Author Topic: उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!  (Read 287811 times)

Dinesh Bijalwan

  • Moderator
  • Sr. Member
  • *****
  • Posts: 305
  • Karma: +13/-0
फिर एक uttrakhandi लड़का-  playan  se utpann  sthiti  ka sajeev chitran hai. Sadhuvbaad  pathkji.



Dinesh Bijalwan

  • Moderator
  • Sr. Member
  • *****
  • Posts: 305
  • Karma: +13/-0
ललित केशवान जी गढवाली के बहुत अच्छे हास्य कवि है  पलायन पर उनकी कविता है:-
तै रोका
यु  डान्डो बिटी
गौळ गौळी
बौग बौगी
सौब
उन्दु जाणु च
तै रोका,
न हो, तब कै दिन
हम भी गौळ जा
हम भी बौग जा

हेम पन्त

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 4,326
  • Karma: +44/-1
स्व. घनश्याम दत्त रतूङी "शैलानी"(18 मई 1934 - 2 दिसम्बर1997) उत्तराखण्ड के जनआन्दोलनों से जुङे रहने वाले एक गम्भीर कवि व लोककलाकार थे. वह सुन्दरलाल बहुगुणा व चण्डी प्रसाद भट्ट के साथ चिपको आन्दोलन से जुङे थे. अपनी गीतों व कविताओं  के माध्यम से उन्होंने जनआन्दोलनों की आवाज को धार दी. एक आपरेशन के बाद लम्बी बिमारी से उबरने पर उन्होंने चण्डी प्रसाद भट्ट जी को चिट्ठी लिखी, उसी पत्र में यह गढवाली कविता की पंक्तियां भी लिखी जो जीवन जीने का आदर्श मार्ग दिखाती हैं.

निम्न कविता शेखर पाठक जी के संपादन में प्रकाशित होने वाली उत्तराखण्ड की प्रमुख वार्षिक पत्रिका "पहाङ" के 10वें अंक से साभार ली गई है-

 
कब गै समय यो सालभर, कना गै इ दिन सरबट कखीI
बसकाल गै व वसन्त भी, कुछु मनखि बी गै कुछु यखीI
आजकल पेङों पर पतझङ आयूं छI

डाली हरि तनसे भरी, ब्याली बसन्त जो तहि यखI
उलार, प्यार-उमंग की, अब स्या जवानि गै कख?

पतझङ बणि झन आज ओ, जो ब्यालि मौली डालि थैI
मौल्यार सै थैं झक भरी, कख गै बसन्त जो ब्यालि थैI
   
जख मां विलीन बसन्त छ, वै शून्य को क्या अन्त छI
रंक, राजा राजनेता, चाइ कोई सन्त छI

एक दिन छोटा-बङौ को, शून्य मांही अन्त छI
लङै-झगङा तेरु-मेरु, खां-मुखां की भिङन्त छI

हंसि खेलिक ईं दुन्यां मां, चुछौं द्वी दिन रैक जाI
के लुकौन्दा, के छुपौन्दा, खूब लैक व खैक जाI

बांटि-चूंटिक खैक तै, अफु मां बि मनखी द्वैक जाI
सुख व दुख बणैक तैं यख, दिल से दिलक मिलैक जाI   

हेम पन्त

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 4,326
  • Karma: +44/-1
अन्धविश्वास ने पहाङ के शिक्षित और अशिक्षित लोगों को अब भी बुरी तरफ जकङ कर रखा है. इसी विषय पर "दुदबोलि-2006" से कुमांउंनी कवि उदय किरौला जी की एक कविता-

पुराण सब खतम हैगो, गौं बाखई उज्याव हैगोI
कम्प्यूटर गौं-गौं पुजिगो, विज्ञानौ जमान ऐगोII

भूता रूणीं जगां आब, मकान बणि गयींI
तिथांणा* ढूंग माटैल, मकान सब सजि गयींII

भूता चक्कर में आज गौं मैंस खतम हैगो,
घर कुङि बेचि बेर, हिरदा पित्तर बगै ऐगोII

अस्पताल नामैके छन देपाता पर्च खतम हैगींI
सैणीं भूत पुजना लिजि डाक्टर सैब घर ऐगींII

बीमार कैं अस्पताल दिखाओ मन पक्को करि भै पूजोI
नान कूंणी भूत पुजणियोI भूता बजाय मैंस पूजोII
 

*तिथांण - श्मशान घाट

पंकज सिंह महर

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 7,401
  • Karma: +83/-0
जनकवि अतुल शर्मा की उत्तराखण्ड आन्दोलन के दौरान की कविता, यह कविता आन्दोलनकारियों के लिये एक स्फूर्ति का काम करती थी।

लड़ के लेंगे, भिड़ के लेंगे, छीन के लेंगे उत्तराखण्ड,
शहीदों की कसम हमें है, मिलके लेंगे उत्तराखण्ड।
पर्वतों के गांव से आवाज उठ रही सम्भल!
औरतों की मुट्ठियां मशाल बन गई सम्भल!
हाथ में ले हाथ आगे बढ़ के लेंगे उत्तराखण्ड।    लड़ के लेंगे..........।
आग की नदी, पहाड़ की शिराओं में बही,
हम ही तय करेंगे, अब कि क्या गलत है क्या सही,
राजनीति वोट की बदल के लेंगे उत्तराखण्ड।    लड़ के लेंगे..........।
प्रांत और केन्द्र का ये खेल है हवा महल,
फाइलों में बंद है जलते सवालों की फसल,
प्रांत और केन्द्र को हिला के लेंगे उत्तराखण्ड।    लड़ के लेंगे..........।
नई कहानी तिरंगे के सथ बुनी जायेगी,
हंसुली और दाथियों की बात सुनी जायेगी,
गढ़-कुमाऊं दोनों आगे बढ़ के लेंगे उत्तराखण्ड।    लड़ के लेंगे..........।
दीदी-भुलियां तीलू रौतेली की तरह छायेंगी,
भूखी प्यासी कोदा और कंडाली खाके आयेंगी,
कफ्फू चौहान बन के बढ़ के लेंगे उत्तराखण्ड।    लड़ के लेंगे..........।
श्रीदेव सुमन, माधो सिंह भण्डारी बनके आज देख लें,
चन्द्र सिंह, गबर सिंह बनके आज देख लें,
आज के जवान जेल भरके लेंगे उत्तराखण्ड।    लड़ के लेंगे..........।
मुट्ठियां उठी हैं इस सिरे से उस सिरे तलक,
मशालें जल उठेंगी इस सिरे से उस सिरे तलक,
हर जुबान को ये गीत देके लेंगे उत्तराखण्ड।    लड़ के लेंगे..........।
एक दिन नई सुबह उगेगी यहां देखना,
दर्द भरी रात भी कटेगी यहां देखना,
जीत के रुमाल को हिला के लेंगे उत्तराखण्ड।    लड़ के लेंगे..........।

jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 188
  • Karma: +3/-0
 प्रिय मित्रों मैं लौट आया हूँ,
    आज आपके पास,
     सोच रहा था,
    मेरी कविताओं के बिना,
     हो रहे होंगे आप उदास.
     विचर रहा था उत्तराखंड में,
     पर्वतों के पास,
     चहक रहे थे पंछी,
     नदी नालों के पास.
     ढूँढ रहा था,
     मुझे दिखे,
     दो बुरांश के फूल,
     दिल्ली को भी जाना है,
     मन से गया था भूल. 
   
   
     " जनता की जय हो"

जनता तेरी जय हो, पकड़ लिया है हाथ,
फूल को है मुरझा दिया, नहीं दिया है साथ.

धुरन्दर देखो चित हुए, बता दी है औकात,
जनता की सेवा बिना, नहीं मिलती सौगात.

जनता सब कुछ जानती, किसको मत इस बार,
कहीं असंख्य फूल बरसे, ख़ुशी मिली अपार.

जनमत नहीं है कालजयी, रहना तुम होशियार,
जन कल्याण मूल मंत्र है, स्वच्छ हो सरकार.

आत्म चिंतन हारे जीते को, यही असल है बात,
क्योँ दिया क्योँ नहीं दिया, समझनी होगी बात?

मन के लड्डू नहीं भले, फैसला है जनता के हाथ,
कहता है कवि "जिग्यांसू" ,  यही फतह की बात.


सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसु"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
१८.५.2009

jagmohan singh jayara

  • Full Member
  • ***
  • Posts: 188
  • Karma: +3/-0
 "पहाड़ प्यारा उत्तराखंड"

जनमत दिया पहाड़ ने, छिपी है कुछ बात,
वक्त भी यही कहता है, मिल जाये सौगात.

उत्तराखंड में जो सरकार है, लगती खाली हाथ,
करना कुछ वे चाहते, नहीं मिलता है साथ.

अब देखना उत्तराखंड में, होगा सत्ता का खेल,
विकास भी जरूर होगा, और चलेगी रेल.

सड़कें हैं बन रही, सर्वत्र हो रहा है विकास,
धैर्य धरो हे उत्तराखंडी, रखना मन में आस.

बिक रहा है उत्तराखंड, ये है सच्ची बात,
प्रवास हैं हम भुगत रहे, क्या है हमारे हाथ.

चर्चाओं में है छाया है, उत्तराखंड की राजधानी,
वहीँ रहेगी सच है, जहाँ होगी बिजली पानी.

राजनीति भी बाधक है, कैसे हो पहाड़ का विकास?
जल खत्म, जंगल जल रहे, संस्कृति का हो रहा है नाश.

पहाड़ पर बिक रहा है पानी, सर्वत्र छाई है शराब,
कुछ लोग चर्चा करते हैं, समाज के लिए है ख़राब.

सब कुछ है बदल रहा, नहीं बदले पक्षिओं के बोल,
डाल डाल पर चहक रहे, जिन पर हैं उनके घोल.

आज भी लग रहा है, देवताओं का दोष,
बाक्की जब बोलता है, उड़ जातें है होश.

पहाड़ घूमने गया था, ये हैं आखों देखे हाल,
उत्तराखंड राजी रहे, तेरी जय हो बद्रीविशाल.

सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसु"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
20.५.2009


पंकज सिंह महर

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 7,401
  • Karma: +83/-0
उत्तराखण्ड के प्रसिद्ध कवि स्व० चन्द्र कुंवर बर्त्वाल जी की एक कविता


अब छाया में गुंजन होगा, वन में फूल खिलेगे
दिशा दिशा से अब सौरभ के धूमिल मेघ उठेंगे
जीवित होंगे वन निद्रा से निद्रित शेल जगेंगे
अब तरुओ में मधू से भीगे कोमल पंख उगेगे

मेरे उर से उमड़ रही गीतों की धारा
बनकर ज्ञान बिखरता है यह जीवन सारा
किन्तु कहा वह प्रिय मुख जिसके आगे जाकर
मैं रोऊ अपना दुःख चटक सा मंडराकर
किसके प्राण भरू मैं इन गीतों के द्वारा
मेरे उर से उमड़ रही गीतों की धारा
मेरे कांटे मिल न सकेगे क्या कुसुमो से
मेरी आहे मिल न सकेगी हरित द्रमो से
मिल न सकेगे क्या शुचि दीपो से तम मेरा
मेरी रातो का ही होगा क्या न सबेरा
मिथ्या होगे स्वप्न सभी क्या इन नयनो के
मेरे..
चाह नहीं है, अब मेरा जीवन शीतल है
द्वेष नहीं है, अब मेरा उर हो गया सरल है
गयी वासना, गया वासनामय योवन भी
मिटे मेघ, मिट गया आज उनका गर्ज़न भी
मैं निर्बल हु पर मुझको ईश्वर का बल

Dinesh Bijalwan

  • Moderator
  • Sr. Member
  • *****
  • Posts: 305
  • Karma: +13/-0
Chander Kunwar bartwal  prakrti ke adhbut chitere the.  Wo bahut kam umar me hi is  duniya se chal base  aur sahitya jagat unki pratibha se vanchit rah gaya.   Unki  kavita ke liye dhanyabaad maharjee.

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

  • Core Team
  • Hero Member
  • *******
  • Posts: 40,912
  • Karma: +76/-0

Composed by : Vikay Singh Butola

याद भौत औंदन वू प्यारा दिन जब होदू थौं

काली चाय मा गुडु कु ठुंगार
पूषा का मैना चुला मा बांजा का अंगार
कोदा की रोटी पयाजा कु साग
बोडा कु हुक्का अर तार वाली साज
चैता का काफल भादों की मुंगरी
जेठा की रोपणी अर टिहरी की सिंगोरी
पुषों कु घाम अषाढ़ मा पाक्या आम
हिमाला कु हिंवाल जख छन पवित्र चार धाम
असुज का मैना की धन की कटाई
बैसाख का मैना पूंगाडो मा जुताई
बल्दू का खंकार गौडियो कु राम्णु
घट मा जैकर रात भरी जगाणु
डाँडो मा बाँझ-बुरांश अर गाडियों घुन्ग्याट
डाँडियों कु बथऔं गाड--गदरो कु सुन्सेयाट
सौंण भादो की बरखा, बस्काल की कुरेडी
घी-दूध की परोठी अर छांच की परेडी
हिमालय का हिवाँल कतिकै की बगवाल
भैजी छ कश्मीर का बॉर्डर बौजी रंदी जग्वाल
चैता का मैना का कौथिग और मेला
बेडू- तिम्लौ कु चोप अर टेंटी कु मेला
ब्योऊ मा कु हुडदंग दगड़यो कु संग
मस्क्बजा की बीन दगडा मा रणसिंग
दासा कु ढोल दमइया कु दमोऊ
कन भालू लगदु मेरु रंगीलो गढ़वाल-छबीलो कुमोऊ
बुलाणी च डांडी कांठी मन मा उठी ग्ये उलार
आवा अपणु मुलुक छ बुलौणु हवे जावा तुम भी तैयार

 

Sitemap 1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16 17 18 19 20 21 22