Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515257 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Sudesh Bhatt
August 16 at 9:18am ·

आज फिर दिल्ली मां
गौं की याद यैगे
फ्लैटु मां बंद छौं
वबरीयुं की याद यैगे
आज फिर दिल्ली मा
गौं की याद यैगे
मैट्रो की स्वचालित सीढी देखी
रुल्दीयुं की याद यैगे
अप्पू घर क झूलों मा
बड की लगुली याद यैगे
आज फिर दिल्ली मा
गौं की याद यैगे
बाथरुम क फुहारा देखी
छींचवाडों की याद यैगे
बिल्डिगों की लिप्ट देखी
ग्यूडु की याद यैगे
आज फिर दिल्ली मां
गौं की याद यैगे
औडोमास देखी यख
गंदयल कु पालु याद यैगे
एसी कुलर की हवा खैकी
गौं की धार याद यैगे
आज यीं दिल्ली मा
गौं की याद यैगे
फ्रिज की तिबासी खैकी
सैदी भूज्जी की याद यैगे
लोगु की कैपरी देखी यख
जंग्यों की याद यैगे
आज यीं दिल्ली मा
गों की याद यैगे
मदर डैरी देखी
दुधाल गौडी याद यैगे
डैनिंग टेबल देखी
ठीलकों की याद यैगै
आज यीं दिल्ली मा
गौं की याद ......
सर्वाधिकार सुरक्षित@लिख्वार सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dharampal Rawat
22 hrs ·

रचना नं-21

सभि दगड्यों थैं _/\_हथ जोड़ि प्रणाम अर् सेवा-सौंलि...,
त ल्या आज आपाकि सेवा मा पेश कनु छों कुछ दोहा....
___________________________________

क्वी अचरज न कर्यां, बुरु न मन्यां, न अपुड़ से मुंड रेच्यां ।
कलजुगा कि छुवीं छों लगाणु, भा-रे क्वी ढंडी न पोड्यां ।।

कि छुछों बल अजगर करे न चाकरी, अर् पंछी करे न काम ।
क्वी लूँण-रोटि को तरसे, अर् क्वी पोड़ि-पोड़ि खाये बदाम ।।

घुगुति खुदेंणि च अपड़ा हि मैत मा, ऐश करे कांणा-गरुड़ ।
नैनसिंग लगाणु जपगणि, अर् शेरसिंग लुक्युं खटुला मूड ।।

बुबा अमांणु च भितरा कूँण, ब्वै नि सम्भालि सकणि च तीग ।
अर् सौरसि लि जयां छि टूर फर्, कभि केरल कभि कश्मीर ।।

जैथैं क्वी घूंण खैं न उप्पन तड़कैंइ, इनु हमरु नेता ह्वै जाणु च ।
मि मोर्रि ग्युं ध्याड़ि कैकि, अर् वु 7 पुश्तों तक जोड़ि जाणु च ।।

स्याल त उड़ाणु च गुलछर्रा, अर् बाघा कि हुयिं च भाजम-भाज ।
कोठि-बंगला बण्यां छि, पर पचणू च सिर्फ BPL कु हि अनाज ।।

गढ़वाल रूंणु च गढ़वल्युं खुणे, नेपाल-बंगाल का ह्वैगि पहाड़ि ।
जलम भूमि जने ढुंगु ढोल्यालि, पर स्यकुण्द कनू च बल ध्याड़ि ।।

........ जारी है.....
____________

©® सर्वाधिकार: धर्मपाल रावत,
ग्राम- सुन्दरखाल,
ब्लॉक- बीरोंखाल,
जिला- पौड़ी गढ़वाल।
31.08.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Dharampal Rawat
August 31 at 11:06am ·

रचना नं-21

सभि दगड्यों थैं _/\_हथ जोड़ि प्रणाम अर् सेवा-सौंलि...,
त ल्या आज आपाकि सेवा मा पेश कनु छों कुछ दोहा....
___________________________________

क्वी अचरज न कर्यां, बुरु न मन्यां, न अपुड़ से मुंड रेच्यां ।
कलजुगा कि छुवीं छों लगाणु, भा-रे क्वी ढंडी न पोड्यां ।।

कि छुछों बल अजगर करे न चाकरी, अर् पंछी करे न काम ।
क्वी लूँण-रोटि को तरसे, अर् क्वी पोड़ि-पोड़ि खाये बदाम ।।

घुगुति खुदेंणि च अपड़ा हि मैत मा, ऐश करे कांणा-गरुड़ ।
नैनसिंग लगाणु जपगणि, अर् शेरसिंग लुक्युं खटुला मूड ।।

बुबा अमांणु च भितरा कूँण, ब्वै नि सम्भालि सकणि च तीग ।
अर् सौरसि लि जयां छि टूर फर्, कभि केरल कभि कश्मीर ।।

जैथैं क्वी घूंण खैं न उप्पन तड़कैंइ, इनु हमरु नेता ह्वै जाणु च ।
मि मोर्रि ग्युं ध्याड़ि कैकि, अर् वु 7 पुश्तों तक जोड़ि जाणु च ।।

स्याल त उड़ाणु च गुलछर्रा, अर् बाघा कि हुयिं च भाजम-भाज ।
कोठि-बंगला बण्यां छि, पर पचणू च सिर्फ BPL कु हि अनाज ।।

गढ़वाल रूंणु च गढ़वल्युं खुणे, नेपाल-बंगाल का ह्वैगि पहाड़ि ।
जलम भूमि जने ढुंगु ढोल्यालि, पर स्यकुण्द कनू च बल ध्याड़ि ।।

........ जारी है.....
____________

©® सर्वाधिकार: धर्मपाल रावत,
ग्राम- सुन्दरखाल,
ब्लॉक- बीरोंखाल,
जिला- पौड़ी गढ़वाल।
31.08.2015

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बित्युं जीवन

-

रचना -- महिमानन्द सुन्दरियाल

( जन्म 1928 , बडोली , गुराड़स्यूं पौ. ग . )

-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
-
ब्यखुन होइगे रुमक होणी च
जीवन को 'ओ' ! रात नजदीक ऐगे।
कुंगळो घाम खेलुम बीत /कभी कूड़ी बाड़ी कभी लुका चोरी
उमैली उमंग अर या तरंग /बचपन का दगड़ा अब वो चलिगे।
तीस बढ़दगै भर दोफरीम /टापी ही टापी तृप्ति नि होई
भटकदो रऊँ मैं डबका लगैन /फिरड़म ढळकां ह्वेगे।
गुठ्यर्यू की छाई डाळयूम जैक /सरकी सरकीक पाखोम गैन
ओ लालिमा सी अर स्वीळय घाम /डाँडों यैँच वोभी चलिगे।
छूटी ग्याया दगड़ो अब सौंजड्यों को , जौंळ मंगरी ये खोळयूं की धार।

-
( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )

Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

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पंचमी

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रचना --जीत सिंह नेगी (1927 जन्म , अयाल , पैडळस्यूं , पौ . ग. )
-

इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
-
पिंगळा प्रभात का घाम तै लेका , सूरज धार मा ऐगे
भैर औं धौं मॉँ की पंचमी , तेरी वसंत ऐगे।
कुंगळो हत्यूं ल देळी देऴयूँ मा, फूलू को रंग चढ़ीगे
दादी -भुल्यूं का गीतूं की ढौळ मा , ऋतुराज नाचण लैगे।
थर थर थतरांदो ह्यूंद की तैलो , घाम बि पैटण लैगे
फर -फर फरांदा रौंतेळा मैना मा , होली को रैबार ऐगे।
रूड़ी का मैनों को ठंडो बथौं , छैल बुलाण लैगे
तपदी हिंवाळी डाँड्यूं का पाणी ला , गंगा भरीण लैगे।
डाँड्यूं का मौऴयार दगड़ा पाखी पिंगळी फ्यूलड़ी कैगे
ग्वेरु का गीतूं मा कृष्ण सी जीतू की , बांसुरी बाजण लैगे।
स्वामी विछो मा खुदेड़ पराणी का , गीतूं मा समळौण ऐगे
हरिद्वार मा जन माळुसाईं तैं , राजुला बुलौण लैगे।

-( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )

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अबै दारु का नशाम त लमंड ले

रचना ----भगवान सिंह जयाड़ा
झूम ले , झूम ले , अबै दारु नशाम त झूम ले
लमंड ले , लमंड ले , दारुक नशाम त लमंड ले

कन फुके पहाड़ी समाज माँ या दारू ,
कनी छ हैंशदी मवास्यों कु या खारू ,
यख ब्यो बरात होंन या जन्म दिन ,
अब त यनु उलटू रिवाज देखि मिन ,
बिना ईका कार्योँ मा मजा नि रैगी ,
यन बात यख सबुका मन मा समैगी
, शराब छ त सभी लोग वाह वाह करदा
, नित सभी वीं मवासी का नौउ धरदा,
जैन जादा पिलाई वेकि वाह क्या बात ,
सभी देण्या छन यख यन लोगु कु साथ ,
खाणु पाणी कथगा भी जू खूब करदा ,
शराब नि छ ता लोग ऊं का नौऊ धरदा ,
मन्न जन्मण मा अब कुछ फर्क नि रैगी ,
या निर्भागी दारू अब सब जगा समैगी ,
अगर यनि यीं दारू कु बोल बालू रालू ,
दिन दूर नि ,जब दारु मा सब समै जालू ,
तब पछतैक कुछ हमारा हाथ नि औण,
अपरी गलती कु सबून यख बाद मा रोण ,
कन फुके पहाड़ी समाज मा या दारू ,
कनी छ हैंशदी मवास्यों कु या खारू ,

Copyright @ भगवान सिंह जयाड़ा दिनांक >१२ /०४ /२०१३

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मान्यताप्राप्त ! पलायन
-.--.--.--.--.--.--.-

थमेदीं नि अज्यूं भि लंग्यार, प्रवासीयूं का देश ,
पंक्ति फर पंक्ति
रूंदी पिड़ा जिकुड़ीयूं कि , कवीयूं कि अभिव्यक्ति !

नब्ज चयेंद पाड़ मा सांगल सि चयेंद जीवट इच्छाशक्ति !
यखुलि नि छौं मि बिना पंखूंणो
'पलायन पंछी'
मुंडमा सब्युं की माटै खैरीयूं की फंची ,
अकलकंठ की बात करद कुमति ।
जग्गा बदलि ,बदली त् गे भक्ति !
निरसू पलायन गीत ह्वे त् जालू बंद ....द्वी एक दिनु मा
प्रवासी भैबंद मान्यताप्राप्त नागरिक छीं बल !
अपंणा अपंणा प्लॉटुमा !
बंणिक पर्यटक आंदा-जांदा छीं अपंणा देश मा !
अर् खौल्ये जंदी बगछट मौलदा डांडौं कु अवारापन देखि अफ्वी ,
चम चलक्वार ऐ जांद मुखड़ीयूं
पहाड़ा सौंर्दयगीत लगंदीं जब आस औलदी प्रवासीयूं कि ।
.
सुनील थपल्याल घंजीर

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सुनील थपल्याल घंजीर
14 hrs

... जोग अर भोग ...

ल्हयूं छौ जोग जौंकु अंग्वाल बोटिक ...
आराम से गैं बल वो दुन्या ईं रीटिक ।।

आंणि जांणि रीत ईं दुन्या मा पक्की
जोग कैका बोतली कैकू ना यख ढक्की ।।

परवाणु का प्रांण भि बल वेलै हरीं
छ्वटा बड़ा थकुला किलै वैल करीं ।।

कैका जोग उकाल अटगी क्वी उंदार
उकल्या कु चुसणा उंदर्या कु संसार ।।

बैठ बात पते की म्वरदी दौ बरमंड
शान बान झूटी छै छाया करमू का फलदंड ।।
.
सुनील थपल्याल घंजीर

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डांडी कांठी हैरी हैरी ,चांदी कु हिमाल
ठण्डु ठण्डु पाणि गदिनियुं कु ,गंगा जी का छाल
रंगीलो कुमौं च मेरु ,छबीलू गढ़वाल
रौन्तेलु च मुल्क म्यारू ,रौन्तेलु पहाड़

पिंगली च फयोंळी जक्ख ,रंगीलू बुरांस
घुगती बस्दिन जक्ख , बसद कफ्फु हिलांस
खित खित हैन्स्दी जक्ख , डालियुं डालियुं ग्वीराल
गीत लगान्दी खुदेड घसेरी , वल्या पल्या स्यार
रंगीलो कुमौं च मेरु ,छबीलू गढ़वाल
रौन्तेलू च मुल्क म्यारू ,रौन्तेलु पहाड़

देब्तों कु वास जक्ख ,या धरती महान
धारौं धारौं मा पंवाडा भडौं का ,च बीरौं की शान
वीर माधो ,वीर रिखोला ,वीर कालू महान
वीर बाला तीलू यक्ख ,गढ़ चौन्दकोट शान
सिंह गब्बर ,सिंह दरबान ,सिंह जसवंत जक्ख ज्वान
वीरौं मा कु बीर भड , बीर कफ्फु चौहान
बीरौं की च धरती या बीरौं की च शान
रंगीलो कुमौं च मेरु ,छबीलू गढ़वाल
रौन्तेलु च मुल्क म्यारू ,रौन्तेलु पहाड़ .......

कविता : गीतेश सिंह नेगी

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दगड्यों... प्रणाम..
एक बार फिर एक नई रचना के साथ आपके समक्ष उपस्थित हूँ।
रचना सामाजिक विसंगतियों पर आधारित है।

दगड्यों... यह रचना मैं अपने बालसखा श्री जगमोहन बिष्ट "गुड्डा भाई "दिल्ली (आयानगर) को प्रेमपूर्वक समर्पित करता हूं।

बक्कीबात
----------------

पळौ कुकर कटणा छन , बक्कीबात ।
हरिबि हमतैं चटणा छन , बक्कीबात ।।

इच्छाधारी "छिपोड़्यामैन" हमरु गौं मा ।
नै - नै लगुली कटणा छन बक्कीबात ।।

कुकर काखड़ एक भद्वळिंद मुंड कुच्याकि ।
दगड़ि परळि चटणा छन बक्कीबात ।।

वैकु ब्वल्यां फर आंखा बूजिकि रट्वा त्वाता ।
रटयूं पाठ रटणा छन बक्कीबात ।।

बिजांद -बिजांद सियां छन सि फस्सोरिकि ।
सि , दिन अपुडा़ कटणा छन बक्कीबात ।।

हम हुयां रौ यूंखुणै बावन पत्ता ।
फटणा, कटणा, बंटणा छन बक्कीबात ।।

घटण लगींच उमर, औकात मेल - जोल ।
आदिम तलक घटणा छन बक्कीबात ।।

 

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