Author Topic: उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!  (Read 284012 times)

अरुण/Sajwan

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वीरबाला तीलू रोतेली

यह गढ़भूमि तब धन्य हुई थी
जब मां मैना ने वह चंडी जनि थी
संवत १७१८ में जन्मी थी
इसी गढ़देश की वह सिंघनी थी

वीर भाई भगतु - पत्वा ने
बहन नहीं दुर्गा पाई थी
15 की बाल उम्र में खड़ग उठाया
सोचो कैसी वह तरुनाई थी

कैसी वीर मां थी वह जिसने
बेटी को रन में था भेजा
सच में वह क्षत्राणी खून था
और था साहसी कलेजा

यह गढ़देश स्वतंत्र करने का
वीरांगना ने प्राण लिया था
सात साल तक लड़ती रही
तनिक भी न विश्राम किया था

तूफ़ान सा आ रहा था उधर
वीरबाला के कदम उठ रहे थे जिधर
निकली भी न थी म्यान से तलवार
की कतर गए थे चार सर

बह रही थी नदियाँ लहू की
कट रहे थे सर दुश्मनों के
वीरबाला रणचंडी बनी थी
उखड गए थे पग अशव तक के

जय हो जय नागिर्जा नरसिंघ
कह कह कर शत्रु संघार किया था
समूल विनाश करके दुश्मनों का
गढ़ वीरता को जता दिया था

मां दुर्गा ने अवतार लिया था
वीरबाला का देह धारण किया था
दुश्मनों का संघार करके
गढ़वासियों का भय हर लिया था

पर हर गए थे प्राण वीरांगना के
अंत में जय विजय पाकर
धोखे से पीठ पर वार खाया
चीख गूंजी थी नयारतट पर

हाय  हमने देवी को खोकर
स्वतंत्रता को पाया था
धन्य वीरबाला सो सो बार तुम्हारा
जो इस देश में जन्म लिया था

Rajen

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श्री पृथ्वी सिंह केदारखंडी जी
(कन्यास रुद्रप्रयाग ) की उत्तराखंड पर कविता.


उत्तराखंड महान च |

खाण खुणि खारु नी,
घरु-घरु मा पर यख
दारु की दुकान च
उत्तराखंड महान च ||

स्कुल्या नी स्कुल्यो मा,
मास्टर मद-मस्त ह्वायां
दफ्तरों मा भ्रष्टाचार
रुप्यों कु फुकान च |
उत्तराखंड महान च ||

हिवाली-कांठी गांली गैन,
गाड़-गधिरा सुखी गैन
मौसम नि रैग्या क्वी
डाक्यों कू कटान च |
उत्तराखंड महान च ||

बिकास कु खालि बबाल,
गों-गकु का बुरा हाल
नेताजी का बैकुं मा
नोटू कु भरान च |
उत्तराखंड महान च ||


साभार : प्यारा उत्तराखंड

प्रहलाद तडियाल

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ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो
भले छीन लो मुझ से मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो, भांगे की चटनी
वो सना हुआ नींबू, वो नौले का पानी।


Mehta ju bhout khoob ho mahraj.......waah waah

पंकज सिंह महर

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मेरे पूर्वज


मेरे पूर्वज बधाण पट्टी के थे,
शिव की बारात में वे भी गण रहे होंगे,
यह मैंने पिता से नहीं इतिहास से जाना,
बांज की जड़ों का पानी,
जिनके हाजमें को ठीक करता रहा,
अखरोट के पेड़ की छांव में,
जिन्होंने अपना पसीना सुखाया,
नमक की इच्छा जिन्हें,
तिब्बत के पहाड़ों में बांधती थी,
पेट की आग ने जिन्हें,
खेतों को सीढ़ीदार बनाना सिखाया,
किसी कमीण, किसी सयाने की तरह,
जिन्होंने जीवन नहीं बिताया,
माफी में कभी नहीं लिया,
जमीन का एक टुकड़ा भी,
कुली और बेगार का बोझ,
न तो जिनके कंधों की ताकत को,
कर पाया खत्म,
और न ही रोक पाया, जिन्हें पीठ को झटकने से,
मैं उन पूर्वजों को करता हूं नमन।

vijay gaur

Dinesh Bijalwan

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Nice poem by vijay ji.  Thanks to Maharji  for selecting such a pearl.

पंकज सिंह महर

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छुटि गे हमसे पहाड़ा


छुटि गे हमसे ए पहाड़ा,
अब नि आयंदू से पहाड़ा,
मजबूरि हमरि समझ रे पहाड़ा,
क्षमा कैर दे हे पहाड़ा,
हमरा नौन्याल हे पहाड़ा,
कनक्वे आला से पहाड़ा,
गारा-माटु मां हे पहाड़ा,
चलि नि सकदा से पहाड़ा,
नौकरि न चाकरि ते पहाड़ा,
खाणु क्या या से पहाड़ा,
तु क्या देलि हे पहाड़ा,
चूना रोटो अर चटनी पहाड़ा,
रोग कु इलाजा नीच, ते पहाड़ा,
जाण कख हमल, हे पहाड़ा!
क्यां कु सुख च, से पहाड़ा,
अब नि आयंदु, म्यारु पहाड़ा,
क्षमा चांदूं, त्वे से पहाड़ा।

                                           खुशहाल सिंह रावत, मुंबई


jagmohan singh jayara

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"प्रवासियों की पीड़ा"


देश के महानगरों में,
उत्तराखंड के लाखों लोग,
झेल रहे हैं प्रवास,
प्यारे पर्वतों से दूर,
जहाँ चाहकर भी नहीं मिलता,
पहाड़ जैसा परिदृश्य,
जनु,
ठण्डु पाणी, ठण्डु बथौं,
हरीं भरीं डांडी,हिंवाळि कांठी,
बांज, बुरांश,घुगती,हिल्वांस,
मनख्वात, भलि बात,पैन्णु पात,
परिवार अर् दगड़्यौं कू साथ,
ढोल-दमौं, मशकबीन बाजू,
डोला पालिंग, रंगमता पौंणा,
औजि का बोल अर् ब्यौ बारात,
अर् झेल्दा छौं,
हो हल्ला, मंख्यों कू किबलाट,
मोटर गाड़ियौं कू घम्म्ग्याट,
जाम मा जकड़िक,
पैदा होन्दि झुन्झलाट,
सब्बि धाणी छोड़िक,
पराया वश ह्वैक,
ड्यूटी कू रगरयाट,
सोचा, यानि छ हम सब्बि,
"प्रवासियों की पीड़ा",
अपन्णु घर बार त्यागिक,
कनुकै ह्वै सकदन,
हमारा तुमारा ठाट बाट.

जगमोहन सिंह जयाडा "जिग्यांसू"
19.2.2009 को रचित
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
(सर्वाधिकार सुरक्षित)

jagmohan singh jayara

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"चिठ्ठी"

लिखता था बचपन में,
क्योंकि लिखवाते थे,
गाँव के अनपढ़ बुजुर्ग,
अपने बेटे को चिठ्ठी,
समझा समझा कर,
घर के बारे में.

जवान होने पर,
लिखता और भेजता था,
अपने माता पिता को,
कुशलता की चिठ्ठी,
समय समय पर,
परदेश से.

आज भी लिखता हूँ,
लेकिन,
चिठ्ठी का स्वरुप बदल गया,
क्योंकि आज,
ई-चिठ्ठी का जमाना है.

जगमोहन सिंह जयाड़ा, जिग्यांसू
२६.८.२००८ को रचित

jagmohan singh jayara

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"उत्तराखंड"

पवित्र देवभूमि पौराणिक है,
नाम है उत्तराखंड,
"उत्तरापथ" और "केदारखण्ड"
मिलकर बना उत्तराखंड.

शिवजी का निवास यहाँ,
बद्री विशाल का धाम,
पंच बद्री-केदार और पर्याग,
प्रसिद्ध है नाम.

गंगा, यमुना का उदगम् यहाँ,
ऊंची-ऊंची बर्फीली चोटी,
चौखम्बा, पंचाचूली, त्रिशूली,
प्रसिद्ध है नंदा घूंटी.

गले मैं नदियों की माला,
सिर पर हिमालय का ताज,
बदन में वनों के वस्त्र,
उत्तराखंड पर हम को नाज.

मनमोहक हैं फूलों की घाटी,
विस्तृत हैं बुग्याल,
मन को मोह लेते हैं,
जल से भरे ताल.

नदी घाटियाँ खूबसूरत है,
देवताओं का वास,
तभी तो "मेघदूत" लिख गए,
महाकवि "कालिदास".

वीर-भडों की भूमि है,
किया जिन्होंने बलिदान,
उनको कितना प्रेम था,
किया मान सम्मान.

उत्तराखंड का प्रवेश द्वार,
पवित्र है हरिद्वार,
पुणय पावन नगरी,
जहाँ होती जय-जयकार.

कितनी सुन्दर देव-भूमि,
देखूं उड़कर आकाश से,
नदी पर्वतों को निहारूं,
जाकर बिल्कुल पास से.

जन्मभूमि है हमारी,
हैं हमारे कैसे भाग,
कहती है उत्तराखंडियों को,
शैल पुत्रों जाग.


जगमोहन सिंह जयाड़ा, जिग्यांसू
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
२३.७.२००८ को रचित
दूरभाष: ९८६८७९५१८७
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि की अनुमति लेना वांछनीय है

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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Excellent Jagmohan Singh Ji..

Hat off u for writing these excellent poem.


"चिठ्ठी"

लिखता था बचपन में,
क्योंकि लिखवाते थे,
गाँव के अनपढ़ बुजुर्ग,
अपने बेटे को चिठ्ठी,
समझा समझा कर,
घर के बारे में.

जवान होने पर,
लिखता और भेजता था,
अपने माता पिता को,
कुशलता की चिठ्ठी,
समय समय पर,
परदेश से.

आज भी लिखता हूँ,
लेकिन,
चिठ्ठी का स्वरुप बदल गया,
क्योंकि आज,
ई-चिठ्ठी का जमाना है.

जगमोहन सिंह जयाड़ा, जिग्यांसू
२६.८.२००८ को रचित


 

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