Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515399 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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देखी छे क्या तिन

देखी छे क्या अ अ अ तिन न न अ
इन मौल्यार कख बी इन उल्यार कख बी
देखी छे क्या तिन

मुखडी विंकी बात कैनी देख,मेरु जीकोडी दख-दख्याट रे
मेरु जीकोडी दख-दख्याट रे
कैल नि बिंगी माया विंकी, मेरु माया कु रगरायट रे
मेरु माया कु रगरायट रे
मैसे ही तो बात कैर मैसे ही तू भेंट कैर
सुबेर सुबेर तू मैसे ही तू सुरवात कैर
देख ना तू कै और्री मेरो आँखा दगडी अपरू आँखा चार कैर

नि राई जियु मेरु पास ,कख लुक्युं हुलु वो आज रे
कख लुक्युं हुलु वो आज रे
उजाली रूप तेरु चाँद जनि ,चकोर सी किलै हुग्युं आज रे
चकोर सी किलै हुग्युं आज रे
मि मी नि राई कख हर्ची गयुं मि आज रे
खोजणा मि थे मेरा अपरा पराया
नि रेंगयुं मि अपरू का पास रे, नि रेंगयुं मि अपरू का पास रे

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कन बरखा पोड़ली ,कब बरखा पोडाली

कन बरखा पोड़ली ,कब बरखा पोडाली
ना तोड़ा दीदा,ना इन यूँ कटा ,यूँ डलियुं …… २

बरखा नि पौडी बल देबता रुस्युं चा
ऐ बार पाणि बिस्युं चा बल देबता रुस्युं चा
बांज पौड़ी धरती बल देबता रुस्युं चा
अपरू घार अपरू देश तिसालु बल देबता रुस्युं चा

नि मानी मिल मेर गलती बल देबता रुस्युं चा
बस मेर च ये हलगर्जि बल देबता रुस्युं चा
बस चल ल मेर यख मर्जी बल देबता रुस्युं चा
बस मि छों और्री कोई ना बल देबता रुस्युं चा

बल चेत जा रे अभी कख देबता रुस्युं चा
तेर निकल जाल रे सब गरमा कख देबता रुस्युं चा
जब तिसलु व्है जाली ये धरती कख देबता रुस्युं चा
बस मोरी जालू तब प्राणी कख देबता रुस्युं चा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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मेरी भूमि भूम्याली

मेरी भूमि भूम्याली
बणों बणों मा पसरी हैरायलि
कख जानू ये छोड़ी की लाटा
ये ना छिन तेरा जणा का बाटा
मेरी भूमि भूम्याली

कया कया नि द्याई इन हम थे
कया कया नि पाई हमुल इं से
जब विं थे देना की बारी ऐ
भुला तू ये बकसा उठे कख हीटे
मेरी भूमि भूम्याली

बगत नि रैगे पैलि जनि अब
मिल बी मान नि राई पैली जनि लोक
पर तू किलै की बदल्नु छे रे
अपरा बाण ही तू किलै जिनु छे रे
मेरी भूमि भूम्याली

देख आस लगै कि वा बी बैंठी चा
तू बी यख रैकी साथ निभै ले
क्या पाई इन ते थे पढ़े लिखे की
तेरो बी सोर बल भैर ही सजे रे
मेरी भूमि भूम्याली

बालकृष्ण डी ध्यानी
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मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

मेरा पहाड़ की बात और कुच चा
नि बोल सकदु ना बिंग सकदु विंको स्वाद कुच और्री चा
मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

शीर्ष पर हिमाला बस्युं चा
यूँ ह्युं चुलं यूँ डंडा कन्डोंमा घिरियूं चा
क्या बात कैरुं विंकी मि विंकी बात ही कुच और चा
कन बगनी गंगा की धारा
छ्ल छ्ल क नु मेरु पियार कुच और चा

मेरा पहाड़ की बात और कुच चा
नि बोल सकदु ना बिंग सकदु विंको स्वाद कुच और्री चा
मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

ये नीलू सरग ये खुलु आक्स
ये रंगमत यख चौधिस् मौल्यार
हर एक फूलों मां वा हैंस्दी रैंदी विंकी बात ही कुच और चा
ढोल दामो झुमैलो छोलिया कि ये बयार चा
मेरु मुलका मेर लोक नृत्य गीतों कु रास्यांण चा

मेरा पहाड़ की बात और कुच चा
नि बोल सकदु ना बिंग सकदु विंको स्वाद कुच और्री चा
मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

यख भगवती कू मंडाण
पितृ देबों कू ठों और्री जागर कू जगाण
ब्यो बारात मेल खोलों पिंगली जलेबी बाल मिठै विंकी बात ही कुच और चा
मीठा किन्गोड़ा काफल हिंसोलों कू ये पहाड़
मेरु मैता सौरास कु एक जनि लाड पियार

मेरा पहाड़ की बात और कुच चा
नि बोल सकदु ना बिंग सकदु विंको स्वाद कुच और्री चा
मेरा पहाड़ की बात और कुच चा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
16 hrs · Edited ·

वरिष्‍ठ गढ़वाळि कवि अर साहित्‍यकार, व्‍यंगकार श्री नरेन्‍द्र कठैत जी की रचना:-

कमीनौं पर चार पंग्ति....

द्वी मनख्यूं कि छ्वीं-बत्वा बीच जै तिसरा मनखी बात होंदि, वू वूंकि नजर मा कमीना होंदू। यां सि यि पता चल्दू कि दुन्या मा हरेक तिसरु मनखी कमीना होंदू। ये हिसाब से त दुन्या मा भला मनखी जादा अर कमीना कम होण चहेणा छा। पर बात स्या नी। दरसल वू तिसरु जु हमारि नजर मा भलू मनखी गिण्ये जांदू , वू बि चुप नी रौंदू। वू वूंकि बुरै, कै हैंका कन्दूड़ू मा भ्वनू रोंदू।

कविवर प्रणाम,

कमीनौं कू ख्‍याल किलै,
आपका मन मा आई,
क्‍या कै कमीनान आपकु मन दुखाई,
कमीनौं की मार सी सबक सिखिक,
हम्‍न सदानि कदम अग्‍नै बढ़ाई,
कमीना त कमीना होन्‍दन,
जौनं सदानि मनख्‍यौं की मवासी,
धार लगाई गाड बगाई.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
मेरा कविमन कू कबलाट
5.10.2015

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शहीदों का अपमान
हम तो बस मातम मनाना जानते हैं
कितने शहीदों को यहाॅं पहचानते हैं
तस्वीर के आॅंशू नजर आते नही
जो मर गये जिन्दों को वो भाते नही

उत्तराखण्ड के मुर्दे कफन में सो रहे हैं
जो मर गये वो लाश अपनी ढो रहे हैं
नींव के पत्थर नजर आते नही
रण बाॅंकुरे दब कर भी चिल्लाते नही

बिखरी हुयी चिन्गारियाॅं भी बुझ रही हैं
कुर्बानीयाॅं किसको यहाॅं पर सुझ रही हैं
आदर्श का उपहास घर -घर हो रहा है
अस्तित्व,अपनी अस्मिता को खो रहा है

संघर्श की वो भीड़ अब दिखती नही है
तस्वीर भी बाजार में बिकती नही है
हम सर्मपण को नही पहचानते हैं
ये शहीदों के सफर की लानते है

संघर्ष की कीमत से हम खुलकर खडे़ है
भटके हुओं को देख लो कितने धडे़ हैं
चैराहों में बे-शर्म बन कर लड़ रहे हैं
सिद्यान्त में सम्भ्रान्त कीडे़ पड रहे हैं

श्रद्वांजलि में जोश होना चाहिये
हर शख्सियत को ठोस होना चाहिये
आग हो तो हर जगह खुशामते हैं
हम तो बस मातम मनाना जानते हैं !!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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श्री भरत सिंह नेगी पहाड़ी मित्र.....

कांधी मा काखड़ि,
मुंड मा अमेर्थ,
कख होलु जाणु भुला,
प्‍यारा पहाड़ मा.......

मन मा ऊलार छ,
पहाड़ सी प्‍यार छ,
खाणु वख की सब्‍बि धाणि,
पेणु छोया ढुंग्‍यौं कू पाणी,
किलैकि पहाड़ सी प्‍यार छ......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 29.9.2015

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भटट भुजेंण लग्‍यां था....

तवा मा भटट भुजेंण लग्‍यां था,
ह्युंद कू मैनु लग्‍युं थौ,
तवा मा तिड़ तिड़ होण लग्‍युं थौ,
कोन्‍ना मा लम्‍पु जग्‍युं थौ.....

एक भग्‍यान देळि मा आई,
भूत छौं यनु बताई,
दादिन गाळी भौत दिनिन,
वे जथैं भटट की मुटट चलाई....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
रचना सर्वाधिकार सुरक्षित
दिनांक 23.9.2015

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भाई ओंकार नेगी जी की रचना.....

कन बिसरि्या हम,
वू कौथिग वा बग्वाळ,
जब करदा छा हम,
पुंगड़ियों मा बैठी जग्वाळ....

रचना पढिक मेरा कविमन कू कबलाट.....

कबरि होन्‍दि थै,
हमारा मुल्‍क मा,
रौनक अर बग्‍वाळ,
आज त होयिं छ,
मनख्‍यौं की जग्‍वाळ...

जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 23.9.2015

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कविता नं-28
___________

जन बगुला कि नज़र माछों फर्
बिराला कि नज़र बस मूसों फर्
जन कुकरा कि नज़र हडगों फर्
कांणा कि नज़र रोटि का टुकड़ों फर्
उन्नि वूंकि भि नज़र सिर्फ वोट बैंक फर्

जन गुर्रा कि नज़र बिचरा मिंढकों फर्
छिप्वड़ा कि नज़र कीड़ा-मकड़ों फर्
जन सौला कि नज़र मुंगर्र्यट्ट फर्
स्याला कि नज़र कुल कुखड्यट्ट फर्
उन्नि वूंकि भि नज़र सिर्फ वोट बैंक फर्

जन बाघा कि नज़र चरदु बखरु फर्
गरुड़ा कि नज़र म्वरयुं-मुर्र्युं ढाँगु फर्
जन रिक्का कि नज़र रिक्वाल फर्
सुंगरा कि नज़र कुल ग़िज़ार फर्
उन्नि वूंकि भि नज़र सिर्फ वोट बैंक फर्

जन भूखा कि नज़र एक गफ्फ़ा फर्
बंण्यां कि नज़र बस अपुड़ नफ्फ़ा फर्
जन दरोल्या कि नज़र मुर्गा कि टांग फर्
बांमणा कि नज़र सिर्री अर् रांन फर्
उन्नि वूंकि भि नज़र सिर्फ वोट बैंक फर्

जन सासुकि नज़र ब्वारि कु फैशन फर्
नौंना कि नज़र माता जि कि पेंशन फर्
जन ब्वारि कि नज़र मैता कि खबरों फर्
नात्यों कि नज़र चॉकलेट कुरकुरों फर्
उन्नि वूंकि भि नज़र सिर्फ वोट बैंक फर्

नोट:- इस कविता का दादरी कांड (U.P.) से कोई सम्बन्ध नहीं है।

©® सर्वाधिकार: धर्मपाल रावत
ग्राम- सुन्दरखाल, ब्लॉक- बीरोंखाल
जिला- पौड़ी गढ़वाल-246169.

05.10.2015

 

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