Author Topic: उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!  (Read 295432 times)

Bhishma Kukreti

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क्य -क्य धाणि हर्चिगे

(गढ़वाली कविता)
कवि-धर्मेंद्र नेगी
 Garhwali Poem illustrating various Losses

By Dharmendra Negi


-
क्य बतौं मि अब कि क्य -क्य धाणि हर्चिगे
मुखड़्यूं कि हैंसि, आंख्यूं को पाणि हर्चिगे
दाना-दिवनौंकि खुचल्यूं बिटि बाळा लुछेनि
कथा-कथगुल्यूं को वो राजा व राणि हर्चिगे
गोर-भैंस्यूं का गुठ्यार रीता - सूना छन हुयां
डखुळि -पर्या -हड़प्या, घ्यू कि माणि हर्चिगे
खेति-पाती नौ पर द्वी सारि चरणा छन गोर
नाजै निरबिजि ह्वे,फल-फरूटै दाणि हर्चिगे
खरेगैनि थौळा-मेला अब कौथगेर नि रैगेनि
कौथग्यूं मा मिलणै व स्याणि - गाणि हर्चिगे
नाता-रिश्तोंकि अपण्यांस घूळिगे यु मोबैल
एक हैंका ध्वार - धरम आणि-जाणि हर्चिगे
चिन्ता - फिकरऽ मूड़ि दबीऽ मरिगे मनखि
निन्द -सुख -चैन हर्चे, सीणी -खाणि हर्चिगे
ये निरभै परदेसम हमारू क्य नि हर्चु 'धरम'
रीति-रिवाज हर्चीं,हमारि मिठि बाणि हर्चिगे
सर्वाधिकार सुरक्षित-:
धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी, रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ

Bhishma Kukreti

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खैरिकि उकाळ हिटदि -हिटदि कटि जान्द

(गढ़वाली कविता)
कवि-धर्मेंद्र नेगी



खैरिकि उकाळ हिटदि -हिटदि कटि जान्द
दुखैऽ कुयड़ि दिखदि - दिखदि छंटि जान्द
किताब जिन्दगी की पुरणि ह्वे जान्द जब
क्वी पन्ना तब पढ़दि - पढ़दि फटि जान्द
नाता - रिश्तों मा सौदाबाजि कख छै भलि
भरोसु हो जु त दिल को सौदा पटि जान्द
हर घड़ि बगत तैं दोष देणों भलु नि होन्दू
झणि कब कैको बगत घड़िम पलटि जान्द
सुख घड़ेकि बि रुकदु नी छ यख पौंणु सी
दुख कुबगत्या मैमान सि ऐकी डटि जान्द
भरोसु करण त कैफर कनुकै करण यख
काम निकलदैऽ य दुन्या त झट नटि जान्द
पढ़्यूं मनखि घुरच्यूळम बि अलग दिखेन्द
चार आखर त पिंजड़ौ तोता बि रटि जान्द
अति मिठा मा कीड़ा पड़ि जन्दन रै 'धरम'
अति घचपच न रिश्तोंऽ मिठास घटि जान्द
सर्वाधिकार सुरक्षित -:
धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी, रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ

Bhishma Kukreti

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बसंत

कुमाउनी / गढ़वाली कवि: रमेश हितैषी
Spring
A Kumaoni Poem on Spring

-
घाम ऐ ग्ये ह्युं गौली ग्ये,
डांडयौं मा हरयाळी छै ग्ये।
मयालू बसंत इ ग्ये,
मिथें त भंग भंगु लगि ग्ये।
ग्यों जौउ माँ गबार ऐ ग्ये,
होरि का होल्यार ऐ ग्ये।
देंण फूलि पिंगलु ह्वे ग्ये,
म्यारु प्राण रुखु रै ग्ये।
सर्वाधिकार@ Ramesh Hitaishi

Bhishma Kukreti

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बसंत

कुमाउनी / गढ़वाली कवि
रमेश हितैषी
       बसंत
Spring
A Kumaoni Poem on Spring

-

घाम ऐ ग्ये ह्युं गौळि   ग्ये,
       डांडयौं मा हर्याळि   छै ग्ये।
मयळू बसंत ऐ  ग्ये,
      मिथें त भंग भंगु लगि ग्ये। 
 
ग्यों जौउ माँ गबार ऐ ग्ये,
     होरि का होल्यार ऐ ग्ये।
देंण फूलि पिंगलु ह्वे ग्ये,
     म्यारु प्राण रुखु रै ग्ये। 
 
डाल्यों मा मौल्यार ऐ ग्ये,
     प्योलि  बुरांस फुलण लै  ग्ये। 
घुगुती आड़ि घोळ भोरणा,
      म्यारु त घोळ खालि रै ग्ये। 
 
देखा फुल सग्यान ऐ ग्ये,
       नौनु की ट्वाफरि बि सजि ग्ये। 
धरती की खुचिलि भोरे  ग्ये, 
       मेरी खुचिलि त खालि रै ग्ये। 
 

जौ पतों कु  रंग घोल्ये  ग्ये, 
     कैका गल्वड़ि गुळाळ चढ़ि ग्ये। 
सबि अपणा रंग मां रंग्या,
        म्यारु त गात रूखु रै  ग्ये।   
 
बनि बनी होरी गए ग्ये, 
       भिंडि  दिनों कि खुद मिटे ग्ये.   
सबका मुख मा हर्ष ही हर्ष, 
       म्यरा मुख मा दुःख ही रै ग्ये। 
 
ऋतू त आदि जांदि रै ग्ये,
       मनखी तू मतलबी ह्वै ग्ये। 
तेरि त मन कि पूरी ह्वै ग्ये,
       मेरि सदनि  जग्वाळ रै ग्ये। 
 
अब त  ऐ जा ब्याळ ह्वे  ग्ये,
       मेरि आख्यौं को नूर चलि ग्ये। 
त्यरा त  प्यारा त्यार पास, 
       मेरि त प्रीत झूटी ह्वै ग्ये।

और्यों को रैबार ऐ ग्ये,
       फागुणकु कल्यौ बि ऐ  ग्ये।
मेरि कैळ सुध बि निल्ये,
      मिथें त  निरमैती बनै  ग्ये।
सर्वाधिकारसुरक्षित

Bhishma Kukreti

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***********सरसी छंद***********
A Garhwali Poem in Sarsi Style
By Jaipal Singh Rawat

-
आदिम अपणै ही हतुलै ता,
करणा लग्यूं बिणाश।
परदूषण फैलाद्या इतगा,
मैलेग्या आगाश।।
बथौं विषैलू ह्वेग्याया अब,
फैलण बैठीं रोग।
भोग कर्मु का भुगणा छींना,
ये कल़्जुग मा लोग।।
जबर्यूं थै या धर्ती हैरी,
तबै तलक चा आस।
जंगल़ अगर नि बचये जाला,
कख बटि ल्हीणै सांस।।
Copyright Jaipal Singh Rawat

Bhishma Kukreti

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Viveka Nand Jakhmola: A Versatile Garhwali Literature Creative

Chronological History and Review of Modern Garhwali poetry series -301

Garhwali Poetry Historian: Bhishma Kukreti


Viveka Nand Jakhmola is a versatile Garhwali Literature Creative.  Viveka Nand Jakhmola created a couple of Garhwali fiction, a few Garhwali poems and lyrics. His lyrics are used in Morning Prayer in many primary schools of Garhwal.
 
     Viveka Nand was born in Gatkot, Malla Dhangu, Pauri Garhwal, and Uttarakhand in 1977. The name of his father was Mangat Ram Jakhmola and mother’s name was Prema  Devi Jakhmola.
Viveka Nand Jakhmola is postgraduate and a trained teacher.

  The subjects of Garhwali Poetries by Viveka Nand are varied but main subjects are  nature, philosophy, spirituality and social situation in rural Garhwal.
Viveka Nand amalgams religious rituals, religious images very well.
Mostly, Viveka Nand uses lyrical style for creating is poems but does not avoid other styles too .Poetry critic Dr. Manju Dhoundiyal states that Rhymed poetry is his speciality.
  Viveka Nand Jakhmola of Gatkot uses local proverbs and phrases for illustrating his views.
   Viveka Nand is effective in creating decided images by using perfect symbols or phrases.
Viveka Nand Jakhmola posted /published his poems in social media and got identity among Garhwali poets within short period.
   
Following poetry is one of best examples of Garhwali verses on spring. Viveka Nand Jakhmola uses nature and figurative ornamentation is the Spring poetry.
-
The spring (a Garhwali poem on Spring) .
 
- कवि - विवेका नंद जखमोला 'शैलेश'
स्वागत चा ऋतुराज तेरु-2,
आज ह्वै ग्याई आगाज तेरु-2।
मौ कि पंचमी मौल़्यार लैगे,
धरति मा देखा उलार छैगे। हुलपुली डाल़ि हैंसणी खितऽऽ,
प्रसन ह्वै गे सब्यूं कु चित्तऽऽ
नचण लैगे वन बाग सैरू।
आज ह्वै ग्याई आगाज तेरु।
स्वागत चा रितुराज तेरु,
आज ह्वै ग्याई आगाज तेरु।
ज्ञान कि देवि तेरु ध्यान जागी,
अज्ञान अंध्यारु सब्यूं कु भागी।
तेरु आशीष चयेंदा माता ऽऽ,
तेरी खुट्यूं मा नवोंदा माथाऽऽ।
चरणुं मा बैठ्यूं छौं माता तेरु,
मन मंदिर विराजऽ तेरु।
स्वागत चा ऋतुराज तेरु,
आज ह्वै ग्याई आगाज़ तेरु।
मौ कि पंचमी तु दैणि ह्वैई,
ज्ञान उज्यल़ु सब्यूं थैं देई।
जौ कि हैर्याल़ि तु सैई ह्वैई,
सुख समृद्धि जग मा लैई।
 मंगलाचार यू ही च  मेरू,
  सुख शांति रयां जगत सैरू।
   स्वागत चा ऋतुराज तेरु,
    आज ह्वै ग्याई आगाज़ तेरु।


ज्यूंदाल

  जौ, तिल, चौंल़ कट्ठा कैरि यलिं ब्ल , 
  द्यब्तौं का नौं का #ज्यूंदाल़# छन ये। 
  कैकि अलै बलै टल़ाणा का साधन अर, 
  कैकि ज्यू ज्यानि का जंजाल़ छन ये। 
  कुज्यणि कदगा निरीह मूक प्राणि, 
  समाला काल का गाल़ उंदैशैलेश । 
  तौंका प्राण ल्हीणा का खयाल छन ये। 
  अपड़ु सुख ढुंढणा छवां हम हैककि ज्यान मा, 
  दानवता का कना बदखयाल छन ये। 
  द्यौ द्यब्ता कबि नि ब्वादा कैकि ज्यान ल्हेकि तुस्योला हम, 
   हमरि स्वाद खोर गिच्चि का बबाल छन ये। 
  मन्दु छौं जबरि या रीत बण, तैबरि अन्न कु अकाल़ रै होलु, 
  प्ण अब त क्वी कमि न्ही अन्न पाणि कि, 
  त किलै निन बदलेणा खयाल छन ये। 
  अरे बल़ि देण तऽ अपड़ा कुटैबुं कि द्यावा धौं, 
  जौं का पैथर ह्वयां तुमारा गैरहाल छन ये। 
  मनखि छ्या मनख्यात मा राण सीखा, 
  मनख्यात थैं खूणा का जंजाल़ छन ये। 
  सद्बुद्धि सद्भावना का #ज्यूंदाल़ ध्वाल़ा अफ्फ उंदै, 
  मानवीयता फरै बि तऽ सवाल छन ये। 
  द्वी चार बि समझि जाला इशारु तेरु शैलैश 
  तेरा शब्दुं का समझि कमाल छन ये। 
  माफ कर्यां मे अल़्प अजाक थैं हे द्यौ द्यब्तौं, 
  तुमरि दया दृष्टि पाणा का वास्ता,म्यारा शब्दुं का ज्यूंदाल़ छन ये। 

Poetry critic Dr Manju Naithani Dhoundiyal states that Viveka Nand Jakhmola ha great potentiality for being versatile poet and he has inborn quality f using phrases as per his desire and requirement.
Copyright@ Bhishma Kukreti , 20120

Bhishma Kukreti

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बसन्त बौड़िकि ऐगे
-

वसंत आगमन की श्रृंगारिक  गढ़वाली कविता
कवि :  धर्मेंद्र नेगी
 
Arrival of Spring: A nature love Poem in Garhwali
By: Dharmendra Negi

-
रौंत्येळि डांडि - कांठ्यूं मा देखा, बाळू बसन्त बौड़िकि ऐगे
धरति तैं देखा हैरि घघरि मा, टुपक्यलि चदरि ओढ़िकि ऐगे
चखुला-पोथला रंगमत ह्वेकि,डाळ्यूं-डाळ्यूं मा गीत लगौणा
भौंण पुर्याणा कु वूंका दगड़म , रौऽलि - गदनी दौड़िकि ऐगे
बुग्याळौंम बिटि ह्यूं को डिसांण,जरा-जरा कैरि बिटळेण लैगे
हिंवाळ मखमली गदेली का ऐंच, कुयड़ै चदरि फोळिकि ऐगे
डाळि - बोट्यूं मा मौळ्यार ऐगे, कुटमणि फुटिनि फुलार ऐगे
फुलार्यूं की टोळ सौदा फूलोंन,ठ्वपरि-ड्वलणि भोरिकि ऐगे
भौंरा-प्वतळा मयादार ह्वेकी,फूलों का ऐथर-पैंथर छन रिंगणा
गुणमुण गुमणाट सूणी भौरों को,'धरम'बि लौंकी-धौंकिकि ऐगे

सर्वाधिकार सुरक्षित-@धर्मेन्द्र नेगी
चुराणी, रिखणीखाळ
पौड़ी गढ़वाळ , 2020

Bhishma Kukreti

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युवा गढ़वाली साहित्यकारों की कलम से

नौं -अपेक्षा राणा

पिताजी-विरेंद्र सिंह राणा
माँजी -रोशनी देवी
उमर-चोदह साल
कक्षा- आठ
स्कूल-राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पालाकुराली,
गौं- पालाकुराली,    जखोली रूद्रप्रयाग
लिखण की शुरुआत- आंठवी कक्षा बटि, 2019 बटि।
प्रेरणा - अपडि स्कूल मा स्थापित गढभाषा मोबाइल लाइब्रेरी बै गढवाली किताब पढ़ी तै, अर गढभाषा कार्यशाला मा प्रतिभाग करीतै।
प्रकाशित रचना- धाद, सोशल विकास समाचार पत्र, दगडि सोशल साइट  अर उत्तराखंड साहित्य मंच पर निरन्तर कविता प्रकाशित।
Garhwali pomes by teen ager Apeksha Rana from Jakholi, Rudraprayag
1-
  ----कबळाट---

ळोखुन बौंण फूकी
पुंगडि बणांई
अर तथ्या  खांणू  नि पाई
जथ्या हर्याळि निपटाई।
पर ये बौंणन
कति जीवूं तै
खांणू पुगाई।
हमुन बौंण
फूकी
अपड्वे भविष्य बिगाड़ी।
बणुमां आग लगैन,
जानवर छोडी जंगल,
मनख्यूं कि तरफ ऐन।
बौंण आग लगे
अब पछतांणा
बोला दूं
गौडी-भैस्यूं
क्या खिलांणा।
तुम बणांग बणों नी लगौंणा
आस औलाद फूकणां छिन
तुमतै त लाखडा, फल सब मिलि
पर अगने नी द्योखणा छिन।
लोखुन बौंण  बचाईं
अर
त्वेन आग लगाई
सचि बोल त्वेतै क्या
जरा भि दया नि आई?
सूखिग्ये पाणी -घास
मरिग्ये तेरी आस
धुंआ मा कबळाणा छिन
समाचारोंमा पछतांणा छिन।
--------अपेक्षा राणा-कक्षा 8
राउमावि पाला कुराली जखोली रूद्रप्रयाग
2-
----मतदान ----

मतदान मा आवा दूं
भविष्य अपडु बणा दूं
वोट द्यौण आवा दूं
मनपसंद सरकार बणां दूं।
दगडा दगडि आवा दूं
उंगुलि पर स्यै लगावा दूं
खाणौ खैक आवा दूं
वोट दीक जावा दूं।
आरू डाळी पर झूला दूं
वोट द्यौण ना भूला दूं,
जु  भी अठारह साला ह्वेगिन
वोट द्यौणा काबिल छिन
वोट हमुन तैई द्योण
जैंन सड़क सुरक्षा नियम ल्यौंण
गौं -गलियूं मा हल्ला मचौण
वोट सबुन जरूर द्यौण।
------ अपेक्षा  राणा पालाकुराली रूद्रप्रयाग


Bhishma Kukreti

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----'परधान'---
कवि :  अश्विनी गौड़
 Village Council Chief : A Garhwali poetry
By : Ashwini Gaur

-
परधान चै
भूतपूर्व हो,
चै नयु-नयु हो,
चै हमारा गौं कु
चै तुमारु गौं कु,
पर कुछ खास हो---
जु पांच साल
बाद भी
बिकास का नौं पर,
भला नंबरों न पास हो
-----@--अश्विनी गौड़----

Bhishma Kukreti

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स्वारा

Poet: सुनील भट्ट
Garhwali Poem by Sunil Bhatt on gifts to Kins


स्वारा का
काकी, ताई,
दीदी, भुली, बोड़ी
मौसी,फूफू अर ददी
जना भारी रिश्तौं
निभौणै खातिर बल
जरा हफलि मतबल
हल्कि सी साड़ी
मुल्यै जांदन
काज कारिजौं मा
/**सुनील भट्ट**
19/02/2020


 

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