Author Topic: उत्तराखंड पर कवितायें : POEMS ON UTTARAKHAND ~!!!  (Read 195387 times)

Bhishma Kukreti

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पाणी आँख्यूंक्”
गढवाली कविता – कमल जखमोला
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कंठ भरि आंद,आँख्यूं भरि अंदिन अँसधरि,
जिक्ड्यूं जम्यूं पीड़ा ह्यूं गsल़ी बण जंदिन....अँँसधरि।
रीती आंख्यूं मा रीता खीसों की तस्वीर ,
दुखी लाचारूंकि छन् अप्ड़ि जागीर.............अँँसधरि।
द्वी बोल प्रेम मा भाषा बण जंदिन,
लुकाई जै दुनिया से,समिण लै अंदिन............अँसधरि।
खुद्द मा कैकी ,खुदेई की खुद खुदै जंदिन ,
बिना रंग ही झणिं कतगा रंग दिंखे जंदिन.......अँसधरि।
हर बार दुख पीड़ा, लाचारी नि छन्,
कै देखि,कै मिलि,खुशी भारी भी छन्.............अँसधरि।
कैकु महेज पाणी,कैकी आंख्यूंsक पाणी,
द्वी लकीर गल़्ड़यूं,जिंदगी की पूरी कहाणी........अँसधरि।
.......कमल जखमोला

Bhishma Kukreti

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लौक डाउन  डाउन मा आजकल
महाभारत द्येखि तैं म्येरी एक कविता :-
🌷🌷खुसुर फुसुर 🌷 🌷

कविता –जगदम्बा चमोला
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अपणों पर विश्वास नि रै
अब अपुड़्वे खाणौ औणू च
पण्डौं मा धर्मराज जु छौ
सू अपणै भयों ठगौणू च
नारी नर रण चण्ड बण्यां छिन
खून को खप्पर च्वोणूं च
कैल ब्वेलि कि आज नि ह्वन्द
अब भी महाभारत ह्वोणू च
बाबू बण्यूं धृतराष्ट्र सु अपणां
नौनूं तैं पुळक्योणू च
गन्धारी दड़ि पुत्रमोह मा
अब भी दगुड़ु पुर्योणू च
आज भी शकुनी घर घर मा
खुद फांसै चाल बिछौणू च
राज को लोभी दुर्योधन यख
एम प्यो टिकट ख्वज्यौणूं च
अर्जुन आज अवार्ड बणीं स्वो
शील्ड कमीशन द्यौणू च
पार्क मा योग करी तैं भिमषण
अपणों प्यौट घटौणू च
नकुल ह्वयूं नाराज भैयों दड़ि
यख बैन तख सरकौणू च
सहदेवन त प्लौट ल्हीलि सु
तब बै घौर नि औंणू च
कृष्ण तैं अब क्वे मतलब नी
सु दार्वा ठ्यका चलौणू च
द्रोण रिटायर ह्वयू्ं च गौं मा
प्रधानौ रौंफ्यौंणू च
भीष्म जयूं च सड़क बणौणौ
दिनभर ध्याड़ि कमौणू च
कर्ण त घौर मूं ऐ तैं अपुड़ी
कोटै बोतळ प्यौणू च
तख्त बदलिगिन ताज बदलिगिन
पर अब भी मन भरम्यौणू च
कैल ब्वेलि कि आज नी ह्वे
अब भी महाभारत ह्वोणूं च
जै पर छौ विश्वास सिं अपणा
हक्वे काम बट्यौणा छिन
कलयुग का ये कुरुक्षेत्र मा
सबुतैं नाच नचौणा छिन
गंधारी की टक्क लगीं
दुर्योधन घर मा रोणूं च
बिधुर बण्यूं प्रधान पती
सू जगु जगु ठप्पा लगौणू च
भीष्म अजूं भी पड़्यूं च गौं मा
कृपाचार्य समझौणू च
जब कौरब पण्डौं द्यौस चल्यां
तू यखुली यख क्यां रौणू च
कुन्ती मन मायूस ह्वयीं
अब तैं दड़ि क्वे नी रौंणू च
विधवा पेंशन मा तैंक्वो अब
अंतिम समय कट्यौणू च
शास्त्र का सबंत पैल्ये नि छा सीं
अब भी क्वे नी रौंणू च
कैल ब्वेलि कि आज नि ह्वे
अब भी महाभारत ह्वोणू च
सुभद्रा का भक्ति भाव मा
ढोलक तबला धौर्यां छिन
सत्यवती का साथ मिली
घर गौं मा कीर्तन ह्वोणा छिन
पर बजर पड़ी यन आग लगी
हम भी तै गौं मा रौणा छिन
जख शल्य सिखंडी ब्लैकौ दारू
घरु घरु तक पौंछौणा छिन
पर चुप्प ह्वयां छिन ब्वना नी क्वे
ना क्वे कै समझौणू च
दारू पी शिशुपाल त अब भी
नट्टी सट्टी द्यौणू च
द्रोपदी फोन मा पोस्ट कनी
दुशासन लाइक द्यौणू च
भबरिक मैसेंजर मा जै तैं
जग जगू फोन घ्वच्यौणू च
भितरा भितरी सब संट बण्यां
अब सबकुछ डिजिटल ह्वोणू च
कैल ब्वेलि कि आज नि ह्वन्द
अब भी महाभारत ह्वोणू च
इन्द्रप्रस्थ मा अभीमन्यु अब
ब्यूह की कोचिंग ल्यौणूं च
द्रोपद देरादूण बस्यूं तख
प्लौट कमीशन द्यौणू च
अस्वथामा स्वस्थ नि रै
सू जगु जगु नब्ज दिखौणू च
धन्य च द्रोण जु पेन्शन मा तू
यतुनो खर्च पुगौणू च
स्वार्थ का सीधा सौदा मा यख
पात्र भी कुछ बदल्यौणू च
पर कैल ब्वेलि कि आज नि ह्वे
अब भी महाभारत ह्वोणूं च
सरकारा यन ब्यूह बण्यां यख
सबतैं चक्कर औंणू च
बेरोजगार्या चक्रब्यूह मा
हर अभिमन्यु पिस्यौणू च
यीं राजनीति की बलि बेदी मा
पिता पुत्र तैं ख्वोणूं च
आज त सूर्य को अस्त भी ह्वे पर
तब भी अर्जुन रोणूं च
यीं कुटिल चाल की राजनीति मा
क्वे ख्वोणू क्वे पौणू च
कैल ब्वेलि कि आज नि ह्वे
अब भी महाभारत ह्वौणू च
आज भी पेट मा संतति मारी
यख ल्वो गाड बगौणा छिन
आज भी बाबा लोगों का
बरदानी पुत्र जण्यौणा छिन
आज भी राज का खातिर यख कै
भीषण जाळ बुण्यौणा छिन
आज भी लक्षागृह जन यख कै
आहुति काण्ड सुण्यौणा छिन
आज भी भै छिन खून का प्यासा
आज भी मार कट्यौणा छिन
कैल ब्वेलि कि आज नि ह्वे
अब भी महाभारत ह्वोणा छिन
---Jagdamba chamola ----


Bhishma Kukreti

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करोना का बीर

गढवाली गजल – सुधीर  बर्त्वाल (प्रसिद्ध कहावत व पहेली संकलनकर्ता )
Garhwali Gajal dedicated to corona warriors those are far from their homes and kin 
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कुजाणि आज य आग यति भभराणी किलै च?
त्येरी जिकुड़ी म्येरी खुद मां रफड़ांणी किलै च?
भग्यानी भोळ फिर होलु उजाळु, हैंसलु बसंत
द्वी दिनों की खैरी सैजा, तू बबराणी किलै च ?
लगौला बैठीक तों खट्टी-मिठी छ्विंयों का खुम्ब
चमकलु डांडि्यों मां घाम,तू थथराणी किलै च?
घेंटला ठंगरा, द्योला माया कि लगुली तैं सारु
रौजली प्रीत कि काखड़ी,तू रंगताणी किलै च?
बासला पौंन-पंछी, होलि सनक्वाळि रतब्याणी
त्येरी रुगबुग्या आंखि,बोल बबलाणी किलै च?
बकळि माया कि दाळ,गौळली अब माठु-माठु
बगत अभी सजिलु नीं च,तू कबलाणी किलै च?
Copyright @सुधीर बर्त्वाल

Bhishma Kukreti

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रिवर्स पलायन
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लाॅक डौन सृजना ये क्रम मा "रिवर्स (व्युत्क्रम ) पलायन" पर आपा आसिरबाद से दुसरो गीत आपै सेवा मा सादर ।जन भि होलो 95 शेयर अर 3.6 K व्यूज दगड़ि पैलो गीत आपतैं ठिकि-ठिक लगि, आपन गीतौ मान बढ़ायि यु मेरो सौभाग्य च भौत-भौत धन्यवाद । जल्दि ही हळ्का- फुळ्का ये गीत तैं भि गाणौ प्रयास करलो------
गढवाली कविता - वरिष्ठ कवि ओम प्रकाश सेमवाल

'जमीन बटि उठीक शून्य से शुरु कैजा'-------
हाथ-खुट्यों चलै दे अळगस भगै दे
कूड़ि-पुंगड़ि उदास भ्येट्यौ यों बुथ्ये दे
पबित्र जल्म भूमी त्वे धध्यौणी च ऐजा
बसै दे नै दुनिया खुद लगीं च ऐजा
पबित्र मातृ भूमी त्वे धध्यौणी च ऐजा--------
ब्वे-बाबौ बुढ़ापो बिपदों मा कटणू
एक ब्यळी को खाणौ द्वी-तीन ब्यळी पुगणू
बंधै जा तौं तैं आस पुंगड़्यों पछण्न ऐजा
कठिण छैंच लाटा यों फेर से लै लहै जा--------
निराश छिन जु भैर तौं बेरोजगारों बुलै दे
छैंच सबुमा हिकमत त साग-भुज्जी उगै दे
पकड़ा फौड़ु सबळी रौलि-बौल्यूं तैं बट्ये जा
बग्वान-बाग सग्वड़्यों बणों मा हर्याळि ल्हे जा-------
कर भल्यार ढब्वटा तलौ खाळ भरि दे
माछा पाळ घोड़ा बखरा गौड़ि- भैंसि गाजि बाँधि दे
कर त्यार रोजगार पाड़ों कि सेवा कै जा
जमीन बटि उठीक शून्य से शुरू कै जा--------
'पलायन रिवर्सा' सुपिन्या साकार कै दे
मवार छबड़ि फाँट म्यळाग -अग्याळ दे
छोटा-छोटा उद्योग अपणौ घराट चळ्दा करि जा
अग्वनि खेत्रपाळ बीर सूत्रधार बणि जा--------
@सर्वाधिकार सुरक्षित

Bhishma Kukreti

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घार
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गढवाली कविता : राधे बहुखंडी
A Garhwali poetry by Radhe bahukhandi
-

घार  हमरू बड़ू छा,
सब्यूँ खुंणि खड़ू छा।
एक बिस्सि मनखि पट्ट,
एकि धै मा दगडि झट्ट।
दाजी खुंणि चिलम पाणिं,
मिलदा च्युडा तिमला दांणिं।
दद्दि पिछने लुकदा छाया,
घुंडा ऊंका दुखदा छाया।
ब्वाडा जी की भारी डैर,
ब्वाडा भितर नौंना भैर।
बोडी नौंणिं गडदि छे,
छांछ सबथे बंटदि छे।
पितजी ल्यांदा चिमनी बाति,
लैट जांदी रोज राति।
मां बणांदि छंछ्या रोज,
भदलचट्टा भुल्ली कि मौज।
काका ब्वादा पढै कारा,
रीता भांडा बिद्या भ्वारा।
हमरि खास दगड्या काकी,
जन्न आरा लींणां ढाकी।
दीदी ल्यांदी तौला पींडू
घास काटी दथडी ख्वींडु।
द्वि जोडी बल्द छाया,
काका जोंथे ख्वल्द छाया।
कालि रंगा गौडी छै
कांसि थकुलि डौंरि छै।
क्वलण पिछने मैलु डालि,
लुक-लुकि दींदा छा गालि।
चौका तीर पिंगला फूल,
पांणि चरणां त्वडदा कूल।
अब ह्वेगे #घार छ्वट्टु,
प्राण किले ह्वाई खट्टु।
दोष बुने कैम नीं,
बात कना टैम नीं।
आज ह्वेगिं रुप्या-कार,
जबरि छुट्टु ह्वालु #घार।।
©®
🔏राधे बहुखण्डी
पौडी गढ़वाल/ हरिद्वार
३०/०४/२०२०


Bhishma Kukreti

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                      " लोग "

(वरिष्ठ गढवाली कवि संदीप रावत की असलियत , दिखाती व्यंग्य करती  मनोवैज्ञानिक गढवाली, गजल  कविता , गढवाली लोक गीत )
               
झूटी- सच्ची बुज्याड़ि जिकुड़ी धरदन लोग
मुखड़ी देखी सामणि  टुकड़ी डलदन लोग ।

हुणत्यळि डाळी का मौळंदा पात देखीक
झट्ट जलड़ौंम छांछ  संग्ती डलदन लोग ।

दूधौ-दूध ,  पाण्यो- पाणि द्यिख्येंद  सब्यूं
पिछनै बाघ सामणि बिराळि बणदन लोग ।

सब्बि जगौं क्वी बण्यां रौंदन भौत पर्वाण
हैंका  तैंकम  झट्ट पक्वड़ी तलदन लोग ।

जणदा नी बल मंत्र द्येखा बिच्छी को
सर्प द्वलणी हत्थ  फिर्बी कुचदन लोग।

मिल्द जब हे स्याळ ददा वळो पट्टा "संदीप "
अफ्वी औतारी अफ्वी पुजारी बणदन लोग।
               © संदीप रावत ,न्यू डांग ,श्रीनगर गढ़वाल

Garhwal se असलियत , दिखाती व्यंग्य करती  मनोवैज्ञानिक  गढवाली लोक गीत, गजल ; श्रीनगर से असलियत , दिखाती व्यंग्य करती  मनोवैज्ञानिक  गढवाली गजल , लोक गीत; पोखड़ा से असलियत , दिखाती व्यंग्य करती  मनोवैज्ञानिक  गढवाली गजल, लोक गीत

Bhishma Kukreti

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लड़ै कठिण च

गढवाली कविता – बीना बेंजवाल

लड़ै कठिण लड़णू मनखि
बलि वैश्विकतै चढ़णू मनखि
अपणि सक्याऽ धीरज का बल
दिन कोरोना गणणू मनखि
खांसि-छींक छै छ्वीं साधारण
कसूर ह्वेगि करोना कारण
देखी अपणौ तैं ही आज
जाणीऽ अजाण बणणू मनखि
लड़ै कठिण.........
गिच्चा मास्क जब हवा साफ
घड़ि-घड़ि धोण पड़णा हात
फिर अपणि मा कै अपणै
गति-मुक्ति कन्नौ डरणू मनखि
लड़ै कठिण...........
कबि भूकु तीसु रै तैं
कबि रेलै पटर्यूं स्ये तैं
कबि सड़क्यूं चलि मीलों पैदल
सांस आखिरि गणणू मनखि
लड़ै कठिण..........
समझद छौ तनीऽ समाज
कोरोना योद्धा बण्यां सी आज
सोच पुराणी करी सैनीटाइज
विचार नया गढ़णू मनखि
लड़ै कठिण.....
दुन्यै छोड़ी भागमभाग
स्वार्थ लालचौ करी त्याग
बैठी अपणा दगड़ा यूं दिनों
अफु तैं अफ्वी पढ़णू मनखि
लड़ै कठिण.......
अद्येखा बैरी देखी तागत
दुगणा कन्नू अपणि हिकमत
ल्यौणौ मनख्याता आली सुबेर
खाड अंध्याराऽ खणणू मनखि
लड़ै कठिण.....
ताळाबंदी देस दुन्या जब
आॅनलाइन काम-धाम सब
नया हिसाब से अपडेट
बाटा नया बढ़णू मनखि
लड़ कठिन.......
दिखेणू दूरै बिटि हिमाल
छाळा ह्वे बगणा गंगाळ
धर्ति का सब्रो देखी फल
तसबीर भोळै गढ़णू मनखि।
लड़ै कठिण.....

सर्वाधिकार – बीना बेंजवाल

Bhishma Kukreti

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बीर भड़ो देस : उत्तराखंड

गढवाली कविता : उपासना सेमवाल पुरोहित
-
शत्रु सैना मा त्राही मचोन्दा ,
हर योद्धा हनुमन्त च यख..
वीर भड़ों से भर्यूं हिमालय ,
हर सैनिक जसवन्त च यख ।।
आर्यव्रत की सीमा पर ..
याद रौखी तू नजर गढ़े ना
यौ ड्येली-ड्येऴी मा भीम छन
एक कदम भी अग्वड़ी बढे़ ना।
नल नीलों से देश भर्यूं च ,
राम सेतु तैयार ह्वयां छन ..
तुमरा चर्यूं तितर्याल नी छां,
दृड़ अंगद आधार जन्यां छन।।
भारत मां का पुत्र भरत छन ,
शेरों का हम वरदहस्त छन ..
देश का खातिर मर मिटि जान्दा ,
सीमा पर हमरा वीर भगत छन।।
दलपीसु करी जब चीन वलों,
एक अकेलु सिंह छयो..
सन बासठ कु महाराणा छो ,
रणबांकरु जसवन्त सिंह छयो ।।
सतयुग द्वापर त्रेता से ही ,
युद्ध कला मा ज्येष्ट छां हम ..
धीर बीर गंभीर सेना च,
शस्त्र विद्या मा श्रेष्ठ छां हम ।।
सर्वाधिकार @ उपासना पर्वत प्रिया
गढवाली बीर रस लोक गीत , कविता , उत्साह बढ़ाती गढवाली लोक गीत , देश प्रेम का गढवाली लोक गीत, रुद्रप्रयाग से सैनिक  ताकत  पर गढवाली लोक गीत 

Bhishma Kukreti

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गढवाली भाषा में  श्री i सत्य नारायण ब्रत कथा

भगवान सत्य नारायण जी की प्रेरणा से मिथैं भगवान सत्य देव की कथा कु पद्यानुवाद कनौ अंतनिर्हित आदेश ह्वै। अर वांकि हि परीणति च आपक समणिश्री हरि कथा कु यु टुट्यां फुट्यां शबदुं मा प्रस्तुत पद्यात्मक कथा समोदर।
रचना  --- Vivekanand Jakhmola 

व्यास जी ब्वना छना-

एक दौं नैमिषारण्य मा, बैठ्यां छ्या शौनकादी ऋषी।
पुछणन श्री सूत जी से, भलि सि क्वी तप व्रत विधी।
सूत जी ब्वलदिन त सूणा, तुम सबी विद्वत गुणी।
यनि कुछ पूछणा छा हरि से, एक दौं नारद मुनी।
भ्वगणा छन नर लोक मा दुःख,
सूणा हे लक्ष्मी पती।
भलु सी क्वी तप व्रत बथावा, पै सक्यां जु सि सदगती।
शंख, चक्र, गदा पद्म धारी बैठ्यां छन श्री विष्णु जी।
सत्य रुपि नारैण मेरा, प्रभु हरी श्री विष्णु जी।
सूणि नारदजी की या सदिच्छा,
प्रसन्न ह्वैनी हरी।
सत्य नारायण कु व्रत बताई, नरुं खुणि कृपा करी।
स्वर्ग अर मृत्यु लोक मा दुर्लभ यू व्रत मेरू।
मनवांछित फल देंदु वैथैं,मनचितऽ धरि जू करू।
रोग, शोक अर दुःख विनाशक, व्रत यू नारद मुने।
जन कल्याण का बान्यूं पूछी, तबि मिलऽ तुम से बुनै।
धन-दौलत, औलाद देंदू, घर मा सुख समृद्धि करू।
श्रद्धा भक्ति से मनखि जू भी, सत्य देव कु व्रत धरू।
दिन भर हरि भजन कारु, शाम दौं पूजन करौ।
बंधु बांधवुं दगड़ि बैठि, पंड जि से हरि कथा करौ।
क्याल़ा फोल़ि, ग्यूं आटौ चूरण, दगड़ि मा गुड़ घ्यू धरी।
सवाया परसाद बांटू, हरि जि थैं अर्पण करी।
ग्यूं कु आटौ यदि न हो तो, चौंल़ु कू आटौ भलू।
मन से जू भी करिल्या अर्पण, तै सई व्रत तप फलू।
भोजन परसाद पैकी, फिर से हरि कीर्तन करू।
नाम जप कलजुग मा फलदू,मन से जू भी व्रत करू।
पैलु पारायण हरी कू, सूणि ल्या नारद मुनी।
जगत कू कल्याण हो, व्रत फलदायी हो सब खुणी।
तऽ बोला सत्य देव भगवान की ईईई जयऽऽ। 🙏 🙏
अथ् दुसरु अध्याय
सूत जी ब्वलदिन -
करि कै कैन व्रत यु उत्तम, सूणा अब तुम हे महामुन्यूं।
फल क्या मिलि वूं थैं ये व्रत कू,
सूणा तुम जनु मी ब्वनू।
विप्र एक गरीब छौ, सतानंदऽ नाम को।
बसदु छौ काशीपुरी मा, भूखु छौ हरि नाम को।
श्री हरी छन भक्त वत्सल, पूछि तौंन विप्र से।
किलै भटगदौ पंड जि इथगा ऽ, ब्वाला मेमा निश्चिंत ह्वै।
ब्रह्म मूर्तिल हाथ जोड़ी, विनति कै बुढ्या पंड जि से।
छौं मि ब्राह्मण कर्म से प्रभु, प्वटगि पल़्दू भिक्षा पै।
कैरि सकदौ तुम उयार, मेरि गरीबि मिटाणा को।
कष्ट कारा बुढ्या पंडा जी, यनु उयार बथाणा को।
सूणि सतानंदऽ कि विनती, श्री हरी ब्वलदिन तबऽ।
सूणा हे द्विज श्रेष्ठ मेरी बात टक लगै अबऽ।
श्री हरी सत्य देव जी कू ये उत्तम तुम व्रत कर्यां।
मनवांछित फल देलु तुम थैं, ध्यान से तुम व्रत धर्यां।
विधि विधान तब बथैकी, अलोप ह्वै गिन हरी।
व्रत कू संकल्प लेकी, पंड जि गैं भिक्षाटन फरी।
आज श्री हरि की कृपा से, पंड जि थैं अन धन मिली।
ऐकि घौऽर कुटमदरि संग, सत्यदेव कु व्रत करी।
व्रत का शुभ फल से, तौंकू अन धनाऽकू घड़ु भ्वरी।
व्रत करि सदानि हरि कू, अंत हरि चरणूं वरी।
प्रभु नारैणऽन याहि कथा, नारदऽ ऋषि थैं सुणै।
वूंकि कृपा प्राप्त करणू, सहज च मनख्यूं खुणै।
ऋषिगण फिर पुछण छन, महामुनी श्री सूत जि थैं ।
हौरि कैन कैरि व्रत यो, तुम सुणावा कृपा कै।
तब ब्वना छन सूत जी, ल्या सुणा अगने कथा।
सतानंदऽ कू नियम छौ हर मैना कन श्री हरि कथा।
एक दिन तै शुभ समै पर, पौंछि तख लखड़्वल़ु एकऽ जी।
पुछदु लखड़ूं धैरि भूयं मा, काम क्या यो नेक जी।
बथै पंडा जिन पूण्य फलदायी कथा।
श्रद्धानत ह्वै लखड़्वल़ु, भूलि गे अपड़ी व्यथा।
लेकि श्री हरि कू परसाऽदऽ, मन मा यू संकल्प ले।
धन जु मिललू लखड़ूं बेची, कथा करण मिल व्रत ले।।
आज ह्वै गे बड़ु अचंभा, लखड़्वल़ु प्रसन्न ह्वै ।
दुगणु दाम मिलि गे तैथैं, श्री हरी के कृपा से।
गै बजार आटु,गुड़,घी, क्याल़ा आदी ल्हैकि ऐ।
बंधु बांधवुं दगड़ि मिलि की सत्यनरैणऽकु व्रत कै।
व्रत का प्रभाव से पुत्र पै धनवान ह्वै।
श्री हरी की कृपा से अंत मा गोलक गे।
दुसरु पारायण कथा कू, सूणा तुम मनचित धरी।
मनोवांछित फल मिलू, कामना मन ज्वा धरीं।
🙏 तऽ बोला श्री सत्यनारायण भगवान की ईईई जयऽऽ। 🙏
अथ् तिसरु अध्याय -
सूत जी ब्वलदिन त सूणा ऋष्यूं अगने की कथा।
उल्कामुख नामऽकु छौ राजा,राणि तैकी पतिव्रता।
भद्रशीला नदि किनर सी करणा छ्या श्री हरि कथा।
नदीतट पर पौंछि तब ही , साधू नामौ इक वणिक।
हाथ जोड़ि खड़ु ह्वै सन्मुख, पूजा हरि की देखि कऽ।
पूछि राजा से हाथ जोड़ी, क्या कना छन मन लगै?
फल क्या मिलदू मे बथाणा, कृपा कारा हथ जुड़ै।
राजा राणी द्वी ब्वदिन, हमरि क्वी संतानऽ न्ही ।
सत्य देव कु व्रत छौं करणा, ल्हे कामना संतानऽ की।
कामना पूरक च व्रत यू, श्री हरी नारैण कू।
यु ही च मन मा यांकै बान्यूं,व्रत च यू नारैण कू।
सूणि मन मा करि विचार ऽ, साधु वणियांऽनऽ तभी।
होलि जू संतान मेरि बि, करलु ये व्रत मी तभी।
वणिक काऽ संकल्प से, ह्वैन दैणा श्री हरी।
लीलावती की भ्वरे कुछली, कन्या जलमीईई सुंदरी।
दिलै यादऽ तब पती थै, कारा श्री हरि की कथा।
ब्यौ का बगत करौलु प्यारी इंका, मी प्रभु की कथा।
चंद्र की सोलह कलाओं जणि बढी कलाऽवती।
ब्यौ की चिंता ह्वै वणिक थैं, करण लैगे सटपटी।
दूत भ्यजिनि चौदिशौं मा, योग्य घर-वर ढुंढणा कूऊऊ।
लेकि ऐ गिन दूत, वणि सुत योग्य कांचन नगर कूऊऊ।
धूमधाम से कैरि दे ब्यौ, वणियांऽनऽ वूं दूयुं कूऊऊ ।
भूलि गे हरि ध्यान फिर भी, रुष्ट ह्वै गे श्री प्रभूऊऊ।
कुछ समै का बाद बणिया, नाव 🚣 ले व्यापारौ गे।
जमाता अर कारि बारीई दूतुं दगड़म ल्हेकि गे।
सागर सीना चिरोड़ी, रत्नसारपुर मा ऐ।
पौंछि की तख बणिया अपड़ू व्यापार करण लगे।
संकल्पभ्रष्टऽ बणिक फरै श्री हरी थैं क्रोध ऐ।
दंड दीणौ बान्यूं हरि न अपड़ि यनि माया बणै।
चंद्र केतु का कोश की तै दिन मा चोरि ह्वै,
ऐकि चोर मालमत्ता बणिक समणी धोल़ि गे।
ऐकि देखी सैनिंकु थैं बणिक पर बड़ु क्रोध ऐ।
लेकि गैनी राजा समणी जवैं सहितऽ बणिक थैं ।
क्रोध मा ऐ चंद्रकेतू राजाऽन आदेश दे।
कारागारऽम ध्वाल़ा दुयुं थैं, मालमत्ता जब्त कै।
दर दर भटगदि मां बेटि भी, श्री हरी का कोप से।
दुखित ह्वै गेनि वू सबी नारैणऽ प्रकोप से।
भुखमरी से भटगदन द्वी मां बेटी घर-घर जई।
भूख प्यास मिटौंदि अपड़ी, नाना विध भटगण कई।
घुमदा घुमदी कलावती जब पौंछि इक दिन नगर में ।
देखि हरि की कथा रुकि गे, देर से वा घौऽर ऐ।
लाड कैरी लीलावति , कन्या थैं अपरी पूछऽदी।
इथगा रात ह्वै ग्या कखन ऐ, त्वै घौऽर कि नीई सूझऽदी।
कलावती तब ब्वलदि मांजी, नगर मा रुकि गौं जरा।
हूणु छौ सत्यदेव पूजन, और श्री हरि की कथा।
कथा कि सूणि बात मां थैं, श्री हरी की याद ऐ।
राजि खुशी लवा पति जमाता थैं, द्यौंलु तुम्हारी कथा मिसै।
करूणावरुणालय हरी संकल्प से प्रसन्न ह्वै।
राति राजाऽक स्वीणा जै, बणियों थैं छुडणौ आदेश दे।
चंद्रकेतु सबेर होंदी, दरबार्युंकि कछड़ी लगै।
बंदि बणिया थैं जमाता दगड़ि छुडणौ आदेश ह्वै ।
बंदि बणियों थैं सिपै, तब राजा जी का समणी लै।
दाढिकाटि संवारि केश, धन दौलत दे ह्वै विदै।
तीसरु पारायण अर्पित च, श्री हरि प्रभु थैं।
मनवांछित फल प्राप्त हो हे प्रभो यजमान थैं।
त जरा जोर से ब्वाला श्री सत्यनारायण भगवान की ईईई जयऽऽ।
अथ् चौथु अध्याय:-
मति हरण जब होंदु मनखी, भूलि जांदू हरि जि थैं ।
बणिक का दगड़म बि आज कुछ यनी हि बात ह्वै।
घौऽर जांदा बणिक की, श्री हरिन फिर परीक्षा ले।
क्या भ्वर्यूं तेरि नाव मा, हे बणिक इथगा बथै।
दंडि स्वामी देखि बणिया, झणि क्या स्वचण बैठि ग्या।
मांगु ना कुछ दंडि स्वामी, लता पत्तर बोलि ग्या।
श्री हरी थैं बात सूणी, एक दौं फिर क्रोध ऐ।
जनु ब्वनू छै ल्वाल़ा बणिया, जा त्वै खुणि तनु ह्वै हि जै।
न्है धुयेकि बणिया जब अपड़ी नौका का समंणि ऐ।
लता पत्रादिक थैं देखी, लमडि गे भुंया होश ख्वै।
नाव की दुर्दशा देखी, जामातऽल, बणियम बथै।
दंडि कू च श्राप सूणा, वांका कारण यनु यु ह्वै।
शरण जावा दंडि की, क्षमा मांगी आवा धौं।
दंडि की तुम कृपा पैकि, जनु छयो तनि पावा जी।
गैनि तब दुया हाथ जोड़ी, दंडि स्वामि कि शरण मा।
दंडवत ह्वै पड़ि गेन द्विया तब, दंडि जी का चरण मा।
करि बणिऽनऽ संकल्प तब, हरि जी कि पूजा करणऽकू।
धूल़ माथा लगै दुयों नऽ, दंडि स्वामि का चरऽण कू।
दया का सागर हरी तब फिर से तुष्टऽ ह्वै गेनी।
नाव माकू सब्बि धाणी, फिर जनऽकु तनि ह्वै गेनी ।
पौंछि नगर का समणि बणियऽन,
दूतुं थैं घौऽर ऽ लखै।
ऐ गैनी दामाद दगड़ी बणिक, सब सुख शांति से।
दूतुं का सूणि शुभ वचऽन, लीलावती प्रसन्न ह्वै।
कलावति कन्या भि पति की खबर पैकी खुश ह्वै गे।
मां ब्वदी सुण बेटि आंदू मि, तेरा पिता कु दरश पै।
ऐ जै तू भी दरश करणू, पूजन थैं पूरु कै।
बेटि भी पति दरश खातिर मां का पिछनै दौड़ि गे।
सत्यदेव भगवान की, पूजा अधुरी छोड़ि के।
बिन प्रसाद खयां ऐ गिनि, जब द्विया मां अर बेटीईई।
रुष्ट ह्वैनि नारैण फिर से, जमाता हरऽण करीईई।
नाव दगड़ि अलोप ह्वै गे, जमाता कलावतिनऽ सूणीईई।
सती होणो प्रण लेकी, ढड्डी देदे की रुणीईई।
बेटि की देखी दशा, स्वचण लैगे बणिक भी।
सत्य देवकु ध्यान करदू, देर नी करि क्षणिक भी।
करुणानिधि फिर द्रवित ह्वै गेनी सूणि की।
ब्वन बैठिन तू देख साधू, बात जरा या गूणि की।
बेटि तेरी दौड़ि गे यख, मेरि पूजा छोड़ि की।
पति जु चांदी राजि खुशि औ ले प्रसाद तु दौड़ि की।
श्री हरी का वचन सूणीईई, बेटि दौड़ी घौऽर गे।
हरि कु पै परसाद तैंन, फिर पती कू दरश पै।
हंसि खुशी बणिया कुटमदरि का समेतऽ घौऽर ऐ।
मन चित से ऐकि घौऽर श्री हरी पूजन उरे।
बंधु बांधवुं दगड़ि मिलि की, नारैण कू व्रत धरे,
संध्या बेल़ा कथा उरे की, विष्णु जी कु आशीष पै।
संगरंदि अर पूर्णिमा सब पर हरी सुमिरण करी।
अंत मा साधू बण्या भी, हरि का चरणुं मा तरी।
चौथु पारायण अर्पित चऽ, हे हरी तेरा चरण मा ।
देर करि ना हे प्रभु, दुख दूर हमारा करण मा।
🙏 त जरा जोर से बोला कि श्री सत्य नारायण भगवान की ईईई। 🙏 जय ऽऽ।
[26/06 1:42 pm] Vivekanand Jakhmola: अथ् पंचौं अध्याय -
सूत जी ब्वलदिन त सूणा ऋष्यूं अगने की कथा ।
तुंगध्वज नाम कू ह्वै छौ ब्ल तब इक बड़ु रजा।
मृगया खेलणौ वु इक दिन बोण मा भटगुणु छयो।
प्यास से आकुल वु एकऽ, बौऽड़ाका छैलम गयो।
तै डाल़ा का छैल बैठ्यां ग्वाल बाल ख्यल्णा छ्या।
खेल ही खेलम हरी विष्णू कि पूजा करणा छ्या।
बौड़ऽका फलुं कू परसाद, दे तौंन जब राजा थैं।
सोचि जंगल़ि फल नि खांदु,बड़ नगर कू राजा मैं।
परसाद त्यागी हरी कू राजाऽन यू दंड पै।
सत्यदेव का क्रोध से, धन पुत्र राज विनष्ट ह्वै।
देखि दुर्दशा अपड़ि यनि, राजा थैं सोची होश ऐ।
श्री हरी कूऊऊ दंड चऽ यो, मिल परसाद जु फुंड चुटै।
दौड़ि की गे राजा फिर से ग्वाल बालुं कि शरण मा।
खै परसाद बड़ फलूं कू, पोड़ि प्रभु का चरणुं मा।
श्री हरी की कृपा से सब कुछ जना कु तनि ह्वै गे।
राजा तुंगध्वज तब बटै कमलानन कू भगत ह्वै।
भक्ति कैरी श्री हरी की अंत मा बैकुंठ गे।
मेरा नारैण कि कृपा से चरणूं मा तौंकी शरण पै।
पूण्य प्रद यीं व्रत कथा थैं, जू बि सुणदूऊऊ गूणऽदूऊऊ।
श्री हरि की कृपा से हर काम वैकू पूरऽदूऊऊ।
दरिद्र थैं धन मान मिलदू, बंदि बंधन मुक्त हो।
निपूतौं संतान मिलदीईई, सब गुणों से युक्त हो।
अंत मा श्री हरि चरण कु वास वै थैं मीलऽदू।
जू प्रभू श्री विष्णु कू, नाम संकीर्तन कदू।।
सत्य देव, सत्य नारायण, नाम छिन प्रभु का कई।
मनवांछित फल पांदु वू जू ध्यांदु वूं थैं मन सई।
सूत जी ब्वलदिन कि सूणा हूंदु क्या ए कैरि की।
हरि कृपा से नजर नी प्वड़ण्या कभी भी बैरि की।
पैलि जौंन करि कथा या , तौंकि बात सुणांदु मी।
फल क्या पै कख गेनि सी, तौंकि बात बथांदु मी।
बुद्धिमान सतानंद जी, सुदामा भगत ह्वै।
कृष्ण चरणाम्बुज अमृत पै, श्री हरी कू लोक पै।
लकड़हारा भील फिर गुहराज बणि निषाद ऐ।
जगका तारणहार ऽकि सेवा मा,
जीवन अर्पण करे।
उल्कामुख राजा जु छौ स्यो फिर से दशरथजी बणिन।
राम - राम रटदा-रटदा, विष्णु का चरणुंम प्वड़िन।
साधु वैश्य नै जनम मा, राजा मोरध्वज बणी।
आरा से शरीर चीरी, महादानी कू पद वरी।
राजा तुंगध्वज स्वयंभू मनु ह्वै ऐनि फिर ये जगत मा।
वैष्णव पथ पर लगै सब्यूं, गैनि हरी की शरण मा।
हरि चरण की रज लगावा ऐकि अपड़ा मुंड फरै।
बोला श्री हरि, जय रमापति जयति जय जगदीश जै--2।
रेवाखंड स्कंदपुराण कु यू पंचौं पारैण चा।
हम सत्य देव का भक्त छौं , हम भक्त छौं नारैण का।
त फिर जोर से बोला -
श्री सत्य नारायण भगवान की ईईई। जय
-
विवेकानन्द जखमोला , गटकोट , द्वारीखाल
-
 गटकोट में रचित गढवाली भाषा में  श्री i सत्य नारायण ब्रत कथा; ढांगू में रचित गढवाली भाषा में  श्री i सत्य नारायण ब्रत कथा; सिलोगी  में रचित गढवाली भाषा में  श्री i सत्य नारायण ब्रत कथा;  द्वारीखाल  ब्लौक में गढवाली भाषा में  श्री i सत्य नारायण ब्रत कथा; लैंसडाउन तहसील में रचित गढवाली भाषा में  श्री i सत्य नारायण ब्रत कथा; पौड़ी गढवाल में रचित गढवाली भाषा में  श्री i सत्य नारायण ब्रत कथा; उत्तराखंड में रचित गढवाली भाषा में  श्री i सत्य नारायण ब्रत कथा



Bhishma Kukreti

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सूंण मेरी सरम्याळी मायादार

सूण मेरी सरम्याळी मायादार
त्वै देखिक मेरी जिकुड़ीम
फुटदिन कतगा ही छ्वोय्या
पराण फूलदेई मनौण्या ह्वै जांदु लठ्याळी
पट्ट ब्वोटिक तेरी खुद की अंग्वाळ
मैं पौंछि जांदु अपणा पाड़्युंम .....
पईंया की झक्क झुकीं डाळ्युं फर
खिल्यां फुलुन लगाई छुंई मैंमा
तेरा औंण से हैंसणु छ पईंया
ह्यूंवळी कांठ्युं कु रंग जनु तेरु गात लठ्याळी
अर तेरी गल्वड़्युंम खिल्युं हो जनु बुरांस
तेरु हिटणु यनु छ जनु कि
छळछळांदु गंगाजी कु पाणी
तेरी हंसी सूंणीक ही त खिलदी फ्योंली...,
बौड़दु चैत, फुटदन कुटमुणा डाळ्युं फर.....
तेरी युं सुरम्याळी आँख्युं की सौं छन
बुरु न मानी
सुआपंखी स्वीणुंम अळझ्युं मेरु हिया
युं आँख्युं की मायादार छुंयुंम बिसरीगी सुध अपणी!
  रुचि बहुगुणा उनियाल
नरेंद्र नगर
दिनांक _२९_११_२०२०


 

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