Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 146960 times)

Bhishma Kukreti

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घुघती*
गढवाल में सामजिक व सांस्कृतिक परिवर्तन की छटपटाहट दर्शाती गढवाली कविता
कवि – सुरेश स्नेही

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वा घुघती यख अब नी रयीं,
जू ब्वेकु रैबार लौन्दी छैई,
मैत्यूंकि छ्वीं बतैकी हमेश,
खुदेड़ बेटी ब्वारयूं बुथ्यौन्दी छैई।
कै मील उड़ीतैं औन्दी छै ज्वा दूर,
बासौं रैकि तैं जान्दी छैई,
बेटी ब्वारयूं कु रंत रैबार,
वींका मैत्यूंमु पौछौन्दी छैई।
अब ना उ बेटी ब्वारी रैगिन जौतैं,
खुद लगो अपणा मैतै की,
घुघती जगा मोबाइलून लेली,
जू सैदा लगौन्दिन सब्यूं की।
डाली बोटी, घौर बौण सैरी,
काटि लीन गौमा मनख्यून,
जख बणौन्दा छा घोळ अपणा स्यू
यून सैरा जगैकि फूकिलीन।
घुघती कि घूर घूर अब कखि सुणेन्दी नी,
घुघती बासुती बाळौ तैंं सिखायेन्दी नी,
चौक तिवारी सैरी बॉजा पड़ी छन,
बिसगूण खान्दी घुघती कखी दिखेन्दी नी।
घुघत्यून बि अपणू रैबासू बदलीयाली,
डॉडी काठ्यूं छोड़ी सैरू तिरपॉ उडणै सोच्याली,
अणमिलौ ह्वेगिन मनख्यू दगड़ी सीबि यख,
जिद्द अर हींसा ठींसा यूनबि सिख्याली।
*सुरेश स्नेही,*


Bhishma Kukreti

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पाणी आँख्यूंक्”
गढवाली कविता – कमल जखमोला
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कंठ भरि आंद,आँख्यूं भरि अंदिन अँसधरि,
जिक्ड्यूं जम्यूं पीड़ा ह्यूं गsल़ी बण जंदिन....अँँसधरि।
रीती आंख्यूं मा रीता खीसों की तस्वीर ,
दुखी लाचारूंकि छन् अप्ड़ि जागीर.............अँँसधरि।
द्वी बोल प्रेम मा भाषा बण जंदिन,
लुकाई जै दुनिया से,समिण लै अंदिन............अँसधरि।
खुद्द मा कैकी ,खुदेई की खुद खुदै जंदिन ,
बिना रंग ही झणिं कतगा रंग दिंखे जंदिन.......अँसधरि।
हर बार दुख पीड़ा, लाचारी नि छन्,
कै देखि,कै मिलि,खुशी भारी भी छन्.............अँसधरि।
कैकु महेज पाणी,कैकी आंख्यूंsक पाणी,
द्वी लकीर गल़्ड़यूं,जिंदगी की पूरी कहाणी........अँसधरि।
.......कमल जखमोला

Bhishma Kukreti

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लौक डाउन  डाउन मा आजकल
महाभारत द्येखि तैं म्येरी एक कविता :-
🌷🌷खुसुर फुसुर 🌷 🌷

कविता –जगदम्बा चमोला
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अपणों पर विश्वास नि रै
अब अपुड़्वे खाणौ औणू च
पण्डौं मा धर्मराज जु छौ
सू अपणै भयों ठगौणू च
नारी नर रण चण्ड बण्यां छिन
खून को खप्पर च्वोणूं च
कैल ब्वेलि कि आज नि ह्वन्द
अब भी महाभारत ह्वोणू च
बाबू बण्यूं धृतराष्ट्र सु अपणां
नौनूं तैं पुळक्योणू च
गन्धारी दड़ि पुत्रमोह मा
अब भी दगुड़ु पुर्योणू च
आज भी शकुनी घर घर मा
खुद फांसै चाल बिछौणू च
राज को लोभी दुर्योधन यख
एम प्यो टिकट ख्वज्यौणूं च
अर्जुन आज अवार्ड बणीं स्वो
शील्ड कमीशन द्यौणू च
पार्क मा योग करी तैं भिमषण
अपणों प्यौट घटौणू च
नकुल ह्वयूं नाराज भैयों दड़ि
यख बैन तख सरकौणू च
सहदेवन त प्लौट ल्हीलि सु
तब बै घौर नि औंणू च
कृष्ण तैं अब क्वे मतलब नी
सु दार्वा ठ्यका चलौणू च
द्रोण रिटायर ह्वयू्ं च गौं मा
प्रधानौ रौंफ्यौंणू च
भीष्म जयूं च सड़क बणौणौ
दिनभर ध्याड़ि कमौणू च
कर्ण त घौर मूं ऐ तैं अपुड़ी
कोटै बोतळ प्यौणू च
तख्त बदलिगिन ताज बदलिगिन
पर अब भी मन भरम्यौणू च
कैल ब्वेलि कि आज नी ह्वे
अब भी महाभारत ह्वोणूं च
जै पर छौ विश्वास सिं अपणा
हक्वे काम बट्यौणा छिन
कलयुग का ये कुरुक्षेत्र मा
सबुतैं नाच नचौणा छिन
गंधारी की टक्क लगीं
दुर्योधन घर मा रोणूं च
बिधुर बण्यूं प्रधान पती
सू जगु जगु ठप्पा लगौणू च
भीष्म अजूं भी पड़्यूं च गौं मा
कृपाचार्य समझौणू च
जब कौरब पण्डौं द्यौस चल्यां
तू यखुली यख क्यां रौणू च
कुन्ती मन मायूस ह्वयीं
अब तैं दड़ि क्वे नी रौंणू च
विधवा पेंशन मा तैंक्वो अब
अंतिम समय कट्यौणू च
शास्त्र का सबंत पैल्ये नि छा सीं
अब भी क्वे नी रौंणू च
कैल ब्वेलि कि आज नि ह्वे
अब भी महाभारत ह्वोणू च
सुभद्रा का भक्ति भाव मा
ढोलक तबला धौर्यां छिन
सत्यवती का साथ मिली
घर गौं मा कीर्तन ह्वोणा छिन
पर बजर पड़ी यन आग लगी
हम भी तै गौं मा रौणा छिन
जख शल्य सिखंडी ब्लैकौ दारू
घरु घरु तक पौंछौणा छिन
पर चुप्प ह्वयां छिन ब्वना नी क्वे
ना क्वे कै समझौणू च
दारू पी शिशुपाल त अब भी
नट्टी सट्टी द्यौणू च
द्रोपदी फोन मा पोस्ट कनी
दुशासन लाइक द्यौणू च
भबरिक मैसेंजर मा जै तैं
जग जगू फोन घ्वच्यौणू च
भितरा भितरी सब संट बण्यां
अब सबकुछ डिजिटल ह्वोणू च
कैल ब्वेलि कि आज नि ह्वन्द
अब भी महाभारत ह्वोणू च
इन्द्रप्रस्थ मा अभीमन्यु अब
ब्यूह की कोचिंग ल्यौणूं च
द्रोपद देरादूण बस्यूं तख
प्लौट कमीशन द्यौणू च
अस्वथामा स्वस्थ नि रै
सू जगु जगु नब्ज दिखौणू च
धन्य च द्रोण जु पेन्शन मा तू
यतुनो खर्च पुगौणू च
स्वार्थ का सीधा सौदा मा यख
पात्र भी कुछ बदल्यौणू च
पर कैल ब्वेलि कि आज नि ह्वे
अब भी महाभारत ह्वोणूं च
सरकारा यन ब्यूह बण्यां यख
सबतैं चक्कर औंणू च
बेरोजगार्या चक्रब्यूह मा
हर अभिमन्यु पिस्यौणू च
यीं राजनीति की बलि बेदी मा
पिता पुत्र तैं ख्वोणूं च
आज त सूर्य को अस्त भी ह्वे पर
तब भी अर्जुन रोणूं च
यीं कुटिल चाल की राजनीति मा
क्वे ख्वोणू क्वे पौणू च
कैल ब्वेलि कि आज नि ह्वे
अब भी महाभारत ह्वौणू च
आज भी पेट मा संतति मारी
यख ल्वो गाड बगौणा छिन
आज भी बाबा लोगों का
बरदानी पुत्र जण्यौणा छिन
आज भी राज का खातिर यख कै
भीषण जाळ बुण्यौणा छिन
आज भी लक्षागृह जन यख कै
आहुति काण्ड सुण्यौणा छिन
आज भी भै छिन खून का प्यासा
आज भी मार कट्यौणा छिन
कैल ब्वेलि कि आज नि ह्वे
अब भी महाभारत ह्वोणा छिन
---Jagdamba chamola ----


Bhishma Kukreti

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करोना का बीर

गढवाली गजल – सुधीर  बर्त्वाल (प्रसिद्ध कहावत व पहेली संकलनकर्ता )
Garhwali Gajal dedicated to corona warriors those are far from their homes and kin 
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कुजाणि आज य आग यति भभराणी किलै च?
त्येरी जिकुड़ी म्येरी खुद मां रफड़ांणी किलै च?
भग्यानी भोळ फिर होलु उजाळु, हैंसलु बसंत
द्वी दिनों की खैरी सैजा, तू बबराणी किलै च ?
लगौला बैठीक तों खट्टी-मिठी छ्विंयों का खुम्ब
चमकलु डांडि्यों मां घाम,तू थथराणी किलै च?
घेंटला ठंगरा, द्योला माया कि लगुली तैं सारु
रौजली प्रीत कि काखड़ी,तू रंगताणी किलै च?
बासला पौंन-पंछी, होलि सनक्वाळि रतब्याणी
त्येरी रुगबुग्या आंखि,बोल बबलाणी किलै च?
बकळि माया कि दाळ,गौळली अब माठु-माठु
बगत अभी सजिलु नीं च,तू कबलाणी किलै च?
Copyright @सुधीर बर्त्वाल

Bhishma Kukreti

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रिवर्स पलायन
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लाॅक डौन सृजना ये क्रम मा "रिवर्स (व्युत्क्रम ) पलायन" पर आपा आसिरबाद से दुसरो गीत आपै सेवा मा सादर ।जन भि होलो 95 शेयर अर 3.6 K व्यूज दगड़ि पैलो गीत आपतैं ठिकि-ठिक लगि, आपन गीतौ मान बढ़ायि यु मेरो सौभाग्य च भौत-भौत धन्यवाद । जल्दि ही हळ्का- फुळ्का ये गीत तैं भि गाणौ प्रयास करलो------
गढवाली कविता - वरिष्ठ कवि ओम प्रकाश सेमवाल

'जमीन बटि उठीक शून्य से शुरु कैजा'-------
हाथ-खुट्यों चलै दे अळगस भगै दे
कूड़ि-पुंगड़ि उदास भ्येट्यौ यों बुथ्ये दे
पबित्र जल्म भूमी त्वे धध्यौणी च ऐजा
बसै दे नै दुनिया खुद लगीं च ऐजा
पबित्र मातृ भूमी त्वे धध्यौणी च ऐजा--------
ब्वे-बाबौ बुढ़ापो बिपदों मा कटणू
एक ब्यळी को खाणौ द्वी-तीन ब्यळी पुगणू
बंधै जा तौं तैं आस पुंगड़्यों पछण्न ऐजा
कठिण छैंच लाटा यों फेर से लै लहै जा--------
निराश छिन जु भैर तौं बेरोजगारों बुलै दे
छैंच सबुमा हिकमत त साग-भुज्जी उगै दे
पकड़ा फौड़ु सबळी रौलि-बौल्यूं तैं बट्ये जा
बग्वान-बाग सग्वड़्यों बणों मा हर्याळि ल्हे जा-------
कर भल्यार ढब्वटा तलौ खाळ भरि दे
माछा पाळ घोड़ा बखरा गौड़ि- भैंसि गाजि बाँधि दे
कर त्यार रोजगार पाड़ों कि सेवा कै जा
जमीन बटि उठीक शून्य से शुरू कै जा--------
'पलायन रिवर्सा' सुपिन्या साकार कै दे
मवार छबड़ि फाँट म्यळाग -अग्याळ दे
छोटा-छोटा उद्योग अपणौ घराट चळ्दा करि जा
अग्वनि खेत्रपाळ बीर सूत्रधार बणि जा--------
@सर्वाधिकार सुरक्षित

Bhishma Kukreti

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घार
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गढवाली कविता : राधे बहुखंडी
A Garhwali poetry by Radhe bahukhandi
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घार  हमरू बड़ू छा,
सब्यूँ खुंणि खड़ू छा।
एक बिस्सि मनखि पट्ट,
एकि धै मा दगडि झट्ट।
दाजी खुंणि चिलम पाणिं,
मिलदा च्युडा तिमला दांणिं।
दद्दि पिछने लुकदा छाया,
घुंडा ऊंका दुखदा छाया।
ब्वाडा जी की भारी डैर,
ब्वाडा भितर नौंना भैर।
बोडी नौंणिं गडदि छे,
छांछ सबथे बंटदि छे।
पितजी ल्यांदा चिमनी बाति,
लैट जांदी रोज राति।
मां बणांदि छंछ्या रोज,
भदलचट्टा भुल्ली कि मौज।
काका ब्वादा पढै कारा,
रीता भांडा बिद्या भ्वारा।
हमरि खास दगड्या काकी,
जन्न आरा लींणां ढाकी।
दीदी ल्यांदी तौला पींडू
घास काटी दथडी ख्वींडु।
द्वि जोडी बल्द छाया,
काका जोंथे ख्वल्द छाया।
कालि रंगा गौडी छै
कांसि थकुलि डौंरि छै।
क्वलण पिछने मैलु डालि,
लुक-लुकि दींदा छा गालि।
चौका तीर पिंगला फूल,
पांणि चरणां त्वडदा कूल।
अब ह्वेगे #घार छ्वट्टु,
प्राण किले ह्वाई खट्टु।
दोष बुने कैम नीं,
बात कना टैम नीं।
आज ह्वेगिं रुप्या-कार,
जबरि छुट्टु ह्वालु #घार।।
©®
🔏राधे बहुखण्डी
पौडी गढ़वाल/ हरिद्वार
३०/०४/२०२०


Bhishma Kukreti

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                      " लोग "

(वरिष्ठ गढवाली कवि संदीप रावत की असलियत , दिखाती व्यंग्य करती  मनोवैज्ञानिक गढवाली, गजल  कविता , गढवाली लोक गीत )
               
झूटी- सच्ची बुज्याड़ि जिकुड़ी धरदन लोग
मुखड़ी देखी सामणि  टुकड़ी डलदन लोग ।

हुणत्यळि डाळी का मौळंदा पात देखीक
झट्ट जलड़ौंम छांछ  संग्ती डलदन लोग ।

दूधौ-दूध ,  पाण्यो- पाणि द्यिख्येंद  सब्यूं
पिछनै बाघ सामणि बिराळि बणदन लोग ।

सब्बि जगौं क्वी बण्यां रौंदन भौत पर्वाण
हैंका  तैंकम  झट्ट पक्वड़ी तलदन लोग ।

जणदा नी बल मंत्र द्येखा बिच्छी को
सर्प द्वलणी हत्थ  फिर्बी कुचदन लोग।

मिल्द जब हे स्याळ ददा वळो पट्टा "संदीप "
अफ्वी औतारी अफ्वी पुजारी बणदन लोग।
               © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल

Garhwal se असलियत , दिखाती व्यंग्य करती  मनोवैज्ञानिक  गढवाली लोक गीत, गजल ; श्रीनगर से असलियत , दिखाती व्यंग्य करती  मनोवैज्ञानिक  गढवाली गजल , लोक गीत; पोखड़ा से असलियत , दिखाती व्यंग्य करती  मनोवैज्ञानिक  गढवाली गजल, लोक गीत

Bhishma Kukreti

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लड़ै कठिण च

गढवाली कविता – बीना बेंजवाल

लड़ै कठिण लड़णू मनखि
बलि वैश्विकतै चढ़णू मनखि
अपणि सक्याऽ धीरज का बल
दिन कोरोना गणणू मनखि
खांसि-छींक छै छ्वीं साधारण
कसूर ह्वेगि करोना कारण
देखी अपणौ तैं ही आज
जाणीऽ अजाण बणणू मनखि
लड़ै कठिण.........
गिच्चा मास्क जब हवा साफ
घड़ि-घड़ि धोण पड़णा हात
फिर अपणि मा कै अपणै
गति-मुक्ति कन्नौ डरणू मनखि
लड़ै कठिण...........
कबि भूकु तीसु रै तैं
कबि रेलै पटर्यूं स्ये तैं
कबि सड़क्यूं चलि मीलों पैदल
सांस आखिरि गणणू मनखि
लड़ै कठिण..........
समझद छौ तनीऽ समाज
कोरोना योद्धा बण्यां सी आज
सोच पुराणी करी सैनीटाइज
विचार नया गढ़णू मनखि
लड़ै कठिण.....
दुन्यै छोड़ी भागमभाग
स्वार्थ लालचौ करी त्याग
बैठी अपणा दगड़ा यूं दिनों
अफु तैं अफ्वी पढ़णू मनखि
लड़ै कठिण.......
अद्येखा बैरी देखी तागत
दुगणा कन्नू अपणि हिकमत
ल्यौणौ मनख्याता आली सुबेर
खाड अंध्याराऽ खणणू मनखि
लड़ै कठिण.....
ताळाबंदी देस दुन्या जब
आॅनलाइन काम-धाम सब
नया हिसाब से अपडेट
बाटा नया बढ़णू मनखि
लड़ कठिन.......
दिखेणू दूरै बिटि हिमाल
छाळा ह्वे बगणा गंगाळ
धर्ति का सब्रो देखी फल
तसबीर भोळै गढ़णू मनखि।
लड़ै कठिण.....

सर्वाधिकार – बीना बेंजवाल

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Durga Datt Joshi
 
ईजा जसि क्वे नं।
ईजा भगवान जसि।
भौतै भलि अणकसि।
जदुक लै भोजन बणालि।
पैंनि नान्तिन खवालि।
फिरि बचि गै ठीक भै।
अतरि मैंनि खा हा कैदेलि।
जो आपण नानतिनाक वीलि ज्यूंन छ।
ज्यैक लिजि आपण परवारै संसार छ।
तसि हुनेर भै ईजा।
हमरि धें जीरौं ईजा।
बस जैकि ईजा खुशि रौं।
नानतिनाक दगडि बेइमी रौं
ऊई नान्तिन भागवान छन।
जनार थैं ईज भगवान छन।


एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Sharma Harish
 
सब टैम-टैम बात छ हो,
कस टैम छी, कस टैम एगो,
पैली हम बल्दौ गिच पे बाधची महाव,
आज हमरै गिच पै लैगो,
फर्क येतुकै छः
जैहे पैली हम महाव कौछी,
आज वी नाम मास्क हैगो।
कस टैम छी कस टैम एगो।🙏
😄😄😄😄😄😄😄

 

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