Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515505 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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 बसगाळ्या बरखा....


डांडी कांठ्यौं मा कुयेड़ि,
लगिं छ झक्‍काझोर,
बसगाळ्या बरखा ऐगि,
नाचणु मन कू मोर......

तिबारि मा रिटणु बोडा,
ह्वक्‍का का ओर पोर,
बोडि उस्‍यौंण लगिं छ,
भडडु फर तोर.....

गाड गदन्‍यौं मा होण लग्‍युं,
पाणी कू सुस्‍यांट,
बोडा बैठ्युं छ तिबारि मा,
होणु बाखरौं कू भिभड़ाट...

डांड्यौं मा कुयेड़ि रिटिणि,
दिखेणु निछ भैर,
फोथ्‍लौं कू किबलाट होणु,
कखि बासणु मैर......

चौक अग्‍वाड़ि डाळी मा बैठि,
घुघति होयिं ऊदास,
बरखा कू धिड़क्‍वाणि लग्‍युं,
बदळ्यु छ आगास.....

भारी जग्‍वाळ होयिं थै,
कब होलि बसगाळ्या बरखा,
बोडा जी नात्‍यौं तैं बोन्‍ना,
हे चुचौं भीतर सरका.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
सर्वाधिकार सुरक्षति,
दिनांक 25.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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 रवि अर कवि......
कवि की कल्‍पना,
कल्‍पना मा,
एक ऊड्यार देखणु छ,
तख बल बाग बैठ्युं,
कखि भागीरथी का छाला,
अपणा बच्‍चौं तैं,
प्‍यार कन्‍नु छ,
यख फुंड मनखि,
कतै नि आला.....

अलकनंदा मा,
मसीर माछु फटकणु छ,
देवप्रयाग संगम फर,
पाणी मा दनकणु छ,
किलैकि संगम फर,
क्‍वी माछु नि मारदु,
नहेन्‍दा छन मनखि,
संगम फर जब होन्‍दु,
पर्व कू दिन,
औन्‍दि पंचमी मकरैण,
पिंड दान करदा तख,
जैकु महत्‍व छ भारी,
जख मू भेंटेन्‍दि छन,
सासु भागीरथी,
अर अलकनंदा ब्‍वारि....

चंद्रकूट पर्वत फर,
ऊंचि चोटी मा,
विराजमान छ चंद्रवदनी,
ऋतु मौळ्यार मा,
जख हैंस्‍दा छन बुरांस,
औन्‍दा छन भक्‍तगण जख,
पूरी होन्‍दि मन की कामना,
अर मन की आस,
तख बिटि दिखेन्‍दु,
हैंस्‍दु हिमालय,
पैरि हो जन कांठ्यौं की,
सुखिली ठांटी.....

कवि की कल्‍पना छ,
देवभूमि उत्‍तराखण्‍ड तैं देखौं,
उड़िक अनंत आगास सी,
पंछी, पहाड़, लखि बखि बण,
देखौं जैक पास सी,
कवि जिज्ञासु की कल्‍पना,
अहसास करौणि होलि,
जख नि जान्‍दु रवि,
कल्‍पना मा तख,
पौंछि जान्‍दु कवि.......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
सर्वाधिकार सुरक्षित,
दिनांक 18.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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औंळि तोड़ी सौंळि भुला,
औंळि तोड़ी सौंळि
भै बंधु मा मेल रखा,
नि बटोळा बौंळि....
अजग्‍याल यू हि होणु,
भै बंधु मा निछ मेल,
जिंदगी द्वी दिन किछ,
खेलणा छौं खेल.....
गौड़ी कू कमर हे भुला,
गौड़ी कू कमर,
सोरौं देखि नि खिरसेणु,
क्‍वी निछ अमर.....
गरीबी का दिन मा सब्‍बि,
करदा था प्रेम भारी,
होन्‍दा खान्‍दा ह्वैग्‍यें चुचौं,
अब क्‍या छ लाचारी.....
भलि बात या हि होन्‍दि,
भै बंधी निभावा,
जैका भाग मा जथ्‍गा,
हैंसी खेलि खावा......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
मेरी अनुभूति वर्तमान फर,
सर्वाधिकार सुरक्षित,
दिनांक 17.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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 एक बुढ़्या.....

हमारा गढ़वाळ कू एक बुढ़्या,
शिकारी कू शौकी भारी,
गौं का मनखि कठ्ठा ह्वैन,
लगोठ्या वेन एक मारी....

कात्‍लु पळ्येक कन्‍न लग्‍युं,
लगोठ्या कू कारबार,
घळ घळकौणु टुकड़ि मुकड़ि,
देखणा लोग हपार.....

सिरी फाड़िक वेन जब,
घळ्काई लगोठ्या कू आंखू,
गळ बळ गळ बळ कन्‍न लग्‍युं,
बंद ह्वैगि वेकु सांखू......

नौनान वेकी धौणि मा,
जोर सी मुठगैकि मारी,
गिच्‍चा बिटि आंखू छटगि,
खुशी ह्वैगि तब भारी.....

बचिगि बुढ़्या बड़ा भाग सी,
सब्‍यौन ऊ समझाई,
खै लेन्‍दि बुढ़्या टुकड़ि मुकड़ि,
आंखू क्‍यौकु घळ्काई.....

थर थर कौंपि बुढ़्या अफुमा,
भै बंधु तैं बताई,
बचपन बिटि मैं घळ्कौन्‍दु छौं,
यांकु मैंन घळ्काई.....

आणि पड़िग्‍यन आज मैकु,
आंखू नि घळ्कौलु,
तुमारु बोल्‍युं मैं याद रखलु,
टुकड़ि मुकड़ि खौलु......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु,
सर्वाधिकार सुरक्षित,
दिनांक 15.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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 हमारा गौं मा बिजळि.....

जब बिटि आई,
तब बिटि ह्वैग्‍यन,
मेरा गौं का रोगी,
बोला त भोगी,
अपणा अपणा भितर,
यकुलि बैठिक,
देखणा छन समाचार,
होणु छ शहरी,
संस्‍कृति कू प्रचार,
दिल्‍ली वाळा भैजि कू,
फोन औन्‍दु त बतौन्‍दा,
हे भैजि,
आज तुमारी दिल्‍ली मा,
क्‍या ह्वैगि हपार,
आप की बणिगि सरकार....

जै दिन मैच हो,
ठप्‍प ह्वै जान्‍दि धाण,
हळ्या भैजि भि बोल्‍दु,
आज मैंन हौळ नि लगाण,
लग्‍दा जब चौक्‍का छक्‍का,
ह्वै जांदन हक्‍का बक्‍का,
डौर भि लग्‍दि,
कखि बिजळि न चलि जौ,
मोळ माटु नि ह्वै जौ.....

बोडि का नौना कू,
फोन आई,
बेटा आज बिजळि,
नि थै दिन भर गौं मा,
वे तैं बोडिन बताई,
यू फोन त मैंन,
बजार भेजिक,
चार्ज करवाई,
त्‍वैकु बोलि थौ,
एक इन्‍वर्टर लगै दे,
बिजळि कू,
क्वी भरोंसु नि रन्‍दु,
अंधेरा मा दिखेन्‍दु निछ,
मैं गज बज लग्‍युं रन्‍दु......

बिजळि का खातिर,
गौं का छोरा,
ट्रांसफार्मर रन्‍दन घच्‍चकौणा,
ऐगि बिजळि, गौं जथैं,
धै रन्‍दन लगौणा,
किलैकि तार ढीलु होण सी,
बिजळि नि औन्‍दि,
भारी आफत ह्वै जान्‍दि,
हमारा गौं मा,
बिजळि का बिना,
बिजळि कू राज छ आज,
गुलाम ह्वैगि गौं समाज.....

-जगमोहन सिंह जयाडा़ जिज्ञासु,सर्वाधिकार सुरक्षित,
ब्‍लाग फर प्रकाशित, दिनांक 12.6.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जिकुडी आज परदेश मा
मेरी उदास ह्वेगे
गों खोलों की मेलों की दीदों
याद छक्वै यैगे
चौंड भौन गैणाडांड
खुब रौनक अयीं होली
दुर दुर बिटी अयीं दीदी भूली
आपस मा भिट्याणा होली
नन तिना भी आज
खुश हुयां ह्वाल
कुई पुयीं वालु गुब्बारा
कुई डमरु बजांणा ह्वाल
सरा मणिकुट आज
स्वर्ग बण्यूं ह्वाल
देबी दयवता म्यार जख
परगट हुयां ह्वाल
यैथर यैथर चलणी होली
मां चौंडेस्वरी की डोली
म्याला मा अयीं होली दीदी भूली
अर नयी नयी ब्योंली
जिकुडी आज परदेश मा
मेरी उदास ह्वैगे
गौं खोलों की मेलों की
दीदों याद छक्वै यैगे
गरमा गरम जलेबीयुं की
रस्यांण अयीं होली
चुडी कांडी अर चुंट्यूं की
दुकान सजीं होली
जिकुडी आज परदेश मा
मेरी उदास ह्वैगे
गौं खोलों की मेलों की
दीदों छक्वै.....
सर्वाधिकार सुरक्षित@लिख्वार सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जिस माटी मे जन्मे मेरे
बीर चंद्र गढवाली
जिस माटी मे जन्मी हो
बेटी तीलु रौतेली
उस माटी को कोटी कोटी
शतबार नमन मै करता हुं
जिस माटी मै खेल कुद कर
जन्मे जहां बीर कप्पु चौहान
दुश्मनों के छक्के छुडाने जहां
पैदा हुये यशवंत और गब्बर जवान
उस माटी को कोटी कोटी
शतबार नमन मै करता हुं
जिस माटी की हरेक शिला मे
देवों के दर्शन होते हैं
निर्मल अविरल धारा के रुप मे
जहां मां गंगा के दर्शन होते हैं
उस माटी को कोटी कोटी
शतबार नमन मै करता हुं
जहां पंख्या दादा की गौरव गाथा
पुरे पहाड का मान बढाती है
पतिब्रतता पालन करती
जहां जंन्मी रामी बौराणी है
उस माटी को कोटी कोटी
शतबार नमन मै करता हुं
ईस माटी का फूल होने पर
खुद भी गौरव करता हुं
उस माटी को कोटी कोटी
नित रोज नमन मैं करता हुं

सर्वाधिकार सुरक्षित@लेखक सुदेश भटट(दगडया)

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रावण तु आज बल
जग जगा फूंक्यांणा होली
परबात फिर कखी न कखी
टुपली पैरीक पैदा ह्वे जैली
कु मारी सकदु दीदा त्वै
बाहुबली मनखी तै
परबात भ्रष्टाचार बणी की
तु फिर पैदा ह्वै जैली
पैली त्यार खुंटा पन रैन
चांद सुरज अर काल
आज त भ्रष्टाचारयुं की कुटुमदारी
तीन तंदयल पर सी बांधी याल
तीन त लंका ही बण्या सुन की
यख त स्वीस बैंक भरै गेन
तेरी जन दस दस लंका
भग्यानु जगजगा बणै देन
शरेल ही मरी त्यारु हे रावण
आत्मा त भटकणा ही च
महंगाई अर भ्रष्टाचार बणीक
मार मार कैकी द्वास लगीं च
कलयुग मा तु हे दशानन
एक ही मुंड लेकी यैयी
कखी मंहगाई भ्रष्टाचारी
कखी घोटाला कैरी ग्यैयी
हाहाहाहा कैकी दादा
तु आज खुब हैंसणा होली
नयी नयी घोटालों की
भीतरी भीतर प्लान बणांणा होली
अरे कु मारी सकदु त्वै
अजर अमर अभिमानी तै
गबन घोटालों की फाईलों मा
जगजगा समयुं छै
अरे झुगली टुपली जाली तेरी
हपार कांड की डाल्यूं मा
कैन ब्वाल तु मरी गे
परगट हुयुं छै भ्रष्टाचार्युं मा
त्वै भ्रष्टाचारी तै मरन कुन
यख कती राम पैदा ह्वैन
जौंन हम मनख्यूं तै ठगे की
अपण निजि स्वार्थ सधेन
तु त जब तक ज्युंदी रै
रावण ही बणी क रैयी
हमर छंटयां राम भी तीन
रावण बणै देन
त्वै तै चिंता छै फिकर छै
अपणी पुरी लंका की
यख त भ्रष्टाचार्युं न देश कु
जमा लुट्या डुबई याली
त्वै कुन हाथ जोडी
बिनती करदु
दीवु धुपंण अर
उठंण गडदु
बोल क्या चयांणा त्वैतै
मी बीजा त्यार बणवे द्यांदु
जर्मन जपान चीन फ्रांस क त्वैै
पैकेज दिलै द्यांदु
त्यार जांण से देश फिर
सुन की चकुली बणी जाली
रोट भेंट की पुजा त्वै
बराबर दियांणा राली
सर्वाधिकार सुरक्षित@लेखक सुदेश भटट(दगडया)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मै भी चान्दू ( बाल कविता)

मै भी चान्दू वीर चन्द्रसिंह,
गढ़वाली जन वीर बणों मी |
मैं भी चान्दू भड़ माधोसिंह ,
भण्डारी जन धीर बणों मी |
बीर गबरसिंह का जन बणिकी ,
सैरि दुन्या मा धाक जमौं मी |
जसवन्तसिंह गोर्ला सी बणिकी ,
बैर्यूं की मुण्डळी छनकौं मी ||

कालू मेहरा जन बणिकी सब्बि ,
मनख्यों तैं एकमुट्ठ कैद्यों मी |
श्रीदेव सुमन सी बणिकी ,
हक का बाना मरि मिटि जौं मी |
वीर केशरीचन्द जन बणिकी ,
जल्मभूमि कु प्राण देद्यों मी |
जयानन्द भारती जन बणिकी ,
सैरि कुप्रथाओं तैं मिटौं मी ||

तीलू रौतेली सी बणिकी ,
बैर्यों कू निर्बिजु कैद्यों मी ||
राणी कर्णावती सि बणिकी,
बैर्यों क नकप्वड़ा कन्दूड़ कटूँ मी |
पतिवर्ता रामी जन बणिकी ,
अपणूँ मनखी धर्म निभौं मी |
गौरी देबी जन बणिकी यों,
डाळी बोट्यों पर चिपकू मी ||

हे प्रभो तुमसे छ या अर्ज ,
मैतैं इतगा शक्ति देद्यो ||
मातृभूमि पर का काम ऐजौं मी ,
सुफल यु म्यारू जीवन कैद्यो ||

सर्वाधिकार सुरक्षित -:

धर्मेन्द्र नेगी
ग्राम चुरानी, रिखनीखाळ,
पौड़ी गढ़वाल

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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म्यार गांव मुल्कु मा
यन रिवाज अंयु च
सासू पुंगडि धाण्यूं दीदों
ब्वारि चैटिंग लगीं च
सासू ह्वेगे काणी बैरी
ब्वारि फैंसी बणी च
जींस पैरी हथ मोबेल
कंदुडी लीड कुचीं च

सासू बेली कटणी बिचरी
तिबासी चुन की रुट्यूं मा
मौडर्न फैंसी ब्वारी
मिस्यां चौमिन टिक्युं मा
सासू खांदी रुखु सुखु
चौकल ठील्कों मा
म्यार मुल्क फैंसी ब्वारी
दीदों डेनिंग टेबुल मा
खुट हथ धरी की सेवा
हरची ग्या पहाड से
हाई हैलो नयी रिवाज
यैग्या जर्मन फ्रांस से
म्यार गांव मुल्क दीदों
यन रिवाज अयुं च..
लुरका तुरकों मा सासू
ब्वारी राणी बणीं च
सासू खै द्या जुं लिखलु न
ब्वारि पार्लर जयीं च
म्यार गांव मुल्क दीदों
यन रिवाज अयुं च...
सर्वाधिकार सुरक्षित@लेखक सुदेश भटट(दगडया)


 

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