Author Topic: Poems written by Bhagwan Singh Jayara-भगवान सिंह जयड़ा द्वारा रचित गढ़वाली कविता  (Read 5337 times)

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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भगवान सिंह जयाड़ा November 8पहाड़ की नारी की दिनचर्या पर मेरा अनुभव ,शंघर्ष पूर्ण जीवन यापन के इस जजब्बे को मेरा नमन ,,,,       
 ----------------------------       
         पहाड़ की नारी
 ------------------------------
 धन धन हे पहाड़ की नारी |
 दुःख तकलीफ उठौदेंन भारी ||
       
       शुबेर बीटी श्याम व्हेई जांदी |
       सदानी काम की मारा मारी ||
 
 चौका चुल्लू ,शुबेर उठीक |
 गौरू भैंसों की देख भाल ||
       
       बच्चों सन स्कूल भेजिक |
       तब होंदी घास की तैयारी ||
 
 धन धन हे पहाड़ की नारी |
 दुःख तकलीफ उठौंदेंन भारी ||
       
        घास लाखडू सी निपटीक |
        फिर ओन्दी पुन्गडो की बारी ||
 
 खेत खलियाण सब देखण |
 दाना संयाणों कु ख्याल राखण ||
       
        मर्द त प्रदेश छन जिंदगी सारी |
        धन धन हे पहाड़ की नारी ||
 
 रौऊ रिस्तादारी भी देखण पड़दी |
 या जिम्मेदारी भी निभौंण पड़दी ||
       
        घौर बौंण कू सब चरखा चलौंदी |
        जिम्मेबारी अपरि सारी निभौंदी ||
 
 दुःख तकलीफ मा मदद करदेंन |
 स्यू कभी नि हटदी पिछाडी ||
       
         कब व्हेगी रात काम काज मा|
         यन ब्यस्त स्यू रंदेंन सारी ||
 
 हमारू भी फर्ज बंणदू यनु |
 देवा यूँ तै इज्जत भारी ||
         
          धन धन हे पहाड़ की नारी |
          दुःख तकलीफ उठौदेंन भारी ||
 
 द्वारा रचित >भगवान सिंह जयारा
 अबुधाबी (संयुक्त अरब अमीरात )
 दिनांक >१५/०४/२०१२
 http://pahadidagadyaa.blogspot.ae/

एम.एस. मेहता /M S Mehta 9910532720

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भगवान सिंह जयाड़ा November 2 · Editedसभी मित्रों व समस्त देशवासियों को दीपावली कि हार्दिक शुभ कामनाएं ,,आओ सब मिलकर इस दीपावली पर एक ऐसा दीप जलाएं ,जिस कि रोशनी से सब के मन का अज्ञान रुपी अन्धकार दूर हो और ज्ञान रुपी प्रकाश का संचरण हो ,,कबिता रूप में मेरा एक छोटा सा प्रयाश ,,,,
 -------------------------------------
  ---- एक ऐसा दीप जलाएं ----
 ------------------------------------------
 दीपावली का यह पावन पर्ब, ऐसी खुशियां लाए ,
 मिटे  तम अज्ञान का, ज्ञान का उजियारा छाए ,
               
               हर दीप से देश प्रेम का आज ,ऐसा फैले प्रकाश ,
               जिसकी लौ से समृद्ध हो,यह धरती और आकाश ,
 
 द्वेष भाव की भावना  ,दिलों से सब के मिट जाए ,
 आपसी भाईचारा और अमन हर जगह छा जाए ,
               
               अन्धकार सबके दिलों का,यह ऐसा दूर  भगा दे ,
 देश प्रेम और भाईचारा ,हर जन जन में जगा दे ,
 
 दीपावली का यह पावन पर्ब, ऐसी खुशियां लाए ,
 मिटे  तम अज्ञान का, ज्ञान का उजियारा छाए ,
               
               देश का कोइ भी जन,अब यहाँ भूखे पेट न सोए ,
               चहुँ ओर हो यहाँ खुशहाली ,ऐसा मेरा भारत होवे ,
 
 दीप जलाकर दिलों में अपने ,कर लो यह संज्ञान ,
 इस की  प्रज्वलित लौ से ,दूर हो सब का अज्ञान ,
               
                दीप जोति से जैसे भागे,घना  काला अंधनियारा ,
                उसी दीप जोति से प्रभो ,कर दो मन में उजियारा ,
 
 घर घर में छाये ख़ुशी ,और रहे सब अमन बहार ,
 तभी समझेगा जन ,सच्चा दीपों का यह त्यौहार ,
                 
                 आवो सब मिलकर आज एक ऐसा दीप जलाएं ,
                 भागे अज्ञान का अन्धकार, नया बिश्वाश जगाये ,
 
 दीपावली का यह पावन पर्ब, ऐसी खुशियां लाए ,
 मिटे  तम अज्ञान का, ज्ञान का उजियारा छाए ,
 --------------------------------------------------
 द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
 दिनांक >०२/११/२०१३
 सर्ब अधिकार सुरक्षित @

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भगवान सिंह जयाड़ा October 27 near Abu Dhabi, United Arab Emirates · Editedतन्हाइयां कभी कभी इन्शान को मायूश कर देती है ,और फिर हर इन्शान सोचने लगता है कुछ इस कदर ,,,,,,,,कबिता रूप में मेरा प्रयाश ,,,,,
   
         --------- तन्हाइयां ----------
 -------------------------------------------
 तन्हाइयां दिल को दुखाती हैं इस कदर ।
 मन लगता नहीं चाहे अब जाऊ जिधर ॥
             
              बस एकाकीपन की चुभन हर दम मन में।
              एक सिंहरन जी जगा देती है मेरे तन में ॥
 
 अपनों से मिलने की  तड़फ सी होती है ।
 आरजू मेरे दिल की दिल में ही रोती  है ॥
               
               घुटन के आंशू सदा यूँ ही हम पी लेते है ।
               मिलन की आश  में कैसे भी जी लेते है ॥
 
 समझो जिंदगी जी रहे है हम इस कदर ।
 बस ठोकरें खाते रहते है सदा दर बदर ॥
               
               तन्हाइयां दिल को दुखाती हैं इस कदर ।
               मन लगता नहीं चाहे अब जाऊ जिधर ॥
 
 रात के अंधेरों से भी अब यूँ डर लगता है।
 गुम न जाएँ कहीं हम ,दिल सदा डरता है॥
               
                जिंदगी का आलम बना अब इस कदर ।
                चाह कर भी कदम नहीं जाते अब उधर ॥
 
 तन्हाइयों की अब आदत सी हो गयी है ।
 अब हसरतें गिंदगी की सब सो गयी है ॥
                 
                 जागनें की कोशिश यूँ तो बहुत करते है।
                 गिंदगी में कई बार जीते और मरते है ॥
 
 अपने शुख चैन की सदा चढ़ा रहे हैं बली।
 फिर भी हसरतें कभी नहीं फूली फली ॥
                 
                  निगाहें शकुन के लिए घुमाता हूँ जिधर ।
                  बस एक मायूसी सी नजर आती है उधर॥
 
 तन्हाइयां दिल को दुखाती हैं इस कदर ।
 मन लगता नहीं चाहे अब जाऊ जिधर ॥
                   
                  फिर भी जगाये रखा हूँ मन में एक आशा।
                   दूर होगी क्या, सबके मन से यह निराशा॥
 
 मन में बनी रहे सदा कुछ करने की उमंग ।
 जागेगी मन में हौशलों की एक नई तरंग ॥
                 
                  बस यही सोच कर अपने आंशू पी लेता हूँ ।
                   उम्मीदों के सहारे जिंदगी यूँ ही जी लेता हूँ ॥
 
 देकर दिलाशा जिंदगी को कुछ  इस कदर ।
 बरना इस मतलबी दुनिया में जाएगे किधर॥
                   
                    तन्हाइयां दिल को दुखाती हैं इस कदर ।
                    मन लगता नहीं चाहे अब जाऊ जिधर ॥
 --------------------------------------------------
 द्वारा रचित >भगवान सिंह जायाड़ा
 दिनांक >२६/१०/२०१३
 सर्ब अधिकार सुरक्षित @
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भगवान सिंह जयाड़ा October 23 near Abu Dhabi, United Arab Emiratesआज फिर सभी चैनलों पर प्याज की चर्चा चल रही है ,चलेगी भी क्यों नहीं ,सेंचुरी जो लगाई है प्याज ने !!!!!!!!!!!!!!!!!!मेरी पुर्व प्रकाशित एक रचना ,,,,,
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  -------हाई रे प्याज----------
 ------------------------------------------------
 प्याज प्याज सभी जगा चर्चा मा आज होयुं छ ,
 किलै मेरु यु देश अभी भी यन सुनिंद मा सेयुं छ ,
                         आज प्याज टमाटर ,का होयां छन यु हाल जख  ,
                          गरीब गुरबौऊ कु भी होन्दु थौ ,हक़ जै पर यख ,
 साग भुज्जी कु स्वाद बिगाड़ीगी देखा यु प्याज ,
 बिना प्याज टमाटर कु ही मजबूर छन लोग आज ,
                           प्याज टमाटर बणिज्ञन जख ,देखा अमीरु की शान ,
                           गरीब की जाणी छ सदा कनी ,यख महंगाई सी जान ,
 दाल रोटी का भी अब पड़न वाला छन यख लाला ,
 कुछ सदबुद्धि दी मेरी सरकार तै तू ,हे ऊपर वाला ,
                            रूप्या की कीमत की यनि बुरी गति कभी नि होई ,
                             खिस्सा भौरी क भी लिजावा , सामान कुछ नि आई ,
 प्याज प्याज सभी जगा चर्चा मा आज होयुं छ ,
 किलै मेरु यु देश अभी भी यन सुनिंद मा सेयुं छ ,
 
 ----------------------------------------------------
 द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
 सर्ब अधिकार सुरक्षित @
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भगवान सिंह जयाड़ा
November 12
अपने एक अजीज मित्र की लिखी रचना पढ़ी जो अपने गाँओ की ब्यथा पर लिखी थी ,उसी से पिरेरणा ले कर यह लाइनें लिख रहा हूँ ,उम्मीद करता हूँ आप लोग भी जन्म भूमि के इस दर्द को गहराई से समझने की कोशिश करेंगे,,,


>जन्म भूमि की पुकार<
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कभी मुड़ीक जरा इथै भी देखा ।
बैर इथगा तुम मै सी नि राखा ॥
किलै छां बिमुख मै सी होण्या ।
अपरू जलणु किलै छै खोण्या ॥
फांग्यों मा तुम जख भी जैल्या ।
भटकी तैई फिर भी मैमू एल्या ॥
माँ का समान छौऊ मै तुम्हारी ।
रोंदू मै जब याद औन्दी तुम्हारी ॥
खेल्यां जख जै माटी मा म्यारी ।
भूली गया बचपन की याद प्यारी ॥
बुड्या ब्वे बाबू भी तुम हेरदी रांदा ।
कब ऐला घौर तुम ,खुदेंण्यां रांदा ॥
छोड़ीक मैकू ,तुम किलै जाण्यां ।
गौऊ छोड़ीक छै,परदेशी होण्या ॥
खाण कामौंण कु कखी भी जावा ।
पर सदानी तुम यु , ध्यान द्यावा ॥
गौऊ मुल्क सदा औन्दु जांदू रवा ।
माँ सी अपरी यन बिमुख नि होवा॥
जन्म भूमि कू तुम रखा सदा मान ।
जन्म भूमि होंदी माँ का समान ॥
कभी मुड़ीक जरा इथै भी देखा ।
बैर इथगा तुम मै सी नि राखा ॥
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द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
दिनांक >२७ /०५ /२०१३
पूर्व प्रकाषित @

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आजकल चुनावी रैलियों का दौर चल रहा है ,हर पार्टी अपनी बड़ाई करने में व दूसरी पार्टी को नीचा दिखाने में कोइ कशर नहीं छोड़ रही है ,और आम जनता को फिर गुमराह करने कि कोशिश की जा रही है , इसी पर मेरा कुछ लिखने का प्रयाश ,,,,, कबिता के बोल गढ़वाली में ,,,,
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--चुनावी रैलियां----
-----------------------------
नेतावों मां छिड़गी फिर
चुनावी रैलियों की जंग ,
पुराणी चिकनी चुपड़ी बात
फिर भोली जनता का संग ,

यख आम जनता व्हेगी
अब यूँ नेताऔ सी तंग ,
आपस मा छन लडण्या
जन हो छिड़ी क्यू जंग ,

भाषण मां बादा त सदानी
स्यू ,बड़ा बड़ा करदा,
जनता कु भलू कम ,
अपरा खिस्सा जादा भरदा ,

देखा आम जनता यख
सदानी ठगीं सी रै जांदी ,
पांच साल का बाद ही तौ
जनता कि याद औन्दी ,

अपरा पाप सदानी स्यू
छुपौण की कोशिश करदा ,
पाप कु ठिकरु सदानी ,
दूसरा का मुंड मा धरदा ,

शर्म लाज देखा यूँ की
अब कखी हरची सी गैई ,
लोक लाज की बात अब
कैका दिल मान नि रैई ,

झूठ बोलण कि कला अब
जथगा जादा जैसन औन्दी ,
खूब चांदी काटदू स्यू यख
और जीत भी वेकी ही होंदी ,

भोली भाली जनता यख
सदानी देखदी रै जांदी ,
गरीब जनता की याद
तौ चुनाव का बक्त आंदी ,

गरीब का मुख कु निवाळु
स्यू छिनी कै छन खाण्यां ,
गरीब ,देश का यख सदानी
दुःख तकलीफ मां छन राण्यां ,

कुकर बिराळो की तरौ रोज
आपस मा छन स्यू लडण्या,
देश जागीर हो जनि युंकी
यन आपस मा झगण्यां,

बोलण कु त देश हमारू
आजाद बहुत पैली व्हेगी ,
पर नेतौऊ की गुलामी मां
आज भारत मां जकड़ी रैगी ,

खानदानी राजनीति कु
होयुं सब जगा बोलबाला ,
जागीर अपरि समझंण्या
यू हमारा देश का रखवाला ,

नीद मा सेंई जनता अब
जरा आँखा अपरा खोला ,
एक स्वर मां अब मिलीकी
तुम जय भारत माँ बोला ,

कुशासन का ये तंत्र सन
अबकी हम बदली द्योला ,
सच्चा देश प्रेम की अलख
अब सरा देश मां जगौला ,

काला कारनामा अब यूँ का
तुम अच्छी तरौ सी पछाणा ,
बदलाव की आंधी कथै बगणी
अपरा दिल सी अब तुम जाणा ,

नेतावों मां छिड़गी फिर
चुनावी रैलियों की जंग ,
पुराणी चिकनी चुपड़ी बात
फिर भोली जनता का संग ,
-------------------------------
द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
दिनांक >०९/११/२०१३
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पहाड़ की नारी की दिनचर्या पर मेरा अनुभव ,शंघर्ष पूर्ण जीवन यापन के इस जजब्बे को मेरा नमन ,,,,
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पहाड़ की नारी
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धन धन हे पहाड़ की नारी |
दुःख तकलीफ उठौदेंन भारी ||

शुबेर बीटी श्याम व्हेई जांदी |
सदानी काम की मारा मारी ||

चौका चुल्लू ,शुबेर उठीक |
गौरू भैंसों की देख भाल ||

बच्चों सन स्कूल भेजिक |
तब होंदी घास की तैयारी ||

धन धन हे पहाड़ की नारी |
दुःख तकलीफ उठौंदेंन भारी ||

घास लाखडू सी निपटीक |
फिर ओन्दी पुन्गडो की बारी ||

खेत खलियाण सब देखण |
दाना संयाणों कु ख्याल राखण ||

मर्द त प्रदेश छन जिंदगी सारी |
धन धन हे पहाड़ की नारी ||

रौऊ रिस्तादारी भी देखण पड़दी |
या जिम्मेदारी भी निभौंण पड़दी ||

घौर बौंण कू सब चरखा चलौंदी |
जिम्मेबारी अपरि सारी निभौंदी ||

दुःख तकलीफ मा मदद करदेंन |
स्यू कभी नि हटदी पिछाडी ||

कब व्हेगी रात काम काज मा|
यन ब्यस्त स्यू रंदेंन सारी ||

हमारू भी फर्ज बंणदू यनु |
देवा यूँ तै इज्जत भारी ||

धन धन हे पहाड़ की नारी |
दुःख तकलीफ उठौदेंन भारी ||

द्वारा रचित >भगवान सिंह जयारा
अबुधाबी (संयुक्त अरब अमीरात )
दिनांक >१५/०४/२०१२
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-----क्रिकेट का भगवान------
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राज पुर,महाराष्ट्र राज्य की भूमि पर
२४अप्रैल१९७३ ,जन्मा एक सितारा,
अपने दृढ़ संकल्प और मेहनत से जो ,
बना करोड़ों भारत वासियों का प्यारा ,
                कौन जानता था ,यह मासूम बच्चा ,
                बनेगा एक दिन क्रिकेट का भगवान ,
                अपनी लग्न और मेहनत से यूँ आज ,
                क्रिकेट की दुनियां में यह बना महान ,
चूंम कर बुलंदियां यूँ क्रिकेट की आज ,
अपने कौशल से बना सब का दुलारा ,
बस जीत और सिर्फ जीत कि उमंग ,
जगमगाया जैसे नभ में एक सितारा ,
                 रचे रोज नयें नयें इतिहास क्रिकेट में,
                 हर कामियाबी से देश का गौरब बढ़ाया,
                 क्रिकेट जगत में यूँ रोशन किया नाम ,
                 दुनियां में भारत ने खूब नाम कमांया ,
पहुंचा है आज उस बुलंदी पर सचिन ,
जहां सायद अब कोई न पंहुच पायेगा ,
रोशन रहेगा नाम सदा क्रिकेट जगत में ,
सितारा जो सदियों तक जगमगाएगा ,
                  लिटिल मास्टर और मास्टर ब्लास्टर ,
                  उपनामों से सचिन नें खूब नाम कमाया,
                  अपने अद्भुत कौशल और खेल भाव से ,
                  सदा अपने चाहने वालों के दिल में छाया ,
राजीव गांधी खेल रत्न और पद्म बिभूषण ,
इस महान खिलाड़ी को मिला है सम्मान ,
बस अब तैयारी है सिर्फ भारत रत्न की ,
तोहफा होगा देश का,बढे सचिन का मान ,
                   दुवा करो कि ,राजनीति में सचिन न आये ,
                   राजनीति के कीचड़ से सचिन लौट जाये  ,
                   बरना चमकती छबि ,धूमिल हो जायेगी ,
                   लोगो के दिलों में बनी जगह घट जायेगी ,
              ----------------------------------------------------
              द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
              दिनांक >१ ५/११/२०१३
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  -खामोश झील- 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 ---------खामोश झील-------------
 ------------------------------------------
 शांत झील की गहराइयों से पूछो कभी ,
 दिल में उनके क्या अरमान मचलते है ,
                मनचले झरनों की ख्वाइशे है जिन में ,
                जो इस में ,सदा के लिए समा गयी हैं  ,
 राह चलते हम भी इतराए थे यहाँ कभी ,
 अब मौन और निष्चल आदत हो गयी है,
                राहों की वह ,तीब्र धार की ख्वाईसें मेरी ,
                सोचा न था ,झील में खामोश हो जायेंगी ,
 कभी कभी यूँ हवा के झोंके हिला देते है ,
 दबे हुए अरमानों को फिर से जगा देते है ,
                 बरना इन पहाड़ों की चारदीवारी में कैद ,
                 इनके प्रतिबिम्बों को निहारती रहती हूँ ,
 मेरे दबे अरमानों को रास्ता मिला अगर ,
 तो आक्रोश में कभी ,प्रलय भी करती हूँ ,
                  बरना शांत निष्चल पड़ी, इस धरा  पर ,
                  शांत जल से ,सब का दिल बहलाती हूँ ,
 शांत झील की गहराइयों से पूछो कभी ,
 दिल में उनके क्या अरमान मचलते है ,
 ----------------------------------------------
  द्वारा रचित >भगवान सिंह जयाड़ा
 दिनांक >२५ /०८ /२०१३
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October 15 at 11:15pm ·

दोस्तों की महफ़िल जब सजती है अक्सर ,
हम भी शामिल होने की कोशिश करते है ,
यह तो दोस्तों की दिल्ल्गी पर निर्भर है ,
वह चाहने वालों को कितनी तबज्जो देते है ,
---------------------------------------
-------भगवान सिंह जयाड़ा---

 

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