ की 'व्याकुल भारत नाटक कंपनी' में एक वर्ष तक नाटककार के रूप काम किया फ़िर पहाड लौटकर मिशन स्कूल रानीखेत ( आज का 'रानीखेत इंटर कालेज') और प्रेम विद्यालय ,ताड़ीखेत में अध्यापन कार्य किया. पंत जी अध्यापन,अभिनय,लेखन और थिएटर-सिनेमा की दुनिया के बीच अपने मुकाम को तलाशते रहे. उन्होंने पत्रकार के रूप मे 'हिमालय', 'सुधा',' धर्मयुग', 'नवनीत' आदि पत्रिकाओं के संपादकीय विभाग में कार्य किया.महादेवी वर्मा द्वारा ताकुला (नैनीताल) में स्थापित 'उत्तरायण'संस्था में भी सहयोग किया.

उनकी ख्याति मुख्यत: नाटककार और कथाकार के रूप में रही है। उनके नाटकों में 'कंजूस की खोपडी', 'राजमुकुट', 'वरमाला', 'अंत:पुर का छिद्र', 'अंगूर की बेटी', 'सुहाग बिन्दी', 'ययाति' आदि प्रमुख हैं. उन्होंने कई नाटक कंपनियों -व्याकुल भारत, राम विजय, न्यू एल्फ्रेड, पृथ्वी थिएटर्स आदि के लिए नाटक लिखे और अभिनय भी किया. ऐसे नाटकों में 'अहंकार', 'प्रेमयोगी', 'मातृभूमि', 'द्रौपदी स्वयंवर' प्रमुख हैं. पंत जी ने जीवन और जगत के विविध अनुभवों पर कई उपन्यासों की रचना की है जिनमें 'प्रतिमा', 'मदारी', 'तारिका', 'अमिताभ', 'नूरजहां', 'मुक्ति के बंधन', 'फॉरगेट मी नाट', 'मैत्रेय', 'यामिनी' आदि चर्चित रहे हैं. उनकी अन्य प्रसिद्ध रचनाओं में 'विषकन्या' ( एकांकी संग्रह) तथा 'एकादशी' और 'प्रदीप' (दोनों कहानी संग्रह) शामिल हैं. उन्होंने लगभग ७५ वर्षों तक लेखन किया लेकिन १९६० के बाद से वे एक रचनाकार के रूप में चुप ही रहे. अगर उनकी यह चुप्पी टूटती तो संभवत: पुस्तकों की संख्या की दृष्टि से वे महापंडित राहुल सांकृत्यायन के निकट पहुंच जाते.

hem

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Biography

Ramesh Singh Matiyani 'Shailesh' was born on October 14, 1931, in Barechhina (बाड़ेछीना), Almora district, Uttarakhand, it was here and later at Almora, that he studied up to High School.

His first novel, Borivilli se Boribander tak was published in 1959, and in his career spanning five decades, he wrote numerous short stories, novels and published many collections of stories and essays. He was also known for his stories for children. He remained the editor of two publications, 'Janpaksh' and 'Vikalp', for many years [1]. Thereafter, he moved to Haldwani, where he spent the rest of his years, though suffering a depression attack in July, 1995, he would often travelled to Delhi and Lucknow, for treatment, despite that he continued writing prolifically [5].

He died on April 24, 2001, in Delhi and was cremated at Haldwani [11].

After his death, 'Shailesh Matiyani Smriti Katha Puraskar' was established by Madhya Pradesh Government. [12]


Madhya Pradesh Government does not award any puraskar in memory of shri Matiyani. It is Madhya Pradesh Rashtra Bhasa Prachar Samiti, who awards "Shailesh Matiyani smriti Chitra Kumar katha Puraskar".M.P.Rashtra Bhasa Prachar Samit is not a Govt. institution. It is an organisation dedicated for the cause of Hindi.Mr. Kailash Chandra Pant is Mantri-Sanchalak of the organisation.

पंकज सिंह महर

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मथुरा कलौनी


20 जनवरी 1947 पिथौरागढ़, उत्तराखण्‍ड में हुआ था। बचपन पहाड़ों में बीता। शिक्षा दीक्षा कोलकाता में। अपने कार्यजीवन के तहत विश्‍व के कई देशों का भ्रमण। अब तक विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में 150 से अधिक व्यंग्य और कहानियॉं प्रकाशित। अधिकांश कहानियॉं हास्य और व्यंग्यप्रधान हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में बनते बिगड़ते संबंधों पर सटीक रचनाऍं चर्चित रही हैं। 1989 में बंगलौर में कलायन नाट्य संस्था की स्थापना की जो बंगलौर में हिन्दी नाटकों का मंचन करती है। कई नाटकों का लेखन तथा मंचन। एक नाटक का अनुवाद और मंचन कन्नड भाषा में। दो नाटक आकाशवाणी बंगलौर से तथा एक दूरदर्शन से प्रसारित। 1999 में कलायन वेबसाइट की स्थापन। वेबसाइट www.kalayan.org की कलायन पत्रिका हिन्दी साहित्य की अपरिमित सेवा कर रही है। प्रकाशित कृतियाँ उपन्यास - इसी भूमि में (प्रियदर्शी अशोक पर एक नया दृष्टिकोंण) तथा वहाँ से वापसी। नाटक - संदेश तथा चिराग का भूत। कहानियाँ -लगभग 150 - मनोरमा, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, माधुरी, कादंबिनी, वामा, मुक्ता, सरिता आदि में। कुछ चर्चित कहानियाँ कलायन पत्रिका में उपलब्‍ध प्रकाश्य उपन्यास - चंद्रभवन तृप्तिभवन , तथा विषकन्या। नाटक - जोड़तोड़, कायापलट, स्वयंवर , चंद्रकान्ता नाटक, जो पीछे रह जाते हैं, तथा चाय या कॉफी ।

पंकज सिंह महर

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मसूरी, जागरण कार्यालय: हिमवंत कवि चंद्रकुंवर बत्र्वाल की पुण्यतिथि पर नगर के साहित्यकार, पत्रकार व बुद्धिजीवियों ने उनकी प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि दी। इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि कवि चंद्रकुंवर ने मात्र 28 वर्ष व 24 दिन की आयु में हिंदी साहित्य जगत को अपार खजाना दिया। रविवार को प्रेस क्लब ऑफ मसूरी, पत्रकार यूनियन व चंद्रकुंवर बत्र्वाल शोध संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में मसूरी ग‌र्ल्स इंटर कालेज स्थित उनकी प्रतिमा पर फूलमालाएं अर्पित करने के बाद एक संगोष्ठी व कविता पाठ का आयोजन किया गया। कवि के पारिवारिक सदस्य व चंद्रकुंवर बत्र्वाल शोध संस्थान के सचिव डा. योगंबर सिंह बत्र्वाल ने कवि के जीवन व रचनाओं पर व्यापक प्रकाश डाला। श्री बत्र्वाल ने कहा कि उनका जन्म 20 अगस्त 1919 का जिला रूद्रप्रयाग के तल्लानागपुर मालकोटी गांव में हुआ था। उडामांडा, नागनाथ, पौड़ी, देहरादून व लखनऊ में शिक्षा-दीक्षा और लखनऊ में ही अपने कविता संसार को जन्म दिया। कवि ने कम उम्र में हिंदी साहित्य की अपार सेवा की है। उनकी प्रमुख रचनाओं में काफल-पाकू, गीत माधवी, जीतू, पयस्विनी, प्राणयिणी, कंकड-पत्थर, साकेत-परीक्षण, गीत माधवी, नागिनी आदि शामिल हैं। इस अवसर पर हिंदी साहित्य अकादमी ने चंद्रकुंवर का कविता संसार को प्रकाशित किया। पत्रकार व इतिहासकार जयप्रकाश उत्तराखंडी ने कहा कि वे मानवतावादी कवि थे। वे 28 वर्ष की अल्पायु में ही हिंदी साहित्य को अपार रचनाएं दे गए। उनकी रचनाओं के केंद्र में हिमालय के साथ ही तत्कालीन जनजीवन व विश्र्व समाज भी मौजूद है। उत्तराखंडी ने कहा कि उनकी पुण्यतिथि पर आगामी वर्ष से एक पुरस्कार शुरू किया जाएगा, जो नवोदित लेखक, कवि व पत्रकार को दिया जाएगा। इस मौके पर हिमवंत काव्य प्रेमियों ने कवि चंद्रकुंवर बत्र्वाल का श्रद्धासुमन अर्पित किए। श्रद्धांजलि सभा व संगोष्ठी में हिमवंत काव्य प्रेमी देवी प्रसाद गोदियाल, अजय उनियाल, शूरवीर भंडारी, जबर सिंह वर्मा, सूरत सिंह रावत, दीपक रावत, सुनील सिल्वाल, अजय रमोला आदि मौजूद थे। 

Meena Pandey

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Uttrakhand k mahan sahitykaro ko sat sat naman

हेम पन्त

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शैलेश मटियानी जी का जन्म बाङेछीना (अल्मोङा) में हुआ. वह हिन्दी साहित्य के बहुत महान लेखक हैं, उनका साहित्य दबे-कुचले और समाज के पिछङे लोगों पर आधारित है. बचपन में ही मां-बाप का साया उठने पर, कम पढे-लिखे होने के बावजूद उन्होने हिन्दी में बेहतरीन कहानियां-उपन्यास लिखनी शुरु की. धन की कमी के कारण उन्हें घरेलू नौकर तक बनने को मजबूर होना पङा. अपने अन्तिम दिनों में उन्हें अनेक विपत्तियों का सामना करना पङा. भू-माफिया ने उनके पुत्र की हत्या करवा दी, जिससे पहुंची मानसिक चोट से वह आजन्म उभर नही पाये. मटियानी जी को पहाङों से बेहद लगाव था, उनकी अनेक कहानियां और उपन्यास पहाङों के जनमानस पर आधारित हैं. इलाहाबाद, मुम्बई तथा दिल्ली में अपने जीवन के कई दशक गुजारने के बाद अन्तत: मटियानी जी अपने लोगों के बीच हल्द्वानी में बस गये और मई 2001 में ह्ल्द्वानी में ही उनका देहावसान हुआ.



"पहाङ" संस्था द्वारा प्रकाशित पुस्तक - "शैलेश मटियानी के मायने".
मटियानी जी के मित्रों-परिजनों के द्वारा लिखे गये महत्वपूर्ण संस्मरण - मटियानी जी की संघर्षपूर्ण जीवनगाथा.

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जयसिंह रावत

जयसिंह रावत (Jaisingh Rawat)
(माताः श्रीमती तारा देवी, पिताः स्व. राम सिंह रावत)
जन्मतिथि : 10 अप्रैल 1955 जन्म स्थान : सांकरी (पोखरी)
पैतृक गाँव : सांकरी जिला : चमोली
वैवाहिक स्थिति : विवाहित बच्चे : 2 पुत्र
शिक्षा : एम.ए.
प्राथमिक शिक्षा- आधारिक विद्यालय सांकरी (चमोली)
हाईस्कूल- हायर सेकेन्ड्री स्कूल, नन्दप्रयाग
इंटर- रा.इ.का. नारायण पोखरी (चमोली)
बी.ए.- रा. स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गोपेश्वर
एम.ए.- डी.ए.वी. कालेज देहरादून
जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ः वर्ष 1977 में अध्ययन के दौरान पत्रकारिता शुरू की। मार्च 2000 में हिमाचल टाइम्स के समाचार सम्पादक पद से त्यागपत्र देकर पूर्णतः स्वतंत्र पत्रकारिता एवं उत्तराखण्ड से जुड़े मुद्दों पर अध्ययन व लेखन शुरू किया। लगभग 2 वर्ष पूर्व तक उत्तर उजाला हल्द्वानी के स्थानीय सम्पादक के रूप में देहरादून में कार्य किया।
प्रमुख उपलब्धियाँ : 1. ग्रामीण पत्रकारिता पर पुस्तक प्रकाशित|
2. उत्तराखण्ड के प्राकृति संसाधनों पर केन्द्रित पुस्तक में सहलेखन।
3. पंचायती राज, संरक्षित क्षेत्र, स्थानीय निवासी, पर्यावरण, पर्यटन आदि विषयों पर अध्ययन, लेखन व कंसल्टेंसी।
4. यू.एन.आई. समाचार एजेंसीयों के लिए कार्य
5. महादेवी कन्या पाठशाला पो.ग्रेजु. कालेज देहरादून की पत्रकारिता स्नातक कक्षाओं में शिक्षण (वर्ष 1999)।
6. लगभग आधा दर्जन फीचर एजेंसियों व आकाशवाणी नजीबाबाद के पैनल में; प्रमुख राष्ट्रीय हिन्दी समाचार पत्रों एवं इंडियन एयर लाइन्स की स्वागत मैगजीन में लेख प्रकाशित।
7. अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित।
युवाओं के नाम संदेशः उत्तरांचल के लोग अपने पुरुषार्थ से अपना विकास कर सकते हैं। ईश्वर भी उनकी मदद करता है जो स्वयं की मदद करते हैं। इसलिए सरकार पर आश्रित नहीं रहना चाहिए। क्षेत्र का गौरवमय अतीत रहा है, उसे नहीं भूलना चाहिए। खासकर राष्ट्रीय सुरक्षा और पर्यावरण रक्षा में उसका अद्वितीय योगदान है। उन्हें विलक्षण जैव विविधता को विश्व धरोहर मानकर उसका संरक्षण करना चाहिए। नौजवानों कोधैर्य नहीं खोना चाहिए। सफलता एक दिन अवश्य मिलती है। पत्रकार मित्र सुविधाओं और चमक-दमक से अधिक लक्ष्य व तथ्यों की ओर ध्यान दें। अध्ययन अवश्य करें।

विशेषज्ञता : पत्रकारिता, लेखन, विविध।

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शक्ति प्रसाद सकलानी

शक्ति प्रसाद सकलानी (Shakti Prasad Saklani)
(माताः स्व. प्रतिमा देवी, पिताः स्व. सत्य प्रसाद सकलानी)
जन्मतिथि : 4 जून 1936
जन्म स्थान : भैंसकोटी
पैतृक गाँव : भैंसकोटी जिला : टिहरी गढ़वाल
वैवाहिक स्थिति : विवाहित बच्चे : 2 पुत्र, 3 पुत्रियाँ
शिक्षा : स्नातक
प्राथमिक शिक्षा- उत्तरकाशी
हाईस्कूल- रा.उ.मा.वि., उत्तरकाशी
इण्टर, बी.ए. (व्यक्तिगत)- देहरादून
जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ः 1956-57 में अध्ययन के साथ-साथ पत्रकारिता में प्रवेश। देहरादून के कतिपय आंचलिक समाचार-पत्रों में संपादन।
प्रमुख उपलब्धियाँ : 1958 से 1980 तक उ.प्र. सरकार की सेवा में। स्वैच्छिक अवकाश और लेखन में प्रवेश। 12-13 वर्षों तक रुद्रपुर से एक साप्ताहिक हिन्दी पत्र का संपादन और प्रकाशन। अब तक 4 पुस्तकें प्रकाशित। ‘उत्तराखण्ड में पत्रकारिता का इतिहास और विकास’ पुस्तक प्रकाशनाधीन। स्वस्थ पत्रकारिता एवं लेखन के लिए रोटरी इंटरनेशनल, रुद्रपुर एवं कतिपय संगठनों द्वारा सम्मानित। उत्तराखण्ड की विभूतियाँ संकलित एवं सम्पादित की।
युवाओं के नाम संदेशः अपनी संस्कृति से स्नेह रखें। कौन क्या कर रहा है? यह देखने-समझने में ऊर्जा क्षीर्ण न करें। आपने क्या किया है, क्या कर रहे हैं और क्या करेंगे? यह महत्वपूर्ण है।
विशेषज्ञता : लेखन, सम्पादन।

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लीलाधर शर्मा ‘पर्वतीय’

लीलाधर शर्मा ‘पर्वतीय’ ( Leeladhar Sharma ‘Parvatiy’)
(माताः श्रीमती पार्वती देवी, पिताः श्री माधवानन्द जोशी (शर्मा))
जन्मतिथि : 1 जनवरी 1918
जन्म स्थान : बगस्वाड़ (जैंती)
पैतृक गाँव : बगस्वाड़ जिला : अल्मोड़ा
वैवाहिक स्थिति : विवाहित बच्चे : 1 पुत्री
शिक्षा : ग्राम बगस्वाड़ का प्राइमरी स्कूल, फिर जैंती का मिडिल स्कूल। उसके बाद अनेक वर्षों तक स्वतंत्रता संग्राम में संलग्न रहने के बाद काशी विद्यापीठ वाराणसी से स्नातक (शास्त्री); आचार्य नरेन्द्र देव के शिष्य।
जीवन का महत्वपूर्ण मोड़ः 14 वर्ष की आयु में गणेश शंकर विद्यार्थी के पत्र ‘प्रताप’ तथा प्रेमचन्द के उपन्यासों के प्रभाव से स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित।
प्रमुख उपलब्धियाँ : स्वतंत्रता संग्राम में लाल बहादुर शास्त्री के सहकर्मी।चार वर्ष से अधिक की दो जेल यात्राएं कीं। 1945 में जेल से छूटने के बाद पत्रकारिता में प्रवेश, दो पत्रों का संपादन, 300 से अधिक लेखों की रचना। अनेक पुरस्कृत पुस्तकों का लेखन व संपादन। हिन्दी समिति के वर्षों तक सचिव। प्रदेश व केन्द्र सरकार की पाठ्य पुस्तकों का लेखन व संपादन। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री व उ.प्र. सरकार द्वारा विभिन्न सेवाओं के लिए सम्मानित। 1979 में उ.प्र. के सूचना विभाग में उपनिदेशक के पद से सेवा निवृत्त। अब भी लेखन व सामाजिक कार्यों में सलग्न।
युवाओं के नाम संदेशः सब लोग संगठित होकर अपनी पूरी शक्ति वर्तमान की समस्याओं के समाधान में लगाएं तभी उत्तरांचल के सम्पन्न और उज्जवल भविष्य का निर्माण हो सकेगा।

विशेषज्ञता : संग्रामी, पत्रकार, लेखन, संपादन।

 

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