Author Topic: उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!  (Read 284738 times)

Bhishma Kukreti

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खुदेंदु पराण
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श्रृंगार रस की गढ़वाली  कविता
कवि-धर्मेंद्र नेगी
-
A Garhwali  Love folk song
by Dharmendra Negi

-

दिन ढलकेगे झप्प अंधेरो ह्वेगे
खुदेन्दु पराण यु अब मेरो ह्वेगे
मेरा बस मा नि रयूं अब कतै बि
यु मेरो ज्यू -पराण अब तेरो ह्वेगे
झिंझ्वड़ीं लगुलि सि पितम्वरेगे
य गात उदासी को अब डेरो ह्वेगे
मन रीटि - फिरड़ी त्वेमा ऐजान्द
य दुन्या घाघरी को जन घेरो ह्वेगे
बौळ्या बणी अटगणूं-भटगणूं छ
ज्यू टोल बिटि बिरड़्यूं भेरो ह्वेगे
कुछ नि करण देणी अब 'धरम'तैं
तेरि खुद त जन दैंऽ को फेरो ह्वेगे
सर्वाधिकार सुरक्षित-:
धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी, रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ
Garhwali Folk song from Garhwal;   Garhwali Folk song from Uttarakhand ;  Garhwali Folk song from North India
  श्रृंगार रस की गढ़वाली  कविता   

Bhishma Kukreti

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गढ़वळि ग़ज़ल – 1

चं
द्रमोहन ज्योति
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Love Rapture based Garhwali Ghazal
-
By Chandramohan Jyoti


**************
धुंधळी सी रै होली जु कुछ तस्वीर
अब वु आँख्यूं म छप्प छप्यां छन
कुंगळी सी रै होली जु कबि माया
अब लगुला बणी मैमु लिस्यां छन
जु गैणा रै होला कबि तेरी जग्वाळ
टूटि कै मेरी खुचिली म खत्यां छन
तै फूंदा फर रै होला जु फूल टुम्यां
वो बसंत बणी मेरा घौर अयां छन
(बसंत पंचमी कि एक दौ फेरि बधै)
Copyright@ Chandramohan Jyoti

Bhishma Kukreti

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निरभै बुढ़ापा"
By : धर्मेन्द्र नेगी
O! Old Age
Garhwali Poetry by Dharamendra Negi[/size]


मुंड -मुंडारू, पुटग पिड़ा, द्वी हैड़ चसगणा छन
कन्दूड़ बुजेगैनि पट, आँख्यूंम जैंगण रिंगणा छन
कबि उन्द, कबि उब्ब, करक-करास-झिलसिणि
दवै काम नि करणी, फल -फरूट नि पचणा छन
खुरा-खाँसी दिन -रात, बळगम कतैऽ छड़ेन्दो नी
सैरि रात उठा -पोड़, आंखा निन्द जग्वळणा छन
डौंणा छन तंगत्याणा, उकाळ - उंदार हिटण मा
गैत जबाब देणी, हाथ - खुटा त जन गळणा छन
दिन-रात ख्यप-ख्यप,हर घड़ि रैन्द हणांट-कड़ांट
ध्वार -धर्म नि आन्दो क्वी, सब्बि दूर भजणा छन
सित्त-पित्त,सितगरमी, बरमंड चटाग मरणूं 'धरम'
जीरण ह्वेगे शरैल अब जाणा लछण लगणा छन
सर्वाधिकार सुरक्षित -:
धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी, रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ


Bhishma Kukreti

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दिल्ली

A Kumaoni /Garhwali Poem about Delhi
by Ramesh Hitaishi
कुमाउनी/गढ़वळि कवि: रमेश हितैषी


-
दिल्ली!
धन रे दिल्ली तेरी पराणी,
सबुलै तेरी पीड़ पछ्याणी।
अपण घरकि नि जाणी कहाणी,
भ्यार अपणी जै जै कराणी।
अपडु कें घर भूकै छोड़ि यानी,
दिल्ली में ऐ भंडारा बांटनी।
कैकी हैरै घर जणे सियाणी,
कैल छोड़ि ह्यै जन्म भूमि अपणी।
आपण गुठ्यार कि दीवाल नि चीणी,
दिल्ली में सब बल भलिक बसाणी।
अपण घर जैल समाइ नि जाणी,
भ्यार कर में पंच परवाणी।
अपण चै धारु धार डोई जै,
दिल्ली अपणी भलिक बसाणी।
सर्वाधिकार@सुरक्षित

Bhishma Kukreti

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" त"

By: शिवदयाल "शैलज"
Garhwali Ghazal
By :Shivdayal Shailaz

गज़ल
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"रून्देरौं -आँसू जो वै बगत हि फुंजे जांदा ।
त सात समोदर आज खारै - खारा किलै हूंदा ।।
साफ कैरि जि स्वरेंदा , जो मनख्यात का बाटा !
त वूं बाटूं मा आज , गारै - गारा किलै हूंदा ।।
धरम त एक ही भौत छौ , जो मनखी चैलि जि जणदू ।
त धर्म - कूड़ी फरि आज , म्वारै - म्वारा किलै हूंदा ।।
मनु -शतरूपा ,आदिम -हव्वा कु जो पता हूंदो ।
त दुन्याम् भै -भै आज, स्वारै - स्वारा किलै हूंदा ।।
मन से मन मिलाणा कु जो पूळा बणयां रैंदा ।
त प्रीतिक बाटा आज , फारै -फारा किलै हूंदा ।।
धर्तिम् फूल तोड़ि सर्गम् गैणा हिलदीं, क्वी जणदो !
त ल्वै पेकि आज त्वारा , क्वारै - क्वारा किलै हूंदा ।।
आँख्यूं मा जि दिल द्यखणै कि , नजर हूंदी "शैलज"।
त वो मुखड़ि ध्वैकि आज , ग्वारै - ग्वारा किलै हूंदा ।।
म्वारै -म्वारा = दरवाजे ही दरवाजे
त्वारा = कंठ या गला
काॅपी @ शिवदयाल "शैलज"

Bhishma Kukreti

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तू भी उड़ी जा अब यख कैन नि औंणु।
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  पलायन दुःख दर्शाती  गढ़वाली कविता
कवि -राजेंद्र सिंह पंवार
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Garhwali poem illustrating pain of Migration
Poem by Rajendra Singh Panwar

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फुर्र उड़ी जा तू भी घुघति कि अब यू मुल्क ह्वेगी बिराणु।
अब नि रैनि उ मनखी मायालु…..ओ ओ ओ हो हो.
अब नि रैनि उ मनखी मायालु, ना- रैगे वा मन्ख्यात,
अब नि विरेन्दा उ थौला मेला, न रीति रिवाजु की बात।।
खुश खबर भी हरची अब त.......
खुश खबर भी हरची अब त प्रदेश्यों कु औणु जाणु।
फुर्र उड़ी जा तू भी घुघति कि अब यू मुल्क ह्वेगी बिराणु।
जैली कभी त उमा लगै दे.....ओ ओ ओ हो हो.
जैली कभी त उमा लगै दे, में.रा पहाड़ की गाणी,
जन्द्री घट भी हर्चि ग्याई, मगरा गदनो कु पाणी।
गंगाजी एक सारू रईं छै.........
गंगा जी एक सारू रईं छै वीं भी डॉम सुखाणु।
फुर्र उड़ी जा तू भी घुघति कि अब यू मुल्क ह्वेगी बिराणु।
बांजी पड़ीन डोखरी-पुंगडी.....ओ ओ ओ हो हो.
बांजी पड़ीन डोखरी-पुंगडी सुन्न चौक गुठ्यार,
अब नि सुंणेदी गोरु घण्डुलि बालौं की किलकार
उसगरा भरदी रैगी पहाड़.........
उसगरा भरदी रैगी पहाड़ यखुली यखुली कंणाणु।
फुर्र उड़ी जा तू भी घुघति कि अब यू मुल्क ह्वेगी बिराणु।
अब नि होणी फेर कभी यख.....ओ ओ ओ हो हो.
अब नि होणी फेर कभी यख रामी तीलू सी नारी
कभी जल्म्णयां बीर भड़ क्वी जन माधो भण्डारी
सच ह्वे तेरु अस्गार उदीना...........
सच ह्वे तेरु अस्गार उदीना,सैरा पाड़ तैं ह्वे पछताणु।
फुर्र उड़ी जा तू भी घुघति कि अब यू मुल्क ह्वेगी बिराणु।
©RSPanwar20200104


Bhishma Kukreti

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गज़ल

Love rapture oriented Garhwali Ghazals by Payas Pokhara
गज़ल: पयाश पोखड़ा

*******

कळ्यज़ा मा कुछ इना लिखत मिलीं ।
कि ज़िकुड़िम त्यारा हि दसखत मिलीं ।।
अब बिसर्यामा भि नि आंदा वो याद पर ।
ब्यखुनि फ़ज़ल ये आंखि लतपत मिलीं ।।
बस एक तेरि मयल्दु खुद मी दगड़ रैंद ।
निथर हमथैं त दिकत हि दिकत मिलीं ।।
बिगरैला बसंत मा मौल्यार नि दिख्याई ।
कोंपळ-कुटमणा हमथैं त निखत मिलीं ।।
जुगराज़ रयां म्यारा आंसु फुंजदरा भि ।
वो भला लोग जो बगत-कुबगत मिलीं ।।
अंगुळि छोड़ि बौंफुर्र थमणा को 'पयाश' ।
अणमील अदम्यूं थैं दस-दस हत मिलीं ।।


© पयाश पोखड़ा 10022020.

Bhishma Kukreti

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निरभै बुढ़ापा'

(गढ़वाली  कविता )

कवि-धर्मेंद्र नेगी
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A Garhwali Pathos rapture Poem on Old Age

By Dharmendra Negi
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मुंड -मुंडारू, पुटग पिड़ा, द्वी हैड़ चसगणा छन
कन्दूड़ बुजेगैनि पट,आँख्यूंम जैंगण रिंगणा छन
कबि उन्द, कबि उब्ब, करक-करास-झिलसिणि
दवै काम नि करणी, फल-फरूट नि पचणा छन
खुरा-खाँसी दिन-रात, बळगम कतैऽ छड़ेन्दो नी
सैरि रात उठा-पोड़, आंखा निन्द जग्वळणा छन
डौंणा छन तंगत्याणा, उकाळ -उंदार हिटण मा
गैत जबाब देणी, हाथ -खुटा त जन गळणा छन
दिन-रात ख्यप-ख्यप,हर घड़ि रैन्द हणांट-कड़ांट
ध्वार-धर्म नि आन्दो क्वी, सब्बि दूर भजणा छन
सित्त-पित्त,सितगरमी,बरमंड चटाग मरणूं 'धरम'
जीरण ह्वेगे शरैल अब जाणा लछण लगणा छन
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चुराणी, रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ

Bhishma Kukreti

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आपकी स्यवा मा एक गज़ल़

B
y: शिवदयाल शैलज
 Garhwali Ghazals by Shiv Dayal Shailaj
-


सदनि घळतण्या खाणो हि नि खाणू भैजी !
चरचरू बरबरू बि कबि खाणू भैजी !!
रोज़ -रोज़ मिठ्ठै फरि हि जीभ नि गिजाणी !
दुन्यांम् कड़ु -कसिलु बि कबि पचाणू भैजी !!
जमनौं बटि जून तुमरि ग्वटीं अपड़ भितर !
चकोरूं सरेल बि कबि मनाणू भैजी !!
जूनी बान उतड़फाळ मन्नू समोदर !
जिकुड़िम इनु ज्वार बि कबि उठाणू भैजी !!
माया कु मुंडरु मां हि बरमंड नि पखड़णु !
मुलुकम क्रान्ति -गीत बि कबि गाणू भैजी !!
पुरणा बटमरा -घटमरा फूकि द्यो जो !
आड़-बुज्याड़ बि कबि पलचाणू भैजी !!
कुछ बिषिला डाळा फपलाणा समाज मां !
वूं तैं उकटाणु कुल्यड़ु बि कबि पळ्याणू भैजी !!
कबि त धरति सैणि ;लोग बराबर ह्वाला !
एकता कु कौथिग बि कबि उर्याणू भैजी !!

काॅपीराइट शिवदयाल शैलज


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केरि से ऐथर बढ़णूं किलै छै

(गढ़वाली कविता)

कवि-धर्मेंद्र नेगी
Inspiring Garhwali Poem
By Dharmendra Negi

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केरि से ऐथर बढ़णूं किलै छै
बढ़िगे त फिर डरणूं किलै छै
सुऽदि तु जैऽ कैऽ का दगड़ि
बिन बातै छेड़ि करणूं किलै छै
होन्द - खान्द देखी अपणौं तैं
छुचाकरा तू जलणूं किलै छै
चकड़ेत दुन्या तैं छन ठगौणा
तु अफुथैं अफी ठगणूं किलै छै
ठंडि रख तु ख्वपड़ि तैं अपणि
तवा सि तम्मऽ तचणूं किलै छै
खतेण देऽ येतैं रोकी नि रख
जिकुड़ी उमाळ थमणूं किलै छै
कैकि छ हिकमत जु त्वे हरैद्यो
अफु से अफी तु हरणूं किलै छै
पैलि त बचन देण नि छौ तिन
दे यालि त अब नटणूं किलै छै
हिकमत कैर तु डौर न 'धरम'
जिम्मेदार्यूं से भजणूं किलै छै
सर्वाधिकार सुरक्षित-:

धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी, रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ

 

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