Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515340 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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विता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
September 11 at 9:45pm ·

मेरो पछाण

मेरो कल्पना कू उड़ाना
मेरो पहाड़ मेरो पछाण

नि जाणा कभी छोड़ी ते
मिल ये सात समुदर पार

मिथे च ये मेरु भान
यख रैकी ही येल बण महान

ये मेरो सुंदर घरबार
मेरु उत्तराखंड मेरु प्राण

साफ सुथरु मेरु गढ़देश
रंगीलो कमो छबीलो गढ़वाल

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार सुरक्षित

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Darshan Singh
22 hrs

उदास घिंडुडु

ए घिंडुडी, इनै सूणिदी।
क्या स्वचणी छै मी बि बतादी।

जणणू छौं मि, जु मि स्वचणू छौं,
तुबी वी स्वचणी छै,
तबी त म्यारु छोड़ नि द्यखणी छै।

हालत देखिक ए गौं का,
त्यारा आंख्यू मा पाणि भ्वर्यूंच।
इनै देखिदी मेरी प्यारी,
म्यारु सरैल बि उदास हुयूंच।।

अहा, कना छज्जा, कनि उरख्यळी।
वूं डंडळ्यूं मा खूब मनखी।
पिसण कु रैंदु छाई, कुटण कु रैंदु छाई,
वूं थाडौं मा खूब बिसगुणा रैंद छाई।
दगड्यो का दगडि हम बि जांदा छाई,
वूं बिसगुणौं मा, वूं उरख्यळौं मा, खूब ख्यल्दा छाई।

अर हाँ, तु बि क्य, फर फर उडांदि छाई,
ड्वलणौं थै नाचिकि कनि बजांदि छाई।
वू डूंडु घिंडुडु, अब त भाजि ग्याई,
पर त्वैफर वु कनु छडेंदु छाई।
मिल बि एक दिन वु कनु भतगै द्याई,
वैदन बटि वैकि टक टुटि ग्याई।

सुणणी छै न,
म्यारु छोड़ द्यखणी छै न।

एक दिन कनु तु,फर फर भितर चलि गै।
भात कु एक टींडु, टप टीपिक ली ऐ।
वैबत मिल स्वाच, बस तु त गाई,
हाँ पर तुबि तब खूब ज्वान छाई।
जनि सर सर भितर गैई, उनि फर फर तू भैर ऐ गेई।

जब तु फत्यलौं का छोप रैंदि छाई,
मि बि चट चट ग्वाळु ल्यांदु छाई।
सैरि सार्यूं मा खेति हूंदि छाई,
हम जुगा त उरख्यळौं मा ई रैंदु छाई।
खाण पीणकी क्वी कमि नि छाई।

झणि कख अब वू मनखी गैं, झणि किलै गौं छोडिकि गैं।
हमरा दगड्या बी लापता ह्वै गैं,
स्वचणू छौं सबि कख चलि गैं।

मेरि प्यारी,सुणणी छै ई-
स्यूं बुज्यूं हम जाइ नि सकदा,
वूं बांजि कूड्यूं देखि नि सकदा।
हम त मनख्यूं का दगड्या छाई,
मनख्यूं का दगडी रैंदा छाई।

चल अब हम बी चलि जौंला,
मेरी घिंडुडी -
कैकि नि रै या दुन्या सदनी,
इथगि राओल यख अंजल पाणी।

छोड अब जनि खाइ प्याइ पिछनै,
चलि जौंला चल हिट अब अगनै।
वूं मनख्यूं कू सार लग्यां रौंला,
बौडि जाला त हम बि ऐ जौंला।

सर्वाधिकार सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई "
दिनांक 16/09/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Darshan Singh 
August 25 at 11:56am ·

रखडी (राखी) कु त्योहार नजदीक च। जौं कि भैणि या भाई नि ह्वाला, वूं थैं कनु लगदु होलु। --------------------------------------------------

कनू छै विधाता तू त निरदयी रैई।
रखडी त्यौहार द्याई भैणी नि देई।।
कनु छै विधाता तू त निरदयी रैई।
रखडी त्यौहार द्याई भाई नि द्याई।।

एक भैणी मीकू दिंदु क्या बिगड़ी जांदू।
ए त्यौहार मि भि त्वैकु भेट पिठै ल्यांदु।।
एक भाई मीकू दिंदु क्या बिगड़ी जांदू।
ए त्यौहार मि भि त्वैकु भेट पिठै ल्यांदु।।

जौं भयों कि भैणि ह्वैलि रखडी पैराला।
बिना भैणि वळा छ्वारा प्यटा प्यटि र्वाला।।
जौं भैण्यू का भाई ह्वाला रखडी पैराली।
बिना भायों वळी छे्वरी प्यटा प्यटी र्वेली।।

त्योहार का बान सुदी दंतुडी द्यखाला।
आंख्यू का कूणू मा छ्वारा आंसू लुकाला।।
त्योहार का बान सुदी दंतुडी द्यखाली।
आंख्यू का कूणू मा छ्वेरी आंसू लुकाली।।

दगड्या भग्यान म्यारा रखडी पैराला।
अपणी भैण्यू का हथौं खटी मीठि खाला।।
दगड्या भग्यान मेरी रखडी पैराली।
अपणा भयों थै टीका पिठैई लगाली।।

त्योहार कू भैणी नि दे त्यारु च कसूर।
खुशि कनकै मनौलु नि दे घार पूरू।।
त्योहार कू भाई नि दे त्यारु च कसूर।
खुशि कनकै मनौलु नि दे घार पूरू।।

निठुर समिझि मिल, क्याच तेरी माया।
धर्म्यालि भैणि, त्वैन मीकू दे ही द्याया।।
निठुर समिझि मिल, क्याच तेरी माया।
धर्म्यालु भाई, त्वैन मीकू दे ही द्याया।।

ऐंसु की रखडी,देवी तु ह्वै जैई दैणी।
भैण्यू थै तु भाई देई,भायों थैई भैणी।।
ऐंसु की रखडी, देवी................

सर्वाधिकार
सुरक्षित @दर्शनसिंह रावत "पडखंडाई
दिनांक 25/08/2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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हमरा मुख्यमंत्री
जी न बोली
आपदा का दौरान
अगर वूंका
अफसरों न मैंगू
भोजन करी
दस रुपय्या चीज
सौ रुपयों म खै
ता क्या ह्वे ?
जनता तैं इत्गा
मर्च किले लगे ?
वो ता अफसरों को
मीनू म छौ
तौन खाणु ही छौ।
ठीक बोली आपन
रावत जी आप
सरकार छा
आपकू प्रताप
सब कुछ होणु च।
पर एक बात बतावा
उत्तराखंड म अमणि
जनता का पैसों की
जो बरबादी हुणि च,
रेता माफिया, बजरी माफिया
क्रेशर माफिया, जल, जंगल माफ़िया
हौरि त हौरि
मीडिया माफिया बी जो
अमणि यत्गा बलवान
हुयूं चा वों तैं
कख बिटि साहस मिलणु चा?
अमणि उत्तराखंड म
यानि छूट किले ह्वै ?
यु .............. !!
कै मीनू म छौ ?। साहित्यकार, दिनेश ध्यानी। ३/६ /१५

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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बाल उड़िगी जब बटे शैम्पू लगाई।
आँखा फुट्टिगी जब बटे नेट चलाई।।

फेशा कु भि भलिके बिणांस ह्वाई।
बन-बनिकि क्रीम-पौडर जु लगाई।।

व्यसनों कि लत कलेजु फूकी ग्याई।
यु जिकुडु भि अब कामा कु नि राई।।

फ़ास्ट फ़ूड खै-खैकि अंदड़ा सड़ाई।
हड़गों मा बगतल हि कीर्तन कराई।।

रुपय्या-पैंसा त तिल खूब कमाई।
पर सब डॉक्टरों जुगता हि ह्वाई।।

शुद्ध पांणि पेकि बड़ु गालू उबाई।
पेप्सी-कोक ला खूब तीस बुझाई।।

घारा कु खाँणा मा स्वाद हि नि पाई।
भैरा कु बासि-तिबासि खूब पचाई।।

घरर्या नुस्खों कि क्वी कदर नि काई।
इलैई रे आज त्यारू यु कुहाल ह्वाई।।

सिकासैरियों मा तिल कन मौ गंवाई।
तन मन अर् धन कु सत्यानाश काई।।

©® सर्वाधिकार: धर्मपाल रावत,
ग्राम- सुन्दरखाल,
ब्लॉक- बीरोंखाल,
जिला- पौड़ी गढ़वाल-246169.
09.09.2015

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अपणो मुल्क

-रचना -- जगदीश बहुगुणा 'किरण ' ( जन्म - 1932 , बुघाणी , चलणस्यूं , पौड़ी गढ़वाल )
Poem by - Jagdish Bahuguna 'Kirna'

-इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
-
मिन त नि जाणी कि अपणो मुल्क भि मुल्क मनिख तै इथगा रुवालो !
बोल्नु कु नौं च अपणो भि गौं च , छन द्वी पुंगड़ी दूर दूर
सौण भि सर्ग खरायुं रहंदू , होंदी नि बरखा की बूर बूर
काळा घम्मु मा , माटाअ कम्मु मा , होंदन हडगा चूर चूर
अर झक् झक् दिन भर जिकुड़ी को होलो
सुखीक पीना -पराळो !
दिन भर फ़िरडि कि डेरा मु ऐकी ह्वे जांद चित्त फीको सी
खट्टा डंकार ऐकि द्वी चार करदन मन क्याप तीखो सी
देखीक झांडी रीती राती म हेरीक कूड़ो रीतो सी
अरे जब्क लगालो मनिख बिचारो
ल्हेकि हाथ मुछ्याळो !
वु भैर मुछयाळो अर दिल मा मुछ्याळो छांदन आंख्युं रात
अर जोन जुन्याळि भै लगदि नि छाळी , करदी मन को क्वात
खौरी -खौरी डेरा खयेंदी , कन क्यांकु खाणै कि बात
अर ह्वे जांदो गाँस्यूँ को खूब ठट्टा
रै जांदी जिकुड़ी तिसाळो !

-( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any

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पहाड़ी कख हर्ची , सर अर युवर्स फेथफुल्ली का बीच ?

-
रचना -- गोकुलानंद किमोठी ( जन्म 1930 , किमोठा , पोखरी च ग )
-
इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
-
कुछ दिन पैली देखी
एक कौथिग , नेहरू स्टेडियम की छोटी पहाड्यूं पर पहाड्यूं को
ढोल दमौ , गीत प्रीत , मिठै सिठै
सब्बि सुणी , करी , चाखो छै ,
पर ह्वैगे छै बिसर्याँ जमाना की बात ,
याद छ त नार्थ ब्लॉक अर गुलाबबाग का बस स्टैंड ,
यस सर अर युवर्स फेथफुल्ली का बीच ,
पहाड़ी कख हर्ची, मेरा छैल तै बि पता नि लगी
कखि अंग्वाळ (डंडरियाळ ) पढ़ी
जग्वाळ (पारु ) देखी
अर्ध्ग्रामेश्वर (धष्माना ) करी
पर बिजल्वाण नि मिली
कौथिग मा मिन देखी बिकट दंदांलो
बरसों कि बिस्मृति को घास
स्यूं जलड़ो भैर आये तब देखणी पाअड़
अफु से भैर आइक मिन देखी त हकाणो ग्यो मि
येकुला चणा अर भड़भूजा का भाड़ की अबारे कथा हि सच हूणी थै
पहाड़ त सब दिल्ली ऐगें फिर मि यकुल वापस
तबारे धरे कैन मेरा काँध ऐसा हाथ
यु मैं हि थौ अप्पू सांस अफ्वी बन्धौणू
पाsड़ त फ़ैल जालो दुनिया मा
पाsड़ मा रै नि रै पर जड़ियु रै रे जलड़ों से
मी आज भी जुड़्यूं छौं पहाड़ से अपणा पहाड़ से।

-( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )

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दीवा जसी जोत (बाजूबंद शैली में रची गयी आधुनिक कविता )
-
रचना --केशवा नन्द ध्यानी (1926 )
-

इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
-
चंदी गड़ी बन्दी
कैकी सुआ ह्वेली /इनी लगुली सी लफ़ंदी
दीवा जसी जोत
चदरी की खांप
कैकी सुआ ह्वेली / इनी सैल जसी लांप दीवा जसी जोत
पाणी जसी पथळी/ रुआँ जसी हपळी
डाळी जसी सुड़सुड़ी /कंठ की सी बडुळी
बखर्यों तान्द,
कैकी सुआ ह्वेली
इन राजुला सी बांद
दीवा जसी जोत
धुँआ जसी धुपेली /नौ गज की धमेली
राजुला सी राणी /केळा जसी हतेली
शंखा की टँकोर
कैकी सुआ ह्वेली /इनी टपरांदी चकोर
दीवा जसी जोत।
नौ सोर मुरली
गीतांग सी गौळी
बुरांस जनी फूल
फ्योंळि जनी रौंतेली।
लगुली लचीली
कै चाल चलदी सुआ
साज सी सजीली
दीवा जसी जोत।


( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )Copyright @ Bhishma Kukreti interpretation if any Modern Garhwali Folk Songs, Modern Garhwali Folk Verses

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कखड़ी चोरेकी लाई छों

कखड़ी चोरेकी लाई छों
त चल बैठी जोंला उस डाली के तौलि
ना कोई देखे, ना पहचाने
छिप जायें उस पहाड़ के पीछे

ककड़ी चोरेकी के लाई छों ...

कल बोड़ा बिजी गया था
मेरे पीछे ढुंगा लेके आ गया था
अरे ब्याल जो होना था व्हैग्याई
आज अब आज की सोचा
बिजी गै तो बिज ने दो ना
अच्छा ? हाँ
त चल बैठी जोंला...

चल उन चलूं पर इन खुठों दगडी
दूर वखि उडी जोंला
अरी खोजी ना पाये गौं वाला
इन खेतों से बोली जोंला
बोली दूँ त ?बोलने दो ना
अच्छा? हाँ
त चल बैठी जोंला ...

बालकृष्ण डी ध्यानी
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एक कवि गिर्दा अब भी रहता है

मेरे उत्तराखंड के पहाड़ में
एक कवि गिर्दा अब भी रहता है
सादगी से भरा है उसका वो दिल
बस मेरे पहाड़ के लिये वो धड़कता है
मेरे उत्तराखंड के पहाड़ में .......

वो अडिग अटल है विचारों से
हर मोर्चे पर वो आगे पग धरता है
अति विलक्षण यथार्त् का वो धनी
अपनों के लिये वो दिन रात जलता है
मेरे उत्तराखंड के पहाड़ में .......

वो आया और वो चला भी गया
दो बोल जो बोले वो अमर हो गये
कविताओं की जो उन्होंने माला पिरोई
हमे दिन रात वो प्रेरणा देते रहते है
मेरे उत्तराखंड के पहाड़ में .......

बालकृष्ण डी ध्यानी
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