Author Topic: उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!  (Read 293314 times)

Bhishma Kukreti

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गढ़वळि ग़ज़ल – 1

Garhwali Ghazal

By Chandamohan Jyoti

**************
धुंधळी सी रै होली जु कुछ तस्वीर
अब वु आँख्यूं म छप्प छप्यां छन
कुंगळी सी रै होली जु कबि माया
अब लगुला बणी मैमु लिस्यां छन
जु गैणा रै होला कबि तेरी जग्वाळ
टूटि कै मेरी खुचिली म खत्यां छन
तै फूंदा फर रै होला जु फूल टुम्यां
वो बसंत बणी मेरा घौर अयां छन
Copyright@ Chandramohan Jyoti


Bhishma Kukreti

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TThe spring
A Modern Kumauni Folk Songs/  Poem
-
By Om Prakash Arya

* वसंत ऋतु *


कुमाऊनी कवि श्री ओम प्रकाश आर्य ज्यूकि
-

वसंत ऋतु पर एक रचना।

-
दिन पंचमी सरस्वती ऐगे,
आशीष अपण दिण लैगे।
डाइ बोटी बौरांणा लै गै ,
ऐगे। ऋतु वसंत ऐगे ।
प्योली बुराँश फुलंण लै गैं,
च्याखुड़ गीत गहांण लै गैं।
हियुंवाँ हिमाल चमकण लै गे,
ऐ गे ऋतु वसंत ऐ गे।
बाग बगीच् सजिंण लै गैं,
भँवर गुन गुनाण लै गैं।
पुतई खेल खेलंण लै गे,
ऐ गे ऋतु वसंत ऐगे ।
डंगर रूअं छोणण लै गैं,
देखि ऋतु डोंरिण लै गैं।
मैत हैं ब्वारि पैटिंण लै गे,
ऐ गे ऋतु वसंत ऐ गे ।
होरि चौपुड़ बादिंण लै गैं,
रौटि नंगार कसिंण लै गै।
निषांण फर फरांण रलै गे,
ऐ गे ऋतु वसंत ऐ गे।
फुलार् फूल टिपंण लै गैं,
फूल देई भेटंण लै गैं।
मैत बै मेरि भेटुइ ऐ गे,
ऐ गे ऋतु वसंत ऐ गे।
दिन पंचमी सरस्वती ऐ गे,
आशीष अपुण दिण लै गे।
सर्वाधिकार @ ओम प्रकाश आर्य।


Bhishma Kukreti

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  Changing time

A Kumauni Poem /folk Song by Ramesh Hitaishi
   
    बघत कुछ अणकौसै हैगो
-
By: रमेश हितैषी

-[/b]
बघत आज बलवान हैगो,
      मनखी पैसुक पछिन  भाजन हैगो. 
अकास पारि पुजणकि सोच हैरै,
       बघत कुछ अणकौसै हैगो।

गों तरुफ़ पूठ फरकै रौ,
      बुजुर्गुक कुड़ी में बुकिलु जामिगो।
पहाड़ छोडि सहरों में ऐ गई,
      अब एन आर आई फौरन रिटर्ण हैगो।

पहाड़ी छोड़ी हिंदी मैं ऐ गो,
       हिंदी लै ग्ये अब निरपट अंग्रेज है गो.
अघिंन पीड़ी बुलानी निछा खाली समझी,
       य अबलछण कुछ अणकौसै हैगो।

नमस्ते नमस्कार मेरीस्यो गे,
       अब त  हैल्लो हाय और बाय बाय रहै गो.
घरक बब बुड़ सौरासकू डैडी,
       दीदी दीदू और भिन जीजू हैगो।

डी टी सी छोड़ी अब गाड़ी वाऊ हैगो,
       सुख सुबिधाक लै आदी हैगो।
घुमणा बौहन  कुकूर पाई रौ,
       गोरु बकर छोड़ी अब कुकुरुकू ग्वाऊ हैगो।

रामी , तिलु,राजुली बघत नहै गो,
       शीला मुन्नी कु बुखार चड़ी गो.
को कौं याद हरियाऊ घिसज्ञान,
       वेलेंटाइन और करवाचौथक रिवाज हैगो।           
दूध, दै, छांछ, बिल्कुलै हैरै गो,
       काई सुकिली पिवाणकु रिवाज हैगो।
पेंट कमीज सोर्ट है गई,
      ज्वातु नस्युड़ जसु जाधे लम्बू हैगो।

एक रिवाज इज बाज्यू हबै अलग रहणक लै हैगो,
      भौ हन द्या सासु कै बुलाई गो.
नामकरणक दिन स्याऊ पिठ्या लगणी बनिरौ,
      सौर कैटरिंग क इन्चार्ज हैगो।

टेलीविजन में खुसी छैं चार व्य देखि बै,
      येति एकै झेलण मुस्किल हैगो।
को पुछू एक गिलाश पाणी,
       बस सिरियालुक जमघट हैगो.
इज बौज्यूक फजितु हैगो,
       घर नि आय सौरासै बै लौटि गो.
घरवाई बीमार नौकरी झंजट बतैगो,
      नेस्ट टैम मिलुल वडसप कैगो।

अब त डिजैनुक लै मतलब बदली गो,
      चिरी टल्य्युक जमानु है गो,
पैली बै डिजैन कागज बन छि,
     अब वक लिजी केवल मुनव रहै गो।

जमानु बदली फैशन बदली, गोरु,
      गोरु और भैंस-भैंसे जसु रहै गो।
सिर्फ इंसान इंसान नि रौहय,
      बस यकै लिजी कुनु बघत कुछ अणकौसै हैगो.

 Kumauni Poem by Ramesh Hitaishi, Uttarakhandi Folk Song by Ramesh Hitaishi

 



Bhishma Kukreti

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मनखी रे मनखी

  गढ़वाली कविता
-
कविता -दीपक नेगी गढ़प्रेमी


A Garhwali Poem /Folk Song by Deepak Garhpremi
-

मनखी रे मनखी मनखी रे मनखी
कै बात कू करदी तू अभिमान
ना साँस ही छन बसमा
तियारा ना जू ना पराण
मनखी रे मनखी मनखी रे मनखी
चार दिनै की जिन्दगी
हँसी खेली काटि ले
सुख हो या दुख यूथै बाटि ले
जीवन मा कभी नी हुणू हताश
मनखी रे मनखी मनखी रे मनखी
कै बात कू करदी तू अभिमान
ना साँस ही छन बसमा
तियारा ना जू ना पराण
मनखी रे मनखी मनखी रे मनखी
ज्वानी सरी रूपया कमौण मा बिते
अर बुढापू दवै दारू मा कटे
अफी सोच हे लाटा तिन क्या पै
मनखी रे मनखी मनखी रे मनखी
कै बात कू करदी तू अभिमान
ना साँस ही छन तियारा बसमा
तियारा ना जू ना पराण
मनखी रे मनखी मनखी रे मनखी
यू तन माटी का पुतला
एक दिन माटी मा ही मिल जाण
खाली हत ऐई तू जगमा
खाली हत ही जाण
मनखी रे मनखी मनखी रे मनखी
कै बात कू करदी तू अभिमान
ना साँस ही छन बसमा
तियारा ना जू ना पराण
मनखी रे मनखी मनखी रे मनखी ।
सर्वाधिकार सुरक्षित @ दीपक नेगी गढप्रेमी
गढ़वाली कविता , Garhwali folk song

Bhishma Kukreti

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 क्य -क्य धाणि हर्चिगे
पलायन दुर्दशा बयां करती एक गढ़वाली कविता
By - धर्मेन्द्र नेगी
A Tragic Garhwali Poem on Plight by  Migration
Poetry by Dhamrnedra Negi

-
बतौं मि अब कि क्य -क्य धाणि हर्चिगे
मुखड़्यूं कि हैंसि, आंख्यूं को पाणि हर्चिगे
दाना-दिवनौंकि खुचल्यूं बिटि बाळा लुछेनि
कथा-कथगुल्यूं को वो राजा व राणि हर्चिगे
गोर-भैंस्यूं का गुठ्यार रीता - सूना छन हुयां
डखुळि -पर्या -हड़प्या, घ्यू कि माणि हर्चिगे
खेति-पाती नौ पर द्वी सारि चरणा छन गोर
नाजै निरबिजि ह्वे,फल-फरूटै दाणि हर्चिगे
खरेगैनि थौळा-मेला अब कौथगेर नि रैगेनि
कौथग्यूं मा मिलणै व स्याणि - गाणि हर्चिगे
नाता-रिश्तोंकि अपण्यांस घूळिगे यु मोबैल
एक हैंका ध्वार - धरम आणि-जाणि हर्चिगे
चिन्ता - फिकरऽ मूड़ि दबीऽ मरिगे मनखि
निन्द -सुख -चैन हर्चे, सीणी -खाणि हर्चिगे
ये निरभै परदेसम हमारू क्य नि हर्चु 'धरम'
रीति-रिवाज हर्चीं,हमारि मिठि बाणि हर्चिगे
सर्वाधिकार सुरक्षित-:
धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी, रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ


Bhishma Kukreti

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       पहाड़ घुमि यायू
-

पलायन से दुर्दशा बखान करती  एक कुमाउँनी कविता
-
कवि : रमेश हितैषी

-
बिहि पोरहुँ आपण पहाड़ घुमि आयू,
        नलू में उमई पाणी पि हायू.
टूटि कुड़ी बांजी पाटई,
        बुकिलु जामी गुठ्यार देखि यायू. 
 
को पूछूं छि एक गिलास पाणि,
        माठु माठु पनह्यर लै जै हायू.
धरुक जगम सिमेंटकि टंकि रौलु हन बाथरूम,
       आपण गौंक विकास देखि यायू.

मलि सोचि एक झपाक  डन पन जै  हुल,
        कांफोउ हिसाउ और किल्म्वाड़  खै हुल.
पर वेति डुट्याउक छप्पर भौत सालुक बाद लिसक कंटर,
           फुकि जंगवक में धुवां रोव और झोलै झोल देखि यायू.

खबर बात पुछ्णक बौहनल,
        व्याउ तलि बाखइ जबरदस्ती जै आयू.
चुलु फुकनि काकि पाणी सारनु कुकड़ हई कक,
        इकल बूढ़ी बाड्युक बुर हाल देखि यायू.

बजार में नेताउक क्वर भाषण,
        दिन दोफरि सराबियुक जमघट देखि यायू.
गाड़ियूकि लम्बी लैन मतलबी अपण पर्या,
         हमरै हमुकैं कस लुटनी बस अणकसै  प्यार देखि यायू.

व्यो बर्यातु में अलूणि सान,
         विडिओ वाउक पावर लै  देखि यायू.   
खाण पीणु लत्त कप्पड़ अफी जस,
         बस अधराति भुतुक जै नाच देखि यायू.
बेरोजगारुक थुपुड़ पधान बनणकि जुगुत,
        नै पुराणी सरकारकि करतूत देखि यायू.
जै रौल पाणिकू एक छिटु नि हौय,
       वेति करोड़ो लागतकि बनी नहर देखि यायू.

अपण गौं में आरक्षण में बनि प्रधान पतिक तन तन, 
      उ पधानिकु अघिनकु भविष्य देखि यायू. 
पांच लाखकि रिकवरी चार सलाकि सजा,
        हाई कोर्टकू वारंट देखि यायू.   

ए पी एल बी पी एल अंतोदय,
      उज्ज्वला गैसकि कहानी सुणि यायू.
गल्ल दारुकि मौज मस्ती, 
        गरीब गुरुबुकि लाचारी देखि यायू.

पशु पालन, स्वस्थ्य केंद्र, डाक बंग्यळ,
        और जग जगु ठुल ठुल रेजॉर्ट देखि यायू.
 बिहि तक जो थोकदार छि वे बाखइक,
        उनुकेँ रेजॉर्ट में चौकीदार देखि यायू.
 
कुड़ी कुड़ी रोवा रो गों गों में भूतेव,
        भ्योउ  हन घूरि गाड़ि देखि यायू। 
अपणि अपणि कूर्शी बचणक चक्कर में, 
       एक दुसरक टांग खैंचन देखि यायू। 
 

कफनक लिजि मिटौण,
     मुर्द लिजणक लिजि बोतल मंगान देखि यायू।
झुट मूट थ्वड़ दिनी सुभ चिंतक,
        थूक लगै ढ़ेडुवकै वाई बेमतलब रुणि देखि यायू।
सर्वाधिकार@सुरक्षित
Kumauni Poem illustrating pain by migration; Kumaoni poem illustrating ruining villages .

Bhishma Kukreti

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गढ्वळि ग़ज़ल – 2
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चंद्रमोहन ज्योति
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Garhwali Ghazal -
By Chandramohan Jyoti

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लुकईं ढकईं सैंतीं पळीं माया आज दिखे ग्याई
बरसूं बिटी कूण दबयूं उमाळ आज खते ग्याई
अब नि राई निर्बै उत्तराखंड म पहाड़ सी जीवन
लुखु खुणै क्य बुन माया बि पलायन कैरि ग्याई
अब नि मनाणै बल ऊंल अपणा बार - त्यौवार
किलैकि अब स्यु पाड़ी न पक्कु देसी ह्वे ग्याई
तु बोटि ले अंग्वाळ जतगा बोटि सकदि ज्योति
अब ए निर्दै निठुर पहाड़ म त्वेकु पिड़ा नि राई
सर्वाधिकार : चंद्रमोहन ज्योति

Bhishma Kukreti

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मंन्जिल मिल जाली त्वै
-
गढ़वळि कविता

कवि: दीपक नेगी गढप्रेमी
A Garhwali Poem by Deepak Negi Garhpremi

-
मंन्जिल मिल जाली त्वै
चल उठ खड हो कदम बढा
बाटू उबड खाबड ही सही
तू हिटदी जा तू हिटदी जा
मंन्जिल मिल...... हिटदी जा
बैठ बैठिकी क्या सुचणी छै
सोच सोचिकी कुछ नी हुणू रे
मनमा नए जोश नए उमंग भरीकि
तू अगनै बढदी जा तू अगनै बढदी जा
मंन्जिल मिल........... हिटदी जा
सुख दुख त लगया रैदन जीवन मा
अपडी जिकुडी थै तू ना झूरा
ना निराश हो ना उदास हो
तू चलदी जा तू चलदी जा
मंन्जिल मिल........ हिटदी जा
विपदौ कू पहाड हुव्ये त क्या
ना हार तू ना डेर तू
कमर कसी ले अपडी तू अर
यू पहाडू मा तू चढदी जा तू चढदी जा
मंन्जिल मिल................ हिटदी जा
मंन्जिल लाख दूर ही सही
हिम्मत कैरी की धीरज धेरी की
अपडी ही मंतग मा बस
तू बढदी जा तू बढदी जा
मंन्जिल मिल.............. हिटदी जा
मंन्जिल मिल जाली त्वै
चल उठ खड हो कदम बढा
बाटू उबड खाबड ही सही
तू हिटदी जा तू हिटदी जा ।।
-
सर्वाधिकार सुरक्षित@ दीपक नेगी गढप्रेमी
Garhwali Folk Song by Garhpremi

Bhishma Kukreti

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    घिनोड़ि
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(पलायन के घाव दर्शाती कुमाउँनी कविता)
-
By: रमेश हितैषी   
The Sparrow

( Kumauni poem Illustrating A pain of Migration from Uttarakhand )
  -         
जा घिनोड़ि पहाड़ जौ, म्यार गौं कि कुसल बात ल्यौ। 
कनु चलणु वख काम धाम, जरसि तू अपणा आंखियुल देखि औ। 

ठिक चलदु आज ब्याखून दौ, पर तु मिथें एक बात त बतौ।
इथगा चिंता करदि वखकि, तुम वख छोड़ि क किलै औ। 

अए घिनोड़ि सुणिक जौ, किलै कुरेदणि छै म्यारा घौ।
मेरी खैरि त भौत ठुलि छै, द्वि रोटी एक लत्ता का बाना औं। 

ठिक छ लोला अब भौत ह्वेगे, अजी बि खैक क्या नि हवे धौ।
अब त त्वेमा सब्या धाणि च, अब चल त अपणा घौर जौ। 

न न छूची त्वे कंनक्वे बिंगौं, यख यौ जैजात कैमा द्यौं।
अब त मीसे बि वख नि रयेणु, तब त छोरी त्वे पठ्याणौ छों।

अब समझु मि तेरि गौं, मि उड़िक सुर यखुलि चलि जौं। 
तू रे यख तेपुरा महलों मा, मि वख किंनगोड़ा बुज्या रौं। 

न न लोलि त्वेकु महल बणौल, तिल त मि दुरबा नेता बणयौं। 
एक बार तू वख जैक देख,  सच बूबू छों त्यारा सौं

न न मिल तू पोर बी देखि, मिथै पुरणि याद न दिवौ। 
मि बि तेरि जवटि मा खूसि छौं,  तू त बस अब अपणि जतौ। 

चलि जा छूची मेरि बात मान, यनु बगत तू अब बिलकुल न गवौ। 
ठंडि हवा च्वाखु पाणि, राजी रौ जरा सियत बणौ।

मेरि छोड़ अपणि लगौ,  अफखवा मंनखी सी लदवडु भीतर करौ। 
चल मि मेलु डाली मा रौंलु, तू चटेली पुंगड्यू हौलु लगा। 
सर्वाधिकार@ रमेश हितैषी   
   
Kumauni poem illustrating the pain of Migration from Uttarakhand

Bhishma Kukreti

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//द्वी बीसी पार ///

Crossing forty
By Balbir Rana 
(a Garhwali Poem illustrating aging factor)
By: बलबीर राणा 'अड़िग'

-[/font][/size]   
-
सफेदी एग्ये अब कंदुड़ा आस-पास
मथि सफाचट या बच्यां/खुच्यां उदास
आंख्यों तौळ लटकीं काळा रयखड़ा
मुख मा अनभौ धीरज, धृगम/धीर
जिमेदारी फंची से ढल्क्यां कांधा
दिनचर्या घटsटे घुरड़यों जन धन्दा
पुटुग उड़्यार या, थळथमकार
तौळी/मौळी चीजों से खट्टा डकार
कुटमदरी सुख खातिर जतन जोड़
सब्बि जगा अपणा ही हड़गा मरोड़
गिरस्ती चुलाणा अफूं जळणु रैंद
मि ठिक छौं सब्यों तें बुथाणु रैंद
भल का वास्ता घिसण/घिसाणु
ब्वल्यों माना रे, हर बगत बिंगाणु
अफूं से बड्या होणी खाणी आशा
द्वी बीसी पार मनखी अभिलाषा।
@ बलबीर राणा 'अड़िग'

 

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