Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515465 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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तुम थे देखि

तुम थे देखि त ये बिचार ऐई
जिंदगी घाम , तुम घणेर सौली

आच फिर जियु नि एक आस बंधी
आच जियु थे फिर हमुन समझेई

तुम जबै हर्ची जला तब सोचला
हमुल कया खोई कया पाई
.
हम जैथे गुनगुना नि सक्दा
बगता न इन गीत किलै गाई

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कविता उत्तराखंड की बालकृष्ण डी ध्यानी
3 hrs ·

ऐ बी जावा ऐ बी जावा

ऐ बी जावा ऐ बी जावा
म्यारा गढ़ देशा मा जी ऐ बी जावा

बाटों बाटों मा हिटा कांडों कंडो मा
नाचा नाचा दीधो ढ़ोल दामू मा
नचेड़ी डंडी कंठी ऐजा मेरो साथी
ऐ बी जावा ऐ बी जावा
म्यारा गढ़ देशा मा जी ऐ बी जावा

रंग रंगा की फूल खिल्या छन
मस्त व्हैकि लस्का धसका लग्या छन
जोड़ा तोड़ कैरि सब खूब नच्या छन
ऐ बी जावा ऐ बी जावा
म्यारा गढ़ देशा मा जी ऐ बी जावा

ये उकाल दगङया दगडी सरोंला
रुकी सुकी खैकी अपरी हिमत बढोंला
हैरी भैरी सैरी धरती थे चल सरग बणोंला
ऐ बी जावा ऐ बी जावा
म्यारा गढ़ देशा मा जी ऐ बी जावा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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आज की बात कुछ और्री च

आज की बात कुछ और्री च
तुमरो साथ कुछ और्र च

तुम बोल्दिना, मुख खोल्दिना
ये मुलकात कुछ और्र च
आज की बात कुछ और्री च

बैठी रयां दगडी म्यारा तुम
तुमरो पियार कुछ और्र च
आज की बात कुछ और्री च

बिंग नि सकदु बोल नि सकदु
ये जीयु की बात कुछ और्र च
आज की बात कुछ और्री च

ढुंगा गारों को मेरो संसार
मयाल्दु मेरु पहाड़ कुछ और्र च
आज की बात कुछ और्री च

आज की बात कुछ और्री च
तुमरो साथ कुछ और्र च

बालकृष्ण डी ध्यानी
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मुल्क बणाई

कैका बणा मुल्क बणाई कै बणा
छोड़िकि जाणा छन किलै सब भाई कै बणा

कैका बणा गोली मिल यख खाई कै बणा
तेरा आंख्युं ल बल आंसूं चुलैई कै बणा

कैका बणा मेरो रौंतेलों मुल्का कै बणा
अप्रि ब्यथा वैल खुद किलै लगैई कै बणा

कैका बणा मिन भाणा बनेई कै बणा
कैथे सुणाण मिल यकुली हे राई कै बणा

बालकृष्ण डी ध्यानी
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चिफळि ढुंगी मा.....

जिंदगी यनि लगणि,
बैठ्युं छौं जन मैं,
कब रड़ि जौ,
जन चिफळि ढुंगी मा.....हिंट आप सब्‍यौं का खातिर।

मेरा प्‍यारा उत्‍तराखण्‍डी भै बंधो जरा अपणा मन की बात बतावा कुछ लैन कविता की बणैक। गढ़वाळि भाषा का प्रति आपकु प्रेम भी झलकलु अनुभूति का माध्‍यम सी।

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 7.10.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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कवि श्री बिष्णु प्रसाद सेमवाल
पुस्तक भांवाजली

पलायन एक चिंतन

खेती बंजर भवन है खाली
सभी पड़े वीराने
पैतृक सम्पंति छोड़ चले सब
पलायन के है दीवाने

नियति के भरोसे छोड़ चले सब
इस धरती की यही रीति
मां बाप से बढ़कर सारे
कर रहे धन से प्रीति

पूर्वजों की सम की क़ीमत
आंक रहे है दो कोडी
अपनत्व भाव है बृद्धजनो मे
शेष् रही अब थोड़ी

कैसा भविष्य होगा आगे
जोत रहे खेत नेपाली
बिशैली औषाधि अधिक खाद से
सूख रही है हरियाली

सभी प्रवासी यदि हो जाएँगे
बस जाएँगे यहाँ मैदानी
मूल गढवाली संग मे आगे
होगी जन धन की हानि

कैसी विडम्बना उन माँ बापो की
तडफ तडफ जो मर जाते
धर्म की लड़की नहीँ मिलती
मुखाग्नि गैरों से पाते

धन्यवाद
सम्पर्क सूत्र = 9927010263, 8057131830

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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dwee कविता
कवि: चिन्मय सायर
कविता
मखौल नी
तिमला पकौळ नी
वाह! वाह ! त छें च
पण ,
भचळवा -भचोळ नी

----------------------------------------------------2 --------------
अखोड़
कवि: चिन्मय सायर
सुख़म -दुखम
कथगा प्यार च
द्याखदी
काठ पुटुग
म्याला च
औनार , अविचल प्रकाशन बिजनौर से साभार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मेरु शरील नखरू हो,
त कवी बात निछ,
मोबाइल मेरु राजि ख़ुशी चैंदु,
यु मेरु ज्यु पराण छ,
येका बिना नि रयेंदु अब मैसि,
चौक मा नि रखि भैंसी____

-तुमारू भैजि कवि जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षित
17.१०.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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छुट बुगल्या नेतों की
बयार यै ग्यायी
2017 बल न्याड
यै ग्यायी
बसगल्या छ्वाया सी
यन फुट्यां छन
धार धार गांव गांव
सौब जगा जम्यां छन
कती अपकुण पुंगडी की
तलास मा लग्यां छन
एक दल बिटी जु
हैंक दल खुज्याणा छन
सुख दुख मा जु कभी
कैक काम नी यैन
श्राद्धों मां यैंसु भग्यान
कती जगह दिखे गेन
2017पर गरड की सी
लगीं भग्यांन की टक
कभी फेसबुक कभी
ब्हाटसप मा जक बक
दल बदलु की भी समाज मा
खुब गगडाट हुयीं च
सिंगान सी मथी फांग कभी
मुडी फांग झल्कां झल्कां हुयीं च
छुट बुगल्या नेतों की बल
बयार यै ग्यायी
2017 बल न्याड.....

सामाजिक कार्यकर्ता मदन कपरुवाण जी द्वारा उपलब्ध करवाये गये शीर्षक पर आधारित किसी भी ब्यक्ति बिशेष का लेख से कोई संबध नही @सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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ब्वारि ऐसी चााहिए मुझे.....!!!!
जो अंग्रजी के साथ गढ़वाली में भी बच्याती हो घास काटने के साथ फेसबुक भी चलाती हो
केवल टीबी पर न चिपकी रहे, गोणी बंदर भी भगाती हो
ब्वारि ऐसी चााहिए मुझे, जो सबको भाती हो
ब्वारि ऐसी चााहिए मुझे पिज्जा चोमिन के साथ प्यळयो छछेंडू भी बनाती हो
करवा चौथ न सही पर एगास बग्वाल जरूर मनाती हो
चाइनीज लड़ी के साथ कडवा तेल का दीया भी जलाती हो
ब्वारि ऐसी चााहिए मुझे जो सबको भाती हो,
ब्वारि ऐसी चााहिए मुझे जींस टॉप के साथ बाजू बंद भी लगाती हो
नौनो को अंग्रजी के साथ गढ़वाली भी सिखाती हो,
चेतन भगत शैक्सपियर के साथ पहाड़ी साहित्य पढ़ाती हो,
ब्वारि ऐसी चााहिए मुझे जो सबको भाती हो
पंजबी गीतों के साथ गढ़वाली गीतों पर सब को नाचाती हो
मुझे देख के न सही पर जेठणा जी को देख कर शरमाती हो,
हिंदी गीतों के साथ नेगी जी के गाने भी गुनगुनाती हो,
थैली के दुध के भरोंसे न रहकर गौड़ी भी पिजाती हो,
ब्वारि ऐसी चााहिए मुझे जो सबको भाती हो,
शैर घुमने का शौक हो पर गाँव मे गाय भी चराती हो,
चटि पटि खाणे के साथ ढबाड़ी रोटि भी पकाती हो,
खदर की धोती के साथ धूप चश्मा भी लगाती हो
ब्वारि ऐसी चााहिए मुझे जो सबको भाती हो
हम उमर लोगों को हैलो दाना सयेणो को सेवा लगाती हो
जादा गरा न सही पर डांडे से लकड़ा भी लाती हो
ऊंच बिचार हो उसके भले कैसी भी कद काठी हो
चकडे़तू के लिए चकड़ेत हो लाटो के लिए लाटी हो
ब्वारि ऐसी चााहिए मुझे जो सबको भाती हो,
हैरी मरच सी जरा तीखी भी हो
खटटे के लिए खटी, अछों के लिए फीकी हो
मयाळु हो गयाळु हो न गोरी न चिटी हो
बस दगड़यों मनै की मीठी हो,
ऐसी मेरी ब्वारी हो....

 

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