Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 63947 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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टेमरू कू लठ्ठा
अति प्यारू होन्दु छ,
नरसिंग देवता तैं,
जोगी सन्यास्यौं कू,
बाठ हिटण वाळौं कू,
हर घर मा रखदा छन,
हमारा पहाड़ मा,
नरसिंग देवता का,
मंदिर मंडुला मा,
झोळी का दगड़ा.

बद्री-केदार धाम मा,
चढौन्दा छन जात्री,
प्रसाद का रूप मा,
टेमरू की प्यारी पत्ती,
धोन्दा छन दांत,
टेमरू की डण्डिन,
ज्व दांत का खातिर,
तंत दवै भि छ.

आज येका अस्तित्व तैं,
पहाड़ मा खतरा पैदा ह्वैगी,
कथ्गा काम कू छ टेमरू,
धीरू-धीरू आज ख्वैगी.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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तिन नि औण ..बेटा !!!

खीसा मा कुछ नी छौ
नि छौ कुछ झोला मा
बस छौ उम्मीद कु दामन
सपणा आँखों मा

पढै लिखी ख़त्म कोरी की तैं
मिन यख औंण की सोची
विदेशामा कुछ बणि की टी दिखै दयूं
मिन तक्खी तक ही सोची


माँ, बाप, भुल्ली कु प्यार
सने दिल मा दबै कि तैं
मिन जन तन हिम्मत जुटे
पर सोब का सोब , सोचण लग गेन
स्यु जू गै अब, येन अब नि औण


तीन साल हुए गेन
मिन घौर कि शक्ल नि देखि
भट्ट नि बुकैन
झंगोरू , कोदू ,पाल्यो नि चखी
रयोंदुं छौन मैं कई बार
पर बोल नि सक्दौं
घोरा लोखुं कु दर्द बिन्ग्दौं मैं
पर खुद का राज़ खोल नि सक्दौं


अब ता च्च्ची न जू बोली छौ
वू सच लगदु च
तिन बल वख बस नोट कमोंण
इक बार जो तू चलगी
बेटा तिन घौर नि औंण


तुम सण कण बतेइ सकदु
कि मेरु मन लगदु नि च यख
घोर, प्रेम और मन
वख च वख
जख जख्या कु छौंक लगदु
जख द्वी रुट्ठी मा
घौर चल्दु
जख पिताजी डांट लागोंदन
जख माँ नींद बीटी जगौन्दी च
जख भुल्ली लड़दी च
अब तो लगदु कि
च्च्ची न झूठ नि बोली छौ
तिन बस वख बर्गेर, पिज्ज़ा ही खै सकण
बेटा तू जानी तो छें
तिन घौर नि ए सकण


छि कख फस्यों मैं
कब जलु घौर
जख होली ख़ुशी
जख हुली उमंग कि बौर
च्च्ची तेरी बात सने
एक दिन मिन हरै कि रखण
तिन देखण एक दिन
मिन वापिस औंण
जल्दी औंण

Posted by अनुपम ध्यानी at 7:37 PM
Tuesday, July 20, 2010
Soruce: http://journying.blogspot.com/2010/07/copyright_20.html

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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सुणि त होली आपन व पुराणि औखाण,

"आदू कु स्वाद बल बांदर क्य जाण",

तुमि तै मुबारक या नया जमनै की

भौ- भौ अर् ढीकचिक- ढीकचिक,

भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !



अंग्रेजी बैण्ड पर नाचदा रमपमबोल,

अर् दाना-स्याणू कु उड़ान्दा मखौल,

छोडियाली युऊन अब ढोल दमाऊ

और मुसिकबाजु त कैन बजाण,

भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !



आजकल का नौन्यालू कि इखारी रौड़,

बाबै की मोणी मा फैशन की दौड़,

यी क्य जाणा कन होन्दु मुण्ड मा टोपली

अर् कन्धा मुंद छातू लिजाण,

भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !



पढोंण का खातिर यूँ तै भेजि स्कूल,

अददा बट्टा बिटिकी ये ह्वाय्ग्या गुल,

घुमया-फिरया यी कौथिक दिनभर

दगडा मा लिकी क्वि गैला-दगडीयाण,

भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !



मुसेडै की डॉरौकु और पैसे कि तैस,

चुल्लू उजड़ीगे और ऐगिनी गैस,

यूँन नि जाणि कन होंदी बांज कि लाखडि

अर् व्यान्सरी मु फूक्मारिक चुलामुन्द गोंसू जगाण,

भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !



काटण छोडिक लाखडु अर् घास,

खेलण लग्यां छन तम्बोला तास,

घर मु गौडी भैंसी लैंदी ही चएंदी सदानी,

बांजी भैंसी गौडी कख फरकाण,

भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !



पेण कु चैन्दि यु अंग्रेजी रोज,

बै-बुबगी कमाई मा यी करना मौज,

जब कभी नि मिलदी यु तै अग्रेजी त्

देशी ठर्रा न ही यूँन काम चलाण,

भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !



खाणौ मा बर्गर, पीजा, चौमिन, दोशा,

नि मिली कभी त बै-बुबौऊ तै कोशा,

हेरी नि सकदा यु कोदा झंगोरू तै,

कफली अर् फाणु त यून कख बीटी खाण,

भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !



बदन पर युंका लत्ती न कपडि और,

वासिंग मशीन भी यी लैग्या घौर,

इनी राला घुमणा नांगा पत्डागा त

आख़िर मा ठनडन पोट्गी भकाण,

भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !



फैशन मुंद युंका इनु पड़ी विजोक,

कमर युंका इन जन क्वि सुकीं जोंक,

डाईटिंग कु युन्गु इन रालू मिजाज

त डाक्टर मु जल्दी यूं पड़लू लिजाण

भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !



भिन्डी क्य बोलू आप दगडी यांमा मैं,

आप भी पढ़यालिख्या और समझदार छै,

नी सुधर्ला त कैन मेरु क्या बिगाडंन

बूडेनदी दा तुमन भी आपरी खोपडी खुजाण,

भै ! मिन त गीत पुराणु ही गाण !



गोदियाल

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गढ़वाली कविता : बिरलु
 

बिलोका  की मीटिंग मा
व्हेय ग्या बिद्रोल
प्रमुख छाई कन्नू फिफराट   
चली ग्या कैरिक घपरोल
चांदु ठेक्क्दार  और पांचू प्रधान
कन्ना छाई ऐडाट
क्या व्हालू हमर ठेक्कौं कु अब
कन्न फुट कपाल
चतरू बुड्या हैसणु राई
थामिकी चिलम
बिरलु जी रुसालु
आखिर कज्जी तलक
फ्यारलू मुख दुधा की डिग्ची देखि
द्याखा धौं आखिर कज्जी तलक ?

 
रचनाकार : गीतेश सिंह नेगी ,सर्वाधिकार सुरक्षित
स्रोत : मेरे अप्रकाशित  गढ़वाली काव्य संग्रह   " घुर घूघुती घूर " से     

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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गढ़वाली कविता :द्वी अक्तूबर
गांधी का देश मा
हुणी च आज गाँधी वाद की हत्या
बरसाणा छीं शस्त्र- वर्दी धारी
निहत्थौं फर गोली - लट्ठा
सिद्धांत कीसौं मा धैरिक
भ्रस्टाचारी व्हे ग्यीं यक्ख सब सत्ता
जौलं दिखाणु छाई बाटू सच्चई कु
निर्भगी वू अफ्फी बिरडयाँ छीं रस्ता
ईमानदरी मुंड -सिरवणु धैरिक नेता यक्ख
तपणा छीं घाम बणिक संसदी देबता
दुशाषण खड़ा छीं बाट -चौबटौं मा द्रोपदी का
और चुल्लौंह मा हलैय्णी चा सीता अज्जी तलक
और गाँधी वाद बणयूँ चा सिर्फ विषय शोध कु
बणी ग्यीं कत्गे कठोर मुलायम गाँधी-वादी वक्ता
अब तू ही बता हे बापू !
द्वी अक्टुबर खुन्णी जलम ल्या तिल एक बार
किल्लेय हुन्द बार बार यक्ख
द्वी अक्टुबर खुण फिर गांधीवाद की हंत्या ?
निडर घुमणा छीं हत्यारा
लिणा छीं सत्ता कु सुख
न्यौं सरकारौं कु धरयुं च मौन
और लुकाणा छीं गांधीवादी मुख
और किल्लेय गांधीवाद यक्ख
न्यौं -अहिंसा का बाटौं मा लमसट्ट हुयुं च
और मिल त यक्ख तक सुण की अज्काळ
गाँधी का देश मा
गांधीवाद थेय आजीवन कारावास हुयुं च ?
गांधीवाद थेय आजीवन कारावास हुयुं च ?
गांधीवाद थेय आजीवन कारावास हुयुं च ?


(उत्तराखंड आन्दोलन के अमर शहीदों को इस आस के साथ समर्पित की एक दिन उन्हे इन्साफ जरूर मिलेगा और उनका समग्र विकास का अधूरा स्वप्न एक दिन जरूर पूरा होगा )


रचनाकार :गीतेश सिंह नेगी ( सिंगापूर प्रवास से,सर्वाधिकार -सुरक्षित, )

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मण मयारू

मण मयारू
मण मेरु आज बस मा णी राई
कंण विपदा घार कै गयाई
मण मयारू बोझ मा दबी ग्याई
खैरी का बस्गा घरु होग्याई
मण मयारू ..........

लूटपाट मांची जख भी जावा तख
त्रश्दी ही त्रश्दी छयी यख या वख
मयारू गढ़ देश भी अछुतु णी रही
म्यार लोगों की पीड़ा बढग्याई
मण मयारू ..........

यखार यखार रै रैकीं मै भी
याखरी सी ही मी होग्युं
एक शुन्य मा ग़ुम होग्युं
यथार्त से भागदा रैंगुओं
मण मयारू ..........

उकल उंदर पाटों मा पीस ग्याई
खैरी की कामणी छुट ग्याई
बंजा पुन्गाडा सी बंजा होग्याई
मयारू बीज कण मोर ग्याई
मण मयारू ..........

हरु हरु देख्दा देखाद मांण कालु होगई
जीवण की चरखी खेचता खेचता
ये दागड़या मण क्या बात होग्याई
मी कीले मी णी रहई ये मेर मण
मण मयारू ..........

ऊँचा हिमाल देखाद देखाद
मण मयारू केले छुटु होग्याई
सै णी कम णी का वास्ता है देबता
रोंल्लयुं का गदनीयौं संग बोगी गयाई
मण मयारू ..........

मण मयारू
मण मेरु आज बस मा णी राई
कंण विपदा घार कै गयाई
मण मयारू बोझ मा दबी ग्याई
खैरी का बस्गा घरु होग्याई
मण मयारू ..........

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http:// balkrishna_dhyani.blogspot.com
मै पूर्व प्रकाशीत हैं -सर्वाधिकार सुरक्षीत

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हीलंसा

हे उड्जा ये हीलंसा
उडी की देख जर सा
हे उड्जा ये हीलंसा....

आकाश भाटे कण लगदु
म्यार तेडा मेडा सड़की का बाटा
हे उड्जा ये हीलंसा....

कदगा रुअडी गैनी
ये सड़की का बाटा
हे उड्जा ये हीलंसा....

जो यख रहे गैनी
देख बता उनका हाला
हे उड्जा ये हीलंसा....

केले रोणी ये हीलंसा
विपदा णी सहेणी आजा
हे उड्जा ये हीलंसा....

देव भूमी च ये
मेर देबतो का आशा
हे उड्जा ये हीलंसा....

बोउडी कब आला ओ
कब आला अपर घारा
हे उड्जा ये हीलंसा....

तो सोचणी केले आज
सुरक उडैकी तु मीथै बथैगै आज
हे उड्जा ये हीलंसा....

हे उड्जा ये हीलंसा
उडी की देख जर सा
हे उड्जा ये हीलंसा...

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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सिखासौरि

 सुखदेव 'दर्द'

सिखासौरि मिन बि कर्यीं
पछां हींसि दौड़णि रै
रडै  खुटि्‌ट जतगा ऐथर
उतिगि पैथर खैंचिणी रै
खिंकिर्यों कांडा खुट्‌यों पिड्‌यां
गैंणा त्वड णौं छ्‌वीं लगाणू
बथौं उडि दि यों छुयों को
दुन्या हैंसि हैंसिणीं रै
भूख-तीस स्है नि साकि
ज्वनी निन्द सिईं रै
अँगिं खुटि्‌ट टेक-टेकि कि
बडि  आदिमि सैंतिणी रै
उतिगि पैथर खैंचिणी रै
भलु कैकु बच्ये नी छ
गिचु उस्ययूं तुमुड  सि
रवाडि  मा रैडि  ग्ये त्‌
खुटि्‌ट खड्‌वा खैंडिणी रै
उतिगि पैथर खैंचिणी रै
अफु खुणै त्‌ कबि नि सोचि

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डुबी मरो

 राजेन्द्र तिवारी 'राजू'

यौस करो-उस करो
बरसों बे सिखानैं रया, भौल करो
गीत हम सुणानैं रया
बात वैकि, पाल नि पड़ी, डुबी मरो।
किल किला मा बाँधी बेर हमुल
वाणी-वाणी, दुकान खोला, धत्‌ त्यौरो
पाणि लै हम पिलानै रया
तीस वैकी, बुझि नि सकी, डुबी मरो।
ग्वार-उज्याव मुखड ी कैं लिबे
भूक्ख कैं समझाण लागो, किलै सुणो
मन वैकी असंच नि सोची
त्यौड  पड ी, खुटौं कौं नि देखी, डुबी मरो।
अताव घिण-पताव प्रेम
त्राण कैकैं, दी नि सका, प्राण को
ठुल आदिम बनौणौं आसा
मन कैक, पखारि नि सका, डुबी मरो।

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दुःख
 
मदन मोहन डुकलान

दुन्या मा दुःख तब बि छाया
जब हम नि छाया
पर तब दुःख
इतगा घैणा अर पैना नि छाया
जतगा आज।
दुःख,
तब बि आंदा छाया
सतान्दा छाया/रुवांदा छाया
आदिम तैं अजमान्दा छाया
अर देखी
आदिमे सक्या वेका तापा
दुःख दुखयर्‌या ह्वेकि
लौटि जांदा छाया
आजै तरों,
बासा नि रैंदा छाया।
दुःख तब बि राला
जब हम नि रौंला
शैद वो
और बि घैणा
और बि पैना ह्वाला
तब लोग
दुःखु तैं कनकै साला
कनकै साला!

 

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