Author Topic: Kumauni & Garhwali Poems by Various Poet-कुमाऊंनी-गढ़वाली कविताएं  (Read 515506 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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फिर बी फैशन हो ऐसा जी

खानु कू नि पैंसा
फिर बी जमानु चैणु ऐसा जी
फिर बी फैशन हो ऐसा जी

छोरी जनि लट्लु
ब्याल च की बैठूल नि समझने हो
फिर बी फैशन हो ऐसा जी

बोबा व्हैगे बोई जी
बोई व्हैगे अब बोबा हो
फिर बी फैशन हो ऐसा जी

कन बदली हुणि च
वो कख जाने की सोचणी हो
फिर बी फैशन हो ऐसा जी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
मेरा ब्लोग्स
http://balkrishna-dhyani.blogspot.in/search/
http://www.merapahadforum.com/
में पूर्व प्रकाशित -सर्वाधिकार

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी

जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी
देश हो या हो अब भैरदेशा जी
जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी

लुन रोटी अब मिल नि खाणु जी
बर्गर पिज्जा जब म्यारा स्वामी लाणु जी
जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी

रामी नि बनने ना मीथै बहूरानी जी
पैल टिकिट कटै जब स्वामी मुंबई दिखाणु जी
जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी

ये उकाला का बाटा अब व्हैजा टाटा
दोई मैन की छुट्टी मा स्वामी स्विजरलैंड घुमाणु जी
जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी

हीटे हीटे ये पहाड़ किले अब कमरी पटणु जी
हवाई जहाज मा जब म्यारा स्वामी मि थे उढणु जी
जखि म्यारा स्वामी वखि मि जी

बालकृष्ण डी ध्यानी
देवभूमि बद्री-केदारनाथ
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एक गाँव का आत्म कथन
____________________

आहा !भोर होगयी
और रवि की किरणों के चूमने से
होने लगा हूँ ऊष्मासित मैं
और मेरे जागते ही जागने लगे हैं -

बाँज बुराँस के बण /गाँव पार का गदेरा
गों की कोदयाड़ि /स्ट्याड़ि सार
गों मूडी का धारा /गों ऐंच का बाटा
पनघट और ऊखल भी

सब तो है मेरे पास
तुम्हारी विरासत संरक्षित
नहीं है तो बस -
पनघट की गोरी
दिलवरि हळ्या
अट्ठारह घण्टे अपनी कीली पर घूमती गुस्याण

पर मैं उतना दुखी भी नहीं हूँ जितना तुम यहाँ से भागते ही
पलायन पलायन चिल्लल्लाने लगते हो *
नगरों महानगरों कस्बों बाजारों में बैठ कर
क्यों पलायन चिल्लाते ही ???
क्या कर लोगे यहां आकर
न तुम अब खेत जोत पाओगे और न तुम्हारे बेटे हल पहचान पाएंगे
फिर खाओगे क्या ?हाँ चाय और दारु की दूकान जरूर चलाओगे
अरे छोड़ो ये पलायन पर भाषण देने का फैशन और
कभी कभी अपनी यादें ताजा करने आया करो
और आया करो ं अपने बच्चों के लिए नए अनुभव बटोरने पुराने सम्बन्ध सहेजने
गाँव जानने पहचानने समझने बूझने के लिए
ताकि मैं भी सुन सकूं उन्हें बतियातेहुए
उन्हें बात करते हुए ups की /माउस की /विंडोज की
एप्पल 6 s /ई बुक /गीगा /मेगा/नैनो /कार नहीं नैनो टेक्नालॉजी की हा हा हा क्यों ?

मुझे इस बात से भी ख़ुशी मिलती है कि -
दिल्ली मुम्बई दुबई की सड़कों पर दौड़ते हुए भी तुम
गीत तो नरेंद्र सिंह नेगी के ही सुनते हो

और मैं खुश होता हूँ ये देख कर भी
कि - फाँस खाने वाली ,गाड पड़ने वाली
मेरी कई बहू बेटियाँ
कि - फर्राटे भरने लगी हैं अपनी अपनी कारों में
दिलबरी हल्या का बेटा आज डी एम् बन कर
बाप की उन कही अनकही पीड़ाओं को
मिटाने की कोशिस कर रहा है
कि - रो - रो कर बेसुरे बेसुध गू - मूत में लिपटे मेरे बच्चे
भी आज देसियों के बच्चों की बराबरी कर की बोर्ड से लगे हैं खेलने
और तो और अरे !जिस बाप को अपने अपने बचपन में ही
पहाड़ से आयात किया जाता था होटल में भांडे बर्तन माँजने के लिए
सुना है आज उसने उन्हीं को नौकर रख लिया है अपने यहाँ

हा हा हा हा हा हा हा मैं खुश हूँ

B positive yaar

तुम्हारे इन्तजार में
पर्वतों की गोद में बसा मैं हूँ

@ तुम्हारा गाँव @
(उमा भट्ट)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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मेरु शरील नखरू हो,
त कवी बात निछ,
मोबाइल मेरु राजि ख़ुशी चैंदु,
यु मेरु ज्यु पराण छ,
येका बिना नि रयेंदु अब मैसि,
चौक मा नि रखि भैंसी____

-तुमारू भैजि कवि जिज्ञासु
सर्वाधिकार सुरक्षित
17.१०.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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श्री भरत सिंह नेगी पहाड़ी मित्र.....

कांधी मा काखड़ि,
मुंड मा अमेर्थ,
कख होलु जाणु भुला,
प्‍यारा पहाड़ मा.......

मन मा ऊलार छ,
पहाड़ सी प्‍यार छ,
खाणु वख की सब्‍बि धाणि,
पेणु छोया ढुंग्‍यौं कू पाणी,
किलैकि पहाड़ सी प्‍यार छ......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 29.9.2015

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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आज बग्‍त यनु ऐगि,
हमारु पहाड़ भारी ऊदास,
घौ हमारा हि दिन्‍यां छन,
तौ भी वेका मन मा आस......

हमारा पित्रुन प्‍यारा पहाड़ कू,
हातु सी श्रृंगार करि,
स्‍वर्ग मा छन आज ऊ,
हम्‍न कुछ भि नि करि......

सोचा मन मा अपणा दगड़यौं,
पहाड़ प्‍यारु घैल छ,
हम निपल्‍टदा परदेशु मा,
मन मा हमारा मैल छ.....

जल्‍मभूमि त्‍यागि दगड़यौं,
घर कूड़ी बांजा डाळिक,
नौट कमै नौट्याळ बणिक,
क्‍या पाई मन मारिक.....

देब्‍ता दोष लगला जब,
तब्‍त अपणा मुल्‍क जैल्‍या,
रखा रिस्‍ता गौं मुल्‍क सी,
तख की सब्‍बि धाणि पैल्‍या....

बिंगणा नि छौं आज हम,
मन सी भौत पछतौला,
अक्‍ल आलि हम्‍तैं तब,
जब घर घाट का नि रौला....

जल्‍मभूमि मां हमारी,
चला हे दगड़्यौं पहाड़ जौला,
तख सब्‍बि धाणि ह्वै सकदु,
जिंदगी सुख सी बितौला......
-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु, सर्वाधिकार सुरक्षित, दिनांक 24.9.2015

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 उत्‍तराखण्‍ड....


भारी रौंत्‍याळु हमारु,
उत्‍तराखण्‍ड छ,
ऊंचा डांडौं मा,
बांज बुरांस का बण मा,
बथौं अर ठण्‍ड छ.....

ज्‍यु पराण सी प्‍यारु,
हमारु उत्‍तराखण्‍ड छ,
जैकी सुंदरता फर हम्‍तैं,
भारी घमण्‍ड छ......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
दिनांक 17.9.2015

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 बुरांस खिल्‍युं....
डांड्यौं मा,
बणांग लगौणु छ,
तुम भी हैंसा मेरी तरौं,
बात बतौणु छ.....

बुरांस की बात बिंगि,
मन खुश होणु छ,
सच छ जिंदगी कू यू,
ऊलार औणु छ.....

किलै औन्‍दु होलु बुरांस,
हमारा मुल्‍क मा,
कुतग्‍याळि सी लगै जान्‍दु,
हमारा मन मा......

आलु मौळ्यार जाला भग्‍यान,
प्‍यारा पहाड़ मा,
हेरला अपणि आंख्‍यौंन,
बुरांस खिल्‍युं छ......

पाख्‍यौं मा हैंस्‍दि फ्यौंलि भी,
मैत अयिं छ,
तै बौळ्या बुरांस हेरिक,
रंगमत होयिं छ.....

फूल्‍युं फूल बुरांस कू,
पहाड़ की पछाण छ,
ज्‍यु मा यनु औणु छ,
बुरांस हेरण जाण छ.....

जुगराजि रै बुरांस तू,
हमारा मुल्‍क औन्‍दु रै,
खित्‍त हैंसि हैंसिक,
कुतग्‍याळि लगौन्‍दु रै....

डांडयौं मा खिल्‍युं बुरांस,
बणांग लगौणु छ,
खुश हि रणु जिंदगी मा,
यनु बतौणु छ.......

-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
30.1.2015, दोपहर 1 बजे
सर्वाधिकार सुरक्षित

http://jagmohansinghjayarajigyansu.blogspot.in/2015_01_01_archive.html

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 उत्‍तराखण्‍ड की,
धरती बोन्‍नि छ,
ह्वैग्‍यन मेरा कुहाल,
नि लेन्‍दा जल्‍म तुम,
मेरी सजीली गोद मा,
नि होन्‍दा मेरा यना हाल,
निराशेक बणि छ बिकराळ,
बांदर सुगंर कन्‍ना छन राज,
बांजी पुंगड़ि टूट्यां कूड़ा,
यू हि रैग्‍यन अब यख,
बंजेणु छ कुमाऊं गढ़वाळ,
कुछ त सोचा,
हे मेरा लाल.....

-जगमोहन सिंह जयाड़ा जिज्ञासु
रचना स्‍वरचित एवं ब्‍लाग पर प्रकाशित
दिनांक 11.11.14

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 प्‍यारा दगड़्यौं.....
कुलदेवी माँ चन्‍द्रबदनी की,
अषीम कृपा सी,
आपकी दुआ सी मैं,
30 नवम्‍बर, 2014 कू,
प्रिय नाती का,
दादा बणिग्‍यौं,
जल्‍म लेण का कारण,
बोला त बुढ़या ह्वैग्‍यौं,
जन कि लाेग बोल्‍दा छन,
भारी खुश होयुं छ,
यू मेरु कविमन,
खुशी कू रैबार अपणु,
आप सब्‍यौं तक,
पौंछौणु छौं,
प्‍यारा दगड़्यौं.....
-जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु",
दिनांक: 01.12.2014

 

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